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अनुशासन पर्व · अध्याय 86

च्यवन का मूल्य: एक गौ

राजा नहुष मन्त्रियों और पुरोहित के साथ आकर मछुआरों को च्यवन का मूल्य चुकाने को कहते हैं। मुनि एक हजार, एक लाख, एक करोड़ और आधे राज्य को भी अस्वीकार कर देते हैं, तब वन में रहने वाले गविजात मुनि सुझाते हैं कि ब्राह्मण और गौएँ अमूल्य हैं, इसलिए मूल्य एक गौ ठहराया जाए। च्यवन गौ को मूल्य मानकर उठते हैं, गौओं की महिमा गाते हैं और निषादों की दी हुई गौ स्वीकार करते हैं; निषाद और मछलियाँ स्वर्ग चले जाते हैं और दोनों ऋषि नहुष को वर देते हैं।

अध्याय 85अध्याय-सूचीअध्याय 87

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.86.1)

नहुषस्तु ततः श्रुत्वा च्यवनं तं तथाऽऽगतम् । त्वरितः प्रययौ तत्र सहामात्यपुरोहितः ॥

nahuṣastu tataḥ śrutvā cyavanaṃ taṃ tathā''gatam | tvaritaḥ prayayau tatra sahāmātyapurohitaḥ

च्यवन के इस प्रकार आ जाने का समाचार सुनकर नहुष अपने मन्त्रियों और पुरोहित के साथ शीघ्रता से वहाँ गया।

श्लोक 2 (13.86.2)

शौचं कृत्वा यथान्यायं प्राञ्जलिः प्रयतो नृपः । आत्मानमाचचक्षे च च्यवनाय महात्मने ॥

śaucaṃ kṛtvā yathānyāyaṃ prāñjaliḥ prayato nṛpaḥ | ātmānamācacakṣe ca cyavanāya mahātmane

राजा ने विधिपूर्वक शुद्ध होकर, हाथ जोड़े हुए और संयत भाव से महात्मा च्यवन को अपना परिचय दिया।

श्लोक 3 (13.86.3)

अर्चयामास तं चापि तस्य राज्ञः पुरोहितः । सत्यव्रतं महात्मानं देवकल्पं विशाम्पते ॥

arcayāmāsa taṃ cāpi tasya rājñaḥ purohitaḥ | satyavrataṃ mahātmānaṃ devakalpaṃ viśāmpate

और हे विशाम्पते, उस राजा के पुरोहित ने उन सत्यव्रत, महात्मा, देवतुल्य मुनि की पूजा की।

नहुष उवाच

श्लोक 4 (13.86.4)

करवाणि प्रियं किं ते तन्मे ब्रूहि द्विजोत्तम । सर्वं कर्ताऽस्मि भगवन्यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् ॥

karavāṇi priyaṃ kiṃ te tanme brūhi dvijottama | sarvaṃ kartā'smi bhagavanyadyapi syātsuduṣkaram

मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? हे द्विजोत्तम, मुझे बताइए। हे भगवन्, चाहे वह अत्यन्त कठिन ही क्यों न हो, मैं सब कुछ करूँगा।

च्यवन उवाच

श्लोक 5 (13.86.5)

श्रमेण महता युक्ताः कैवर्ता मत्स्यजीविनः । मम मूल्यं प्रयच्छैभ्यो मत्स्यानां विक्रयैः सह ॥

śrameṇa mahatā yuktāḥ kaivartā matsyajīvinaḥ | mama mūlyaṃ prayacchaibhyo matsyānāṃ vikrayaiḥ saha

मछली से जीविका चलाने वाले ये मछुआरे बड़े परिश्रम से थके हैं। इन्हें मेरा मूल्य दे दो, और उन मछलियों का मूल्य भी, जिन्हें ये बेचते।

नहुष उवाच

श्लोक 6 (13.86.6)

सहस्रं दीयतां मूल्यं निषादेभ्यः पुरोहित । निष्क्रयार्थे भगवतो यथाऽऽह भृगुनन्दनः ॥

sahasraṃ dīyatāṃ mūlyaṃ niṣādebhyaḥ purohita | niṣkrayārthe bhagavato yathā''ha bhṛgunandanaḥ

हे पुरोहित, भगवान् च्यवन के निष्क्रय (छुटकारे) के लिए निषादों को एक हजार का मूल्य दिया जाए, जैसा कि भृगुनन्दन ने कहा है।

