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अनुशासन पर्व · अध्याय 89

च्यवन द्वारा कुशिक को स्वर्ग का दर्शन

भोर होते ही राजा कुशिक अपनी पत्नी के साथ वन में जाते हैं और वहाँ सोने का महल तथा पक्षियों, अप्सराओं और गन्धर्वों से भरा एक अद्भुत उद्यान देखते हैं, जिसके बीच च्यवन लेटे हैं। मुनि की इच्छा से वह दृश्य लुप्त हो जाता है और गङ्गा का तट पहले जैसा हो जाता है। कुशिक तप के प्रभाव पर विस्मित होते हैं; इन्द्रियों पर उनकी विजय से प्रसन्न च्यवन उन्हें वर माँगने को कहते हैं, और कुशिक इन विचित्र घटनाओं का कारण पूछते हैं।

अध्याय 88अध्याय-सूचीअध्याय 90

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.89.1)

ततः स राजा रात्र्यन्ते प्रतिबुद्धो महामनाः । कृतपूर्वाह्णिकः प्रायात्सभार्यस्तद्वनं प्रति ॥

tataḥ sa rājā rātryante pratibuddho mahāmanāḥ | kṛtapūrvāhṇikaḥ prāyātsabhāryastadvanaṃ prati

तब रात बीतने पर वह उदारचित्त राजा जागा और प्रातःकाल के नित्यकर्म करके अपनी पत्नी के साथ उसी वन की ओर चल पड़ा।

श्लोक 2 (13.89.2)

ततो ददर्श नृपतिः प्रासादं सर्वकाञ्चनम् । मणिस्तम्भसहस्राढ्यं गन्धर्वनगरोपमम् । तत्र दिव्यानभिप्रायान्ददर्श कुशिकस्तदा ॥

tato dadarśa nṛpatiḥ prāsādaṃ sarvakāñcanam | maṇistambhasahasrāḍhyaṃ gandharvanagaropamam | tatra divyānabhiprāyāndadarśa kuśikastadā

तब राजा ने सोने का बना एक सम्पूर्ण महल देखा, जो मणियों के हज़ारों खम्भों से सम्पन्न और गन्धर्वनगर के समान था। वहाँ कुशिक ने उस समय अनेक प्रकार की दिव्य वस्तुएँ देखीं।

श्लोक 3 (13.89.3)

पर्वतान्रूप्यसानूंश्च नलिनीश्च सपङ्कजाः । चित्रशालाश्च विविधास्तोरणानि च भारत । शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम् ॥

parvatānrūpyasānūṃśca nalinīśca sapaṅkajāḥ | citraśālāśca vividhāstoraṇāni ca bhārata | śādvalopacitāṃ bhūmiṃ tathā kāñcanakuṭṭimām

उसने चाँदी की चोटियों वाले पर्वत, कमलों से भरी पुष्करिणियाँ, भाँति-भाँति की चित्रशालाएँ और तोरण देखे, हे भारत; साथ ही हरी घास से ढकी भूमि और सोने के फर्श भी देखे।

श्लोक 4 (13.89.4)

सहकारान्प्रफुल्लांश्च केतकोद्दालकान्वरान् । अशोकान्सहकुन्दांश्च फुल्लांश्चैवातिमुक्तकान् ॥

sahakārānpraphullāṃśca ketakoddālakānvarān | aśokānsahakundāṃśca phullāṃścaivātimuktakān

उसने फूले हुए आम, उत्तम केतक और उद्दालक, कुन्द के साथ अशोक, तथा खिले हुए अतिमुक्तक देखे।

श्लोक 5 (13.89.5)

चम्पकांस्तिलकान्भव्यान्पनसान्वञ्जुलानपि । पुष्पितान्कर्णिकारांश्च तत्रतत्र ददर्श ह ॥

campakāṃstilakānbhavyānpanasānvañjulānapi | puṣpitānkarṇikārāṃśca tatratatra dadarśa ha

चम्पा, सुन्दर तिलक, कटहल, वञ्जुल और फूले हुए कर्णिकार के वृक्ष वह जगह-जगह देखता गया।

