Skip to main content

अनुशासन पर्व · अध्याय 82

भिन्न-भिन्न वर्णों की पत्नियों के पुत्रों में पिता के धन का विभाजन

युधिष्ठिर पूछते हैं कि भिन्न-भिन्न वर्णों की पत्नियों से उत्पन्न पुत्रों में पिता का धन कैसे बाँटा जाए। भीष्म ब्राह्मण के धन (दस भाग), क्षत्रिय के धन (आठ भाग), वैश्य के धन (पाँच भाग) और शूद्र के धन (समान भाग) का विभाजन बताते हैं। साथ ही वे कन्या और पत्नी के धन, ब्राह्मणी पत्नी की ज्येष्ठता और ज्येष्ठ पुत्र के बड़े भाग के नियम भी कहते हैं।

अध्याय 81अध्याय-सूचीअध्याय 83

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.82.1)

सर्वशास्त्रविधानज्ञ राजधर्मविदुत्तम । अतीव संशयच्छेत्ता भवान्वै प्रथितः क्षितौ ॥

sarvaśāstravidhānajña rājadharmaviduttama | atīva saṃśayacchettā bhavānvai prathitaḥ kṣitau

हे सब शास्त्रों के विधान के ज्ञाता, राजधर्म जानने वालों में श्रेष्ठ, पृथ्वी पर आप संशयों को पूरी तरह काट देने वाले के रूप में विख्यात हैं।

श्लोक 2 (13.82.2)

कश्चित्तु संशयो मेऽस्ति तन्मे ब्रूहि पितामह । अस्यामापदि कष्टायामन्यं पृच्छाम कं वयम् । जातेऽस्मिन्संशये राजन्नान्यं पृच्छेम कञ्चन ॥

kaścittu saṃśayo me'sti tanme brūhi pitāmaha | asyāmāpadi kaṣṭāyāmanyaṃ pṛcchāma kaṃ vayam | jāte'sminsaṃśaye rājannānyaṃ pṛcchema kañcana

पितामह, मेरे मन में एक संशय है; उसे मुझे बताइए। इस कष्टकारी विपत्ति में हम आपको छोड़कर और किससे पूछें? हे राजन्, जब यह संशय उठा है तो हम किसी दूसरे से नहीं पूछ सकते।

श्लोक 3 (13.82.3)

यथा नरेण कर्तव्यं धर्ममार्गानुवर्तिना । एतत्सर्वं महाबाहो भवान्व्याख्यातुमर्हति ॥

yathā nareṇa kartavyaṃ dharmamārgānuvartinā | etatsarvaṃ mahābāho bhavānvyākhyātumarhati

हे महाबाहो, धर्म के मार्ग पर चलने वाले मनुष्य को जो कुछ करना चाहिए, वह सब आप मुझे समझाइए।

श्लोक 4 (13.82.4)

चतस्रो विहिता भार्या ब्राह्मणस्य पितामह । ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या शूद्रा च रतिमिच्छतः ॥

catasro vihitā bhāryā brāhmaṇasya pitāmaha | brāhmaṇī kṣatriyā vaiśyā śūdrā ca ratimicchataḥ

पितामह, ब्राह्मण के लिए चार पत्नियाँ विहित हैं: ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा, यदि वह सुख की इच्छा करे।

श्लोक 5 (13.82.5)

तत्र जातेषु पुत्रेषु सर्वासां कुरुसत्तम । आनुपूर्व्येण कस्तेषां पित्र्यं दायाद्यमर्हति ॥

tatra jāteṣu putreṣu sarvāsāṃ kurusattama | ānupūrvyeṇa kasteṣāṃ pitryaṃ dāyādyamarhati

हे कुरुश्रेष्ठ, उन सब पत्नियों से उत्पन्न पुत्रों में से, किस क्रम से कौन पिता की सम्पत्ति का अधिकारी होता है?

श्लोक 6 (13.82.6)

केन वा किं ततो हार्यं पितृवित्तात्पितामह । एतदिच्छामि कथितं विभागस्तेषु कः स्मृतः ॥

kena vā kiṃ tato hāryaṃ pitṛvittātpitāmaha | etadicchāmi kathitaṃ vibhāgasteṣu kaḥ smṛtaḥ

और पितामह, पिता के धन में से किसे क्या लेना है? मैं यह सुनना चाहता हूँ कि उनके बीच कौन-सा विभाजन बताया गया है।

भीष्म उवाच

श्लोक 7 (13.82.7)

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः । एतेषु विहितो धर्मो ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ॥

brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyastrayo varṇā dvijātayaḥ | eteṣu vihito dharmo brāhmaṇasya yudhiṣṭhira

