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अनुशासन पर्व · अध्याय 83

वर्णसंकर जातियाँ और जन्म की पहचान के लक्षण

युधिष्ठिर वर्णसंकर से उत्पन्न लोगों के धर्म और कर्मों के विषय में पूछते हैं। भीष्म चारों वर्णों के पुरुषों से अन्य वर्णों की पत्नियों में उत्पन्न पुत्रों का वर्णन करते हैं, फिर बाह्य संकर जातियों और उनकी जीविकाओं की गणना करते हैं और नीच योनि में सन्तान उत्पन्न करने के प्रति सावधान करते हैं। दूषित जन्म वाले पर आर्य जैसे दिखने वाले मनुष्य की पहचान पूछे जाने पर वे कहते हैं कि आचरण ही जन्म को प्रकट करता है, और सदाचारी शूद्र शीलहीन ऊँचे वर्ण वाले से अधिक सम्मान के योग्य है।

अध्याय 82अध्याय-सूचीअध्याय 84

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.83.1)

अर्थाश्रयाद्वा कामाद्वा वर्णानां चाप्यनिश्चयात् । अज्ञानाद्वापि वर्णानां जायते वर्णसङ्करः ॥

arthāśrayādvā kāmādvā varṇānāṃ cāpyaniścayāt | ajñānādvāpi varṇānāṃ jāyate varṇasaṅkaraḥ

धन का आश्रय लेने से, कामना से, वर्णों के विषय में अनिश्चय से, अथवा अज्ञान से भी वर्णसंकर उत्पन्न होता है।

श्लोक 2 (13.83.2)

तेषामेतेन विधिना जातानां वर्णसङ्करे । को धर्मः कानि कर्माणि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

teṣāmetena vidhinā jātānāṃ varṇasaṅkare | ko dharmaḥ kāni karmāṇi tanme brūhi pitāmaha

इस प्रकार वर्णसंकर में उत्पन्न हुए लोगों का क्या धर्म है और कौन-से कर्म हैं? पितामह, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (13.83.3)

चातुर्वर्ण्यस्य कर्माणि चातुर्वर्ण्यं च केवलम् । असृजत्स हि यज्ञार्थे पूर्वमेव प्रजापतिः ॥

cāturvarṇyasya karmāṇi cāturvarṇyaṃ ca kevalam | asṛjatsa hi yajñārthe pūrvameva prajāpatiḥ

प्राचीन काल में प्रजापति ने यज्ञ के लिए ही चारों वर्णों और उनके कर्मों की सृष्टि की थी।

श्लोक 4 (13.83.4)

भार्याश्चतस्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते । आनुपूर्व्याद्द्वयोर्हीनौ मातृजात्यौ प्रसूयतः ॥

bhāryāścatasro viprasya dvayorātmā prajāyate | ānupūrvyāddvayorhīnau mātṛjātyau prasūyataḥ

ब्राह्मण की चार पत्नियाँ होती हैं; दो में उसका अपना ही स्वरूप उत्पन्न होता है, और शेष दो में क्रम से हीन पुत्र उत्पन्न होते हैं, जो अपनी माताओं की जाति के होते हैं।

श्लोक 5 (13.83.5)

परं शवाद्ब्राह्मणस्यैव पुत्रः । शूद्रापुत्रं पारशवं तमाहुः । शुश्रूषकः स्वस्य कुलस्य स स्यात् । स्वचारित्रं नित्यमथो न जह्यात् ॥

paraṃ śavādbrāhmaṇasyaiva putraḥ | śūdrāputraṃ pāraśavaṃ tamāhuḥ | śuśrūṣakaḥ svasya kulasya sa syāt | svacāritraṃ nityamatho na jahyāt

ब्राह्मण का शूद्रा से उत्पन्न पुत्र शव के समान शूद्र से ऊँचा है; उसे पारशव कहते हैं। वह अपने कुल की सेवा करने वाला हो और अपने सदाचार को कभी न छोड़े।

