अनुशासन पर्व · अध्याय 84
पुत्रों के भेद
युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि पुत्र कितने प्रकार के होते हैं और कौन किसका पुत्र माना जाता है, क्योंकि इस विषय में मत भिन्न-भिन्न हैं। भीष्म औरस, क्षेत्रज, दत्त, कृत्रिम, गूढज, अपविद्ध आदि पुत्रों का, मिश्र संयोग से उत्पन्न अपसद और अपध्वंसज पुत्रों का तथा पुत्र के प्रतिनिधि माने गए अन्य पुत्रों का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि पुत्र के अधिकार का निर्णय कहाँ बीज से और कहाँ क्षेत्र से होता है, और गोद लिए या त्यागे हुए पुत्र के संस्कार और विवाह कैसे किए जाएँ।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.84.1)
ब्रूहि तात कुरुश्रेष्ठ वर्णानां त्वं पृथक् पृथक् । कीदृश्यां कीदृशाश्चापि पुत्राः कस्य च के च ते ॥
brūhi tāta kuruśreṣṭha varṇānāṃ tvaṃ pṛthak pṛthak | kīdṛśyāṃ kīdṛśāścāpi putrāḥ kasya ca ke ca te
हे तात, कुरुश्रेष्ठ! आप प्रत्येक वर्ण के विषय में अलग-अलग बताइए कि कैसी स्त्री से कैसे पुत्र उत्पन्न होते हैं, वे किसके पुत्र माने जाते हैं और वे कौन-कौन से हैं।
श्लोक 2 (13.84.2)
विप्रवादाः सुबहवः श्रूयन्ते पुत्रकारिणाम् । अत्र नो मुह्यतां राजन्संशयं छेत्तुमर्हसि ॥
vipravādāḥ subahavaḥ śrūyante putrakāriṇām | atra no muhyatāṃ rājansaṃśayaṃ chettumarhasi
पुत्र उत्पन्न करने के विषय में बहुत-से परस्पर विरोधी मत सुने जाते हैं। हे राजन्, इस विषय में हम मोह में पड़े हैं; आप हमारा संशय दूर करने योग्य हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (13.84.3)
आत्मा पुत्रस्तु विज्ञेयः प्रथमो बहुधा परे ॥
ātmā putrastu vijñeyaḥ prathamo bahudhā pare
पुत्र को अपना ही आत्मा जानना चाहिए; वह प्रथम है, और दूसरे अनेक प्रकार के हैं।
श्लोक 4 (13.84.4)
स्वे क्षेत्रे संस्कृते यस्तु पुत्रमुत्पादयेत्स्वयम् । तमौरसं विजानीयात्पुत्रं प्रथमकल्पितम् ॥
sve kṣetre saṃskṛte yastu putramutpādayetsvayam | tamaurasaṃ vijānīyātputraṃ prathamakalpitam
अपने विधिपूर्वक संस्कारित क्षेत्र (पत्नी) में जो स्वयं पुत्र उत्पन्न करता है, उसे औरस पुत्र जानना चाहिए; वह पहले स्थान पर गिना गया है।
श्लोक 5 (13.84.5)
अग्निं प्रजापतिं चेष्ट्वा वराय प्रतिपादिता । पुत्रिका स्याद्दुहितरि सङ्कल्पे वाऽपि वा सुतः ॥
agniṃ prajāpatiṃ ceṣṭvā varāya pratipāditā | putrikā syādduhitari saṅkalpe vā'pi vā sutaḥ
अग्नि और प्रजापति का यज्ञ करके वर को दी गई कन्या ‘पुत्रिका’ होती है; इसी प्रकार कन्या का पुत्र, अथवा संकल्प से बना हुआ पुत्र भी (पुत्र माना जाता है)।
श्लोक 6 (13.84.6)
तल्पे जातः प्रमीतस्य क्लीबस्य पतितस्य वा । स्वधर्मेण नियुक्तो यः स पुत्रः क्षेत्रजः स्मृतः ॥