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन द्विजाति वर्ण हैं। युधिष्ठिर, इनमें ब्राह्मण के लिए जो विधान बताया गया है, वही मैं कहूँगा।

श्लोक 8 (13.82.8)

वैषम्यादथवा लोभात्कामाद्वाऽपि परन्तप । ब्राह्मणस्य भवेच्छूद्रा न तु दृष्टा न तु स्मृता ॥

vaiṣamyādathavā lobhātkāmādvā'pi parantapa | brāhmaṇasya bhavecchūdrā na tu dṛṣṭā na tu smṛtā

हे परंतप, विपरीत बुद्धि, लोभ या कामना से ब्राह्मण की कोई शूद्रा पत्नी भी हो सकती है; किंतु वह न श्रुति में देखी गई है, न स्मृति में कही गई है।

श्लोक 9 (13.82.9)

शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् । प्रायश्चित्तीयते चापि विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

śūdrāṃ śayanamāropya brāhmaṇo yātyadhogatim | prāyaścittīyate cāpi vidhidṛṣṭena karmaṇā

जो ब्राह्मण शूद्रा स्त्री को अपनी शय्या पर बिठाता है, वह अधोगति को प्राप्त होता है; और विधि में देखे गए कर्म से उसे प्रायश्चित्त भी करना पड़ता है।

श्लोक 10 (13.82.10)

तत्र जातेष्वपत्येषु द्विगुणं स्याद्युधिष्ठिर । अतस्ते नियमं वित्ते सम्प्रवक्ष्यामि भारत ॥

tatra jāteṣvapatyeṣu dviguṇaṃ syādyudhiṣṭhira | ataste niyamaṃ vitte sampravakṣyāmi bhārata

युधिष्ठिर, ऐसी स्त्री से सन्तान उत्पन्न होने पर प्रायश्चित्त दुगुना हो जाता है। इसलिए भारत, अब मैं धन के विषय में नियम तुम्हें बताऊँगा।

श्लोक 11 (13.82.11)

लक्षण्यं गोवृषो यानं यत्प्रधानतमं भवेत् । ब्राह्मण्यास्तद्धरेत्पुत्र एकांशं वै पितुर्धनात् ॥

lakṣaṇyaṃ govṛṣo yānaṃ yatpradhānatamaṃ bhavet | brāhmaṇyāstaddharetputra ekāṃśaṃ vai piturdhanāt

शुभ लक्षणों वाला बैल, सवारी और जो कुछ सबसे उत्तम हो, उसे ब्राह्मणी का पुत्र पिता के धन में से एक विशेष अंश के रूप में ले।

श्लोक 12 (13.82.12)

शेषं तु दशधा कार्यं ब्राह्मणस्वं युधिष्ठिर । तत्र तेनैव हर्तव्याश्चत्वारोंशाः पितुर्धनात् ॥

śeṣaṃ tu daśadhā kāryaṃ brāhmaṇasvaṃ yudhiṣṭhira | tatra tenaiva hartavyāścatvāroṃśāḥ piturdhanāt

युधिष्ठिर, ब्राह्मण के शेष धन के दस भाग किए जाएँ; उनमें से वही पुत्र पिता के धन के चार भाग ले।

श्लोक 13 (13.82.13)

क्षत्रियायास्तु यः पुत्रो ब्राह्मणः सोप्यसंशयः । स तु मातुर्विशेषेण त्रीनंशान्हर्तुमर्हति ॥

kṣatriyāyāstu yaḥ putro brāhmaṇaḥ sopyasaṃśayaḥ | sa tu māturviśeṣeṇa trīnaṃśānhartumarhati

क्षत्रिया पत्नी का जो पुत्र है, वह भी निःसंदेह ब्राह्मण ही है; किंतु माता के भेद के कारण वह तीन भाग लेने का अधिकारी है।

श्लोक 14 (13.82.14)

वर्णे तृतीये जातस्तु वैश्यायां ब्राह्मणादपि । द्विरंशस्तेन हर्तव्यो ब्राह्मणस्वाद्युधिष्ठिर ॥

varṇe tṛtīye jātastu vaiśyāyāṃ brāhmaṇādapi | dviraṃśastena hartavyo brāhmaṇasvādyudhiṣṭhira

तीसरे वर्ण की वैश्या स्त्री से ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न पुत्र ब्राह्मण के धन में से दो भाग ले, युधिष्ठिर।

श्लोक 15 (13.82.15)

शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातो नित्यादेयधनः स्मृतः । अल्पं चापि प्रदातव्यं शूद्रापुत्राय भारत ॥

śūdrāyāṃ brāhmaṇājjāto nityādeyadhanaḥ smṛtaḥ | alpaṃ cāpi pradātavyaṃ śūdrāputrāya bhārata

ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र धन का अधिकारी नहीं माना गया है; फिर भी भारत, शूद्रा के पुत्र को थोड़ा-सा तो अवश्य देना चाहिए।

श्लोक 16 (13.82.16)

दशधा प्रविभक्तस्य धनस्यैव भवेत्क्रमः । सवर्णासु तु जातानां समान्भागान्प्रकल्पयेत् ॥

daśadhā pravibhaktasya dhanasyaiva bhavetkramaḥ | savarṇāsu tu jātānāṃ samānbhāgānprakalpayet

दस भागों में बँटे धन का यह क्रम है; किंतु सवर्ण पत्नियों से उत्पन्न पुत्रों के लिए बराबर भाग ठहराए जाएँ।

श्लोक 17 (13.82.17)

अब्राह्मणं तु मन्यन्ते शूद्रापुत्रमनैपुणात् । त्रिषु वर्णेषु जातो हि ब्राह्मणाद्ब्राह्मणो भवेत् ॥

abrāhmaṇaṃ tu manyante śūdrāputramanaipuṇāt | triṣu varṇeṣu jāto hi brāhmaṇādbrāhmaṇo bhavet

योग्यता की कमी के कारण लोग शूद्रा के पुत्र को ब्राह्मण नहीं मानते; किंतु ब्राह्मण से तीन वर्णों की स्त्रियों में उत्पन्न पुत्र ब्राह्मण ही होता है।

श्लोक 18 (13.82.18)

स्मृताश्च वर्णाश्चत्वारः पञ्चमो नाधिगम्यते । हरेच्च दशमं भागं शूद्रापुत्रः पितुर्धनात् ॥

smṛtāśca varṇāścatvāraḥ pañcamo nādhigamyate | harecca daśamaṃ bhāgaṃ śūdrāputraḥ piturdhanāt

वर्ण चार ही बताए गए हैं, पाँचवाँ नहीं मिलता। शूद्रा का पुत्र पिता के धन का दसवाँ भाग ले।

श्लोक 19 (13.82.19)

तत्तु दत्तं हरेत्पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति । अवश्यं हि धनं देयं शूद्रापुत्राय भारत ॥

tattu dattaṃ haretpitrā nādattaṃ hartumarhati | avaśyaṃ hi dhanaṃ deyaṃ śūdrāputrāya bhārata

परंतु वह वही ले सकता है जो पिता ने दिया हो; जो न दिया गया हो, उसे लेने का वह अधिकारी नहीं। फिर भी भारत, शूद्रा के पुत्र को धन देना अवश्य चाहिए।

श्लोक 20 (13.82.20)

आनृशंस्यं परो धर्म इति तस्मै प्रदीयते । यत्रतत्र समुत्पन्नं गुणायैवोपपद्यते ॥

ānṛśaṃsyaṃ paro dharma iti tasmai pradīyate | yatratatra samutpannaṃ guṇāyaivopapadyate

दया सबसे बड़ा धर्म है, इसलिए उसे दिया जाता है; जहाँ कहीं और जिस किसी को दिया गया दान गुण के लिए ही होता है।

श्लोक 21 (13.82.21)

यद्यप्येष सुपुत्रः स्यादपुत्रो यदि वा भवेत् । नाधिकं दशमाद्दद्याच्छूद्रापुत्राय भारत ॥

yadyapyeṣa suputraḥ syādaputro yadi vā bhavet | nādhikaṃ daśamāddadyācchūdrāputrāya bhārata

चाहे यह सुपुत्र हो, या पिता के और पुत्र न भी हों, फिर भी शूद्रा के पुत्र को दसवें भाग से अधिक न दे, भारत।

श्लोक 22 (13.82.22)

स्मृत एकश्चतुर्भागः कन्याभागस्तु धर्मतः । अभ्रातृका समग्रार्हा चार्थस्येत्यपरे विदुः ॥

smṛta ekaścaturbhāgaḥ kanyābhāgastu dharmataḥ | abhrātṛkā samagrārhā cārthasyetyapare viduḥ

धर्म के अनुसार कन्या का भाग एक चौथाई बताया गया है; और भाई-रहित कन्या सारे धन की अधिकारिणी है, ऐसा दूसरे लोग कहते हैं।

श्लोक 23 (13.82.23)

त्रैवार्षिकाद्यदा भक्तादधिकं स्याद्द्विजस्य तु । यजेत तेन द्रव्येण न वृथा साधयेद्धनम् ॥

traivārṣikādyadā bhaktādadhikaṃ syāddvijasya tu | yajeta tena dravyeṇa na vṛthā sādhayeddhanam

जब किसी द्विज के पास तीन वर्ष के भरण-पोषण से अधिक धन हो जाए, तो उस धन से यज्ञ करे; व्यर्थ ही धन का संग्रह न करे।

