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अनुशासन पर्व · अध्याय 87

च्यवन का राजा कुशिक के पास आना

युधिष्ठिर पूछते हैं कि ब्रह्मर्षियों के वंश में जमदग्नि-पुत्र परशुराम को क्षत्रिय-स्वभाव कैसे मिला और क्षत्रिय-कुल में जन्मे विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे बने। भीष्म च्यवन और राजा कुशिक का प्राचीन इतिहास आरम्भ करते हैं। ऋषि राजा के साथ रहना चाहते हैं; राजा उनका सत्कार करके राज्य तक देने को तैयार होता है, पर ऋषि सेवा का नियम रखते हैं। वे इक्कीस दिन एक करवट सोते हैं और राजा-रानी निराहार रहकर उनकी सेवा करते हैं; फिर वे उठकर बिना कुछ कहे निकल जाते हैं और उनकी आँखों के सामने अन्तर्धान हो जाते हैं।

अध्याय 86अध्याय-सूचीअध्याय 88

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.87.1)

संशयो मे महाप्राज्ञ सुमहान्सागरोपम । तं मे शृणु महाबाहो श्रुत्वा व्याख्यातुमर्हसि ॥

saṃśayo me mahāprājña sumahānsāgaropama | taṃ me śṛṇu mahābāho śrutvā vyākhyātumarhasi

हे महाप्राज्ञ, सागर के समान गम्भीर पितामह, मुझे एक बहुत बड़ा संशय है। हे महाबाहो, उसे सुनिए और सुनकर मुझे समझाइए।

श्लोक 2 (13.87.2)

कौतूहलं मे सुमहज्जामदग्न्यं प्रति प्रभो । रामं धर्मभृतां श्रेष्ठं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

kautūhalaṃ me sumahajjāmadagnyaṃ prati prabho | rāmaṃ dharmabhṛtāṃ śreṣṭhaṃ tanme vyākhyātumarhasi

प्रभो, धर्मधारियों में श्रेष्ठ जमदग्नि-पुत्र परशुराम के विषय में मुझे बड़ा कौतूहल है; कृपया उसे मुझे समझाइए।

श्लोक 3 (13.87.3)

ब्राह्मे बले सुपूर्णानामेतेषां च्यवनादिनाम् । कथमेष समुत्पन्नो रामः सत्यपराक्रमः । कथं ब्रह्मर्षिवंशोऽयं क्षत्रधर्मा व्यजायत ॥

brāhme bale supūrṇānāmeteṣāṃ cyavanādinām | kathameṣa samutpanno rāmaḥ satyaparākramaḥ | kathaṃ brahmarṣivaṃśo'yaṃ kṣatradharmā vyajāyata

ब्राह्मणों के तेज से भरे हुए इन च्यवन आदि के कुल में सत्य-पराक्रमी यह परशुराम कैसे उत्पन्न हुआ? ब्रह्मर्षियों के इस वंश में क्षत्रिय-स्वभाव वाला पुत्र कैसे जन्मा?

श्लोक 4 (13.87.4)

तदस्य सम्भवं राजन्निखिलेनानुकीर्तय । कौशिकश्च कथं वंशात्क्षात्राद्वै ब्राह्मणोऽभवत् ॥

tadasya sambhavaṃ rājannikhilenānukīrtaya | kauśikaśca kathaṃ vaṃśātkṣātrādvai brāhmaṇo'bhavat

हे राजन्, उसके जन्म का सारा वृत्तान्त पूरा-पूरा कहिए। और यह भी कि क्षत्रिय वंश में उत्पन्न कौशिक (विश्वामित्र) ब्राह्मण कैसे हो गए।

श्लोक 5 (13.87.5)

अहो प्रभावः सुमहानासीद्वै सुमहात्मनोः । रामस्य च नरव्याघ्र विश्वामित्रस्य चैव हि ॥

aho prabhāvaḥ sumahānāsīdvai sumahātmanoḥ | rāmasya ca naravyāghra viśvāmitrasya caiva hi

हे नरव्याघ्र, उन दोनों महात्माओं का प्रभाव बहुत ही महान् था, परशुराम का भी और विश्वामित्र का भी।

श्लोक 6 (13.87.6)

कथं पुत्रानतिक्रम्य तेषां नप्तृष्वथाभवत् । एष दोषो महाप्राज्ञ तत्त्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥

kathaṃ putrānatikramya teṣāṃ naptṛṣvathābhavat | eṣa doṣo mahāprājña tattvaṃ vyākhyātumarhasi

