अनुशासन पर्व · अध्याय 85
मछुआरों के जाल में च्यवन
युधिष्ठिर के पूछने पर कि दर्शन और साथ रहने से कैसा स्नेह होता है, और गौओं के माहात्म्य के विषय में, भीष्म नहुष और महर्षि च्यवन की कथा आरम्भ करते हैं। च्यवन गंगा और यमुना के संगम के जल में बारह वर्ष तप करते हैं और मछलियाँ उन पर विश्वास करने लगती हैं। मछुआरे उन्हें मछलियों के साथ जाल में खींच लाते हैं; मरती हुई मछलियों को देखकर मुनि को दया आती है और वे भयभीत मछुआरों से कहते हैं कि मैं मछलियों के साथ ही जाऊँगा, तब वे यह समाचार राजा नहुष को देते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.85.1)
दर्शने कीदृशः स्नेहः संवासे च पितामह । महाभाग्यं गवां चैव तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
darśane kīdṛśaḥ snehaḥ saṃvāse ca pitāmaha | mahābhāgyaṃ gavāṃ caiva tanme vyākhyātumarhasi
पितामह, दर्शन से और साथ रहने से कैसा स्नेह उत्पन्न होता है? और गौओं का माहात्म्य भी मुझे समझाइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.85.2)
हन्त ते कथयिष्यामि पुरावृत्तं महाद्युते । नहुषस्य च संवादं महर्षेश्च्यवनस्य च ॥
hanta te kathayiṣyāmi purāvṛttaṃ mahādyute | nahuṣasya ca saṃvādaṃ maharṣeścyavanasya ca
हे महाद्युति, मैं तुम्हें एक पुरानी कथा सुनाता हूँ: नहुष और महर्षि च्यवन का संवाद।
श्लोक 3 (13.85.3)
पुरा महर्षिश्च्यवनो भार्गवो भरतर्षभ । उदवासकृतारम्भो बभूव स महाव्रतः ॥
purā maharṣiścyavano bhārgavo bharatarṣabha | udavāsakṛtārambho babhūva sa mahāvrataḥ
हे भरतर्षभ, बहुत पहले भृगुवंशी महर्षि च्यवन, जो महान् व्रत वाले थे, जल में निवास करने का व्रत आरम्भ कर बैठे।
श्लोक 4 (13.85.4)
निहत्य मानं क्रोधं च प्रहर्षं शोकमेव च । वर्षाणि द्वादश मुनिर्जलवासे धृतव्रतः ॥
nihatya mānaṃ krodhaṃ ca praharṣaṃ śokameva ca | varṣāṇi dvādaśa munirjalavāse dhṛtavrataḥ
अभिमान और क्रोध, हर्ष और शोक को छोड़कर वह दृढ़व्रत मुनि बारह वर्ष तक जल में रहा।
श्लोक 5 (13.85.5)
आदधत्सर्वभूतेषु विस्रम्भं परमं शुभम् । जलेचरेषु सर्वेषु शीतरश्मिरिव प्रभुः ॥
ādadhatsarvabhūteṣu visrambhaṃ paramaṃ śubham | jalecareṣu sarveṣu śītaraśmiriva prabhuḥ
शीतल किरणों वाले चन्द्रमा के समान उस प्रभु ने जल में रहने वाले सब प्राणियों के हृदय में परम शुभ विश्वास उत्पन्न कर दिया।
श्लोक 6 (13.85.6)
स्थाणुभूतः शुचिर्भूत्वा दैवतेभ्यः प्रणम्य च । गङ्गायमुनयोर्मध्ये जलं सम्प्रविवेश ह ॥