श्लोक 24 (13.82.24)

त्रिसहस्रपरो दायः स्त्रियै देयो धनस्य वै । भर्त्रा तच्च धनं दत्तं यथार्हं भोक्तुमर्हति ॥

trisahasraparo dāyaḥ striyai deyo dhanasya vai | bhartrā tacca dhanaṃ dattaṃ yathārhaṃ bhoktumarhati

पत्नी को धन का दान तीन हज़ार से अधिक न दिया जाए; और पति ने जो धन उसे दिया हो, उसे वह यथोचित भोगने की अधिकारिणी है।

श्लोक 25 (13.82.25)

स्त्रीणां तु पतिदायाद्यमुपभोगफलं स्मृतम् । नापहारं स्त्रियः कुर्युः पितृवित्तात्कथञ्चन ॥

strīṇāṃ tu patidāyādyamupabhogaphalaṃ smṛtam | nāpahāraṃ striyaḥ kuryuḥ pitṛvittātkathañcana

स्त्रियों के लिए पति से मिला उत्तराधिकार केवल उपभोग के फल वाला माना गया है; स्त्रियाँ पिता के धन में से किसी प्रकार भी कुछ अपने लिए न हड़पें।

श्लोक 26 (13.82.26)

स्त्रियास्तु यद्भवेद्वित्तं पित्रा दत्तं युधिष्ठिर । ब्राह्मण्यास्तद्धरेत्कन्या यथा पुत्रस्तथाऽस्य सा ॥

striyāstu yadbhavedvittaṃ pitrā dattaṃ yudhiṣṭhira | brāhmaṇyāstaddharetkanyā yathā putrastathā'sya sā

युधिष्ठिर, स्त्री को पिता से जो धन मिला हो, उसे ब्राह्मणी की कन्या ले; क्योंकि वह उसके लिए पुत्र के समान है।

श्लोक 27 (13.82.27)

सा हि पुत्रसमा राजन्विहिता कुरुनन्दन । एवमेव समुद्दिष्टो धर्मो वै भरतर्षभ । एवं धर्ममनुस्मृत्य न वृथा साधयेद्धनम् ॥

sā hi putrasamā rājanvihitā kurunandana | evameva samuddiṣṭo dharmo vai bharatarṣabha | evaṃ dharmamanusmṛtya na vṛthā sādhayeddhanam

हे राजन्, हे कुरुनन्दन, वह पुत्र के समान ही निश्चित की गई है। हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रकार यह धर्म बताया गया। इस धर्म का स्मरण करके मनुष्य व्यर्थ धन का संचय न करे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 28 (13.82.28)

शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातो यद्यदेयधनः स्मृतः । केन प्रतिविशेषेण दशमोऽप्यस्य दीयते ॥

śūdrāyāṃ brāhmaṇājjāto yadyadeyadhanaḥ smṛtaḥ | kena prativiśeṣeṇa daśamo'pyasya dīyate

यदि ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र धन का अधिकारी नहीं माना गया है, तो फिर किस विशेष कारण से उसे दसवाँ भाग भी दिया जाता है?

श्लोक 29 (13.82.29)

ब्राह्मण्यां ब्राह्मणाज्जातो ब्राह्मणः स्यान्न संशयः । क्षत्रियायां तथैव स्याद्वैश्यायामपि चैव हि ॥

brāhmaṇyāṃ brāhmaṇājjāto brāhmaṇaḥ syānna saṃśayaḥ | kṣatriyāyāṃ tathaiva syādvaiśyāyāmapi caiva hi

ब्राह्मण से ब्राह्मणी में उत्पन्न पुत्र निःसंदेह ब्राह्मण होता है; इसी प्रकार क्षत्रिया में और वैश्या में उत्पन्न पुत्र भी।

श्लोक 30 (13.82.30)

कस्मात्तु विषमं भागं भजेरन्नृपसत्तम । यदा सर्वे त्रयो वर्णास्त्वयोक्ता ब्राह्मणा इति ॥

kasmāttu viṣamaṃ bhāgaṃ bhajerannṛpasattama | yadā sarve trayo varṇāstvayoktā brāhmaṇā iti

हे नृपश्रेष्ठ, जब आपने कहा है कि तीनों वर्णों की पत्नियों के पुत्र ब्राह्मण ही हैं, तो वे असमान भाग क्यों लें?

