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अनुशासन पर्व · अध्याय 88

च्यवन द्वारा कुशिक और उनकी पत्नी की परीक्षा

च्यवन फिर शय्या पर सोते हुए मिलते हैं, तेल-मालिश और भोजन माँगते हैं, भोजन को जला देते हैं और फिर अन्तर्धान हो जाते हैं, पर राजा-रानी क्रोध नहीं करते। फिर वे दोनों को रथ में जोतकर नगर में घुमाते हैं, चाबुक से घायल करते हैं और राजा का धन लुटाते हैं। उनके धैर्य से प्रसन्न होकर वे उनके घाव भर देते हैं, उन्हें युवा और सुन्दर बना देते हैं, वर देते हैं और राजा को अगले दिन गंगा-तट पर मिलने को कहकर घर भेज देते हैं।

अध्याय 87अध्याय-सूचीअध्याय 89

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.88.1)

तस्मिन्नन्तर्हिते विप्रे राजा किमकरोत्तदा । भार्या चास्य महाभागा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

tasminnantarhite vipre rājā kimakarottadā | bhāryā cāsya mahābhāgā tanme brūhi pitāmaha

उस ब्राह्मण के अन्तर्धान हो जाने पर राजा ने तब क्या किया, और उसकी महाभाग्यवती पत्नी ने क्या किया? पितामह, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.88.2)

अदृष्ट्वा स महीपालस्तमृषिं सह भार्यया । परिश्रान्तो निववृते व्रीडितो नष्टचेतनः ॥

adṛṣṭvā sa mahīpālastamṛṣiṃ saha bhāryayā | pariśrānto nivavṛte vrīḍito naṣṭacetanaḥ

ऋषि को न पाकर राजा थका हुआ, लज्जित और व्याकुलचित्त होकर अपनी पत्नी के साथ लौट आया।

श्लोक 3 (13.88.3)

स प्रविश्य पुरीं दीनो नाभ्यभाषत किञ्चन । तदेव चिन्तयामास च्यवनस्य विचेष्टितम् ॥

sa praviśya purīṃ dīno nābhyabhāṣata kiñcana | tadeva cintayāmāsa cyavanasya viceṣṭitam

नगर में प्रवेश करके वह दीन भाव से किसी से कुछ नहीं बोला और केवल च्यवन के उस विचित्र आचरण का ही चिन्तन करता रहा।

श्लोक 4 (13.88.4)

अथ शून्येन मनसा प्रविवेश गृहं नृपः । ददर्श शयने तस्मिञ्शयानं भृगुनन्दनम् ॥

atha śūnyena manasā praviveśa gṛhaṃ nṛpaḥ | dadarśa śayane tasmiñśayānaṃ bhṛgunandanam

फिर शून्य मन से राजा अपने भवन में गया और उसी शय्या पर भृगु-पुत्र को सोते हुए देखा।

श्लोक 5 (13.88.5)

विस्मितौ तमृषिं दृष्ट्वा तदाश्चर्यं विचिन्त्य च । दर्शनात्तस्य तु तदा विश्रान्तौ सम्बभूवतुः ॥

vismitau tamṛṣiṃ dṛṣṭvā tadāścaryaṃ vicintya ca | darśanāttasya tu tadā viśrāntau sambabhūvatuḥ

ऋषि को देखकर और उस आश्चर्य पर विचार करके वे दोनों विस्मित हुए, और उनके दर्शन से ही उनकी थकान दूर हो गई।

श्लोक 6 (13.88.6)

यथास्थानं ततो गत्वा तत्पादौ संववाहतुः । अथापरेण पार्श्वेन सुष्वाप स महामुनिः ॥

yathāsthānaṃ tato gatvā tatpādau saṃvavāhatuḥ | athāpareṇa pārśvena suṣvāpa sa mahāmuniḥ

फिर वे अपने स्थान पर जाकर उनके पैर दबाने लगे; और महामुनि दूसरी करवट से सो गए।

श्लोक 7 (13.88.7)

तेनैव च स कालेन प्रत्यबुद्ध्यत वीर्यवान् । न च तौ चक्रतुः किञ्चिद्विकारं भयशङ्कितौ ॥

tenaiva ca sa kālena pratyabuddhyata vīryavān | na ca tau cakratuḥ kiñcidvikāraṃ bhayaśaṅkitau

उतने ही समय बाद वे पराक्रमी मुनि जागे; और भय से शंकित होते हुए भी उन दोनों ने कोई विकार प्रकट नहीं किया।

श्लोक 8 (13.88.8)

प्रतिबुद्धस्तु स मुनिस्तौ प्रोवाच विशाम्पते । तैलाभ्यङ्गो दीयतां मे स्नास्येऽहमिति भारत ॥

pratibuddhastu sa munistau provāca viśāmpate | tailābhyaṅgo dīyatāṃ me snāsye'hamiti bhārata

जागने पर मुनि ने उन दोनों से कहा, “हे विशाम्पते, हे भारत, मुझे तेल की मालिश दी जाए; मैं स्नान करूँगा।”