श्लोक 6 (13.89.6)

श्यामान्वारणपुष्पांश्च तथाऽष्टपदिका लताः । तत्रतत्र परिक्लृप्ता ददर्श स महीपतिः ॥

śyāmānvāraṇapuṣpāṃśca tathā'ṣṭapadikā latāḥ | tatratatra pariklṛptā dadarśa sa mahīpatiḥ

उस राजा ने जगह-जगह लगाई हुई श्याम लताएँ, वारणपुष्प और अष्टपदिका लताएँ भी देखीं।

श्लोक 7 (13.89.7)

रम्यान्पद्मोत्पलधरान्सर्वर्तुकुसुमांस्तथा । विमानप्रतिमांश्चापि प्रासादाञ्शैलसन्निभान् ॥

ramyānpadmotpaladharānsarvartukusumāṃstathā | vimānapratimāṃścāpi prāsādāñśailasannibhān

उसने कमलों और नीलकमलों से सजे, सब ऋतुओं के फूलों से भरे रमणीय स्थल देखे, तथा विमानों के समान और पर्वतों जैसे ऊँचे महल देखे।

श्लोक 8 (13.89.8)

शीतलानि च तोयानि क्वचिदुष्णानि भारत । आसनानि विचित्राणि शयनप्रवराणि च ॥

śītalāni ca toyāni kvaciduṣṇāni bhārata | āsanāni vicitrāṇi śayanapravarāṇi ca

हे भारत, वहाँ कहीं शीतल और कहीं गरम जल था; अनेक प्रकार के आसन और उत्तम शय्याएँ थीं।

श्लोक 9 (13.89.9)

पर्यङ्कान्रत्नसौवर्णान्परार्ध्यास्तरणास्तृतान् । भक्ष्यं भोज्यमनन्तं च तत्रतत्रोपकल्पितम् ॥

paryaṅkānratnasauvarṇānparārdhyāstaraṇāstṛtān | bhakṣyaṃ bhojyamanantaṃ ca tatratatropakalpitam

वहाँ रत्न और सोने के पलंग थे, जिन पर बहुमूल्य बिछौने बिछे थे; और जगह-जगह अनन्त भक्ष्य और भोज्य पदार्थ सजाकर रखे थे।

श्लोक 10 (13.89.10)

वाणीवादाञ्छुकांश्चैव शारिका भृङ्गराजकान् । कोकिलाञ्छतपत्रांश्च सकोयष्टिककुक्कुभान् ॥

vāṇīvādāñchukāṃścaiva śārikā bhṛṅgarājakān | kokilāñchatapatrāṃśca sakoyaṣṭikakukkubhān

उसने मनुष्य की बोली की नकल करने वाले पक्षी, तोते, मैना, भृङ्गराज, कोयल, शतपत्र तथा कोयष्टिक और कुक्कुभ पक्षी देखे।

श्लोक 11 (13.89.11)

मयूरान्कुक्कुटांश्चापि दात्यूहाञ्जीवजीवकान् । चकोरान्वानरान्हंसान्सारसांश्चक्रसाह्वयान् ॥

mayūrānkukkuṭāṃścāpi dātyūhāñjīvajīvakān | cakorānvānarānhaṃsānsārasāṃścakrasāhvayān

मोर, मुर्गे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस और चक्रवाक भी वहाँ थे।

श्लोक 12 (13.89.12)

समन्ततः प्रणदतो ददर्श सुमनोहरान् । क्वचिदप्सरसां सङ्घान्गन्धर्वाणां च पार्थिव ॥

samantataḥ praṇadato dadarśa sumanoharān | kvacidapsarasāṃ saṅghāngandharvāṇāṃ ca pārthiva

उसने उन्हें चारों ओर मधुर स्वर में कूजते और अत्यन्त मनोहर देखा; और, हे राजन्, कहीं अप्सराओं तथा गन्धर्वों के समूह भी देखे।

श्लोक 13 (13.89.13)

कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान्ददर्श ह । न ददर्श च तान्भूयो ददर्श च पुनर्नृपः ॥

kāntābhiraparāṃstatra pariṣvaktāndadarśa ha | na dadarśa ca tānbhūyo dadarśa ca punarnṛpaḥ

उसने वहाँ कुछ और लोगों को प्रियाओं से आलिङ्गित देखा; फिर वे दिखाई न दिए, और राजा ने उन्हें फिर देखा।

श्लोक 14 (13.89.14)

गीतध्वनिं सुमधुरं तथैवाध्ययनध्वनिम् । हंसान्सुमधुरांश्चापि तत्र शुश्राव पार्थिवः ॥

gītadhvaniṃ sumadhuraṃ tathaivādhyayanadhvanim | haṃsānsumadhurāṃścāpi tatra śuśrāva pārthivaḥ

राजा ने वहाँ गीतों की अति मधुर ध्वनि सुनी, वेदपाठ की ध्वनि सुनी, और हंसों की भी मधुर आवाज़ें सुनीं।

श्लोक 15 (13.89.15)

तं दृष्ट्वाऽत्यद्भुतं राजा मनसाऽचिन्तयत्तदा । स्वप्नोऽयं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु ॥

taṃ dṛṣṭvā'tyadbhutaṃ rājā manasā'cintayattadā | svapno'yaṃ cittavibhraṃśa utāho satyameva tu

उस अत्यन्त अद्भुत दृश्य को देखकर राजा ने मन में सोचा, “क्या यह स्वप्न है, मन का भ्रम है, या सचमुच सत्य है?”

श्लोक 16 (13.89.16)

अहो सह शरीरेण प्राप्तोस्मि परमां गतिम् । उत्तरान्वा कुरून्पुण्यानथवाऽप्यमरावतीम् ॥

aho saha śarīreṇa prāptosmi paramāṃ gatim | uttarānvā kurūnpuṇyānathavā'pyamarāvatīm

“अहो! क्या मैं इसी शरीर से परमगति को पहुँच गया हूँ — या तो पवित्र उत्तरकुरु में, अथवा अमरावती में?”

श्लोक 17 (13.89.17)

किञ्चेदं महदाश्चर्यं सम्पश्यामीत्यचिन्तयत् । एवं सञ्चिन्तयन्नेव ददर्श मुनिपुङ्गवम् ॥

kiñcedaṃ mahadāścaryaṃ sampaśyāmītyacintayat | evaṃ sañcintayanneva dadarśa munipuṅgavam

“यह कैसा बड़ा आश्चर्य मैं देख रहा हूँ!” — ऐसा वह सोच ही रहा था कि उसे मुनिश्रेष्ठ दिखाई दिए।

श्लोक 18 (13.89.18)

तस्मिन्विमाने सौवर्णे मणिस्तम्भसमाकुले । महार्हे शयने दिव्ये शयानं भृगुनन्दनम् ॥

tasminvimāne sauvarṇe maṇistambhasamākule | mahārhe śayane divye śayānaṃ bhṛgunandanam

सोने के उस विमान में, जो मणियों के खम्भों से भरा था, एक बहुमूल्य दिव्य शय्या पर भृगुनन्दन च्यवन लेटे हुए थे।

श्लोक 19 (13.89.19)

तमभ्ययात्प्रहर्षेण नरेन्द्रः सह भार्यया । अन्तर्हितस्ततो भूयश्च्यवनः शयनं च तत् ॥

tamabhyayātpraharṣeṇa narendraḥ saha bhāryayā | antarhitastato bhūyaścyavanaḥ śayanaṃ ca tat

राजा अपनी पत्नी के साथ बड़े हर्ष से उनकी ओर बढ़ा; तब च्यवन और वह शय्या फिर अदृश्य हो गए।

श्लोक 20 (13.89.20)

ततोऽन्यस्मिन्वनोद्देशे पुनरेव ददर्श तम् । कौश्यां बृस्यां समासीनं जपमानं महाव्रतम् ॥

tato'nyasminvanoddeśe punareva dadarśa tam | kauśyāṃ bṛsyāṃ samāsīnaṃ japamānaṃ mahāvratam