भीष्म उवाच

श्लोक 31 (13.82.31)

दारा इत्युच्यते लोके नाम्नैकेन परन्तप । प्रोक्तेन चैव नाम्नाऽयं विशेषः सुमहान्भवेत् ॥

dārā ityucyate loke nāmnaikena parantapa | proktena caiva nāmnā'yaṃ viśeṣaḥ sumahānbhavet

हे परंतप, लोक में सब पत्नियाँ एक ही नाम 'दारा' से कही जाती हैं; किंतु जो विशेष नाम बताया जाता है, उससे बहुत बड़ा भेद हो जाता है।

श्लोक 32 (13.82.32)

तिस्रः कृत्वा पुरो भार्याः पश्चाद्विन्देत ब्राह्मणीम् । सा ज्येष्ठा सा च पूज्या स्यात्सा च ताभ्यो गरीयसी ॥

tisraḥ kṛtvā puro bhāryāḥ paścādvindeta brāhmaṇīm | sā jyeṣṭhā sā ca pūjyā syātsā ca tābhyo garīyasī

यदि कोई पहले तीन पत्नियाँ करके बाद में ब्राह्मणी से विवाह करे, तो वही ज्येष्ठ है, वही पूजनीय है और वही उन तीनों से श्रेष्ठ है।

श्लोक 33 (13.82.33)

स्नानं प्रसाधनं भर्तुर्दन्तधावनमञ्जनम् । हव्यं कव्यं च यच्चान्यद्धर्मयुक्तं गृहे भवेत् ॥

snānaṃ prasādhanaṃ bharturdantadhāvanamañjanam | havyaṃ kavyaṃ ca yaccānyaddharmayuktaṃ gṛhe bhavet

स्नान, पति का शृंगार, दातौन और अञ्जन, देवों और पितरों के लिए हव्य-कव्य, तथा घर में जो और भी धर्मयुक्त कार्य हो:

श्लोक 34 (13.82.34)

न तस्यां जातु तिष्ठन्त्यामन्या तत्कर्तुमर्हति । ब्राह्मणीत्वेव कुर्याद्वा ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ॥

na tasyāṃ jātu tiṣṭhantyāmanyā tatkartumarhati | brāhmaṇītveva kuryādvā brāhmaṇasya yudhiṣṭhira

जब तक वह उपस्थित है, तब तक कोई दूसरी पत्नी यह नहीं कर सकती; ब्राह्मण के लिए ब्राह्मणी ही यह करे, युधिष्ठिर।

श्लोक 35 (13.82.35)

अन्नं पानं च माल्यं च वासांस्याभरणानि च । ब्राह्मण्यैतानि देयानि भर्तुः सा हि गरीयसी ॥

annaṃ pānaṃ ca mālyaṃ ca vāsāṃsyābharaṇāni ca | brāhmaṇyaitāni deyāni bhartuḥ sā hi garīyasī

अन्न, पेय, माला, वस्त्र और आभूषण ब्राह्मणी को ही दिए जाएँ, क्योंकि वह पति की दृष्टि में अधिक श्रेष्ठ है।

श्लोक 36 (13.82.36)

मनुनाऽभिहितं शास्त्रं यच्चापि कुरुनन्दन । तत्राप्येष महाराज दृष्टो धर्मः सनातनः ॥

manunā'bhihitaṃ śāstraṃ yaccāpi kurunandana | tatrāpyeṣa mahārāja dṛṣṭo dharmaḥ sanātanaḥ

हे कुरुनन्दन, मनु द्वारा कहे गए शास्त्र में भी यही सनातन धर्म दिखाई देता है, महाराज।

श्लोक 37 (13.82.37)

अथ चेदन्यथा कुर्याद्यदि कामाद्युधिष्ठिर । यथा ब्राह्मणचाण्डालः पूर्वदृष्टस्तथैव सः ॥

atha cedanyathā kuryādyadi kāmādyudhiṣṭhira | yathā brāhmaṇacāṇḍālaḥ pūrvadṛṣṭastathaiva saḥ

किंतु युधिष्ठिर, यदि कोई कामवश इससे उलटा करे, तो वह वैसा ही 'ब्राह्मण-चाण्डाल' है जैसा पहले देखा गया है।

श्लोक 38 (13.82.38)

ब्राह्मण्याः सदृशः पुत्रः क्षत्रियायाश्च यो भवेत् । राजन्विशेषो यस्त्वत्र वर्णयोरुभयोरपि ॥

brāhmaṇyāḥ sadṛśaḥ putraḥ kṣatriyāyāśca yo bhavet | rājanviśeṣo yastvatra varṇayorubhayorapi

ब्राह्मणी का पुत्र और क्षत्रिया का पुत्र समान हों, तो भी हे राजन्, इन दोनों वर्णों में यहाँ एक भेद अवश्य है।

श्लोक 39 (13.82.39)

न तु जात्या समा लोके ब्राह्मण्याः क्षत्रिया भवेत् । ब्राह्मण्याः प्रथमः पुत्रो भूयान्स्याद्राजसत्तम ॥

na tu jātyā samā loke brāhmaṇyāḥ kṣatriyā bhavet | brāhmaṇyāḥ prathamaḥ putro bhūyānsyādrājasattama