talpe jātaḥ pramītasya klībasya patitasya vā | svadharmeṇa niyukto yaḥ sa putraḥ kṣetrajaḥ smṛtaḥ
मृत, नपुंसक अथवा पतित पुरुष की शय्या (पत्नी) से उत्पन्न, जो अपने धर्म के अनुसार नियुक्त होकर जन्मा हो, वह क्षेत्रज पुत्र कहा गया है।
श्लोक 7 (13.84.7)
माता पिता च दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि । सदृशप्रीतिसंयुक्तो विज्ञेयो दत्रिमः सुतः ॥
mātā pitā ca dadyātāṃ yamadbhiḥ putramāpadi | sadṛśaprītisaṃyukto vijñeyo datrimaḥ sutaḥ
आपत्ति के समय माता-पिता जिस पुत्र को जल के साथ दान कर दें और जो उनके प्रति समान प्रीति से जुड़ा हो, उसे दत्रिम (दत्तक) पुत्र जानना चाहिए।
श्लोक 8 (13.84.8)
सदृशं तु प्रकुर्याद्यं गुणदोषविचक्षणम् । पुत्रं पुत्रगुणैर्युक्तं विज्ञेयः स तु कृत्रिमः ॥
sadṛśaṃ tu prakuryādyaṃ guṇadoṣavicakṣaṇam | putraṃ putraguṇairyuktaṃ vijñeyaḥ sa tu kṛtrimaḥ
गुण-दोष को परखने वाला पुरुष जिस पुत्रोचित गुणों से युक्त बालक को अपने समान बना ले, वह कृत्रिम पुत्र जानना चाहिए।
श्लोक 9 (13.84.9)
उत्पद्यते यस्य गूढं न च ज्ञायेत कस्यचित् । स भवेद्गूढजो नाम तस्य स्याद्यस्य तल्पतः ॥
utpadyate yasya gūḍhaṃ na ca jñāyeta kasyacit | sa bhavedgūḍhajo nāma tasya syādyasya talpataḥ
जो गुप्त रूप से उत्पन्न हो और जिसके जन्म को कोई न जाने, वह ‘गूढज’ कहलाता है; वह उसी का होता है जिसकी शय्या (पत्नी) से वह उत्पन्न हुआ।
श्लोक 10 (13.84.10)
मातापितृभ्यामुत्सृष्टस्तयोरन्यतरेण वा । यं पुत्रं प्रतिगृह्णीयादपविद्धः स उच्यते ॥
mātāpitṛbhyāmutsṛṣṭastayoranyatareṇa vā | yaṃ putraṃ pratigṛhṇīyādapaviddhaḥ sa ucyate
माता-पिता ने, या दोनों में से किसी एक ने जिस पुत्र को त्याग दिया हो और जिसे कोई दूसरा अपना ले, वह ‘अपविद्ध’ कहलाता है।
श्लोक 11 (13.84.11)
पितृवेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः । तं कानीनं वदन्नाम्ना वोढुः कन्यासमुद्भवे ॥
pitṛveśmani kanyā tu yaṃ putraṃ janayedrahaḥ | taṃ kānīnaṃ vadannāmnā voḍhuḥ kanyāsamudbhave
पिता के घर में कन्या जिस पुत्र को गुप्त रूप से जन्म दे, उसे ‘कानीन’ नाम से कहते हैं; वह उस कन्या से विवाह करने वाले का होता है।
श्लोक 12 (13.84.12)
या गर्भिणी संस्क्रियते ज्ञाताऽज्ञातापि वा सती । वोढुः स गर्भो भवति सहोढ इति उच्यते ॥
yā garbhiṇī saṃskriyate jñātā'jñātāpi vā satī | voḍhuḥ sa garbho bhavati sahoḍha iti ucyate
गर्भवती स्त्री का विवाह होने पर, चाहे उसकी दशा ज्ञात हो या अज्ञात, वह गर्भ पति का होता है और ‘सहोढ’ कहलाता है।
श्लोक 13 (13.84.13)
क्रीणीयाद्यस्त्वपत्यार्थं मातापित्रोर्यमन्तिकात् । स क्रीतकः सुतस्तस्य सदृशोऽसदृशोपि वा ॥
krīṇīyādyastvapatyārthaṃ mātāpitroryamantikāt | sa krītakaḥ sutastasya sadṛśo'sadṛśopi vā