फिर वन के दूसरे भाग में राजा ने उन्हें फिर देखा — वे कुश की चटाई पर बैठे हुए, महाव्रती, जप कर रहे थे।

श्लोक 21 (13.89.21)

एवं योगबलाद्विप्रो मोहयामास पार्थिवम् ॥

evaṃ yogabalādvipro mohayāmāsa pārthivam

इस प्रकार उस ब्राह्मण ने योगबल से राजा को मोह में डाल दिया।

श्लोक 22 (13.89.22)

क्षणेन तद्वनं चैव ते चैवाप्सरसां गणाः । गन्धर्वाः पादपाश्चैव सर्वमन्तरधीयत ॥

kṣaṇena tadvanaṃ caiva te caivāpsarasāṃ gaṇāḥ | gandharvāḥ pādapāścaiva sarvamantaradhīyata

क्षण भर में वह वन, अप्सराओं के वे समूह, गन्धर्व और वृक्ष — सब अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 23 (13.89.23)

निःशब्दमभवच्चापि गङ्गाकूलं पुनर्नृप । कुशवल्मीकभूयिष्ठं बभूव च यथा पुरा ॥

niḥśabdamabhavaccāpi gaṅgākūlaṃ punarnṛpa | kuśavalmīkabhūyiṣṭhaṃ babhūva ca yathā purā

हे राजन्, गङ्गा का तट फिर निःशब्द हो गया और पहले की भाँति कुश और बाँबियों से भर गया।

श्लोक 24 (13.89.24)

ततः स राजा कुशिकः सभार्यस्तेन कर्मणा । विस्मयं परमं प्राप्तस्तद्दृष्ट्वा महदद्भुतम् ॥

tataḥ sa rājā kuśikaḥ sabhāryastena karmaṇā | vismayaṃ paramaṃ prāptastaddṛṣṭvā mahadadbhutam

तब राजा कुशिक अपनी पत्नी के साथ उस महान् अद्भुत दृश्य को देखकर उस कर्म से अत्यन्त विस्मय में पड़ गया।

श्लोक 25 (13.89.25)

ततः प्रोवाच कुशिको भार्यां हर्षसमन्वितः । पश्य भद्रे यथाभावाश्चित्रा दृष्टाः सुदुर्लभाः । प्रसादाद्भृगुमुख्यस्य किमन्यत्र तपोबलात् ॥

tataḥ provāca kuśiko bhāryāṃ harṣasamanvitaḥ | paśya bhadre yathābhāvāścitrā dṛṣṭāḥ sudurlabhāḥ | prasādādbhṛgumukhyasya kimanyatra tapobalāt

तब हर्ष से भरे कुशिक ने अपनी पत्नी से कहा, “देखो भद्रे, कैसे विचित्र और अत्यन्त दुर्लभ भाव हमने देखे! यह भृगुश्रेष्ठ की कृपा से हुआ — तपोबल के सिवा और क्या इसका कारण हो सकता है?”

कुशिक उवाच

श्लोक 26 (13.89.26)

तपसा तदवाप्यं हि यन्न शक्यं मनोरथैः । त्रैलोक्यराज्यादपि हि तप एव विशिष्यते ॥

tapasā tadavāpyaṃ hi yanna śakyaṃ manorathaiḥ | trailokyarājyādapi hi tapa eva viśiṣyate

“जो मनोरथों से भी नहीं पाया जा सकता, वह तप से प्राप्त होता है। तीनों लोकों के राज्य से भी तप ही श्रेष्ठ है।”

श्लोक 27 (13.89.27)

तपसा हि सुतप्तेन क्रीडत्येष तपोधनः । अहो प्रभावो ब्रह्मर्षेश्च्यवनस्य महात्मनः ॥

tapasā hi sutaptena krīḍatyeṣa tapodhanaḥ | aho prabhāvo brahmarṣeścyavanasya mahātmanaḥ

“भली-भाँति तपाए हुए तप से ये तपोधन मानो खेल करते हैं। अहो, महात्मा ब्रह्मर्षि च्यवन का कैसा प्रभाव है!”