जन्म में क्षत्रिया लोक में कभी ब्राह्मणी के समान नहीं हो सकती। हे राजसत्तम, ब्राह्मणी का पहला पुत्र अधिक भाग पाए।

श्लोक 40 (13.82.40)

भूयोभूयोपि संहार्यः पितृवित्ताद्युधिष्ठिर । यथा न सदृशी जातु ब्राह्मण्याः क्षत्रिया भवेत् ॥

bhūyobhūyopi saṃhāryaḥ pitṛvittādyudhiṣṭhira | yathā na sadṛśī jātu brāhmaṇyāḥ kṣatriyā bhavet

युधिष्ठिर, पिता के धन में से उसे और भी अधिक दिया जाए, क्योंकि क्षत्रिया कभी ब्राह्मणी के समान नहीं हो सकती,

श्लोक 41 (13.82.41)

क्षत्रियायास्तथा वैश्या न जातु सदृशी भवेत् । श्रीश्च राज्यं च कोशश्च क्षत्रियाणां युधिष्ठिर ॥

kṣatriyāyāstathā vaiśyā na jātu sadṛśī bhavet | śrīśca rājyaṃ ca kośaśca kṣatriyāṇāṃ yudhiṣṭhira

और वैश्या कभी क्षत्रिया के समान नहीं हो सकती। युधिष्ठिर, लक्ष्मी, राज्य और कोश क्षत्रियों के लिए ही विहित दिखाई देते हैं,

श्लोक 42 (13.82.42)

विहितं दृश्यते राजन्सागरान्तां च मेदिनीम् । क्षत्रियो हि स्वधर्मेण श्रियं प्राप्नोति भूयसीम् । राजा दण्डधरो राजन्रक्षा नान्यत्र क्षत्रियात् ॥

vihitaṃ dṛśyate rājansāgarāntāṃ ca medinīm | kṣatriyo hi svadharmeṇa śriyaṃ prāpnoti bhūyasīm | rājā daṇḍadharo rājanrakṣā nānyatra kṣatriyāt

और हे राजन्, समुद्र तक फैली पृथ्वी भी उन्हीं के लिए विहित दिखाई देती है। क्षत्रिय अपने धर्म से बड़ी लक्ष्मी पाता है। हे राजन्, राजा दण्ड धारण करने वाला होता है; क्षत्रिय को छोड़कर और कहीं रक्षा नहीं है।

श्लोक 43 (13.82.43)

ब्राह्मणा हि महाभाग देवानामपि देवताः । तेषु राजा प्रवर्तेत पूजया विधिपूर्वकम् ॥

brāhmaṇā hi mahābhāga devānāmapi devatāḥ | teṣu rājā pravarteta pūjayā vidhipūrvakam

हे महाभाग, ब्राह्मण देवताओं के भी देवता हैं। राजा को चाहिए कि वह विधिपूर्वक पूजा के साथ उनके प्रति व्यवहार करे।

श्लोक 44 (13.82.44)

प्रणीतमृषिभिर्ज्ञात्वा धर्मं शाश्वतमव्ययम् । लुप्यमानं स्वधर्मेण क्षत्रियो रक्षति प्रजाः ॥

praṇītamṛṣibhirjñātvā dharmaṃ śāśvatamavyayam | lupyamānaṃ svadharmeṇa kṣatriyo rakṣati prajāḥ

ऋषियों द्वारा प्रतिपादित सनातन, अविनाशी धर्म को जानकर क्षत्रिय प्रजा की रक्षा करता है, जब वह अपने धर्म से भ्रष्ट होकर लुप्त हो रहा होता है।

श्लोक 45 (13.82.45)

दस्युभिर्ह्रियमाणं च धनं दारांश्च सर्वशः । सर्वेषामेव वर्णानां त्राता भवति पार्थिवः ॥

dasyubhirhriyamāṇaṃ ca dhanaṃ dārāṃśca sarvaśaḥ | sarveṣāmeva varṇānāṃ trātā bhavati pārthivaḥ

जब डाकू धन और स्त्रियों को चारों ओर से हर रहे हों, तब राजा ही सब वर्णों का रक्षक होता है।

श्लोक 46 (13.82.46)

भूयान्स्यात्क्षत्रियापुत्रो वैश्यापुत्रान्न संशयः । भूयस्तेनापि हर्तव्यं पितृवित्ताद्युधिष्ठिर ॥

bhūyānsyātkṣatriyāputro vaiśyāputrānna saṃśayaḥ | bhūyastenāpi hartavyaṃ pitṛvittādyudhiṣṭhira

क्षत्रिया का पुत्र वैश्या के पुत्रों से निःसंदेह बड़ा है, और पिता के धन में से वह भी अधिक भाग ले, युधिष्ठिर।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 47 (13.82.47)

उक्तं ते विधिवद्राजन्ब्राह्मणस्य पितामह । इतरेषां तु वर्णानां कथं वै नियमो भवेत् ॥

uktaṃ te vidhivadrājanbrāhmaṇasya pitāmaha | itareṣāṃ tu varṇānāṃ kathaṃ vai niyamo bhavet

पितामह, आपने ब्राह्मण के लिए विधि के अनुसार नियम बता दिया। अन्य वर्णों के लिए नियम कैसा होगा?