श्लोक 9 (13.88.9)

तौ तथेति प्रतिश्रुत्य क्षुधितौ श्रमकर्शितौ । शतपाकेन तैलेन महार्हेणोपतस्थतुः ॥

tau tatheti pratiśrutya kṣudhitau śramakarśitau | śatapākena tailena mahārheṇopatasthatuḥ

भूख और थकान से क्षीण होते हुए भी उन्होंने “ऐसा ही हो” कहकर स्वीकार किया और सौ बार पकाए हुए बहुमूल्य तेल से उनकी सेवा की।

श्लोक 10 (13.88.10)

ततः सुखासीनमृषिं वाग्यतौ संववाहतुः । न च पर्याप्तमित्याह भार्गवः सुमहातपाः ॥

tataḥ sukhāsīnamṛṣiṃ vāgyatau saṃvavāhatuḥ | na ca paryāptamityāha bhārgavaḥ sumahātapāḥ

फिर सुखपूर्वक बैठे हुए ऋषि की उन्होंने मौन रहकर मालिश की; फिर भी महातपस्वी भार्गव ने कहा कि यह पर्याप्त नहीं है।

श्लोक 11 (13.88.11)

यदा तौ निर्विकारौ तु लक्षयामास भार्गवः । तत उत्थाय सहसा स्नानशालां विवेश ह ॥

yadā tau nirvikārau tu lakṣayāmāsa bhārgavaḥ | tata utthāya sahasā snānaśālāṃ viveśa ha

जब भार्गव ने देखा कि वे दोनों बिल्कुल विचलित नहीं हुए, तो वे सहसा उठकर स्नानशाला में चले गए।

श्लोक 12 (13.88.12)

क्लृप्तमेव तु तत्रासीत्स्नानीयं पार्थिवोचितम् । असत्कृत्य च तत्सर्वं तत्रैवान्तरधीयत ॥

klṛptameva tu tatrāsītsnānīyaṃ pārthivocitam | asatkṛtya ca tatsarvaṃ tatraivāntaradhīyata

वहाँ राजा के योग्य स्नान की सब सामग्री सजी हुई थी; पर उसका तिरस्कार करके वे वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 13 (13.88.13)

स मुनिः पुनरेवाथ नृपतेः पश्यतस्तदा । नासूयां चक्रतुस्तौ च दम्पती भरतर्षभ ॥

sa muniḥ punarevātha nṛpateḥ paśyatastadā | nāsūyāṃ cakratustau ca dampatī bharatarṣabha

फिर राजा के देखते-देखते मुनि ओझल हो गए; तो भी हे भरतश्रेष्ठ, उन दोनों ने कोई रोष नहीं किया।

श्लोक 14 (13.88.14)

अथ स्नातः स भगवान्सिंहासनगतः प्रभुः । दर्शयामास कुशिकं सभार्यं कुरुनन्दन ॥

atha snātaḥ sa bhagavānsiṃhāsanagataḥ prabhuḥ | darśayāmāsa kuśikaṃ sabhāryaṃ kurunandana

फिर स्नान कर चुकने पर वे भगवान् प्रभु सिंहासन पर बैठे हुए कुशिक और उनकी पत्नी को दिखाई दिए, हे कुरुनन्दन।

श्लोक 15 (13.88.15)

संहृष्टवदनो राजा सभार्यः कुशिको मुनिम् । सिद्धमन्नमिति प्रह्वो निर्विकारो न्यवेदयत् ॥

saṃhṛṣṭavadano rājā sabhāryaḥ kuśiko munim | siddhamannamiti prahvo nirvikāro nyavedayat

हर्षित मुख वाले राजा कुशिक ने पत्नी सहित विनम्र होकर, बिना किसी विकार के, मुनि से निवेदन किया, “भोजन तैयार है।”

श्लोक 16 (13.88.16)

आनीयतामिति मुनिस्तं चोवाच नराधिपम् । स राजा समुपाजह्रे तदन्नं सह भार्यया ॥

ānīyatāmiti munistaṃ covāca narādhipam | sa rājā samupājahre tadannaṃ saha bhāryayā

“लाया जाए,” मुनि ने राजा से कहा; और राजा पत्नी सहित वह भोजन ले आया।

श्लोक 17 (13.88.17)

मांसप्रकारान्विविधाञ्शाकानि विविधानि च । लेह्यपिष्टविकारांश्च पानकानि लघूनि च ॥

māṃsaprakārānvividhāñśākāni vividhāni ca | lehyapiṣṭavikārāṃśca pānakāni laghūni ca

अनेक प्रकार से बने मांस और अनेक प्रकार के शाक, चाटने के पदार्थ, आटे से बने व्यंजन और हल्के पेय;

श्लोक 18 (13.88.18)

रसालापूपकांश्चित्रान्मोदकानथ षड्रसान् । रसान्नानाप्रकारांश्च वन्यं च मुनिभोजनम् ॥

rasālāpūpakāṃścitrānmodakānatha ṣaḍrasān | rasānnānāprakārāṃśca vanyaṃ ca munibhojanam