श्लोक 28 (13.89.28)

इच्छयैष तपोवीर्यादन्याँल्लोकान्सृजेदपि । ब्राह्मणा एव जायेरन्पुण्यवाग्बुद्धिकर्मणा ॥

icchayaiṣa tapovīryādanyām̐llokānsṛjedapi | brāhmaṇā eva jāyeranpuṇyavāgbuddhikarmaṇā

“ये चाहें तो तप के बल से दूसरे लोक भी रच सकते हैं, जिनमें पवित्र वाणी, बुद्धि और कर्म के कारण ब्राह्मण ही उत्पन्न हों।”

श्लोक 29 (13.89.29)

उत्सहेदिह कृत्वैव कोऽन्यो वै च्यवनादृते । ब्राह्मण्यं दुर्लभं लोके राज्यं हि सुलभं नरैः ॥

utsahediha kṛtvaiva ko'nyo vai cyavanādṛte | brāhmaṇyaṃ durlabhaṃ loke rājyaṃ hi sulabhaṃ naraiḥ

“च्यवन के सिवा और कौन ऐसा करने का साहस कर सकता है? संसार में ब्राह्मणत्व दुर्लभ है, जबकि राज्य मनुष्यों को सुलभ है।”

भीष्म उवाच

श्लोक 30 (13.89.30)

ब्राह्मण्यस्य प्रभावाद्धि रथे युक्तौ स्वधुर्यवत् । इत्येवं चिन्तयानः स विदितश्च्यवनस्य वै ॥

brāhmaṇyasya prabhāvāddhi rathe yuktau svadhuryavat | ityevaṃ cintayānaḥ sa viditaścyavanasya vai

“ब्राह्मणत्व के प्रभाव से ही हम दोनों उनके रथ में उनके अपने जुए के बैलों की तरह जोत दिए गए थे।” कुशिक ऐसा सोच रहा था कि च्यवन ने उसके मन की बात जान ली।

श्लोक 31 (13.89.31)

सम्प्रेक्ष्योवाच नृपतिं क्षिप्रमागम्यतामिति । इत्युक्तः सहभार्यस्तु सोभ्यगच्छन्महामुनिम् ॥

samprekṣyovāca nṛpatiṃ kṣipramāgamyatāmiti | ityuktaḥ sahabhāryastu sobhyagacchanmahāmunim

राजा की ओर देखकर च्यवन बोले, “शीघ्र यहाँ आओ।” ऐसा कहे जाने पर वह अपनी पत्नी के साथ उन महामुनि के पास गया।

श्लोक 32 (13.89.32)

शिरसा वन्दनीयं तमवन्दत च पार्थिवः । तस्याशिषः प्रयुज्याथ स मुनिस्तं नराधिपम् । निषीदेत्यब्रवीद्धीमान्सान्त्वयन्पुरुषर्षभः ॥

śirasā vandanīyaṃ tamavandata ca pārthivaḥ | tasyāśiṣaḥ prayujyātha sa munistaṃ narādhipam | niṣīdetyabravīddhīmānsāntvayanpuruṣarṣabhaḥ

वन्दनीय उन मुनि को राजा ने सिर झुकाकर प्रणाम किया। तब उन बुद्धिमान पुरुषश्रेष्ठ मुनि ने राजा को आशीर्वाद देकर और सान्त्वना देते हुए कहा, “बैठो।”

श्लोक 33 (13.89.33)

ततः प्रकृतिमापन्नो भार्गवो नृपते नृपम् । उवाच श्लक्ष्णया वाचा तर्पयन्निव भारत ॥

tataḥ prakṛtimāpanno bhārgavo nṛpate nṛpam | uvāca ślakṣṇayā vācā tarpayanniva bhārata

फिर, हे भारत, अपने स्वाभाविक रूप में लौटकर भृगुवंशी च्यवन ने राजा को मानो तृप्त करते हुए मधुर वाणी में कहा।