sthāṇubhūtaḥ śucirbhūtvā daivatebhyaḥ praṇamya ca | gaṅgāyamunayormadhye jalaṃ sampraviveśa ha
स्तम्भ के समान स्थिर और शुद्ध होकर, देवताओं को प्रणाम करके उसने गंगा और यमुना के बीच के जल में प्रवेश किया।
श्लोक 7 (13.85.7)
गङ्गायमुनयोर्वेगं सुभीमं भीमनिःस्वनम् । प्रतिजग्राह शिरसा वातवेगसमं जवे ॥
gaṅgāyamunayorvegaṃ subhīmaṃ bhīmaniḥsvanam | pratijagrāha śirasā vātavegasamaṃ jave
उसने गंगा और यमुना के अत्यन्त भयंकर, भीषण गर्जन वाले, वायु के समान तीव्र वेग को अपने सिर पर सह लिया।
श्लोक 8 (13.85.8)
गङ्गा च यमुना चैव सरितश्च सरांसि च । प्रदक्षिणमृषिं चक्रुर्न चैनं पर्यपीडयन् ॥
gaṅgā ca yamunā caiva saritaśca sarāṃsi ca | pradakṣiṇamṛṣiṃ cakrurna cainaṃ paryapīḍayan
गंगा, यमुना, अन्य नदियाँ और सरोवर ऋषि की प्रदक्षिणा करते रहे और उन्हें कष्ट नहीं पहुँचाया।
श्लोक 9 (13.85.9)
अन्तर्जलेषु सुष्वाप काष्ठभूतो महामुनिः । ततश्चोर्ध्वस्थितो धीमानभवद्भरतर्षभ ॥
antarjaleṣu suṣvāpa kāṣṭhabhūto mahāmuniḥ | tataścordhvasthito dhīmānabhavadbharatarṣabha
वह महामुनि जल के भीतर काठ की भाँति सोया रहा; फिर हे भरतर्षभ, वह बुद्धिमान् सीधा खड़ा हो गया।
श्लोक 10 (13.85.10)
जलौकसां ससत्वानां बभूव प्रियदर्शनः । उपाजिघ्नन्त च तदा मत्स्यास्तं हृष्टमानसाः । तत्र तस्यासतः कालः समतीतोऽभवन्महान् ॥
jalaukasāṃ sasatvānāṃ babhūva priyadarśanaḥ | upājighnanta ca tadā matsyāstaṃ hṛṣṭamānasāḥ | tatra tasyāsataḥ kālaḥ samatīto'bhavanmahān
वह जल में रहने वाले प्राणियों को प्रिय दिखाई देने लगा; प्रसन्न मन वाली मछलियाँ उसे सूँघतीं। इस प्रकार वहाँ रहते हुए उसका बहुत लम्बा समय बीत गया।
श्लोक 11 (13.85.11)
ततः कदाचित्समये कस्मिंश्चिन्मत्स्यजीविनः । तं देशं समुपाजग्मुर्जालहस्ता महाद्युते ॥
tataḥ kadācitsamaye kasmiṃścinmatsyajīvinaḥ | taṃ deśaṃ samupājagmurjālahastā mahādyute
तब किसी समय हाथों में जाल लिए हुए मछली पकड़ने वाले उस स्थान पर आए, हे महाद्युति।
श्लोक 12 (13.85.12)
निषादा बहवस्तत्र मत्स्योद्धरणनिश्चयाः । व्यायता बलिनः शूराः सलिलेष्वनुवर्तिनः । अभ्याययुश्च तं देशं निश्चिता जालकर्मणि ॥
niṣādā bahavastatra matsyoddharaṇaniścayāḥ | vyāyatā balinaḥ śūrāḥ salileṣvanuvartinaḥ | abhyāyayuśca taṃ deśaṃ niścitā jālakarmaṇi
वहाँ बहुत-से निषाद मछलियाँ निकालने का निश्चय किए हुए थे, लम्बे-चौड़े, बलवान्, शूरवीर, जल में विचरने वाले; और वे जाल के काम में निपुण होकर उस स्थान पर आ पहुँचे।