रसाला और तरह-तरह के पूए, लड्डू, छह रसों वाले पदार्थ, अनेक प्रकार के रस और वन में मिलने वाला मुनियों का भोजन;

श्लोक 19 (13.88.19)

फलानि च विचित्राणि राजभोज्यानि भूरिशः । बदरेङ्गुदकाश्मर्यभल्लातकफलानि च ॥

phalāni ca vicitrāṇi rājabhojyāni bhūriśaḥ | badareṅgudakāśmaryabhallātakaphalāni ca

राजाओं के खाने योग्य अनेक प्रकार के फल भरपूर मात्रा में, तथा बेर, इंगुदी, कश्मर्य और भिलावे के फल।

श्लोक 20 (13.88.20)

गृहस्थानां च यद्भोज्यं यच्चापि वनवासिनाम् । सर्वमाहारयामास राजा शापभयान्मुनेः ॥

gṛhasthānāṃ ca yadbhojyaṃ yaccāpi vanavāsinām | sarvamāhārayāmāsa rājā śāpabhayānmuneḥ

गृहस्थों का जो भोजन होता है और वनवासियों का भी जो होता है, वह सब राजा ने मुनि के शाप के भय से मँगवाया।

श्लोक 21 (13.88.21)

अथ सर्वमुपन्यस्तमग्रतश्च्यवनस्य तत् । ततः सर्वं समानीय तच्च शय्यासनं मुनिः ॥

atha sarvamupanyastamagrataścyavanasya tat | tataḥ sarvaṃ samānīya tacca śayyāsanaṃ muniḥ

वह सब च्यवन के सामने रख दिया गया। तब मुनि ने सब कुछ, शय्या और आसन सहित, एक जगह इकट्ठा कराया,

श्लोक 22 (13.88.22)

वस्त्रैः शुभैरवच्छाद्य भोजनोपस्करैः सह । सर्वमादीपयामास च्यवनो भृगुनन्दनः ॥

vastraiḥ śubhairavacchādya bhojanopaskaraiḥ saha | sarvamādīpayāmāsa cyavano bhṛgunandanaḥ

उसे सुन्दर वस्त्रों से ढककर, भोजन के बर्तनों सहित, भृगु-पुत्र च्यवन ने सब में आग लगा दी।

श्लोक 23 (13.88.23)

न च तौ चक्रतुः क्रोधं दम्पती सुमहाव्रतौ । तयोः सम्प्रेक्षतोरेव पुनरन्तर्हितोऽभवत् ॥

na ca tau cakratuḥ krodhaṃ dampatī sumahāvratau | tayoḥ samprekṣatoreva punarantarhito'bhavat

फिर भी महान् व्रत वाले उन दोनों पति-पत्नी ने क्रोध नहीं किया; और उनके देखते-देखते वे फिर अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 24 (13.88.24)

तथैव च स राजर्षिस्तस्थौ तां रजनीं तदा । सभार्यो वाग्यतः श्रीमान्न च कोपं समाविशत् ॥

tathaiva ca sa rājarṣistasthau tāṃ rajanīṃ tadā | sabhāryo vāgyataḥ śrīmānna ca kopaṃ samāviśat

वह राजर्षि उस रात पत्नी सहित वैसे ही मौन और तेजस्वी बना रहा, और उसके मन में क्रोध नहीं आया।

श्लोक 25 (13.88.25)

नित्यसंस्कृतमन्नं तु विविधं राजवेश्मनि । शयनानि च मुख्यानि परिषेकाश्च पुष्कलाः ॥

nityasaṃskṛtamannaṃ tu vividhaṃ rājaveśmani | śayanāni ca mukhyāni pariṣekāśca puṣkalāḥ

फिर भी राजभवन में नित्य की भाँति अनेक प्रकार का अन्न तैयार हुआ, साथ ही उत्तम शय्याएँ और स्नान के लिए प्रचुर जल,

श्लोक 26 (13.88.26)

वस्त्रं च विविधाकारमभवत्समुपार्जितम् । न शशाक ततो द्रष्टुमन्तरं च्यवनस्तदा ॥

vastraṃ ca vividhākāramabhavatsamupārjitam | na śaśāka tato draṣṭumantaraṃ cyavanastadā

और अनेक प्रकार के वस्त्र भी फिर जुटा लिए गए; और तब च्यवन को उनमें कोई दोष नहीं दिखाई दिया।

श्लोक 27 (13.88.27)

पुनरेव च विप्रर्षिः प्रोवाच कुशिकं नृपम् । सभार्यो मां रथेनाशु वह यत्र ब्रवीम्यहम् ॥

punareva ca viprarṣiḥ provāca kuśikaṃ nṛpam | sabhāryo māṃ rathenāśu vaha yatra bravīmyaham

उस ब्रह्मर्षि ने फिर राजा कुशिक से कहा, “तुम दोनों पति-पत्नी मुझे शीघ्र रथ में बैठाकर वहाँ ले चलो जहाँ मैं कहूँ।”

श्लोक 28 (13.88.28)

तथेति च प्राह नृपो निर्विशङ्कस्तपोधनम् । क्रीडारथोऽस्तु भगवन्नुत साङ्ग्रामिको रथः ॥

tatheti ca prāha nṛpo nirviśaṅkastapodhanam | krīḍāratho'stu bhagavannuta sāṅgrāmiko rathaḥ

“ऐसा ही हो,” राजा ने निःशंक होकर उन तपस्वी से कहा। “भगवन्, क्रीडा-रथ हो अथवा युद्ध-रथ?”