भीष्म उवाच

श्लोक 48 (13.82.48)

क्षत्रियस्यापि भार्ये द्वे विहिते कुरुनन्दन । तृतीया च भवेच्छूद्रा न तु दृष्टा न तु स्मृता ॥

kṣatriyasyāpi bhārye dve vihite kurunandana | tṛtīyā ca bhavecchūdrā na tu dṛṣṭā na tu smṛtā

हे कुरुनन्दन, क्षत्रिय के लिए भी दो पत्नियाँ विहित हैं; तीसरी शूद्रा हो सकती है, किंतु वह न श्रुति में देखी गई है, न स्मृति में कही गई है।

श्लोक 49 (13.82.49)

एष एव क्रमो हि स्यात्क्षत्रियाणां युधिष्ठिर । अष्टधा तु भवेत्कार्यं क्षत्रियस्वं जनाधिप ॥

eṣa eva kramo hi syātkṣatriyāṇāṃ yudhiṣṭhira | aṣṭadhā tu bhavetkāryaṃ kṣatriyasvaṃ janādhipa

युधिष्ठिर, क्षत्रियों के लिए भी यही क्रम है। हे जनाधिप, क्षत्रिय का धन आठ भागों में बाँटा जाए।

श्लोक 50 (13.82.50)

क्षत्रियाया हरेत्पुत्रश्चतुरोंशान्पितुर्धनात् । युद्धावहारिकं यच्च पितुः स्यात्स हरेत्तु तत् ॥

kṣatriyāyā haretputraścaturoṃśānpiturdhanāt | yuddhāvahārikaṃ yacca pituḥ syātsa harettu tat

क्षत्रिया का पुत्र पिता के धन के चार भाग ले, और युद्ध में जो कुछ पिता ने जीतकर लिया हो, वह भी वही ले।

श्लोक 51 (13.82.51)

वैश्यापुत्रस्तु भागांस्त्रीञ्शूद्रापुत्रस्तथाष्टमम् । एकैव हि भवेद्भार्या वैश्यस्य कुरुनन्दन । द्वितीया तु भवेच्छूद्रा न तु दृष्टा न तु स्मृता ॥

vaiśyāputrastu bhāgāṃstrīñśūdrāputrastathāṣṭamam | ekaiva hi bhavedbhāryā vaiśyasya kurunandana | dvitīyā tu bhavecchūdrā na tu dṛṣṭā na tu smṛtā

वैश्या का पुत्र तीन भाग ले और शूद्रा का पुत्र आठवाँ भाग। हे कुरुनन्दन, वैश्य की एक ही पत्नी होनी चाहिए; दूसरी शूद्रा हो सकती है, किंतु वह न श्रुति में देखी गई है, न स्मृति में कही गई है।

श्लोक 52 (13.82.52)

वैश्यस्य वर्तमानस्य वैश्यायां भरतर्षभ । शूद्रायां चापि कौन्तेय तयोर्विनियमः स्मृतः ॥

vaiśyasya vartamānasya vaiśyāyāṃ bharatarṣabha | śūdrāyāṃ cāpi kaunteya tayorviniyamaḥ smṛtaḥ

भरतश्रेष्ठ, जिस वैश्य के वैश्या पत्नी हो और कौन्तेय, शूद्रा भी हो, उन दोनों के बीच का नियम इस प्रकार बताया गया है।

श्लोक 53 (13.82.53)

पञ्चधा तु भवेत्कार्यं वैश्यस्वं भरतर्षभ । तयोरपत्ये वक्ष्यामि विभागं च जनाधिप ॥

pañcadhā tu bhavetkāryaṃ vaiśyasvaṃ bharatarṣabha | tayorapatye vakṣyāmi vibhāgaṃ ca janādhipa

भरतश्रेष्ठ, वैश्य का धन पाँच भागों में बाँटा जाए; और हे जनाधिप, उन दोनों की सन्तानों के बीच का विभाजन भी मैं बताऊँगा।

श्लोक 54 (13.82.54)