श्लोक 13 (13.85.13)
जालं ते योजयामासुर्नवसूत्रकृतं दृढम् । मत्स्योद्धरणमाकर्षस्तदा भरतसत्तम ॥
jālaṃ te yojayāmāsurnavasūtrakṛtaṃ dṛḍham | matsyoddharaṇamākarṣastadā bharatasattama
उन्होंने नई डोरियों से बना हुआ मज़बूत जाल जोड़ा, हे भरतसत्तम, मछलियों को खींचकर निकालने के लिए।
श्लोक 14 (13.85.14)
ततस्ते बहुभिर्योगैः कैवर्ता मत्स्यकाङ्क्षिणः । गङ्गायमुनयोर्वारि जालेनावकिरन्ति ते ॥
tataste bahubhiryogaiḥ kaivartā matsyakāṅkṣiṇaḥ | gaṅgāyamunayorvāri jālenāvakiranti te
तब मछली चाहने वाले उन मछुआरों ने अनेक उपायों से गंगा और यमुना के जल में जाल फैलाया।
श्लोक 15 (13.85.15)
जालं सुविततं तेषां नवसूत्रकृतं तथा । विस्तारायामसम्पन्नं यत्तत्र सलिले क्षमम् ॥
jālaṃ suvitataṃ teṣāṃ navasūtrakṛtaṃ tathā | vistārāyāmasampannaṃ yattatra salile kṣamam
उनका जाल खूब फैला हुआ और नई डोरियों का बना था, और चौड़ाई-लम्बाई में उस जल के अनुरूप था।
श्लोक 16 (13.85.16)
ततस्ते सुमहच्चैव बलवच्च सुवर्तितम् । अवतीर्य ततः सर्वे जालं चकृषिरे तदा ॥
tataste sumahaccaiva balavacca suvartitam | avatīrya tataḥ sarve jālaṃ cakṛṣire tadā
तब वे सब पानी में उतरकर उस बहुत बड़े, मज़बूत और भली-भाँति बटे हुए जाल को खींचने लगे।
श्लोक 17 (13.85.17)
अभीतरूपाः संहृष्टा अन्योन्यवशवर्तिनः । बबन्धुस्तत्र मत्स्यांश्च तथाऽन्याञ्जलचारिणः ॥
abhītarūpāḥ saṃhṛṣṭā anyonyavaśavartinaḥ | babandhustatra matsyāṃśca tathā'nyāñjalacāriṇaḥ
निर्भय और प्रसन्न होकर, एक-दूसरे के संकेत पर चलते हुए, उन्होंने वहाँ मछलियों और अन्य जलचरों को घेर लिया।
श्लोक 18 (13.85.18)
तथा मत्स्यैः परिवृतं च्यवनं भृगुनन्दनम् । आकर्षयन्महाराज जालेनाथ यदृच्छया ॥
tathā matsyaiḥ parivṛtaṃ cyavanaṃ bhṛgunandanam | ākarṣayanmahārāja jālenātha yadṛcchayā
और इस प्रकार, हे महाराज, संयोग से उन्होंने जाल से भृगुनन्दन च्यवन को, जो मछलियों से घिरे हुए थे, खींच लिया।
श्लोक 19 (13.85.19)
नदीशैवलदिग्धाङ्गं हरिश्मश्रुजटाधरम् । लग्नैः शङ्खनखैर्गात्रे क्रोडैश्चित्रैरिवार्पितम् ॥
nadīśaivaladigdhāṅgaṃ hariśmaśrujaṭādharam | lagnaiḥ śaṅkhanakhairgātre kroḍaiścitrairivārpitam
उनके अंग नदी की काई से लिपटे थे, दाढ़ी और जटाएँ हरी थीं, शरीर पर शंख-जीवों के नख चिपके हुए थे, मानो वे रंग-बिरंगे चित्रों से सजाए गए हों।
श्लोक 20 (13.85.20)
तं जालेनोद्धृतं दृष्ट्वा ते तदा वेदपारगम् । सर्वे प्राञ्जलयो दाशाः शिरोभिः प्रापतन्भुवि ॥