श्लोक 29 (13.88.29)

इत्युक्तः स मुनी राज्ञा तेन हृष्टेन तद्वचः । च्यवनः प्रत्युवाचेदं हृष्टः परपुरंजयम् ॥

ityuktaḥ sa munī rājñā tena hṛṣṭena tadvacaḥ | cyavanaḥ pratyuvācedaṃ hṛṣṭaḥ parapuraṃjayam

प्रसन्न राजा के इस प्रकार कहने पर मुनि च्यवन ने भी प्रसन्न होकर शत्रुनगरों को जीतने वाले उस राजा को उत्तर दिया:

च्यवन उवाच

श्लोक 30 (13.88.30)

सज्जीकुरु रथं क्षिप्रं यस्ते साङ्ग्रामिको मतः । सायुधः सपताकश्च शक्तीकनकयष्टिमान् ॥

sajjīkuru rathaṃ kṣipraṃ yaste sāṅgrāmiko mataḥ | sāyudhaḥ sapatākaśca śaktīkanakayaṣṭimān

“तुम्हारा जो रथ युद्ध-रथ माना जाता है, उसे शीघ्र तैयार करो, जो अस्त्र-शस्त्र और पताकाओं से युक्त हो, शक्तियों और सोने की यष्टियों वाला हो,

श्लोक 31 (13.88.31)

किंकिणीस्वननिर्घोषो युक्तस्तोरणकल्पनैः । गदाखड्गनिबद्धश्च परमेषुशतान्वितः ॥

kiṃkiṇīsvananirghoṣo yuktastoraṇakalpanaiḥ | gadākhaḍganibaddhaśca parameṣuśatānvitaḥ

छोटी घण्टियों की ध्वनि से गूँजता हो, तोरणों की सजावट से युक्त हो, गदा और खड्ग उससे बँधे हों, और सैकड़ों उत्तम बाण उसमें रखे हों।”

भीष्म उवाच

श्लोक 32 (13.88.32)

ततः स तं तथेत्युक्त्वा कल्पयित्वा महारथम् । भार्यां वामे धुरि तदा चात्मानं दक्षिणे तथा ॥

tataḥ sa taṃ tathetyuktvā kalpayitvā mahāratham | bhāryāṃ vāme dhuri tadā cātmānaṃ dakṣiṇe tathā

तब “ऐसा ही हो” कहकर राजा ने उस महारथ को तैयार किया, और जूए के बायें भाग में अपनी पत्नी को तथा दायें भाग में स्वयं को जोता।

श्लोक 33 (13.88.33)

त्रिदण्डं वज्रसूच्यग्रं प्रतोदं तत्र चादधत् । सर्वमेतत्तथा दत्त्वा नृपो वाक्यमथाब्रवीत् ॥

tridaṇḍaṃ vajrasūcyagraṃ pratodaṃ tatra cādadhat | sarvametattathā dattvā nṛpo vākyamathābravīt

वहाँ तीन दण्डों वाला, हीरे की सुई जैसी तीखी नोक वाला एक चाबुक रख दिया गया। यह सब देकर राजा ने कहा:

कुशिक उवाच

श्लोक 34 (13.88.34)

भगवन्क्व रथो यातु ब्रवीतु भृगुनन्दन । यत्र वक्ष्यसि विप्रर्षे तत्र यास्यति ते रथः ॥

bhagavankva ratho yātu bravītu bhṛgunandana | yatra vakṣyasi viprarṣe tatra yāsyati te rathaḥ

“हे भृगुनन्दन, रथ कहाँ जाए? कहिए। हे विप्रर्षि, आप जहाँ बताएँगे, आपका रथ वहीं जाएगा।”

भीष्म उवाच

श्लोक 35 (13.88.35)

एवमुक्तस्तु भगवान्प्रत्युवाचाथ तं नृपम् । इतः प्रभृति यातव्यं पदकम्पदकं शनैः ॥

evamuktastu bhagavānpratyuvācātha taṃ nṛpam | itaḥ prabhṛti yātavyaṃ padakampadakaṃ śanaiḥ

ऐसा कहे जाने पर उन भगवान् ने राजा को उत्तर दिया, “यहाँ से आगे तुम्हें एक-एक पग धीरे-धीरे चलना होगा,

च्यवन उवाच

श्लोक 36 (13.88.36)

श्रमो मम यथा न स्यात्तथा मच्छन्दचारिणौ । सुसुखं चैव वोढव्यो जनः सर्वश्च पश्यतु ॥

śramo mama yathā na syāttathā macchandacāriṇau | susukhaṃ caiva voḍhavyo janaḥ sarvaśca paśyatu