च्यवन उवाच

श्लोक 7 (13.86.7)

आत्ममूल्यं च वक्तव्यं न तल्लोकः प्रशंसति । तस्मादहं प्रवक्ष्यामि न चात्मस्तुतिम्मवृतः ॥

ātmamūlyaṃ ca vaktavyaṃ na tallokaḥ praśaṃsati | tasmādahaṃ pravakṣyāmi na cātmastutimmavṛtaḥ

अपना मूल्य स्वयं नहीं बताना चाहिए; लोक उसकी प्रशंसा नहीं करता। इसलिए मैं कहूँगा, पर आत्मप्रशंसा के भाव से नहीं।

श्लोक 8 (13.86.8)

सहस्रं नाहमर्हामि किं वा त्वं मन्यसे नृप । सदृशं दीयतां मूल्यं स्वबुद्ध्या निश्चयं कुरु ॥

sahasraṃ nāhamarhāmi kiṃ vā tvaṃ manyase nṛpa | sadṛśaṃ dīyatāṃ mūlyaṃ svabuddhyā niścayaṃ kuru

मैं एक हजार के योग्य नहीं हूँ। हे राजन्, तुम क्या सोचते हो? उचित मूल्य दिया जाए; अपनी बुद्धि से निश्चय करो।

नहुष उवाच

श्लोक 9 (13.86.9)

सहस्राणां शतं विप्र निषादेभ्यः प्रदीयताम् । स्यादिदं भगवन्मूल्यं किं वाऽन्यन्मन्यते भवान् ॥

sahasrāṇāṃ śataṃ vipra niṣādebhyaḥ pradīyatām | syādidaṃ bhagavanmūlyaṃ kiṃ vā'nyanmanyate bhavān

हे विप्र, निषादों को एक लाख दिए जाएँ। हे भगवन्, क्या यह मूल्य होगा, या आप कुछ और मानते हैं?

च्यवन उवाच

श्लोक 10 (13.86.10)

नाहं शतसहस्रेण निमेयः पार्थिवर्षभ । दीयतां सदृशं मूल्यममात्यैः सह चिन्तय ॥

nāhaṃ śatasahasreṇa nimeyaḥ pārthivarṣabha | dīyatāṃ sadṛśaṃ mūlyamamātyaiḥ saha cintaya

हे पार्थिवर्षभ, एक लाख से मेरा मोल नहीं आँका जा सकता। उचित मूल्य दिया जाए; अपने मन्त्रियों के साथ विचार करो।

नहुष उवाच

श्लोक 11 (13.86.11)

कोटिः प्रदीयतां मूल्यं निषादेभ्यः पुरोहित । यदेतदपि नो मूल्यमतो भूयः प्रदीयताम् ॥

koṭiḥ pradīyatāṃ mūlyaṃ niṣādebhyaḥ purohita | yadetadapi no mūlyamato bhūyaḥ pradīyatām

हे पुरोहित, निषादों को मूल्य के रूप में एक करोड़ दिया जाए। यदि यह भी मूल्य के लिए पर्याप्त न हो, तो और अधिक दिया जाए।

च्यवन उवाच

श्लोक 12 (13.86.12)

राजन्नार्हाम्यहं कोटिं भूयो वाऽपि महाद्युते । सदृशं दीयतां मूल्यं ब्राह्मणैः सह चिन्तय ॥

rājannārhāmyahaṃ koṭiṃ bhūyo vā'pi mahādyute | sadṛśaṃ dīyatāṃ mūlyaṃ brāhmaṇaiḥ saha cintaya

हे राजन्, हे महाद्युति, मैं एक करोड़ के योग्य नहीं हूँ, इससे अधिक के भी नहीं। उचित मूल्य दिया जाए; ब्राह्मणों के साथ विचार करो।

नहुष उवाच

श्लोक 13 (13.86.13)

अर्धं राज्यं समग्रं वा निषादेभ्यः प्रदीयताम् । एतत्तुल्यमहं मन्ये किं वाऽन्यन्मन्यसे द्विज ॥

ardhaṃ rājyaṃ samagraṃ vā niṣādebhyaḥ pradīyatām | etattulyamahaṃ manye kiṃ vā'nyanmanyase dvija

निषादों को मेरा आधा राज्य, अथवा सारा राज्य ही दे दिया जाए। मैं इसे तुम्हारे बराबर मानता हूँ; हे द्विज, या तुम कुछ और मानते हो?

च्यवन उवाच

श्लोक 14 (13.86.14)

अर्धं राज्यं समग्रं च मूल्यं नार्हामि पार्थिव । सदृशं दीयतां मूल्यमृषिभिः सह चिन्त्यताम् ॥

ardhaṃ rājyaṃ samagraṃ ca mūlyaṃ nārhāmi pārthiva | sadṛśaṃ dīyatāṃ mūlyamṛṣibhiḥ saha cintyatām

हे पार्थिव, मैं आधे राज्य के योग्य नहीं, न पूरे राज्य के। उचित मूल्य दिया जाए; ऋषियों के साथ उस पर विचार किया जाए।

भीष्म उवाच

श्लोक 15 (13.86.15)

महर्षेर्वचनं श्रुत्वा नहुषो दुःखकर्शितः । स चिन्तयामास तदा सहामात्यपुरोहितः ॥

maharṣervacanaṃ śrutvā nahuṣo duḥkhakarśitaḥ | sa cintayāmāsa tadā sahāmātyapurohitaḥ

महर्षि के वचन सुनकर दुःख से पीड़ित नहुष ने तब अपने मन्त्रियों और पुरोहित के साथ विचार किया।

श्लोक 16 (13.86.16)

तत्र त्वन्यो वनचरः कश्चिन्मूलफलाशनः । नहुषस्य समीपस्थो गविजातोऽभवन्मुनिः ॥

tatra tvanyo vanacaraḥ kaścinmūlaphalāśanaḥ | nahuṣasya samīpastho gavijāto'bhavanmuniḥ

तभी नहुष के पास एक और वनवासी मुनि खड़े थे, जो कन्द-मूल-फल खाते थे और गौ से उत्पन्न हुए थे।

श्लोक 17 (13.86.17)

स तमाभाष्य राजानमब्रवीद्द्विजसत्तमः । तोषयिष्याम्यहं विप्रं यथा तुष्टो भविष्यति ॥

sa tamābhāṣya rājānamabravīddvijasattamaḥ | toṣayiṣyāmyahaṃ vipraṃ yathā tuṣṭo bhaviṣyati

उन द्विजश्रेष्ठ ने राजा से बात करके कहा: “मैं उन विप्र को सन्तुष्ट करूँगा, जिससे वे प्रसन्न हो जाएँगे।”

गविजात उवाच

श्लोक 18 (13.86.18)

नाहं मिथ्यावचो ब्रूयां स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा । भवतो यदहं ब्रूयां तत्कार्यमविशङ्कया ॥

nāhaṃ mithyāvaco brūyāṃ svaireṣvapi kuto'nyathā | bhavato yadahaṃ brūyāṃ tatkāryamaviśaṅkayā

मैं विनोद में भी मिथ्या वचन नहीं कहता, फिर अन्य अवसर पर कैसे कहूँगा? मैं आपसे जो कहूँ, उसे निःशंक होकर कीजिए।

नहुष उवाच

श्लोक 19 (13.86.19)

ब्रवीतु भगवान्मूल्यं महर्षेः सदृशं भृगोः । परित्रायस्व मामस्मद्विषयं च कुलं च मे ॥

bravītu bhagavānmūlyaṃ maharṣeḥ sadṛśaṃ bhṛgoḥ | paritrāyasva māmasmadviṣayaṃ ca kulaṃ ca me

हे भगवन्, भृगुवंशी महर्षि के योग्य मूल्य आप बताइए। इस संकट से मेरी, मेरे राज्य की और मेरे कुल की रक्षा कीजिए।

श्लोक 20 (13.86.20)

हन्याद्धि भगवान्क्रुद्धस्त्रैलोक्यमपि केवलम् । किं पुनर्मां तपोहीनं बाहुवीर्यपरायणम् ॥

hanyāddhi bhagavānkruddhastrailokyamapi kevalam | kiṃ punarmāṃ tapohīnaṃ bāhuvīryaparāyaṇam

क्रुद्ध होने पर भगवान् तो तीनों लोकों को भी नष्ट कर सकते हैं; फिर मुझ तपोहीन, केवल बाहुबल के भरोसे रहने वाले की क्या बात?