taṃ jālenoddhṛtaṃ dṛṣṭvā te tadā vedapāragam | sarve prāñjalayo dāśāḥ śirobhiḥ prāpatanbhuvi
वेदों के उस पारंगत को जाल से निकला देखकर सब मछुआरे हाथ जोड़कर सिर के बल भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 21 (13.85.21)
परिखेदपरित्रासाज्जालस्याकर्षणेन च । मत्स्या बभूवुर्व्यापन्नाः स्थलसंस्पर्शनेन च ॥
parikhedaparitrāsājjālasyākarṣaṇena ca | matsyā babhūvurvyāpannāḥ sthalasaṃsparśanena ca
कष्ट और भय से, जाल के खिंचने से और स्थल के स्पर्श से मछलियाँ मर गईं।
श्लोक 22 (13.85.22)
स मुनिस्तत्तदा दृष्ट्वा मत्स्यानां कदनं कृतम् । बभूव कृपयाविष्टो निःश्वसंश्च पुनःपुनः ॥
sa munistattadā dṛṣṭvā matsyānāṃ kadanaṃ kṛtam | babhūva kṛpayāviṣṭo niḥśvasaṃśca punaḥpunaḥ
मछलियों का वह संहार देखकर मुनि करुणा से भर गए और बार-बार लम्बी साँसें लेने लगे।
निषादा ऊचुः
श्लोक 23 (13.85.23)
अज्ञानाद्यत्कृतं पापं प्रसादं तत्र नः कुरु । करवाम प्रिय किं ते तन्नो ब्रूहि महामुने ॥
ajñānādyatkṛtaṃ pāpaṃ prasādaṃ tatra naḥ kuru | karavāma priya kiṃ te tanno brūhi mahāmune
हमने अज्ञान में जो पाप किया है, उस पर हमें क्षमा कीजिए। हम आपका कौन-सा प्रिय कार्य करें? हे महामुनि, यह हमें बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 24 (13.85.24)
इत्युक्तो मत्स्यमध्यस्थश्च्यवनो वाक्यमब्रवीत् । यो मेऽद्य परमः कामस्तं शृणुध्वं समाहिताः ॥
ityukto matsyamadhyasthaścyavano vākyamabravīt | yo me'dya paramaḥ kāmastaṃ śṛṇudhvaṃ samāhitāḥ
ऐसा कहे जाने पर मछलियों के बीच खड़े च्यवन ने ये वचन कहे: “आज मेरी जो परम इच्छा है, उसे तुम सब एकाग्र मन से सुनो।”
च्यवन उवाच
श्लोक 25 (13.85.25)
प्राणोत्सर्गं विसर्गं वा मत्स्यैर्यास्याम्यहं सह । संवासान्नोत्सहे त्यक्तुं सलिलेऽध्युषितानहम् ॥
prāṇotsargaṃ visargaṃ vā matsyairyāsyāmyahaṃ saha | saṃvāsānnotsahe tyaktuṃ salile'dhyuṣitānaham
चाहे प्राण त्यागने का अवसर हो या छूट जाने का, मैं इन मछलियों के साथ ही जाऊँगा। जल में जिनके साथ मैं रहा हूँ, उनके साथ रहना छोड़ने का मुझमें साहस नहीं है।
भीष्म उवाच
श्लोक 26 (13.85.26)
इत्युक्तास्ते निषादास्तु सुभृशं भयकम्पिताः । सर्वे विवर्णवदना नहुषाय न्यवेदयन् ॥
ityuktāste niṣādāstu subhṛśaṃ bhayakampitāḥ | sarve vivarṇavadanā nahuṣāya nyavedayan
ऐसा कहे जाने पर वे निषाद भय से बहुत काँप उठे और सबके मुख पीले पड़ गए; उन्होंने यह बात नहुष को जाकर बताई।