जो माता-पिता के पास से संतान के लिए किसी बालक को मोल ले ले, उसका वह पुत्र ‘क्रीतक’ कहलाता है, चाहे वह उसके समान हो अथवा असमान।
श्लोक 14 (13.84.14)
या पत्या वा परित्यक्ता विधवा वा स्वकेच्छया । उत्पादयति पुनर्भूत्वा स पौनर्भव उच्यते ॥
yā patyā vā parityaktā vidhavā vā svakecchayā | utpādayati punarbhūtvā sa paunarbhava ucyate
जो स्त्री पति से त्याग दी गई हो अथवा विधवा हो और अपनी इच्छा से पुनः पत्नी बनकर पुत्र उत्पन्न करे, वह पुत्र ‘पौनर्भव’ कहलाता है।
श्लोक 15 (13.84.15)
सा चेदक्षतयोनिः स्याद्गतप्रत्यागताऽपि वा । पौनर्भवेन भर्त्रा सा पुनःसंस्कारमर्हति ॥
sā cedakṣatayoniḥ syādgatapratyāgatā'pi vā | paunarbhavena bhartrā sā punaḥsaṃskāramarhati
यदि वह अक्षतयोनि हो, अथवा जाकर लौट आई हो, तो पुनर्विवाह के पति द्वारा उसका फिर से संस्कार होना उचित है।
श्लोक 16 (13.84.16)
मातापितृहीनो यः स्यात्त्यक्तो वा स्यादकारणम् । आत्मानं स्पर्शयेद्यस्तु स्वयंदत्तस्तु स स्मृतः ॥
mātāpitṛhīno yaḥ syāttyakto vā syādakāraṇam | ātmānaṃ sparśayedyastu svayaṃdattastu sa smṛtaḥ
जो माता-पिता से रहित हो, अथवा बिना कारण त्याग दिया गया हो, और जो स्वयं को (किसी को पुत्र रूप में) अर्पित कर दे, वह ‘स्वयंदत्त’ कहा गया है।
श्लोक 17 (13.84.17)
यं ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत्सुतम् । स पारयन्नेव शवस्तस्मात्पारशवः स्मृतः ॥
yaṃ brāhmaṇastu śūdrāyāṃ kāmādutpādayetsutam | sa pārayanneva śavastasmātpāraśavaḥ smṛtaḥ
ब्राह्मण कामवश शूद्र स्त्री से जिस पुत्र को उत्पन्न करे, वह पार लगाता हुआ भी शव (जीवित शव) है; इसीलिए वह ‘पारशव’ कहा गया है।
श्लोक 18 (13.84.18)
दास्यां वा दासदास्यां वा यः शूद्रस्य सुतो भवेत् । सोऽनुज्ञातो हरेदंशमिति धर्मो व्यवस्थितः ॥
dāsyāṃ vā dāsadāsyāṃ vā yaḥ śūdrasya suto bhavet | so'nujñāto haredaṃśamiti dharmo vyavasthitaḥ
शूद्र के जो पुत्र दासी या दास की दासी से उत्पन्न हो, वह अनुमति मिलने पर अंश पाता है; यही धर्म स्थिर किया गया है।
श्लोक 19 (13.84.19)
क्षेत्रजादीन्सुतानेतानेकादश यथोदितान् । पुत्रप्रतिनिधीनाहुः क्रियालोपान्मनीषिणः ॥
kṣetrajādīnsutānetānekādaśa yathoditān | putrapratinidhīnāhuḥ kriyālopānmanīṣiṇaḥ
क्षेत्रज से आरम्भ करके जिन ग्यारह पुत्रों का वर्णन हुआ है, उन्हें ज्ञानी लोग संस्कारों के लोप के कारण पुत्र के प्रतिनिधि कहते हैं।
श्लोक 20 (13.84.20)
भ्रातॄणामेकजातानामेकश्चेत्पुत्रवान्भवेत् । सर्वांस्तांस्तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीत् ॥
bhrātṝṇāmekajātānāmekaścetputravānbhavet | sarvāṃstāṃstena putreṇa putriṇo manurabravīt
एक ही पिता से उत्पन्न भाइयों में यदि एक के पुत्र हो, तो मनु ने कहा है कि उस पुत्र से वे सभी पुत्रवान् हैं।