श्लोक 21 (13.86.21)

अगाधाम्भसि मग्नस्य सामात्यस्य सऋत्विजः । प्लवो भव महर्षे त्वं कुरु मूल्यविनिश्चयम् ॥

agādhāmbhasi magnasya sāmātyasya saṛtvijaḥ | plavo bhava maharṣe tvaṃ kuru mūlyaviniścayam

हे महर्षि, अथाह जल में डूबे हुए मुझ जैसे के लिए, जो मन्त्रियों और ऋत्विजों के साथ हूँ, आप नौका बनिए और मूल्य निश्चित कीजिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (13.86.22)

नहुषस्य वचः श्रुत्वा गविजातः प्रतापवान् । उवाच हर्षयन्सर्वानमात्यान्पार्थिवं च तम् ॥

nahuṣasya vacaḥ śrutvā gavijātaḥ pratāpavān | uvāca harṣayansarvānamātyānpārthivaṃ ca tam

नहुष के वचन सुनकर प्रतापी गविजात ने सब मन्त्रियों और राजा को हर्षित करते हुए कहा:

गविजात उवाच

श्लोक 23 (13.86.23)

ब्राह्मणानां गवां चैव कुलमेकं द्विधा कृतम् । एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति हविरन्यत्र तिष्ठति ॥

brāhmaṇānāṃ gavāṃ caiva kulamekaṃ dvidhā kṛtam | ekatra mantrāstiṣṭhanti haviranyatra tiṣṭhati

ब्राह्मणों और गौओं का कुल एक ही है, जिसे दो भागों में बाँटा गया है: एक में मन्त्र स्थित हैं, दूसरे में हवि स्थित है।

श्लोक 24 (13.86.24)

अनर्घेया महाराज द्विजा वर्णेषु चोत्तमाः । गावश्च पुरुषव्याग्र गौर्मूल्यं परिकल्प्यताम् ॥

anargheyā mahārāja dvijā varṇeṣu cottamāḥ | gāvaśca puruṣavyāgra gaurmūlyaṃ parikalpyatām

हे महाराज, वर्णों में श्रेष्ठ ब्राह्मण अमूल्य हैं; और हे पुरुषव्याघ्र, गौएँ भी। इसलिए गौ को ही मूल्य ठहराया जाए।

भीष्म उवाच

श्लोक 25 (13.86.25)

नहुषस्तु ततः श्रुत्वा महर्षेर्वचनं नृप । हर्षेण महता युक्तः सहामात्यपुरोहितः ॥

nahuṣastu tataḥ śrutvā maharṣervacanaṃ nṛpa | harṣeṇa mahatā yuktaḥ sahāmātyapurohitaḥ

हे राजन्, महर्षि के वचन सुनकर नहुष महान् हर्ष से भर गया, और अपने मन्त्रियों और पुरोहित के साथ,

श्लोक 26 (13.86.26)

अभिगम्य भृगोः पुत्रं च्यवनं संशितव्रतम् । इदं प्रोवाच नृपते वाचा सन्तर्पयन्निव ॥

abhigamya bhṛgoḥ putraṃ cyavanaṃ saṃśitavratam | idaṃ provāca nṛpate vācā santarpayanniva

व्रत में दृढ़ भृगुपुत्र च्यवन के पास जाकर, हे नृपते, वाणी से मानो उन्हें तृप्त करते हुए यह बोला।

नहुष उवाच

श्लोक 27 (13.86.27)

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ विप्रर्षे गवा क्रीतोसि भार्गव । एतन्मूल्यमहं मन्ये तव धर्मभृतांवर ॥

uttiṣṭhottiṣṭha viprarṣe gavā krītosi bhārgava | etanmūlyamahaṃ manye tava dharmabhṛtāṃvara

उठिए, उठिए, हे विप्रर्षि! हे भार्गव, आप एक गौ से खरीद लिए गए हैं। हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, मैं यही आपका मूल्य मानता हूँ।

च्यवन उवाच

श्लोक 28 (13.86.28)

उत्तिष्ठाम्येष राजेन्द्र सम्यक् क्रीतोस्मि तेऽनघ । गोभिस्तुल्यं न पश्यामि धनं किञ्चिदिहाच्युत ॥

uttiṣṭhāmyeṣa rājendra samyak krītosmi te'nagha | gobhistulyaṃ na paśyāmi dhanaṃ kiñcidihācyuta

हे राजेन्द्र, मैं उठता हूँ; हे निष्पाप, आपने मुझे ठीक ही खरीदा है। हे अच्युत, मैं यहाँ गौओं के बराबर कोई धन नहीं देखता।