च्यवन उवाच

श्लोक 34 (13.89.34)

राजन्सम्यग्जितानीह पञ्चपञ्च स्वयं त्वया । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि कृच्छ्रान्मुक्तोसि तेन वै ॥

rājansamyagjitānīha pañcapañca svayaṃ tvayā | manaḥṣaṣṭhānīndriyāṇi kṛcchrānmuktosi tena vai

“हे राजन्, तुमने स्वयं ही पाँच और पाँच को भली-भाँति जीत लिया है — इन्द्रियों को, जिनमें मन छठा है; इसी से तुम कठिन संकट से मुक्त हुए हो।”

श्लोक 35 (13.89.35)

सम्यगाराधितः पुत्र त्वयाऽहं वदतांवर । न हि ते वृजिनं किञ्चित्सुसूक्ष्ममपि दृश्यते ॥

samyagārādhitaḥ putra tvayā'haṃ vadatāṃvara | na hi te vṛjinaṃ kiñcitsusūkṣmamapi dṛśyate

“हे पुत्र, हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, तुमने मेरी भली-भाँति सेवा की है। तुम्हारा कोई दोष मुझे सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भी दिखाई नहीं देता।”

श्लोक 36 (13.89.36)

अनुजानीहि मां राजन्गमिष्यामि यथागतम् । प्रीतोस्मि तव राजेन्द्र वरश्च प्रतिगृह्यताम् ॥

anujānīhi māṃ rājangamiṣyāmi yathāgatam | prītosmi tava rājendra varaśca pratigṛhyatām

“हे राजन्, मुझे जाने की आज्ञा दो; मैं जैसे आया था वैसे ही चला जाऊँगा। हे राजेन्द्र, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; वर ग्रहण करो।”

कुशिक उवाच

श्लोक 37 (13.89.37)

अग्निमध्ये गतेनेव भगवन्सन्निधौ मया । वर्तितं भृगुशार्दूल यन्न दग्धोस्मि तद्बहु ॥

agnimadhye gateneva bhagavansannidhau mayā | vartitaṃ bhṛguśārdūla yanna dagdhosmi tadbahu

“भगवन्, आपके निकट रहकर मैंने मानो आग के बीच रहकर समय बिताया है; हे भृगुश्रेष्ठ, मैं जल नहीं गया — यही बहुत है।”

श्लोक 38 (13.89.38)

एष एव वरो मुख्यः प्राप्तो मे भृगुनन्दन । यत्प्रीतोसि ममाचारैः कुलं त्रातं च मेऽनघ ॥

eṣa eva varo mukhyaḥ prāpto me bhṛgunandana | yatprītosi mamācāraiḥ kulaṃ trātaṃ ca me'nagha

“हे भृगुनन्दन, यही मुझे मिला सबसे बड़ा वर है कि आप मेरे आचरण से प्रसन्न हैं और, हे निष्पाप, मेरा कुल बच गया।”

श्लोक 39 (13.89.39)

एष मेऽनुग्रहो विप्र जीविते च प्रयोजनम् । एतद्राज्यफलं चैव तपसश्च फलं मम ॥

eṣa me'nugraho vipra jīvite ca prayojanam | etadrājyaphalaṃ caiva tapasaśca phalaṃ mama

“हे विप्र, यही मुझ पर आपका अनुग्रह है, यही मेरे जीवन का प्रयोजन है; यही मेरे राज्य का फल है और यही मेरे तप का फल है।”

श्लोक 40 (13.89.40)

यदि त्वं प्रीतिमान्विप्र मयि वै भृगुनन्दन । अस्ति मे संशयः कश्चित्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

yadi tvaṃ prītimānvipra mayi vai bhṛgunandana | asti me saṃśayaḥ kaścittanme vyākhyātumarhasi

“हे भृगुनन्दन, हे विप्र, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे एक संशय है; उसे आप मुझे समझाइए।”

अध्याय 88अध्याय-सूचीअध्याय 90