श्लोक 21 (13.84.21)
सर्वासामेकपत्नीनामेका चेत्पुत्रिणी भवेत् । सर्वास्तास्तेन पुत्रेण प्राह पुत्रवतीर्मनुः ॥
sarvāsāmekapatnīnāmekā cetputriṇī bhavet | sarvāstāstena putreṇa prāha putravatīrmanuḥ
एक पति की सब पत्नियों में यदि एक के पुत्र हो, तो मनु ने कहा है कि उस पुत्र से वे सभी पुत्रवती हैं।
श्लोक 22 (13.84.22)
आत्मा पुत्रश्च विज्ञेयस्तस्यानन्तरजश्च यः । निरुक्तजश्च विज्ञेयः सुतः प्रसृतजस्तथा ॥
ātmā putraśca vijñeyastasyānantarajaśca yaḥ | niruktajaśca vijñeyaḥ sutaḥ prasṛtajastathā
आत्मा (अपने ही शरीर से उत्पन्न पुत्र) को पुत्र जानना चाहिए; और उसके बाद उत्पन्न होने वाले को भी; निरुक्तज (नियोग से उत्पन्न) को भी; तथा प्रसृतज को भी।
श्लोक 23 (13.84.23)
पतितस्य तु भार्याया भर्त्रा सुसमवेतया । तथा दत्तकृतौ पुत्रावध्यूढश्च तथाऽपरः ॥
patitasya tu bhāryāyā bhartrā susamavetayā | tathā dattakṛtau putrāvadhyūḍhaśca tathā'paraḥ
पतित पुरुष की पत्नी से, पति के साथ भली-भाँति मिलने पर, उत्पन्न पुत्र; दत्त और कृत नामक दो पुत्र; और दूसरा अध्यूढ।
श्लोक 24 (13.84.24)
षडपध्वंसजाश्चापि कानीनापसदास्तथा । इत्येते वै समाख्यातास्तान्विजानीहि भारत ॥
ṣaḍapadhvaṃsajāścāpi kānīnāpasadāstathā | ityete vai samākhyātāstānvijānīhi bhārata
छह अपध्वंसज, कानीन तथा अपसद: इस प्रकार इनके नाम बताए गए। हे भारत, इन्हें जान लो।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 25 (13.84.25)
षडपध्वंसजाः के स्युः के वाऽप्यपसदास्तथा । एतत्सर्वं यथातत्त्वं व्याख्यातुं मे त्वमर्हसि ॥
ṣaḍapadhvaṃsajāḥ ke syuḥ ke vā'pyapasadāstathā | etatsarvaṃ yathātattvaṃ vyākhyātuṃ me tvamarhasi
छह अपध्वंसज कौन हैं और अपसद कौन हैं? यह सब आप मुझे यथार्थ रूप से समझाइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 26 (13.84.26)
त्रिषु वर्णेषु ये पुत्रा ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर । वर्णयोश्च द्वयोः स्यातां यौ राजन्यस्य भारत ॥
triṣu varṇeṣu ye putrā brāhmaṇasya yudhiṣṭhira | varṇayośca dvayoḥ syātāṃ yau rājanyasya bhārata
हे युधिष्ठिर, तीन वर्णों में ब्राह्मण के जो पुत्र होते हैं, और हे भारत, दो वर्णों में क्षत्रिय के जो दो पुत्र होते हैं,
श्लोक 27 (13.84.27)
एको द्विवर्ण एवाथ तथाऽत्रैवोपलक्षितः । षडपध्वंसजास्ते हि तथैवापसदाञ्शृणु ॥
eko dvivarṇa evātha tathā'traivopalakṣitaḥ | ṣaḍapadhvaṃsajāste hi tathaivāpasadāñśṛṇu
तथा दो वर्णों से उत्पन्न वह एक, जो वैसे ही पहचाना जाता है: ये छह अपध्वंसज हैं। अब इसी प्रकार अपसदों के विषय में सुनो।
श्लोक 28 (13.84.28)
चाण्डालो व्रात्यवेनौ तु ब्राह्मण्यां क्षत्रियासु च । वैश्यायां चैव शूद्रस्य लक्ष्यास्तेऽपसदास्त्रयः ॥