जिससे मुझे थकान न हो; तुम दोनों मेरी इच्छा के अनुसार चलो। मुझे बहुत सुख से ले चलना होगा, और सब लोग देखें।

श्लोक 37 (13.88.37)

नोत्सार्याः पथिकाः केचित्तेभ्यो दास्ये वसु ह्यहम् । ब्राह्मणेभ्यश्च ये कामानर्थयिष्यन्ति मां पथि ॥

notsāryāḥ pathikāḥ kecittebhyo dāsye vasu hyaham | brāhmaṇebhyaśca ye kāmānarthayiṣyanti māṃ pathi

किसी राही को हटाया न जाए; मैं उन्हें धन दूँगा, और उन ब्राह्मणों को भी जो मार्ग में मुझसे अपनी कामनाएँ माँगेंगे।

श्लोक 38 (13.88.38)

सर्वान्दास्याम्यशेषेण धनं रत्नानि चैव हि । क्रियतां निखिलेनैतन्मा विचारय पार्थिव ॥

sarvāndāsyāmyaśeṣeṇa dhanaṃ ratnāni caiva hi | kriyatāṃ nikhilenaitanmā vicāraya pārthiva

मैं सब कुछ बिना शेष छोड़े दूँगा, धन और रत्न भी। यह सब पूरी तरह किया जाए; हे राजन्, इसमें हिचको मत।”

भीष्म उवाच

श्लोक 39 (13.88.39)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राजा भृत्यांस्तथाऽब्रवीत् । यद्यद्ब्रूयान्मुनिस्तत्तत्सर्वं देयमशङ्कितैः ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā rājā bhṛtyāṃstathā'bravīt | yadyadbrūyānmunistattatsarvaṃ deyamaśaṅkitaiḥ

उनकी बात सुनकर राजा ने सेवकों से कहा, “मुनि जो-जो माँगें, वह सब बिना किसी शंका के दिया जाए।”

श्लोक 40 (13.88.40)

ततो रत्नान्यनेकानि स्त्रियो युग्यमजाविकम् । कृताकृतं च कनकं गजेन्द्राश्चाचलोपमाः ॥

tato ratnānyanekāni striyo yugyamajāvikam | kṛtākṛtaṃ ca kanakaṃ gajendrāścācalopamāḥ

तब अनेक रत्न, स्त्रियाँ, सवारियाँ, बकरियाँ और भेड़ें, गढ़ा और बिना गढ़ा सोना, और पर्वतों जैसे विशाल हाथी

श्लोक 41 (13.88.41)

अन्वगच्छन्त तमृषिं राजामात्याश्च सर्वशः । हाहाभूतं च तत्सर्वमासीन्नगरमार्तवत् ॥

anvagacchanta tamṛṣiṃ rājāmātyāśca sarvaśaḥ | hāhābhūtaṃ ca tatsarvamāsīnnagaramārtavat

ऋषि के पीछे चले, और राजा के मन्त्री भी चारों ओर से साथ चले; और सारा नगर मानो व्यथित होकर “हाय! हाय!” की पुकार से भर गया।

श्लोक 42 (13.88.42)

तौ तीक्ष्णाग्रेण सहसा प्रतोदेन प्रतोदितौ । पृष्ठे विद्धौ कटे चैव निर्विकारौ तमूहतुः ॥

tau tīkṣṇāgreṇa sahasā pratodena pratoditau | pṛṣṭhe viddhau kaṭe caiva nirvikārau tamūhatuḥ

उन दोनों को तीखी नोक वाले चाबुक से सहसा हाँका गया; पीठ और कमर में बिंधने पर भी वे विचलित हुए बिना उन्हें खींचते रहे।

श्लोक 43 (13.88.43)

वेपमानौ निराहारौ पञ्चाशद्रात्रकर्शितौ । कथंचिदूहतुर्धैर्याद्दम्पती तं रथोत्तमम् ॥

vepamānau nirāhārau pañcāśadrātrakarśitau | kathaṃcidūhaturdhairyāddampatī taṃ rathottamam

काँपते हुए, निराहार, पचास रातों से दुर्बल वे दोनों पति-पत्नी किसी प्रकार धैर्य के बल पर उस उत्तम रथ को खींचते रहे।

श्लोक 44 (13.88.44)

बहुशो भृशविद्धौ तौ क्षरमाणौ क्षतोद्भवम् । ददृशाते महाराज पुष्पिताविव किंशुकौ ॥

bahuśo bhṛśaviddhau tau kṣaramāṇau kṣatodbhavam | dadṛśāte mahārāja puṣpitāviva kiṃśukau

हे महाराज, बार-बार गहरे बिंधे हुए और घावों से रक्त बहाते हुए वे दोनों फूले हुए किंशुक वृक्षों जैसे दिखाई देते थे।

श्लोक 45 (13.88.45)