श्लोक 6 (13.83.6)

सर्वानुपायानथ सम्प्रधार्य । समुद्धरेत्स्वस्य कुलस्य तन्त्रम् । ज्येष्ठो यवीयानपि यो द्विजस्य । शुश्रूषया दानपरायणः स्यात् ॥

sarvānupāyānatha sampradhārya | samuddharetsvasya kulasya tantram | jyeṣṭho yavīyānapi yo dvijasya | śuśrūṣayā dānaparāyaṇaḥ syāt

सब उपायों पर विचार करके वह अपने कुल के आधार को सँभाले; क्योंकि आयु में बड़ा होने पर भी पारशव द्विज के पुत्र के सामने छोटा ही गिना जाता है; वह सेवा और दान में लगा रहे।

श्लोक 7 (13.83.7)

तिस्रः क्षत्रियसम्बन्धाद्द्वयोरात्माऽस्य जायते । हीनवर्णास्तृतीयायां शूद्रा उग्रा इति स्मृतिः ॥

tisraḥ kṣatriyasambandhāddvayorātmā'sya jāyate | hīnavarṇāstṛtīyāyāṃ śūdrā ugrā iti smṛtiḥ

क्षत्रिय का सम्बन्ध तीन वर्णों की पत्नियों से होता है; दो में उसका अपना ही स्वरूप उत्पन्न होता है, और तीसरी से हीन वर्ण की सन्तान होती है। शूद्रा से उत्पन्न लोग 'उग्र' कहलाते हैं, ऐसी स्मृति है।

श्लोक 8 (13.83.8)

द्वे चापि भार्ये वैश्यस्य द्वयोरात्माऽस्य जायते । शूद्रा शूद्रस्य चाप्येका शूद्रमेव प्रजायते ॥

dve cāpi bhārye vaiśyasya dvayorātmā'sya jāyate | śūdrā śūdrasya cāpyekā śūdrameva prajāyate

वैश्य की भी दो पत्नियाँ होती हैं और दोनों में उसका अपना ही स्वरूप उत्पन्न होता है। शूद्र की एक ही पत्नी होती है, शूद्रा, और उससे शूद्र ही उत्पन्न होता है।

श्लोक 9 (13.83.9)

अतोऽविशिष्टस्त्वधमो गुरुदारप्रधर्षकः । बाह्यं वर्णं जनयति चातुर्वर्ण्यविगर्हितम् ॥

ato'viśiṣṭastvadhamo gurudārapradharṣakaḥ | bāhyaṃ varṇaṃ janayati cāturvarṇyavigarhitam

इन सबसे जो ऊँचा नहीं है, ऐसा अधम पुरुष, जो गुरुजनों की स्त्रियों पर बलात्कार करता है, चारों वर्णों से निन्दित बाह्य वर्ण को जन्म देता है।

श्लोक 10 (13.83.10)

अयाज्यं क्षत्रियो व्रात्यं सूतं स्तोत्रक्रियापरम् । वैश्यो वैदेहकं चापि मौद्गल्यमपवर्जितम् ॥

ayājyaṃ kṣatriyo vrātyaṃ sūtaṃ stotrakriyāparam | vaiśyo vaidehakaṃ cāpi maudgalyamapavarjitam

क्षत्रिय से अयाज्य व्रात्य और स्तुति-कर्म में लगा हुआ सूत उत्पन्न होता है; वैश्य से वैदेहक और बहिष्कृत मौद्गल्य;

श्लोक 11 (13.83.11)

शूद्रश्चण्डालमत्युग्रं वध्यघ्नं बाह्यवासिनम् । ब्राह्मण्यां सम्प्रजायन्त इत्येते कुलपांसनाः । एते मतिमतांश्रेष्ठ वर्णसङ्करजाः प्रभो ॥

śūdraścaṇḍālamatyugraṃ vadhyaghnaṃ bāhyavāsinam | brāhmaṇyāṃ samprajāyanta ityete kulapāṃsanāḥ | ete matimatāṃśreṣṭha varṇasaṅkarajāḥ prabho