cāṇḍālo vrātyavenau tu brāhmaṇyāṃ kṣatriyāsu ca | vaiśyāyāṃ caiva śūdrasya lakṣyāste'pasadāstrayaḥ
चाण्डाल, व्रात्य और वेन: शूद्र से क्रमशः ब्राह्मणी, क्षत्रिया और वैश्या स्त्रियों में उत्पन्न ये तीन अपसद माने गए हैं।
श्लोक 29 (13.84.29)
मागधो वामकश्चैव द्वौ वैश्यस्योपलक्षितौ । ब्राह्मण्यां क्षत्रियायां च क्षत्रियस्यैक एव तु ॥
māgadho vāmakaścaiva dvau vaiśyasyopalakṣitau | brāhmaṇyāṃ kṣatriyāyāṃ ca kṣatriyasyaika eva tu
मागध और वामक: ये दो वैश्य के पुत्र माने गए हैं, ब्राह्मणी और क्षत्रिया स्त्री से; और क्षत्रिय का केवल एक ही होता है।
श्लोक 30 (13.84.30)
ब्राह्मण्यां लक्ष्यते सूत इत्येतेऽपसदाः स्मृताः । पुत्रा ह्येते न शक्यन्ते मिथ्या कर्तुं नराधिप ॥
brāhmaṇyāṃ lakṣyate sūta ityete'pasadāḥ smṛtāḥ | putrā hyete na śakyante mithyā kartuṃ narādhipa
ब्राह्मणी स्त्री से उत्पन्न वह सूत कहलाता है। इस प्रकार ये अपसद कहे गए हैं। हे नराधिप, ये सब पुत्र ही हैं; इन्हें मिथ्या नहीं ठहराया जा सकता।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 31 (13.84.31)
क्षेत्रजं केचिदेवाहुः सुतं केचित्तु शुक्रजम् । तुल्यावेतौ सुतौ कस्य तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kṣetrajaṃ kecidevāhuḥ sutaṃ kecittu śukrajam | tulyāvetau sutau kasya tanme brūhi pitāmaha
कोई क्षेत्रज को पुत्र कहते हैं, कोई बीज से उत्पन्न को। क्या ये दोनों पुत्र बराबर हैं? ये किसके होते हैं? पितामह, यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 32 (13.84.32)
रेतजो वा भवेत्पुत्रः पुत्रो वा क्षेत्रजो भवेत् । अध्यूढः समयं भित्त्वेत्येतदेव निबोध मे ॥
retajo vā bhavetputraḥ putro vā kṣetrajo bhavet | adhyūḍhaḥ samayaṃ bhittvetyetadeva nibodha me
पुत्र चाहे रेतज हो, चाहे क्षेत्रज हो, या समय (प्रतिज्ञा) को तोड़कर आया हुआ अध्यूढ हो: यही मुझसे सुनो।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 33 (13.84.33)
रेतजं विद्म वै पुत्रं क्षेत्रजस्यागमः कथम् । अध्यूढं विद्म वै पुत्रं भित्त्वा तु समयं कथम् ॥
retajaṃ vidma vai putraṃ kṣetrajasyāgamaḥ katham | adhyūḍhaṃ vidma vai putraṃ bhittvā tu samayaṃ katham
रेतज पुत्र को मैं जानता हूँ; पर क्षेत्रज की मान्यता कैसे होती है? अध्यूढ पुत्र को मैं जानता हूँ; पर समय को तोड़ने पर वह कैसे होता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 34 (13.84.34)
आत्मजं पुत्रमुत्पाद्य यस्त्यजेत्कारणान्तरे । न तत्र कारणं रेतः स क्षेत्रस्वामिनो भवेत् ॥
ātmajaṃ putramutpādya yastyajetkāraṇāntare | na tatra kāraṇaṃ retaḥ sa kṣetrasvāmino bhavet
जो पुरुष अपने शरीर से पुत्र उत्पन्न करके किसी अन्य कारण से उसे त्याग दे, वहाँ बीज निर्णायक नहीं होता; वह पुत्र क्षेत्र के स्वामी का होता है।