श्लोक 29 (13.86.29)

कीर्तनं श्रवणं दानं दर्शनं चापि पार्थिव । गवां प्रशस्यते वीर सर्वपापहरं शिवम् ॥

kīrtanaṃ śravaṇaṃ dānaṃ darśanaṃ cāpi pārthiva | gavāṃ praśasyate vīra sarvapāpaharaṃ śivam

हे पार्थिव, हे वीर, गौओं का कीर्तन, श्रवण, दान और दर्शन प्रशंसित है; यह सब पापों को हरने वाला और कल्याणकारी है।

श्लोक 30 (13.86.30)

गावो लक्ष्म्याः सदा मूलं गोषु पाप्मा न विद्यते । अन्नमेव सदा गावो देवानां परमं हविः ॥

gāvo lakṣmyāḥ sadā mūlaṃ goṣu pāpmā na vidyate | annameva sadā gāvo devānāṃ paramaṃ haviḥ

गौएँ सदा लक्ष्मी की जड़ हैं; गौओं में पाप नहीं होता। गौएँ सदा अन्न हैं और देवताओं की परम हवि हैं।

श्लोक 31 (13.86.31)

स्वाहाकारवषट्कारौ गोषु नित्यं प्रतिष्ठितौ । गावो यज्ञस्य नेत्र्यो वै तथा यज्ञस्य ता मुखम् ॥

svāhākāravaṣaṭkārau goṣu nityaṃ pratiṣṭhitau | gāvo yajñasya netryo vai tathā yajñasya tā mukham

स्वाहाकार और वषट्कार गौओं में सदा प्रतिष्ठित हैं। गौएँ यज्ञ को आगे ले चलने वाली हैं, और वे ही यज्ञ का मुख हैं।

श्लोक 32 (13.86.32)

अमृतं ह्यव्ययं दिव्यं क्षरन्ति च वहन्ति च । अमृतायतनं चैताः सर्वलोकनमस्कृताः ॥

amṛtaṃ hyavyayaṃ divyaṃ kṣaranti ca vahanti ca | amṛtāyatanaṃ caitāḥ sarvalokanamaskṛtāḥ

वे दिव्य, अविनाशी अमृत को बहाती भी हैं और धारण भी करती हैं; और वे अमृत का आश्रय हैं, जिन्हें सब लोक नमस्कार करते हैं।

श्लोक 33 (13.86.33)

तेजसा वपुषा चैव गावो वह्निसमा भुवि । गावो हि सुमहत्तेजः प्राणिनां च सुखप्रदाः ॥

tejasā vapuṣā caiva gāvo vahnisamā bhuvi | gāvo hi sumahattejaḥ prāṇināṃ ca sukhapradāḥ

तेज और रूप में गौएँ पृथ्वी पर अग्नि के समान हैं। गौएँ महान् तेज हैं और प्राणियों को सुख देने वाली हैं।

श्लोक 34 (13.86.34)

निविष्टं गोकुलं यत्र श्वासं मुञ्चति निर्भयम् । विराजयति तं देशं पापं चास्यापकर्षति ॥

niviṣṭaṃ gokulaṃ yatra śvāsaṃ muñcati nirbhayam | virājayati taṃ deśaṃ pāpaṃ cāsyāpakarṣati

जहाँ गौओं का समूह बैठकर निर्भय होकर साँस लेता है, उस स्थान को वह शोभित कर देता है और उसके पाप को दूर कर देता है।

श्लोक 35 (13.86.35)

गावः स्वर्गस्य सोपानं गावः स्वर्गेऽपि पूजिताः । गावः कामदुहोदेव्यो नान्यत्किञ्चित्परं स्मृतम् ॥

gāvaḥ svargasya sopānaṃ gāvaḥ svarge'pi pūjitāḥ | gāvaḥ kāmaduhodevyo nānyatkiñcitparaṃ smṛtam

गौएँ स्वर्ग की सीढ़ी हैं; गौएँ स्वर्ग में भी पूजित हैं। गौएँ कामधेनु रूप देवियाँ हैं; इनसे बढ़कर कुछ और नहीं माना गया।

श्लोक 36 (13.86.36)

इत्येतद्गोषु मे प्रोक्तं माहात्म्यं भरतर्षभ । गुणैकदेशवचनं शक्यं पारायणं न तु ॥

ityetadgoṣu me proktaṃ māhātmyaṃ bharatarṣabha | guṇaikadeśavacanaṃ śakyaṃ pārāyaṇaṃ na tu