शूद्र से अत्यन्त उग्र चाण्डाल, जो वध्य लोगों का वध करने वाला और बस्ती के बाहर रहने वाला होता है। ये सब ब्राह्मणी स्त्रियों में उत्पन्न होते हैं और कुल को कलंकित करने वाले हैं। हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, हे प्रभो, ये वर्णसंकर से उत्पन्न हैं।

श्लोक 12 (13.83.12)

बन्दी तु जायते वैश्यान्मागधो वाक्यजीवनः । शूद्रान्निषादो मत्स्यघ्नः क्षत्रियायां व्यतिक्रमात् ॥

bandī tu jāyate vaiśyānmāgadho vākyajīvanaḥ | śūdrānniṣādo matsyaghnaḥ kṣatriyāyāṃ vyatikramāt

वैश्य से वन्दी और वाणी से जीविका चलाने वाला मागध उत्पन्न होता है; शूद्र से क्षत्रिया में मर्यादा के उल्लंघन से मछली मारने वाला निषाद उत्पन्न होता है।

श्लोक 13 (13.83.13)

शूद्रादायोगवश्चापि वैश्यायां ग्राम्यधर्मिणः । ब्राह्मणैरप्रतिग्राह्यस्तक्षा स्वधनजीवनः ॥

śūdrādāyogavaścāpi vaiśyāyāṃ grāmyadharmiṇaḥ | brāhmaṇairapratigrāhyastakṣā svadhanajīvanaḥ

और शूद्र से वैश्या में आयोगव उत्पन्न होता है, जो ग्रामीण आचार वाला होता है, जिससे ब्राह्मण दान नहीं ले सकते, और जो बढ़ई का काम करके अपनी कमाई से जीता है।

श्लोक 14 (13.83.14)

एतेऽपि सदृशान्वर्णाञ्जनयन्ति स्वयोनिषु । मातृजात्या प्रसूयन्ते ह्यवरा हीनयोनिषु ॥

ete'pi sadṛśānvarṇāñjanayanti svayoniṣu | mātṛjātyā prasūyante hyavarā hīnayoniṣu

ये भी अपनी जाति की स्त्रियों में अपने समान सन्तान उत्पन्न करते हैं; पर हीन योनि की स्त्रियों में उत्पन्न होने वाले हीन होते हैं और माता की जाति के होते हैं।

श्लोक 15 (13.83.15)

यथा चतुर्षु वर्णेषु द्वयोरात्माऽस्य जायते । आनन्तर्यात्प्रजायन्ते यथा बाह्याः प्रधानतः ॥

yathā caturṣu varṇeṣu dvayorātmā'sya jāyate | ānantaryātprajāyante yathā bāhyāḥ pradhānataḥ

जैसे चारों वर्णों में पुरुष का अपना स्वरूप दो पत्नियों में उत्पन्न होता है, वैसे ही बाह्य जातियाँ भी मुख्यतः अनन्तर क्रम से उत्पन्न होती हैं।

श्लोक 16 (13.83.16)

ते चापि सदृशं वर्णं जनयन्ति स्वयोनिषु । परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान् ॥

te cāpi sadṛśaṃ varṇaṃ janayanti svayoniṣu | parasparasya dāreṣu janayanti vigarhitān

वे भी अपनी जाति की स्त्रियों में अपने समान सन्तान उत्पन्न करते हैं; पर एक-दूसरे की स्त्रियों में निन्दित सन्तान उत्पन्न करते हैं।

श्लोक 17 (13.83.17)

यथा शूद्रोऽपि ब्राह्मण्यां जन्तुं बाह्यं प्रसूयते । एवं बाह्यतराद्बाह्यश्चातुर्वर्ण्यात्प्रजायते ॥

yathā śūdro'pi brāhmaṇyāṃ jantuṃ bāhyaṃ prasūyate | evaṃ bāhyatarādbāhyaścāturvarṇyātprajāyate