श्लोक 35 (13.84.35)
पुत्रकामो हि पुत्रार्थे यां वृणीते विशाम्पते । तत्र क्षेत्रं प्रमाणं स्यान्न वै तत्रात्मजः सुतः ॥
putrakāmo hi putrārthe yāṃ vṛṇīte viśāmpate | tatra kṣetraṃ pramāṇaṃ syānna vai tatrātmajaḥ sutaḥ
हे विशाम्पते, पुत्र की इच्छा रखने वाला पुरुष पुत्र के लिए जिस स्त्री का वरण करता है, वहाँ क्षेत्र ही प्रमाण होता है; वहाँ वह पुत्र बीज देने वाले का अपना नहीं होता।
श्लोक 36 (13.84.36)
अन्यत्र क्षेत्रजः पुत्रो लक्ष्यते भरतर्षभ । न ह्यात्मा शक्यते हन्तुं दृष्टान्तोपगतो ह्यसौ ॥
anyatra kṣetrajaḥ putro lakṣyate bharatarṣabha | na hyātmā śakyate hantuṃ dṛṣṭāntopagato hyasau
हे भरतर्षभ, अन्यत्र क्षेत्रज पुत्र को मान्यता मिलती है; पर आत्मज पुत्र को हटाया नहीं जा सकता, क्योंकि वह दृष्टान्त से प्रमाणित है।
श्लोक 37 (13.84.37)
क्वचिच्च कृतकः पुत्रः सङ्ग्रहादेव लक्ष्यते । न तत्र रेतः क्षेत्रं वा प्रमाणं स्याद्युधिष्ठिर ॥
kvacicca kṛtakaḥ putraḥ saṅgrahādeva lakṣyate | na tatra retaḥ kṣetraṃ vā pramāṇaṃ syādyudhiṣṭhira
कहीं कृतक पुत्र केवल ग्रहण करने से ही माना जाता है; हे युधिष्ठिर, वहाँ न बीज प्रमाण होता है, न क्षेत्र।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 38 (13.84.38)
कीदृशः कृतकः पुत्रः सङ्ग्रहादेव लक्ष्यते । शुक्रं क्षेत्रं प्रमाणं वा यत्र लक्ष्यं न भारत ॥
kīdṛśaḥ kṛtakaḥ putraḥ saṅgrahādeva lakṣyate | śukraṃ kṣetraṃ pramāṇaṃ vā yatra lakṣyaṃ na bhārata
हे भारत, कैसा कृतक पुत्र केवल ग्रहण करने से माना जाता है, जहाँ न बीज और न क्षेत्र प्रमाण दिखाई देता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 39 (13.84.39)
मातापितृभ्यां यस्त्यक्तः पथि यस्तं प्रकल्पयेत् । न चास्य मातापितरौ ज्ञायेतां स हि कृत्रिमः ॥
mātāpitṛbhyāṃ yastyaktaḥ pathi yastaṃ prakalpayet | na cāsya mātāpitarau jñāyetāṃ sa hi kṛtrimaḥ
जिसे माता-पिता ने त्याग दिया हो, जिसे कोई मार्ग में उठा ले और जिसके माता-पिता का पता न हो, वह कृत्रिम पुत्र है।
श्लोक 40 (13.84.40)
अस्वामिकस्य स्वामित्वं यस्मिन्सम्प्रतिलक्ष्यते । यो वर्णः पोषयेत्तं च तद्वर्णस्तस्य जायते ॥
asvāmikasya svāmitvaṃ yasminsampratilakṣyate | yo varṇaḥ poṣayettaṃ ca tadvarṇastasya jāyate
जिस अस्वामिक (स्वामीरहित) बालक का स्वामित्व जिस पुरुष में दिखाई दे, उसका पालन जो वर्ण करता है, वह उसी वर्ण का हो जाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 41 (13.84.41)
कथमस्य प्रयोक्तव्यः संस्कारः कस्य वा कथम् । देया कन्या कथं चेति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
kathamasya prayoktavyaḥ saṃskāraḥ kasya vā katham | deyā kanyā kathaṃ ceti tanme brūhi pitāmaha