तौ दृष्ट्वा पौरवर्गस्तु भृशं शोकसमाकुलः । अभिशापभयत्रस्तो न तं किञ्चिदुवाच ह ॥

tau dṛṣṭvā pauravargastu bhṛśaṃ śokasamākulaḥ | abhiśāpabhayatrasto na taṃ kiñciduvāca ha

उन्हें देखकर नगरवासी शोक से अत्यन्त व्याकुल हुए, और शाप के भय से त्रस्त होकर उन्होंने उनसे कुछ नहीं कहा।

श्लोक 46 (13.88.46)

द्वन्द्वशश्चाब्रुवन्सर्वे पश्यध्वं तपसो बलम् । क्रुद्धा अपि मुनिश्रेष्ठं वीक्षितुं नेह शक्नुमः ॥

dvandvaśaścābruvansarve paśyadhvaṃ tapaso balam | kruddhā api muniśreṣṭhaṃ vīkṣituṃ neha śaknumaḥ

वे सब जोड़ी-जोड़ी में कहने लगे, “तप का बल देखो! क्रुद्ध होते हुए भी हम इन मुनिश्रेष्ठ की ओर देख तक नहीं सकते।

पौरा ऊचुः

श्लोक 47 (13.88.47)

अहो भगवतो वीर्यं महर्षेर्भावितात्मनः । राज्ञश्चापि सभार्यस्य धैर्यं पश्यत यादृशम् ॥

aho bhagavato vīryaṃ maharṣerbhāvitātmanaḥ | rājñaścāpi sabhāryasya dhairyaṃ paśyata yādṛśam

“अहो, इन पवित्र आत्मा वाले महर्षि भगवान् का कैसा प्रभाव है! और देखो, राजा और उसकी पत्नी का धैर्य कैसा है!

श्लोक 48 (13.88.48)

श्रान्तावपि हि कृच्छ्रेण रथमेनं समूहतुः । न चैतयोर्विकारं वै ददर्श भृगुनन्दनः ॥

śrāntāvapi hi kṛcchreṇa rathamenaṃ samūhatuḥ | na caitayorvikāraṃ vai dadarśa bhṛgunandanaḥ

“थके होने पर भी इन दोनों ने बड़े कष्ट से यह रथ खींचा है, और भृगु-पुत्र ने इनमें कोई विकार नहीं देखा।”

भीष्म उवाच

श्लोक 49 (13.88.49)

ततः स निर्विकारौ तु दृष्ट्वा भृगुकुलोद्वहः । वसु विश्राणयामास यथा वैश्रवणस्तथा ॥

tataḥ sa nirvikārau tu dṛṣṭvā bhṛgukulodvahaḥ | vasu viśrāṇayāmāsa yathā vaiśravaṇastathā

तब उन दोनों को विकारहीन देखकर भृगुकुल के उन श्रेष्ठ पुरुष ने कुबेर की भाँति धन बाँटना आरम्भ किया।

श्लोक 50 (13.88.50)

तत्रापि राजा प्रीतात्मा यथादिष्टमथाकरोत् । ततोऽस्य भगवान्प्रीतो बभूव मुनिसत्तमः ॥

tatrāpi rājā prītātmā yathādiṣṭamathākarot | tato'sya bhagavānprīto babhūva munisattamaḥ

तब भी प्रसन्न मन से राजा ने जैसा कहा गया वैसा ही किया; इससे मुनिश्रेष्ठ भगवान् उन पर प्रसन्न हो गए।

श्लोक 51 (13.88.51)

अवतीर्य रथश्रेष्ठाद्दम्पती तौ मुमोच ह । विमोच्य चैतौ विधिवत्ततो वाक्यमुवाच ह ॥

avatīrya rathaśreṣṭhāddampatī tau mumoca ha | vimocya caitau vidhivattato vākyamuvāca ha

वे उस श्रेष्ठ रथ से उतरे और उन दोनों को छोड़ दिया; विधिपूर्वक उन्हें मुक्त करके उन्होंने कहा।

श्लोक 52 (13.88.52)

स्निग्धगम्भीरया वाचा भार्गवः सुप्रसन्नया । ददामि वां वरं श्रेष्ठं तं ब्रूतामिति भारत ॥

snigdhagambhīrayā vācā bhārgavaḥ suprasannayā | dadāmi vāṃ varaṃ śreṣṭhaṃ taṃ brūtāmiti bhārata

भार्गव ने कोमल, गम्भीर और अत्यन्त प्रसन्न वाणी में कहा, “हे भारत, मैं तुम दोनों को श्रेष्ठ वर देता हूँ; उसे माँगो।”

श्लोक 53 (13.88.53)

सुकुमारौ च तौ विद्धौ कराभ्यां मुनिसत्तमः । पस्पर्शामृतकल्पाभ्यां स्नेहाद्भरतसत्तम ॥

sukumārau ca tau viddhau karābhyāṃ munisattamaḥ | pasparśāmṛtakalpābhyāṃ snehādbharatasattama

हे भरतश्रेष्ठ, मुनिश्रेष्ठ ने स्नेहवश उन दोनों सुकुमार और घायल जनों को अमृत के समान हाथों से स्पर्श किया।