जैसे शूद्र ब्राह्मणी में बाह्य सन्तान उत्पन्न करता है, वैसे ही चतुर्वर्ण के भीतर से बाह्य से भी अधिक बाह्य सन्तान उत्पन्न होती है।

श्लोक 18 (13.83.18)

प्रतिलोमं तु वर्धन्ते बाह्याद्बाह्यतरात्पुनः । हीनाद्धीनाः प्रसूयन्ते वर्णाः पञ्चदशैव तु ॥

pratilomaṃ tu vardhante bāhyādbāhyatarātpunaḥ | hīnāddhīnāḥ prasūyante varṇāḥ pañcadaśaiva tu

वे प्रतिलोम क्रम से बढ़ते हैं, बाह्य से फिर और भी बाह्य, हीन से हीन उत्पन्न होते हैं; इस प्रकार वर्ण कुल पन्द्रह ही होते हैं।

श्लोक 19 (13.83.19)

अगम्यागमनाच्चैव जायते वर्णसङ्करः । बाह्यानामनुजायन्ते सैरन्ध्र्यां मागधेषु च । प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दासजीवनम् ॥

agamyāgamanāccaiva jāyate varṇasaṅkaraḥ | bāhyānāmanujāyante sairandhryāṃ māgadheṣu ca | prasādhanopacārajñamadāsaṃ dāsajīvanam

अगम्या स्त्री के साथ गमन से भी वर्णसंकर उत्पन्न होता है। बाह्य लोगों में सैरन्ध्री स्त्री से और मागधों में ऐसा पुरुष उत्पन्न होता है जो शृंगार और सेवा की विधि जानता है, दास न होते हुए भी दास की-सी जीविका वाला होता है।

श्लोक 20 (13.83.20)

क्षत्ता ह्यायोगवं सूते वागुराबन्धजीवनम् । मैरेयकं च वैदेहः सम्प्रसूतेऽथ माधुकम् ॥

kṣattā hyāyogavaṃ sūte vāgurābandhajīvanam | maireyakaṃ ca vaidehaḥ samprasūte'tha mādhukam

क्षत्ता जाल और फंदे लगाकर जीने वाले आयोगव को उत्पन्न करता है; और वैदेहक मैरेयक तथा माधुक को उत्पन्न करता है।

श्लोक 21 (13.83.21)

निषादो मद्गुरं सूते दासं नावोपजीविनम् । मृतपं चापि चाण्डालः श्वपाकमिति विश्रुतम् ॥

niṣādo madguraṃ sūte dāsaṃ nāvopajīvinam | mṛtapaṃ cāpi cāṇḍālaḥ śvapākamiti viśrutam

निषाद नाव से जीने वाले दास मद्गुर को उत्पन्न करता है; और चाण्डाल मृतप को, जो श्वपाक के नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक 22 (13.83.22)

चतुरो मागधी सूते क्रूरान्मायोपजीविनः । मांसं स्वादुकरं क्षौद्रं सौगन्धमिति विश्रुतम् ॥

caturo māgadhī sūte krūrānmāyopajīvinaḥ | māṃsaṃ svādukaraṃ kṣaudraṃ saugandhamiti viśrutam

मागधी स्त्री क्रूर और छल से जीने वाले चार पुत्रों को जन्म देती है, जो मांस, स्वादुकर, क्षौद्र और सौगन्ध नाम से प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 23 (13.83.23)

वैदेहकाच्च पापिष्ठं क्रूरं मायोपजीविनम् । निषादान्मद्रनाभं च खरयानप्रयायिनम् ॥

vaidehakācca pāpiṣṭhaṃ krūraṃ māyopajīvinam | niṣādānmadranābhaṃ ca kharayānaprayāyinam

वैदेहक से अत्यन्त पापी, क्रूर और छल से जीने वाला पुत्र उत्पन्न होता है; और निषाद से गधे की सवारी पर चलने वाला मद्रनाभ।