यह कैसे हुआ कि पुत्रों को छोड़कर वह बात उनके पौत्रों में प्रकट हुई? हे महाप्राज्ञ, यही विसंगति है; इसका तत्त्व मुझे समझाइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 7 (13.87.7)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । च्यवनस्य च संवादं कुशिकस्य च भारत ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | cyavanasya ca saṃvādaṃ kuśikasya ca bhārata

हे भारत, इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: च्यवन और कुशिक का संवाद।

श्लोक 8 (13.87.8)

एतं दोषं पुरा दृष्ट्वा भार्गवश्च्यवनस्तदा । आगामिनं महाबुद्धिः स्ववंशे मुनिसत्तमः ॥

etaṃ doṣaṃ purā dṛṣṭvā bhārgavaścyavanastadā | āgāminaṃ mahābuddhiḥ svavaṃśe munisattamaḥ

भृगुवंशी च्यवन, जो महाबुद्धिमान् और मुनियों में श्रेष्ठ थे, अपने वंश में आगे आने वाले इस दोष को बहुत पहले ही देख चुके थे;

श्लोक 9 (13.87.9)

निश्चित्य मनसा सर्वं गुणदोषबलाबलम् । दग्धुकामः कुलं सर्वं कुशिकानां तपोधनः ॥

niścitya manasā sarvaṃ guṇadoṣabalābalam | dagdhukāmaḥ kulaṃ sarvaṃ kuśikānāṃ tapodhanaḥ

और गुण-दोष तथा बल-अबल, सब कुछ मन में तौलकर उन तपस्वी ने कुशिकों के पूरे कुल को भस्म कर देना चाहा।

श्लोक 10 (13.87.10)

च्यवनस्तमनुप्राप्य कुशिकं वाक्यमब्रवीत् । वस्तुमिच्छा समुत्पन्ना त्वया सह ममानघ ॥

cyavanastamanuprāpya kuśikaṃ vākyamabravīt | vastumicchā samutpannā tvayā saha mamānagha

च्यवन ने कुशिक के पास पहुँचकर उनसे कहा, “हे निष्पाप, मेरे मन में तुम्हारे साथ रहने की इच्छा उत्पन्न हुई है।”

कुशिक उवाच

श्लोक 11 (13.87.11)

भगवन्सहधर्मोऽयं पण्डितैरिह चर्यते । प्रदानकाले कन्यानामुच्यते च सदा बुधैः ॥

bhagavansahadharmo'yaṃ paṇḍitairiha caryate | pradānakāle kanyānāmucyate ca sadā budhaiḥ

“भगवन्, यह ‘साथ-साथ किया जाने वाला धर्म’ है, जिसका विद्वान् लोग इस संसार में पालन करते हैं और जिसे ज्ञानी जन कन्याओं के दान के समय सदा कहते हैं।

श्लोक 12 (13.87.12)

यत्तु तावदतिक्रान्तं धर्मद्वारं तपोधन । तत्कार्यं प्रकरिष्यामि तदनुज्ञातुमर्हसि ॥

yattu tāvadatikrāntaṃ dharmadvāraṃ tapodhana | tatkāryaṃ prakariṣyāmi tadanujñātumarhasi

किन्तु हे तपोधन, धर्म का जो द्वार पहले ही लाँघा जा चुका है, उसके विषय में जो करना उचित है वह मैं करूँगा; आप इसकी अनुमति दें।”

भीष्म उवाच

श्लोक 13 (13.87.13)

अथासनमुपादाय च्यवनस्य महामुनेः । कुशिको भार्यया सार्धमाजगाम यतो मुनिः ॥

athāsanamupādāya cyavanasya mahāmuneḥ | kuśiko bhāryayā sārdhamājagāma yato muniḥ

तब कुशिक महामुनि च्यवन के लिए आसन लेकर अपनी पत्नी के साथ वहाँ गए जहाँ मुनि थे।

श्लोक 14 (13.87.14)

प्रगृह्य राजा भृङ्गारं पाद्यमस्मै न्यवेदयत् । कारयामास सर्वाश्च क्रियास्तस्य महात्मनः ॥

pragṛhya rājā bhṛṅgāraṃ pādyamasmai nyavedayat | kārayāmāsa sarvāśca kriyāstasya mahātmanaḥ

राजा ने जलपात्र लेकर उन्हें पैर धोने का जल अर्पित किया और उन महात्मा के लिए सब उपचार करवाए।