हे भरतर्षभ, गौओं का यह माहात्म्य मैंने कहा। यह उनके गुणों का केवल एक अंश है; उन्हें पूरा कह सकना सम्भव नहीं।

निषादा ऊचुः

श्लोक 37 (13.86.37)

दर्शनं कथनं चैव सहास्माभिः कृतं मुने । सतां साप्तपदं मैत्रं प्रसादं नः कुरु प्रभो ॥

darśanaṃ kathanaṃ caiva sahāsmābhiḥ kṛtaṃ mune | satāṃ sāptapadaṃ maitraṃ prasādaṃ naḥ kuru prabho

हे मुने, हमने आपके दर्शन किए और आपसे बात की है। सज्जनों की मित्रता सात पग साथ चलने से होती है; हे प्रभो, हम पर कृपा कीजिए।

श्लोक 38 (13.86.38)

हवींषि सर्वाणि यथा ह्युपभुङ्क्ते हुताशनः । एवं त्वमपि धर्मात्मन्पुरुषाग्निः प्रतापवान् ॥

havīṃṣi sarvāṇi yathā hyupabhuṅkte hutāśanaḥ | evaṃ tvamapi dharmātmanpuruṣāgniḥ pratāpavān

जैसे अग्नि सब हवियों को ग्रहण करती है, वैसे ही हे धर्मात्मन्, आप भी तेजस्वी पुरुषाग्नि हैं।

श्लोक 39 (13.86.39)

प्रसादयामहे विद्वन्भवन्तं प्रणता वयम् । अनुग्रहार्थमस्माकमियं गौः प्रतिगृह्यताम् ॥

prasādayāmahe vidvanbhavantaṃ praṇatā vayam | anugrahārthamasmākamiyaṃ gauḥ pratigṛhyatām

हे विद्वन्, हम आपके सामने नत होकर आपको प्रसन्न करना चाहते हैं। हम पर अनुग्रह करने के लिए यह गौ स्वीकार कीजिए।

श्लोक 40 (13.86.40)

अत्यन्तापदि शक्तानां परित्राणं हि कुर्वताम् । या गतिर्विदिता त्वद्य नरके शरणं भवान् ॥

atyantāpadi śaktānāṃ paritrāṇaṃ hi kurvatām | yā gatirviditā tvadya narake śaraṇaṃ bhavān

अत्यन्त विपत्ति में रक्षा करने वाले समर्थ पुरुषों में जो गति हमें आज ज्ञात हुई है, वह आप हैं; आप ही नरक से बचाने वाले हमारे शरण हैं।

च्यवन उवाच

श्लोक 41 (13.86.41)

कृपणस्य च यच्चक्षुर्मुनेराशीविषस्य च । नरं समूलं दहति कक्षमग्निरिव ज्वलन् ॥

kṛpaṇasya ca yaccakṣurmunerāśīviṣasya ca | naraṃ samūlaṃ dahati kakṣamagniriva jvalan

दीन मनुष्य की, मुनि की और विषैले सर्प की दृष्टि मनुष्य को जड़ समेत जला देती है, जैसे धधकती आग सूखी घास को।

श्लोक 42 (13.86.42)

प्रतिगृह्णामि वो धेनुं कैवर्ता मुक्तकिल्बिषाः । दिवं गच्छत वै क्षिप्रं मत्स्यैर्जालोद्धृतैः सह ॥

pratigṛhṇāmi vo dhenuṃ kaivartā muktakilbiṣāḥ | divaṃ gacchata vai kṣipraṃ matsyairjāloddhṛtaiḥ saha

हे मछुआरो, मैं तुम्हारी गौ स्वीकार करता हूँ। पाप से मुक्त होकर तुम जाल में खिंची मछलियों के साथ शीघ्र स्वर्ग जाओ।

भीष्म उवाच

श्लोक 43 (13.86.43)

ततस्तस्य प्रभावात्ते महर्षेर्भावितात्मनः । निषादास्तेन वाक्येन सह मत्स्यैर्दिवं ययुः ॥

tatastasya prabhāvātte maharṣerbhāvitātmanaḥ | niṣādāstena vākyena saha matsyairdivaṃ yayuḥ

तब उन शुद्धात्मा महर्षि के प्रभाव से, उनके वचन के बल पर, निषाद मछलियों के साथ स्वर्ग चले गए।