श्लोक 24 (13.83.24)

चण्डालात्पुल्कसं चापि खराश्वगजभोजिनम् । मृतचैलप्रतिच्छन्नं भिन्नभाजनभोजिनम् ॥

caṇḍālātpulkasaṃ cāpi kharāśvagajabhojinam | mṛtacailapraticchannaṃ bhinnabhājanabhojinam

और चाण्डाल से पुल्कस उत्पन्न होता है, जो गधे, घोड़े और हाथी खाता है, मरे हुओं के वस्त्र पहनता है और टूटे बर्तनों में भोजन करता है।

श्लोक 25 (13.83.25)

आयोगवीषु जायन्ते हीनवर्णास्तु ते त्रयः । क्षुद्रो वैदेहकादन्धो बहिर्ग्रामप्रतिश्रयः ॥

āyogavīṣu jāyante hīnavarṇāstu te trayaḥ | kṣudro vaidehakādandho bahirgrāmapratiśrayaḥ

आयोगवी स्त्रियों में ये तीन हीन वर्ण के लोग उत्पन्न होते हैं: क्षुद्र, और वैदेहक से अन्ध, जो गाँव के बाहर रहता है।

श्लोक 26 (13.83.26)

कारावरो निषाद्यां तु चर्मकारः प्रसूयते । चाण्डालात्पाण्डुसौपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान् ॥

kārāvaro niṣādyāṃ tu carmakāraḥ prasūyate | cāṇḍālātpāṇḍusaupākastvaksāravyavahāravān

निषादी स्त्री में चर्मकार कारावर उत्पन्न होता है; और चाण्डाल से पाण्डुसौपाक, जो बाँस की वस्तुओं का व्यापार करता है।

श्लोक 27 (13.83.27)

आहिण्डिको निषादेन वैदेह्यां सम्प्रसूयते । चण्डालेन तु सौपाकश्चण्डालसमवृत्तिमान् ॥

āhiṇḍiko niṣādena vaidehyāṃ samprasūyate | caṇḍālena tu saupākaścaṇḍālasamavṛttimān

निषाद से वैदेही स्त्री में आहिण्डिक उत्पन्न होता है; और चाण्डाल से सौपाक, जिसकी जीविका चाण्डाल के समान होती है।

श्लोक 28 (13.83.28)

निषादी चापि चण्डालात्पुत्रमन्तेवसायिनम् । श्मशानगोचरं सूते बाह्यैरपि बहिष्कृतम् ॥

niṣādī cāpi caṇḍālātputramantevasāyinam | śmaśānagocaraṃ sūte bāhyairapi bahiṣkṛtam

निषादी स्त्री चाण्डाल से अन्तेवसायी पुत्र को जन्म देती है, जो श्मशान में विचरता है और बाह्य लोगों द्वारा भी बहिष्कृत होता है।

श्लोक 29 (13.83.29)

इत्येते सङ्करे जाताः पितृमातृव्यतिक्रमात् । प्रच्छन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः ॥

ityete saṅkare jātāḥ pitṛmātṛvyatikramāt | pracchannā vā prakāśā vā veditavyāḥ svakarmabhiḥ

ये पिता और माता के मर्यादा-उल्लंघन से उत्पन्न संकर जातियाँ हैं; छिपी हों या प्रकट, इन्हें इनके अपने कर्मों से पहचानना चाहिए।

श्लोक 30 (13.83.30)

चतुर्णामेव वर्णानां धर्मो नान्यस्य विद्यते । वर्णानां धर्महीनेषु सङ्ख्या नास्तीह कस्यचित् ॥

caturṇāmeva varṇānāṃ dharmo nānyasya vidyate | varṇānāṃ dharmahīneṣu saṅkhyā nāstīha kasyacit

धर्म केवल चारों वर्णों का है, किसी और का नहीं। जो वर्ण धर्महीन हैं, उनमें यहाँ किसी की गिनती नहीं की जाती।

श्लोक 31 (13.83.31)