श्लोक 54 (13.88.54)

अथाब्रवीन्नृपो वाक्यं श्रमो नास्त्यावयोरिह । विश्रान्तौ स्वः प्रभावात्ते ध्यानेनैवेह भार्गव ॥

athābravīnnṛpo vākyaṃ śramo nāstyāvayoriha | viśrāntau svaḥ prabhāvātte dhyānenaiveha bhārgava

तब राजा ने कहा, “हे भार्गव, हमें यहाँ कोई थकान नहीं है; आपके प्रभाव से और आपके ध्यान मात्र से हम दोनों विश्राम पा गए हैं।”

श्लोक 55 (13.88.55)

अथ तौ भगवान्प्राह प्रहृष्टश्च्यवनस्तदा । न वृथा व्याहृतं पूर्वं यन्मया तद्भविष्यति ॥

atha tau bhagavānprāha prahṛṣṭaścyavanastadā | na vṛthā vyāhṛtaṃ pūrvaṃ yanmayā tadbhaviṣyati

तब अत्यन्त प्रसन्न भगवान् च्यवन ने उनसे कहा, “मैंने पहले जो कहा है वह व्यर्थ नहीं कहा; वह होकर रहेगा।

च्यवन उवाच

श्लोक 56 (13.88.56)

रमणीयः समुद्देशो गङ्गातीरमिदं शुभम् । किञ्चित्कालं व्रतपरो निवत्स्यामीह पार्थिव ॥

ramaṇīyaḥ samuddeśo gaṅgātīramidaṃ śubham | kiñcitkālaṃ vrataparo nivatsyāmīha pārthiva

“यह स्थान रमणीय है, गंगा का यह सुन्दर तट है। हे राजन्, मैं व्रत में लगा हुआ कुछ समय यहाँ रहूँगा।

श्लोक 57 (13.88.57)

गम्यतां स्वपुरं पुत्र विश्रान्तः पुनरेष्यसि । इहस्थं मां सभार्यस्त्वं द्रष्टासि श्वो नराधिप ॥

gamyatāṃ svapuraṃ putra viśrāntaḥ punareṣyasi | ihasthaṃ māṃ sabhāryastvaṃ draṣṭāsi śvo narādhipa

पुत्र, तुम अपने नगर को जाओ; विश्राम करके फिर आना। हे नराधिप, कल तुम पत्नी सहित मुझे यहीं देखोगे।

श्लोक 58 (13.88.58)

न च मन्युस्त्वया कार्यः श्रेयस्त्वां समुपस्थितम् । यत्काङ्क्षितं हृदिस्थं ते तत्सर्वं हि भविष्यति ॥

na ca manyustvayā kāryaḥ śreyastvāṃ samupasthitam | yatkāṅkṣitaṃ hṛdisthaṃ te tatsarvaṃ hi bhaviṣyati

तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए; तुम्हारे सामने कल्याण उपस्थित है। तुम्हारे हृदय में जो भी इच्छा है, वह सब पूरी होगी।”

भीष्म उवाच

श्लोक 59 (13.88.59)

इत्येवमुक्तः कुशिकः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । प्रोवाच मुनिशार्दूलमिदं वचनमर्थवत् ॥

ityevamuktaḥ kuśikaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā | provāca muniśārdūlamidaṃ vacanamarthavat

ऐसा कहे जाने पर कुशिक ने प्रसन्न अन्तःकरण से उन मुनिश्रेष्ठ से ये अर्थपूर्ण वचन कहे:

कुशिक उवाच

श्लोक 60 (13.88.60)

न मे मन्युर्महाभाग पूतौ स्वो भगवंस्त्वया । संवृत्तौ यौवनस्थौ स्वो वपुष्मन्तौ बलान्वितौ ॥

na me manyurmahābhāga pūtau svo bhagavaṃstvayā | saṃvṛttau yauvanasthau svo vapuṣmantau balānvitau

“हे महाभाग, मुझे क्रोध नहीं है। भगवन्, आपने हम दोनों को पवित्र कर दिया है। हम दोनों युवा, सुन्दर रूप वाले और बलवान् हो गए हैं।

श्लोक 61 (13.88.61)

प्रतोदेन व्रणा ये मे सभार्यस्य त्वया कृताः । तान्न पश्यामि गात्रेषु स्वस्थोऽस्मि सह भार्यया ॥

pratodena vraṇā ye me sabhāryasya tvayā kṛtāḥ | tānna paśyāmi gātreṣu svastho'smi saha bhāryayā

आपने चाबुक से मुझ पर और मेरी पत्नी पर जो घाव किए थे, वे मुझे हमारे अंगों पर दिखाई नहीं देते; मैं पत्नी सहित स्वस्थ हूँ।

श्लोक 62 (13.88.62)

इमां च देवीं पश्यामि वपुषाऽप्सरसोपमाम् । श्रिया परमया युक्ता तथा दृष्टा पुरा मया ॥

imāṃ ca devīṃ paśyāmi vapuṣā'psarasopamām | śriyā paramayā yuktā tathā dṛṣṭā purā mayā