श्लोक 44 (13.86.44)

ततः स राजा नहुषो विस्मितः प्रेक्ष्य धीवरान् । आरोहमाणांस्त्रिदिवं मत्स्यांश्च भरतर्षभ ॥

tataḥ sa rājā nahuṣo vismitaḥ prekṣya dhīvarān | ārohamāṇāṃstridivaṃ matsyāṃśca bharatarṣabha

हे भरतर्षभ, तब राजा नहुष ने विस्मित होकर मछुआरों और मछलियों को स्वर्ग पर चढ़ते देखा।

श्लोक 45 (13.86.45)

ततस्तौ गविजश्चैव च्यवनश्च भृगूद्वहः । वराभ्यामनुरूपाभ्यां छन्दयामासतुर्नृपम् ॥

tatastau gavijaścaiva cyavanaśca bhṛgūdvahaḥ | varābhyāmanurūpābhyāṃ chandayāmāsaturnṛpam

तब गविजात और भृगुवंशी च्यवन ने दो अनुरूप वर देकर राजा को प्रसन्न किया।

श्लोक 46 (13.86.46)

ततो राजा महावीर्यो नहुषः पृथिवीपतिः । परमित्यब्रवीत्प्रीतस्तदा भरतसत्तम ॥

tato rājā mahāvīryo nahuṣaḥ pṛthivīpatiḥ | paramityabravītprītastadā bharatasattama

तब महापराक्रमी पृथ्वीपति राजा नहुष ने प्रसन्न होकर कहा, “यह बहुत है”, हे भरतसत्तम।

श्लोक 47 (13.86.47)

ततो जग्राह धर्मे स स्थितिमिन्द्रनिभो नृपः । तथेति चोदितः प्रीतस्तावृषी प्रत्यपूजयत् ॥

tato jagrāha dharme sa sthitimindranibho nṛpaḥ | tatheti coditaḥ prītastāvṛṣī pratyapūjayat

तब इन्द्र के समान तेजस्वी उस राजा ने धर्म में दृढ़ स्थिति ग्रहण की; और “ऐसा ही हो” कहे जाने पर उसने प्रसन्न होकर दोनों ऋषियों का सत्कार किया।

श्लोक 48 (13.86.48)

समाप्तदीक्षश्च्यवनस्ततोऽगच्छत्स्वमाश्रमम् । गविजश्च महातेजाः स्वमाश्रमपदं ययौ ॥

samāptadīkṣaścyavanastato'gacchatsvamāśramam | gavijaśca mahātejāḥ svamāśramapadaṃ yayau

व्रत पूर्ण करके च्यवन अपने आश्रम को चले गए; और महातेजस्वी गविजात अपने आश्रम-स्थान को गए।

श्लोक 49 (13.86.49)

निषादाश्च दिवं जग्मुस्ते च मत्स्या जनाधिप । नहुषोपि वरं लब्ध्वा प्रविवेश स्वकं पुरम् ॥

niṣādāśca divaṃ jagmuste ca matsyā janādhipa | nahuṣopi varaṃ labdhvā praviveśa svakaṃ puram

हे जनाधिप, निषाद और वे मछलियाँ स्वर्ग चली गईं; और नहुष भी वर पाकर अपने नगर में लौट गया।

श्लोक 50 (13.86.50)

एतत्ते कथितं तात यन्मां त्वं परिपृच्छसि । दर्शने यादृशः स्नेहः संवासे वा युधिष्ठिर ॥

etatte kathitaṃ tāta yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | darśane yādṛśaḥ snehaḥ saṃvāse vā yudhiṣṭhira

हे तात, तुमने जो मुझसे पूछा था, वह मैंने कह दिया: दर्शन में अथवा साथ रहने में कैसा स्नेह होता है, हे युधिष्ठिर।

श्लोक 51 (13.86.51)

महाभाग्यं गवां चैव तथा धर्मविनिश्चयम् । किं भूयः कथ्यतां वीर किं ते हृदि विवक्षितम् ॥

mahābhāgyaṃ gavāṃ caiva tathā dharmaviniścayam | kiṃ bhūyaḥ kathyatāṃ vīra kiṃ te hṛdi vivakṣitam

और गौओं का माहात्म्य तथा धर्म का निश्चय भी बता दिया। हे वीर, अब और क्या कहा जाए? तुम्हारे हृदय में क्या कहने की इच्छा है?

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