यदृच्छयोपसम्पन्नैर्यज्ञसाधुबहिष्कृतैः । बाह्या बाह्यैश्च जायन्ते यथावृत्ति यथाश्रयम् ॥

yadṛcchayopasampannairyajñasādhubahiṣkṛtaiḥ | bāhyā bāhyaiśca jāyante yathāvṛtti yathāśrayam

जो मनमाने ढंग से मिलते हैं और यज्ञ तथा सज्जनों से बहिष्कृत हैं, उनसे बाह्य लोग बाह्य लोगों में अपनी जीविका और आश्रय के अनुसार उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 32 (13.83.32)

चतुष्पथश्मशानानि शैलांश्चान्यान्वनस्पतीन् । कार्ष्णायसमलङ्कारं परिगृह्य च नित्यशः । वसेयुरेते विज्ञाता वर्तयन्तः स्वकर्मभिः ॥

catuṣpathaśmaśānāni śailāṃścānyānvanaspatīn | kārṣṇāyasamalaṅkāraṃ parigṛhya ca nityaśaḥ | vaseyurete vijñātā vartayantaḥ svakarmabhiḥ

चौराहों, श्मशानों, पर्वतों और कुछ वृक्षों के पास, सदा काले लोहे के आभूषण पहनकर, ये अपने पहचाने जाते हुए, अपने कर्मों से जीविका चलाते हुए रहें।

श्लोक 33 (13.83.33)

युञ्जन्तो वाऽप्यलङ्कारांस्तथोपकरणानि च । गोब्राह्मणाय साहाय्यं कुर्वाणा वै न संशयः ॥

yuñjanto vā'pyalaṅkārāṃstathopakaraṇāni ca | gobrāhmaṇāya sāhāyyaṃ kurvāṇā vai na saṃśayaḥ

आभूषण धारण करते और अपने उपकरणों का प्रयोग करते हुए वे गौओं और ब्राह्मणों की सहायता करते हैं; इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 34 (13.83.34)

आनृशंस्यमनुक्रोशः सत्यवाक्यं तथा क्षमा । स्वशरीरैरपि त्राणं बाह्यानां सिद्धिकारणम् । भवन्ति मनुजव्याघ्र तत्र मे नास्ति संशयः ॥

ānṛśaṃsyamanukrośaḥ satyavākyaṃ tathā kṣamā | svaśarīrairapi trāṇaṃ bāhyānāṃ siddhikāraṇam | bhavanti manujavyāghra tatra me nāsti saṃśayaḥ

दया, करुणा, सत्य वचन और क्षमा, तथा अपने शरीर से भी दूसरों की रक्षा, ये बाह्य लोगों की सिद्धि के कारण होते हैं। हे नरव्याघ्र, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं।

श्लोक 35 (13.83.35)

यथोपदेशं परिकीर्तितासु । नरः प्रजायेत विचार्य बुद्धिमान् । निहीनयोनिर्हि सुतोऽवसादयेत् । तितीर्षमाणं हि यथोपलो जले ॥

yathopadeśaṃ parikīrtitāsu | naraḥ prajāyeta vicārya buddhimān | nihīnayonirhi suto'vasādayet | titīrṣamāṇaṃ hi yathopalo jale

ऊपर बताई गई स्त्रियों में बुद्धिमान पुरुष विचार करके ही सन्तान उत्पन्न करे; क्योंकि नीच योनि का पुत्र पिता को वैसे ही डुबा देता है, जैसे जल में पत्थर पार जाने की इच्छा वाले को।

श्लोक 36 (13.83.36)

अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः । नयन्ति ह्यपथं नार्यः कामक्रोधवशानुगम् ॥

avidvāṃsamalaṃ loke vidvāṃsamapi vā punaḥ | nayanti hyapathaṃ nāryaḥ kāmakrodhavaśānugam

स्त्रियाँ संसार में अज्ञानी हो या विद्वान, काम और क्रोध के वश में पड़े हुए पुरुष को कुमार्ग पर ले जाती हैं।