वैश्यापुत्रेण हर्तव्याश्चत्वारोंशाः पितुर्धनात् । पञ्चमस्तु स्मृतो भागः शूद्रापुत्राय भारत ॥

vaiśyāputreṇa hartavyāścatvāroṃśāḥ piturdhanāt | pañcamastu smṛto bhāgaḥ śūdrāputrāya bhārata

वैश्या का पुत्र पिता के धन के चार भाग ले, और पाँचवाँ भाग, भारत, शूद्रा के पुत्र के लिए माना गया है।

श्लोक 55 (13.82.55)

सोपि दत्तं हरेत्पित्रा नादत्तं हर्तुमर्हति । त्रिभिर्वर्णैः सदा जातः शूद्रो देयधनो भवेत् ॥

sopi dattaṃ haretpitrā nādattaṃ hartumarhati | tribhirvarṇaiḥ sadā jātaḥ śūdro deyadhano bhavet

वह भी वही ले सकता है जो पिता ने दिया हो; जो न दिया गया हो, उसे लेने का वह अधिकारी नहीं। तीनों वर्णों से उत्पन्न शूद्र पुत्र को सदा कुछ देना चाहिए।

श्लोक 56 (13.82.56)

शूद्रस्य स्यात्सवर्णैव भार्या नान्या कथञ्चन । समभागाश्च पुत्राः स्युर्यदि पुत्रशतं भवेत् ॥

śūdrasya syātsavarṇaiva bhāryā nānyā kathañcana | samabhāgāśca putrāḥ syuryadi putraśataṃ bhavet

शूद्र की पत्नी अपने ही वर्ण की हो, किसी प्रकार दूसरी नहीं; और यदि उसके सौ पुत्र हों, तो वे सब बराबर भाग पाएँ।

श्लोक 57 (13.82.57)

जातानां समवर्णायाः पुत्राणामविशेषतः । सर्वेषामेव वर्णानां समभागो धनात्स्मृतः ॥

jātānāṃ samavarṇāyāḥ putrāṇāmaviśeṣataḥ | sarveṣāmeva varṇānāṃ samabhāgo dhanātsmṛtaḥ

सवर्ण पत्नी से उत्पन्न पुत्रों में कोई भेद नहीं है; सभी वर्णों में धन का समान भाग निश्चित किया गया है।

श्लोक 58 (13.82.58)

ज्येष्ठस्य भागो ज्येष्ठः स्यादेकांशो यः प्रधानतः । एष दायविधिः पार्थ पूर्वमुक्तः स्वयंभुवा ॥

jyeṣṭhasya bhāgo jyeṣṭhaḥ syādekāṃśo yaḥ pradhānataḥ | eṣa dāyavidhiḥ pārtha pūrvamuktaḥ svayaṃbhuvā

ज्येष्ठ का भाग ज्येष्ठ (श्रेष्ठ) अंश हो, जो एक प्रधान भाग है। पार्थ, यह दाय-विधि पहले स्वयंभू ने कही थी।

श्लोक 59 (13.82.59)

समवर्णासु जातानां विशेषोऽस्त्यपरो नृप । विवाहवैशिष्ट्यकृतः पूर्वपूर्वो विशिष्यते ॥

samavarṇāsu jātānāṃ viśeṣo'styaparo nṛpa | vivāhavaiśiṣṭyakṛtaḥ pūrvapūrvo viśiṣyate

हे राजन्, समान वर्ण की पत्नियों से उत्पन्न पुत्रों में एक और भेद है: वह विवाह की विशेषता से होता है, और पहले वाला पिछले से श्रेष्ठ माना जाता है।

श्लोक 60 (13.82.60)

हरेज्ज्येष्ठः प्रधानांशमेकभार्यासुतेष्वपि । मध्यमो मध्यमं चैव कनीयांस्तु कनीयसम् ॥

harejjyeṣṭhaḥ pradhānāṃśamekabhāryāsuteṣvapi | madhyamo madhyamaṃ caiva kanīyāṃstu kanīyasam

एक ही पत्नी के पुत्रों में भी ज्येष्ठ प्रधान अंश ले, मझला मध्यम अंश और कनिष्ठ सबसे छोटा अंश।

श्लोक 61 (13.82.61)

एवं जातिषु सर्वासु सवर्णः श्रेष्ठतां गतः । महर्षिरपि चैतद्वै मारीचः काश्यपोऽब्रवीत् ॥

evaṃ jātiṣu sarvāsu savarṇaḥ śreṣṭhatāṃ gataḥ | maharṣirapi caitadvai mārīcaḥ kāśyapo'bravīt

इस प्रकार सब जातियों में सवर्ण पत्नी का पुत्र श्रेष्ठता को प्राप्त हुआ है। मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप ने भी यही कहा है।

अध्याय 81अध्याय-सूचीअध्याय 83