श्लोक 15 (13.87.15)

ततः स राजा च्यवनं मधुपर्कं यथाविधि । ग्राहयामास चाव्यग्रो महात्मा नियतव्रतः ॥

tataḥ sa rājā cyavanaṃ madhuparkaṃ yathāvidhi | grāhayāmāsa cāvyagro mahātmā niyatavrataḥ

फिर नियमों में दृढ़ और महात्मा उस राजा ने शान्त भाव से च्यवन को विधिपूर्वक मधुपर्क ग्रहण कराया।

श्लोक 16 (13.87.16)

सत्कृत्य तं तथा विप्रमिदं पुनरथाब्रवीत् । भगवन्परवन्तौ स्वो ब्रूहि किं करवावहे ॥

satkṛtya taṃ tathā vipramidaṃ punarathābravīt | bhagavanparavantau svo brūhi kiṃ karavāvahe

इस प्रकार उस ब्राह्मण का सत्कार करके उसने फिर कहा, “भगवन्, हम आपके अधीन हैं। कहिए, हम क्या करें?

कुशिक उवाच

श्लोक 17 (13.87.17)

यदि राज्यं यदि धनं यदि गाः संशितव्रत । यज्ञदानानि च तथा ब्रूहि सर्वं ददामि ते ॥

yadi rājyaṃ yadi dhanaṃ yadi gāḥ saṃśitavrata | yajñadānāni ca tathā brūhi sarvaṃ dadāmi te

“हे कठोर व्रत वाले, यदि राज्य चाहिए, यदि धन, यदि गायें, या यज्ञ और दान, तो कहिए; मैं आपको सब दे दूँगा।

श्लोक 18 (13.87.18)

इदं गृहमिदं राज्यमिदं धर्मासनं च ते । राजा त्वमसि शाध्युर्वीं भृत्योऽहं परवान्स्त्रिया ॥

idaṃ gṛhamidaṃ rājyamidaṃ dharmāsanaṃ ca te | rājā tvamasi śādhyurvīṃ bhṛtyo'haṃ paravānstriyā

“यह घर, यह राज्य और यह धर्मासन आपका है। आप राजा हैं, पृथ्वी पर शासन कीजिए। मैं आपका सेवक हूँ और अपनी पत्नी सहित आपके अधीन हूँ।”

भीष्म उवाच

श्लोक 19 (13.87.19)

एवमुक्ते ततो वाक्ये च्यवनो भार्गवस्तदा । कुशिकं प्रत्युवाचेदं मुदा परमया युतः ॥

evamukte tato vākye cyavano bhārgavastadā | kuśikaṃ pratyuvācedaṃ mudā paramayā yutaḥ

ऐसा कहे जाने पर भार्गव च्यवन ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कुशिक को यह उत्तर दिया:

च्यवन उवाच

श्लोक 20 (13.87.20)

न राज्यं कामये राजन्न धनं न च योषितः । न च गा न च वै देशान्न यज्ञं श्रूयतामिदम् ॥

na rājyaṃ kāmaye rājanna dhanaṃ na ca yoṣitaḥ | na ca gā na ca vai deśānna yajñaṃ śrūyatāmidam

“हे राजन्, मुझे न राज्य चाहिए, न धन, न स्त्रियाँ, न गायें, न देश और न यज्ञ। यह सुनो:

श्लोक 21 (13.87.21)

नियमं किञ्चिदारप्स्ये युवयोर्यदि रोचते । परिचर्योस्मि यत्ताभ्यां युवाभ्यामविशङ्कया ॥

niyamaṃ kiñcidārapsye yuvayoryadi rocate | paricaryosmi yattābhyāṃ yuvābhyāmaviśaṅkayā

यदि तुम दोनों को अच्छा लगे तो मैं एक नियम आरम्भ करूँगा: तुम दोनों बिना किसी शंका के मेरी सेवा करो।”

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (13.87.22)

एवमुक्ते तदा तेन दम्पती तौ जहर्षतुः । प्रत्यब्रूतां च तमृषिमेवमस्त्विति भारत ॥

evamukte tadā tena dampatī tau jaharṣatuḥ | pratyabrūtāṃ ca tamṛṣimevamastviti bhārata

यह सुनकर वे दोनों पति-पत्नी प्रसन्न हुए और हे भारत, उन्होंने ऋषि से कहा, “ऐसा ही हो।”

श्लोक 23 (13.87.23)