उसका संस्कार कैसे, किसके द्वारा और किस प्रकार किया जाए? और उसे कन्या कैसे दी जाए? पितामह, यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 42 (13.84.42)
आत्मवत्तस्य कुर्वीत संस्कारं स्वामिवत्तथा । त्यक्तो मातापितृभ्यां यः सवर्णं प्रतिपद्यते ॥
ātmavattasya kurvīta saṃskāraṃ svāmivattathā | tyakto mātāpitṛbhyāṃ yaḥ savarṇaṃ pratipadyate
माता-पिता से त्यागा हुआ जो बालक अपने ही वर्ण के पुरुष का आश्रय पाता है, उसके संस्कार अपने पुत्र की भाँति और स्वामी की भाँति करने चाहिए।
श्लोक 43 (13.84.43)
तद्गोत्रबन्धुजं तस्य कुर्यात्संस्कारमच्युत । अथ देया तु कन्या स्यात्तद्वर्णस्य युधिष्ठिर ॥
tadgotrabandhujaṃ tasya kuryātsaṃskāramacyuta | atha deyā tu kanyā syāttadvarṇasya yudhiṣṭhira
हे अच्युत, उसके संस्कार उसी पुरुष के गोत्र और बन्धुओं के अनुसार किए जाएँ। और यदि कन्या देनी हो, तो हे युधिष्ठिर, उसी वर्ण के पुरुष को दी जाए।
श्लोक 44 (13.84.44)
संस्कर्तुं वर्णगोत्रं च मातृवर्णविनिश्चये । कानीनाध्यूढजौ वाऽपि विज्ञेयौ पुत्रकिल्बिषौ ॥
saṃskartuṃ varṇagotraṃ ca mātṛvarṇaviniścaye | kānīnādhyūḍhajau vā'pi vijñeyau putrakilbiṣau
माता का वर्ण निश्चित हो जाने पर संस्कार के लिए वर्ण और गोत्र उसी के अनुसार होते हैं; और कानीन तथा अध्यूढज को ‘पुत्रकिल्बिष’ (दोषयुक्त पुत्र) जानना चाहिए।
श्लोक 45 (13.84.45)
कानीनाध्यूढजौ वाऽपि विज्ञेयौ पुत्रकिल्बिषौ । तावपि स्वाविव सुतौ संस्कार्याविति निश्चयः ॥
kānīnādhyūḍhajau vā'pi vijñeyau putrakilbiṣau | tāvapi svāviva sutau saṃskāryāviti niścayaḥ
कानीन और अध्यूढज को दोषयुक्त पुत्र जानना चाहिए; फिर भी इन दोनों का संस्कार अपने पुत्रों की भाँति ही करना चाहिए, यही निश्चय है।
श्लोक 46 (13.84.46)
क्षेत्रजो वाऽप्यपसदो येऽध्यूढास्तेषु चाप्युत । आत्मवद्वै प्रयुञ्जीरन्संस्कारान्ब्राह्मणादयः ॥
kṣetrajo vā'pyapasado ye'dhyūḍhāsteṣu cāpyuta | ātmavadvai prayuñjīransaṃskārānbrāhmaṇādayaḥ
क्षेत्रज, अपसद तथा अध्यूढ पुत्रों के विषय में भी ब्राह्मण आदि वर्ण अपने ही समान उनके संस्कार करें।
श्लोक 47 (13.84.47)
स्वं जन्मे मातृगोत्रेण संस्कारं ब्राह्मणादयः । धर्मशास्त्रेषु वर्णानां निश्चयोऽयं प्रदृश्यते ॥
svaṃ janme mātṛgotreṇa saṃskāraṃ brāhmaṇādayaḥ | dharmaśāstreṣu varṇānāṃ niścayo'yaṃ pradṛśyate
ब्राह्मण आदि वर्ण अपने जन्म और माता के गोत्र के अनुसार संस्कार करते हैं। धर्मशास्त्रों में वर्णों के लिए यही निश्चय दिखाई देता है।
श्लोक 48 (13.84.48)
एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
etatte sarvamākhyātaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
यह सब तुम्हें बता दिया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो?