अनुशासन पर्व · अध्याय 81
स्त्रियों का सम्मान
भीष्म प्राचेतस का नियम बताते हैं कि कन्या के बदले कुछ न लेने वाले बन्धु विक्रय नहीं करते, और कहते हैं कि पिता, भाई और पति स्त्रियों का आदर और लाड़ करें। जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है वहाँ देवता रमण करते हैं, और जिस घर को वे शाप दें वह नष्ट हो जाता है। मनु ने स्त्रियों को पुरुषों को सौंपा, स्त्री का धर्म पति की सेवा है, और लाड़-प्यार पाई स्त्री स्वयं श्री बन जाती है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.81.1)
प्राचेतसस्य वचनं कीर्तयन्ति पुराविदः । यस्याः किञ्चिन्नाददते ज्ञातयो न स विक्रयः ॥
prācetasasya vacanaṃ kīrtayanti purāvidaḥ | yasyāḥ kiñcinnādadate jñātayo na sa vikrayaḥ
पुरानी बातों के जानकार प्राचेतस का वचन सुनाते हैं: जिस कन्या के बदले उसके बन्धु कुछ नहीं लेते, वह विक्रय नहीं है।
श्लोक 2 (13.81.2)
अर्हणं तत्कुमारीणामानृशंस्यं व्रतं च तत् । सर्वं च प्रतिदेयं स्यात्कन्यायै तदशेषतः ॥
arhaṇaṃ tatkumārīṇāmānṛśaṃsyaṃ vrataṃ ca tat | sarvaṃ ca pratideyaṃ syātkanyāyai tadaśeṣataḥ
वह कुमारियों का सम्मान और दयालुता का व्रत है; और जो कुछ लिया गया हो, वह सब कन्या को पूरा लौटा देना चाहिए।
श्लोक 3 (13.81.3)
पितृभिर्भ्रातृभिश्चापि श्वशुरैरथ देवरैः । पूज्या लालयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥
pitṛbhirbhrātṛbhiścāpi śvaśurairatha devaraiḥ | pūjyā lālayitavyāśca bahukalyāṇamīpsubhiḥ
जो बहुत कल्याण चाहते हैं, उन पिताओं, भाइयों, श्वशुरों और देवरों को चाहिए कि वे उनका आदर और लाड़-प्यार करें।
श्लोक 4 (13.81.4)
यदि वै स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत् । अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनो न प्रवर्धते ॥
yadi vai strī na roceta pumāṃsaṃ na pramodayet | apramodātpunaḥ puṃsaḥ prajano na pravardhate
यदि स्त्री प्रसन्न न हो तो वह पति को आनन्द नहीं देगी; और पति के आनन्दित न होने पर सन्तानोत्पत्ति नहीं बढ़ती।
श्लोक 5 (13.81.5)
पूज्या लालयितव्याश्च स्त्रियो नित्यं जनाधिप । स्त्रियो यत्र च पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ॥
pūjyā lālayitavyāśca striyo nityaṃ janādhipa | striyo yatra ca pūjyante ramante tatra devatāḥ
हे जनाधिप, स्त्रियों का सदा आदर और लाड़-प्यार करना चाहिए। जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता रमण करते हैं।
श्लोक 6 (13.81.6)
अपूजिताश्च यत्रैताः सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः । तदा चैतत्कुलं नास्ति यदा शोचन्ति जामयः ॥
apūjitāśca yatraitāḥ sarvāstatrāphalāḥ kriyāḥ | tadā caitatkulaṃ nāsti yadā śocanti jāmayaḥ
जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ सब कर्म निष्फल होते हैं। उसी समय वह कुल नहीं रह जाता जब घर की स्त्रियाँ शोक करती हैं।
श्लोक 7 (13.81.7)
जामीशप्तानि गेहानि निकृत्तानीव कृत्यया । नैव भान्ति न वर्धन्ते श्रिया हीनानि पार्थिव ॥
jāmīśaptāni gehāni nikṛttānīva kṛtyayā | naiva bhānti na vardhante śriyā hīnāni pārthiva
जिन घरों को घर की स्त्रियाँ शाप दे देती हैं, वे अभिचार से कटे हुए-से नष्ट हो जाते हैं; हे राजन्, वे श्री से हीन होकर न शोभा पाते हैं, न बढ़ते हैं।
श्लोक 8 (13.81.8)
स्त्रियः पुंसां परिददौ मनुर्जिगमिषुर्दिवम् । अबलाः स्वल्पकौपीनाः सुहृदः सत्यजिष्णवः ॥
striyaḥ puṃsāṃ paridadau manurjigamiṣurdivam | abalāḥ svalpakaupīnāḥ suhṛdaḥ satyajiṣṇavaḥ
स्वर्ग जाने की इच्छा वाले मनु ने स्त्रियों को पुरुषों को सौंपा, जो अबला, अल्प वस्त्र वाली, स्नेहमयी और सत्य से विजय पाने वाली हैं।
श्लोक 9 (13.81.9)
ईर्षवो मानकामाश्च चण्डाश्च सुहृदोऽबुधाः । स्त्रियस्तु मानमर्हन्ति ता मानयत मानवाः ॥
īrṣavo mānakāmāśca caṇḍāśca suhṛdo'budhāḥ | striyastu mānamarhanti tā mānayata mānavāḥ
वे ईर्ष्यालु, मान चाहने वाली, उग्र, स्नेहमयी और अबोध होती हैं; फिर भी स्त्रियाँ सम्मान के योग्य हैं, इसलिए हे मनुष्यो, उनका सम्मान करो।
श्लोक 10 (13.81.10)
स्त्रीप्रत्ययो हि वै धर्मो रतिभोगाश्च केवलाः । परिचर्या नमस्कारास्तदायत्ता भवन्तु वः ॥
strīpratyayo hi vai dharmo ratibhogāśca kevalāḥ | paricaryā namaskārāstadāyattā bhavantu vaḥ
तुम्हारा धर्म स्त्रियों पर निर्भर है, और केवल रति के भोग भी; सेवा और नमस्कार भी उन्हीं के अधीन रहें।
श्लोक 11 (13.81.11)
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् । प्रीत्यर्थं लोकयात्रायाः पश्यत स्त्रीनिबन्धनम् ॥
utpādanamapatyasya jātasya paripālanam | prītyarthaṃ lokayātrāyāḥ paśyata strīnibandhanam
सन्तान को जन्म देना, उत्पन्न हुई सन्तान का पालन करना, और आनन्द के लिए लोकयात्रा चलाना, देखो, यह सब स्त्रियों पर ही टिका है।
श्लोक 12 (13.81.12)
सम्मान्यमानाश्चैता हि सर्वकार्याण्यवाप्स्यथ । विदेहराजदुहिता चात्र श्लोकमगायत ॥
sammānyamānāścaitā hi sarvakāryāṇyavāpsyatha | videharājaduhitā cātra ślokamagāyata
यदि तुम इनका सम्मान करोगे, तो सब कार्य सिद्ध कर लोगे। इस विषय में विदेहराज की पुत्री ने एक श्लोक गाया था।
श्लोक 13 (13.81.13)
नास्ति यज्ञः स्त्रियाः कश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् । धर्मः स्वभर्तृशुश्रूषा तया स्वर्गं जयन्त्युत ॥
nāsti yajñaḥ striyāḥ kaścinna śrāddhaṃ nopavāsakam | dharmaḥ svabhartṛśuśrūṣā tayā svargaṃ jayantyuta
स्त्री के लिए न कोई यज्ञ है, न श्राद्ध, न उपवास; उसका धर्म अपने पति की सेवा है, और उसी से वे स्वर्ग जीतती हैं।
श्लोक 14 (13.81.14)
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्राश्च स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥
pitā rakṣati kaumāre bhartā rakṣati yauvane | putrāśca sthāvire bhāve na strī svātantryamarhati
बचपन में पिता उसकी रक्षा करता है, यौवन में पति रक्षा करता है, और वृद्धावस्था में पुत्र; स्त्री स्वतन्त्रता के योग्य नहीं है।
श्लोक 15 (13.81.15)
श्रिय एताः स्त्रियो नाम सत्कार्या भूतिमिच्छता । लालिताऽनुगृहीता च श्रीः स्त्री भवति भारत ॥
śriya etāḥ striyo nāma satkāryā bhūtimicchatā | lālitā'nugṛhītā ca śrīḥ strī bhavati bhārata
ये स्त्रियाँ श्री के ही रूप हैं; समृद्धि चाहने वाले को इनका सत्कार करना चाहिए। हे भारत, लाड़-प्यार और अनुग्रह पाई हुई स्त्री स्वयं श्री बन जाती है।