अथ तं कुशिको हृष्टः प्रावेशयदनुत्तमम् । गृहोद्देशं ततस्तस्य दर्शनीयमदर्शयत् ॥

atha taṃ kuśiko hṛṣṭaḥ prāveśayadanuttamam | gṛhoddeśaṃ tatastasya darśanīyamadarśayat

तब हर्षित कुशिक ने उन्हें भीतर ले जाकर घर का एक सुन्दर भाग दिखाया।

कुशिक उवाच

श्लोक 24 (13.87.24)

इयं शय्या भगवतो यथाकाममिहोष्यताम् । प्रयतिष्यावहे प्रीतिमाहर्तुं ते तपोधन ॥

iyaṃ śayyā bhagavato yathākāmamihoṣyatām | prayatiṣyāvahe prītimāhartuṃ te tapodhana

“भगवन्, यह आपकी शय्या है; यहाँ अपनी इच्छा से रहिए। हे तपोधन, हम दोनों आपको प्रसन्न करने का यत्न करेंगे।”

भीष्म उवाच

श्लोक 25 (13.87.25)

अथ सूर्योऽतिचक्राम तेषां संवदतां तथा । अथर्षिश्चोदयामास पानमन्नं तथैव च ॥

atha sūryo'ticakrāma teṣāṃ saṃvadatāṃ tathā | atharṣiścodayāmāsa pānamannaṃ tathaiva ca

वे बातें कर ही रहे थे कि सूर्य ढल गया; तब ऋषि ने पेय और अन्न माँगा।

श्लोक 26 (13.87.26)

तमपृच्छत्ततो राजा कुशिकः प्रणतस्तदा । किमन्नजातमिष्टं ते किमुपस्थापयाम्यहम् ॥

tamapṛcchattato rājā kuśikaḥ praṇatastadā | kimannajātamiṣṭaṃ te kimupasthāpayāmyaham

तब राजा कुशिक ने प्रणाम करके उनसे पूछा, “आपको कैसा भोजन अच्छा लगता है? मैं क्या प्रस्तुत करूँ?”

श्लोक 27 (13.87.27)

ततः स परया प्रीत्या प्रत्युवाच नराधिपम् । औपपत्तिकमाहारं प्रयच्छस्वेति भारत ॥

tataḥ sa parayā prītyā pratyuvāca narādhipam | aupapattikamāhāraṃ prayacchasveti bhārata

तब उन्होंने बड़ी प्रसन्नता से राजा को उत्तर दिया, “हे भारत, जो भोजन सहज उपलब्ध हो वही दो।”

श्लोक 28 (13.87.28)

तद्वचः पूजयित्वा तु तथेत्याह स पार्थिवः । यथोपपन्नमाहारं तस्मै प्रादाज्जनाधिप ॥

tadvacaḥ pūjayitvā tu tathetyāha sa pārthivaḥ | yathopapannamāhāraṃ tasmai prādājjanādhipa

उनकी बात का आदर करके राजा ने “ऐसा ही हो” कहा और हे जनाधिप, जैसा भोजन तैयार था वही उन्हें दिया।

श्लोक 29 (13.87.29)

ततः स भुक्त्वा भगवान्दम्पती प्राह धर्मवित् । स्वप्तुमिच्छाम्यहं निद्रा बाधते मामिति प्रभो ॥

tataḥ sa bhuktvā bhagavāndampatī prāha dharmavit | svaptumicchāmyahaṃ nidrā bādhate māmiti prabho

फिर भोजन करके धर्म को जानने वाले भगवान् ने उन दोनों से कहा, “मैं सोना चाहता हूँ; नींद मुझे सता रही है, राजन्।”

श्लोक 30 (13.87.30)

ततः शय्यागृहं प्राप्य भगवानृषिसत्तमः । संविवेश नरेशस्तु सपत्नीकः स्थितोऽभवत् ॥

tataḥ śayyāgṛhaṃ prāpya bhagavānṛṣisattamaḥ | saṃviveśa nareśastu sapatnīkaḥ sthito'bhavat

तब ऋषियों में श्रेष्ठ भगवान् शयनगृह में जाकर लेट गए, और राजा अपनी पत्नी सहित खड़े रहे।

श्लोक 31 (13.87.31)

न प्रबोध्योस्मि संसुप्त इत्युवाचाथ भार्गवः । संवाहितव्यौ मे पादौ जागर्तव्यं च वां निशि ॥

na prabodhyosmi saṃsupta ityuvācātha bhārgavaḥ | saṃvāhitavyau me pādau jāgartavyaṃ ca vāṃ niśi