श्लोक 37 (13.83.37)

स्वभावश्चैव नारीणां नराणामिह दूषणम् । अत्यर्थं न प्रसज्जन्ते प्रमदासु विपश्चितः ॥

svabhāvaścaiva nārīṇāṃ narāṇāmiha dūṣaṇam | atyarthaṃ na prasajjante pramadāsu vipaścitaḥ

स्त्रियों का स्वभाव ही यहाँ पुरुषों को दूषित करने वाला है; इसलिए विवेकी लोग स्त्रियों में अत्यधिक आसक्त नहीं होते।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 38 (13.83.38)

वर्णापेतमविज्ञाय नरं कलुषयोनिजम् । आर्यरूपमिवानार्यं कथं विद्यामहे वयम् ॥

varṇāpetamavijñāya naraṃ kaluṣayonijam | āryarūpamivānāryaṃ kathaṃ vidyāmahe vayam

जो पुरुष दूषित योनि से उत्पन्न है, वर्ण से बाहर है, पहचाना नहीं गया है और अनार्य होकर भी आर्य जैसा दिखता है, उसे हम कैसे पहचानें?

भीष्म उवाच

श्लोक 39 (13.83.39)

योनिसङ्कलुषे जातं नानाभावसमन्वितम् । कर्मभिः सज्जनाचीर्णैर्विज्ञेयाः शुद्धयोनिकाः ॥

yonisaṅkaluṣe jātaṃ nānābhāvasamanvitam | karmabhiḥ sajjanācīrṇairvijñeyāḥ śuddhayonikāḥ

दूषित योनि में उत्पन्न मनुष्य अनेक प्रकार के विचित्र भावों से युक्त होता है; शुद्ध योनि वालों को सज्जनों द्वारा आचरित कर्मों से पहचानना चाहिए।

श्लोक 40 (13.83.40)

अनार्यत्वमनाचारः क्रूरत्वं निष्क्रियात्मता । पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ॥

anāryatvamanācāraḥ krūratvaṃ niṣkriyātmatā | puruṣaṃ vyañjayantīha loke kaluṣayonijam

अनार्यता, दुराचार, क्रूरता और निष्क्रियता इस लोक में दूषित योनि वाले पुरुष को प्रकट कर देती हैं।

श्लोक 41 (13.83.41)

पित्र्यं वा भजते शीलं मातृजं वा तथोभयम् । न कथञ्चन सङ्कीर्णः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ॥

pitryaṃ vā bhajate śīlaṃ mātṛjaṃ vā tathobhayam | na kathañcana saṅkīrṇaḥ prakṛtiṃ svāṃ niyacchati

वह या तो पिता के स्वभाव का अनुसरण करता है, या माता के, या दोनों के; संकर जन्म वाला मनुष्य किसी प्रकार अपनी प्रकृति को रोक नहीं पाता।

श्लोक 42 (13.83.42)

यथैव सदृशो रूपे मातापित्रोर्हि जायते । व्याघ्रबिन्दोस्तथा योनिं पुरुषः स्वां नियच्छति ॥

yathaiva sadṛśo rūpe mātāpitrorhi jāyate | vyāghrabindostathā yoniṃ puruṣaḥ svāṃ niyacchati

जैसे सन्तान रूप में माता-पिता के समान उत्पन्न होती है, वैसे ही मनुष्य अपनी योनि को नहीं दबा सकता, जैसे बाघ के चिह्न।

श्लोक 43 (13.83.43)

कुले स्रोतसि संच्छन्ने यस्य स्याद्योनिसङ्करः । संश्रयत्येव तच्छीलं नरोऽल्पमथवा बहु ॥

kule srotasi saṃcchanne yasya syādyonisaṅkaraḥ | saṃśrayatyeva tacchīlaṃ naro'lpamathavā bahu

कुल की धारा छिपी रहने पर भी जिसकी योनि में संकर हुआ हो, वह मनुष्य उस स्वभाव को थोड़ा या बहुत अवश्य अपनाता है।