और मैं इस देवी को अप्सरा के समान रूप वाली और परम शोभा से युक्त देख रहा हूँ, जैसी मैंने इन्हें पहले देखा था।

श्लोक 63 (13.88.63)

तव प्रसादसंवृत्तमिदं सर्वं महामुने । नैतच्चित्रं तु भगवंस्त्वयि सत्यपराक्रम ॥

tava prasādasaṃvṛttamidaṃ sarvaṃ mahāmune | naitaccitraṃ tu bhagavaṃstvayi satyaparākrama

हे महामुने, यह सब आपकी कृपा से हुआ है; हे भगवन्, सत्य-पराक्रमी आपमें यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।”

भीष्म उवाच

श्लोक 64 (13.88.64)

इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं कुशिकं च्यवनस्तदा । आगच्छेथाः सभार्यश्च त्वमिहेति नराधिप ॥

ityuktaḥ pratyuvācainaṃ kuśikaṃ cyavanastadā | āgacchethāḥ sabhāryaśca tvamiheti narādhipa

ऐसा कहे जाने पर च्यवन ने कुशिक से कहा, “हे राजन्, तुम पत्नी सहित यहाँ फिर आना।”

श्लोक 65 (13.88.65)

इत्युक्तः समनुज्ञातो राजर्षिरभिवाद्य तम् । प्रययौ वपुषा युक्तो नगरं देवराजवत् ॥

ityuktaḥ samanujñāto rājarṣirabhivādya tam | prayayau vapuṣā yukto nagaraṃ devarājavat

ऐसा कहे जाने पर आज्ञा पाकर राजर्षि ने उन्हें प्रणाम किया और देवराज के समान सुन्दर रूप से युक्त होकर नगर को चले गए।

श्लोक 66 (13.88.66)

तत एनमुपाजग्मुरमात्याः सपुरोहिताः । बलस्था गणिकायुक्ताः सर्वाः प्रकृतयस्तथा ॥

tata enamupājagmuramātyāḥ sapurohitāḥ | balasthā gaṇikāyuktāḥ sarvāḥ prakṛtayastathā

तब मन्त्री पुरोहितों सहित, सेना के लोग गणिकाओं सहित, और सब प्रजाजन उनके पास आए।

श्लोक 67 (13.88.67)

तैर्वृतः कुशिको राजा श्रिया परमया ज्वलन् । प्रविवेश पुरं हृष्टः पूज्यमानोऽथ बन्दिभिः ॥

tairvṛtaḥ kuśiko rājā śriyā paramayā jvalan | praviveśa puraṃ hṛṣṭaḥ pūjyamāno'tha bandibhiḥ

उनसे घिरे हुए, परम शोभा से दीप्त राजा कुशिक ने हर्षित होकर नगर में प्रवेश किया, और बन्दीजन उनकी स्तुति करते रहे।

श्लोक 68 (13.88.68)

ततः प्रविश्य नगरं कृत्वा पौर्वाह्णिकीः क्रियाः । भुक्त्वा सभार्यो रजनीमुवास स महाद्युतिः ॥

tataḥ praviśya nagaraṃ kṛtvā paurvāhṇikīḥ kriyāḥ | bhuktvā sabhāryo rajanīmuvāsa sa mahādyutiḥ

नगर में प्रवेश करके और पूर्वाह्ण के कृत्य करके उस महातेजस्वी राजा ने पत्नी सहित भोजन किया और रात बिताई।

श्लोक 69 (13.88.69)

ततस्तु तौ नवमभिवीक्ष्य यौवनं । परस्परं विगतजराविवामरौ । ननन्दतुः शयनगतौ वपुर्धरौ । श्रिया युतौ द्विजवरदत्तया तदा ॥

tatastu tau navamabhivīkṣya yauvanaṃ | parasparaṃ vigatajarāvivāmarau | nanandatuḥ śayanagatau vapurdharau | śriyā yutau dvijavaradattayā tadā

फिर एक-दूसरे को नवयौवन में देखकर, मानो जरा से रहित अमरों की भाँति, सुन्दर देह धारण किए हुए वे दोनों शय्या पर आनन्दित हुए, उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मण से मिली हुई शोभा से युक्त होकर।

श्लोक 70 (13.88.70)

अथाप्यृषिर्भृगुकुलकीर्तिवर्धन- । स्तपोधनो वनमभिराममृद्धिमत् । मनीषया बहुविधरत्नभूषितं । ससर्ज यन्न पुरि शतक्रतोरपि ॥

athāpyṛṣirbhṛgukulakīrtivardhana- | stapodhano vanamabhirāmamṛddhimat | manīṣayā bahuvidharatnabhūṣitaṃ | sasarja yanna puri śatakratorapi

और भृगुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले उन तपस्वी ऋषि ने अपने संकल्प से अनेक प्रकार के रत्नों से सजा हुआ एक रमणीय, समृद्ध वन रच दिया, जैसा इन्द्र (शतक्रतु) के नगर में भी नहीं है।

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