भार्गव ने कहा, “सो जाने पर मुझे जगाना नहीं। मेरे पैर दबाने होंगे और तुम दोनों को रात भर जागते रहना होगा।”

श्लोक 32 (13.87.32)

अविशङ्कस्तु कुशिकस्तथेत्येवाह धर्मवित् । न प्राबोधयतां तौ च दंपती रजनीक्षये ॥

aviśaṅkastu kuśikastathetyevāha dharmavit | na prābodhayatāṃ tau ca daṃpatī rajanīkṣaye

धर्म को जानने वाले कुशिक ने बिना किसी शंका के “ऐसा ही हो” कहा; और रात बीतने पर भी उन दोनों ने उन्हें नहीं जगाया।

श्लोक 33 (13.87.33)

यथादेशं महर्षेस्तु शुश्रूषापरमौ तदा । बभूवतुर्महाराज प्रयतावथ दम्पती ॥

yathādeśaṃ maharṣestu śuśrūṣāparamau tadā | babhūvaturmahārāja prayatāvatha dampatī

हे महाराज, महर्षि के आदेश के अनुसार वे दोनों पति-पत्नी संयम से रहकर पूरी तरह उनकी सेवा में लगे रहे।

श्लोक 34 (13.87.34)

ततः स भगवान्विप्रः समादिश्य नराधिपम् । सुष्वापैकेन पार्श्वेन दिवसानेकविंशतिम् ॥

tataḥ sa bhagavānvipraḥ samādiśya narādhipam | suṣvāpaikena pārśvena divasānekaviṃśatim

तब उन भगवान् ब्राह्मण ने राजा को आदेश देकर इक्कीस दिन तक एक ही करवट सोकर बिताए।

श्लोक 35 (13.87.35)

स तु राजा निराहारः सभार्यः कुरुनन्दन । पर्युपासत तं हृष्टश्च्यवनाराधने रतः ॥

sa tu rājā nirāhāraḥ sabhāryaḥ kurunandana | paryupāsata taṃ hṛṣṭaścyavanārādhane rataḥ

हे कुरुनन्दन, वह राजा भी अपनी पत्नी सहित बिना भोजन किए, च्यवन को प्रसन्न करने में लगा हुआ, हर्षपूर्वक उनकी सेवा में बैठा रहा।

श्लोक 36 (13.87.36)

भार्गवस्तु समुत्तस्थौ स्वयमेव तपोधनः । अकिञ्चिदुक्त्वा तु गृहान्निश्चक्राम महातपाः ॥

bhārgavastu samuttasthau svayameva tapodhanaḥ | akiñciduktvā tu gṛhānniścakrāma mahātapāḥ

फिर वे तपस्वी भार्गव अपने आप उठ खड़े हुए और महातपस्वी कुछ भी कहे बिना घर से बाहर निकल गए।

श्लोक 37 (13.87.37)

तमन्वगच्छतां तौ च क्षुधितौ श्रमकर्शितौ । भार्यापती मुनिश्रेष्ठस्तावेतौ नावलोकयत् ॥

tamanvagacchatāṃ tau ca kṣudhitau śramakarśitau | bhāryāpatī muniśreṣṭhastāvetau nāvalokayat

भूख और थकान से क्षीण वे दोनों पति-पत्नी उनके पीछे-पीछे चले, पर मुनिश्रेष्ठ ने उनकी ओर देखा तक नहीं।

श्लोक 38 (13.87.38)

तयोस्तु प्रेक्षतोरेव भार्गवाणां कुलोद्वहः । अन्तर्हितोऽभूद्राजेन्द्र ततो राजाऽपतत्क्षितौ ॥

tayostu prekṣatoreva bhārgavāṇāṃ kulodvahaḥ | antarhito'bhūdrājendra tato rājā'patatkṣitau

हे राजेन्द्र, उन दोनों के देखते-देखते भार्गवों के कुल को धारण करने वाले वे अन्तर्धान हो गए, और तब राजा भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 39 (13.87.39)

ततो मुहूर्तादाश्वस्य सह देव्या महामुनेः । पुनरन्वेषणे यत्नमकरोत्स महीपतिः ॥

tato muhūrtādāśvasya saha devyā mahāmuneḥ | punaranveṣaṇe yatnamakarotsa mahīpatiḥ

फिर थोड़ी देर में सँभलकर राजा ने रानी के साथ उन महामुनि को ढूँढ़ने का फिर यत्न किया।

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