श्लोक 44 (13.83.44)

आर्यरूपसमाचारं चरन्तं कृतके पथि । सवर्णमन्यवर्णं वा स्वशीलं शास्ति निश्चये ॥

āryarūpasamācāraṃ carantaṃ kṛtake pathi | savarṇamanyavarṇaṃ vā svaśīlaṃ śāsti niścaye

जो पुरुष कपट के मार्ग पर आर्य के रूप और आचरण के साथ चलता है, चाहे वह सवर्ण हो या अन्य वर्ण का, उसका अपना स्वभाव निश्चय ही उसे प्रकट कर देता है।

श्लोक 45 (13.83.45)

नानावृत्तेषु भूतेषु नानाक्रमरतेषु च । जन्मवृत्तसमं लोके सुश्लिष्टं न विरज्यते ॥

nānāvṛtteṣu bhūteṣu nānākramarateṣu ca | janmavṛttasamaṃ loke suśliṣṭaṃ na virajyate

अनेक प्रकार की वृत्ति और अनेक प्रकार के आचरण वाले प्राणियों में जो जन्म और आचरण के अनुरूप होता है, वह भली-भाँति जुड़ा रहता है और कभी फीका नहीं पड़ता।

श्लोक 46 (13.83.46)

शरीरमिह सत्वेन न तस्य परिकृष्यते । ज्येष्ठमध्यावरं सत्वं तुल्यसत्वं प्रमोदते ॥

śarīramiha satvena na tasya parikṛṣyate | jyeṣṭhamadhyāvaraṃ satvaṃ tulyasatvaṃ pramodate

यहाँ उसका शरीर उसके सत्त्व द्वारा खींचा नहीं जाता; वह सत्त्व उत्तम, मध्यम या निम्न होता है, और प्राणी समान सत्त्व वाले में आनन्द पाता है।

श्लोक 47 (13.83.47)

ज्यायांसमपि शीलेन विहीनं नैव पूजयेत् । अपि शूद्रं च धर्मज्ञं सद्वृत्तमभिपूजयेत् ॥

jyāyāṃsamapi śīlena vihīnaṃ naiva pūjayet | api śūdraṃ ca dharmajñaṃ sadvṛttamabhipūjayet

ऊँचे वर्ण का होने पर भी जो शील से रहित है, उसकी पूजा न करे; पर धर्म को जानने वाले सदाचारी शूद्र का भी सम्मान करे।

श्लोक 48 (13.83.48)

आत्मानमाख्याति हि कर्मभिर्नरः । सुशीलचारित्रकुलैः शुभाशुभैः । प्रनष्टमप्यात्मकुलं तथा नरः । पुनः प्रकाशं कुरुते स्वकर्मतः ॥

ātmānamākhyāti hi karmabhirnaraḥ | suśīlacāritrakulaiḥ śubhāśubhaiḥ | pranaṣṭamapyātmakulaṃ tathā naraḥ | punaḥ prakāśaṃ kurute svakarmataḥ

मनुष्य अपने शुभ-अशुभ कर्मों, शील, आचरण और कुल से अपना परिचय देता है; और उसी प्रकार मनुष्य अपने कर्मों से लुप्त हो चुके अपने कुल को भी फिर प्रकाश में ला सकता है।

श्लोक 49 (13.83.49)

योनिष्वेतासु सर्वासु सङ्कीर्णास्वितरासु च । यत्रात्मानं न जनयेद्बुधस्तां परिवर्जयेत् ॥

yoniṣvetāsu sarvāsu saṅkīrṇāsvitarāsu ca | yatrātmānaṃ na janayedbudhastāṃ parivarjayet

इन सब संकर और अन्य योनियों में बुद्धिमान पुरुष उस योनि को छोड़ दे जिसमें वह अपने समान सन्तान उत्पन्न न कर सके।

अध्याय 82अध्याय-सूचीअध्याय 84