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अनुशासन पर्व · अध्याय 90

च्यवन ने कुशिक की परीक्षा क्यों ली

कुशिक च्यवन से उनके विचित्र आचरण का कारण पूछते हैं — इक्कीस दिन की नींद, अदृश्य हो जाना, जला हुआ भोजन, रथ की सवारी और सोने के महलों का दर्शन। च्यवन बताते हैं कि उन्होंने ब्रह्मा से सुना था कि कुशिक के कुल से ब्राह्मण और क्षत्रिय वंशों का सङ्कर होगा, और वे उसे नष्ट करने आए थे, पर राजा में कोई दोष न पाया। वह दर्शन तप और धर्म का प्रभाव दिखाने के लिए था; वे वचन देते हैं कि तीसरी पीढ़ी में कुशिक का वंश ब्राह्मणत्व पाएगा, और कुशिक पूछते हैं कि यह कैसे होगा।

अध्याय 89अध्याय-सूचीअध्याय 91

च्यवन उवाच

श्लोक 1 (13.90.1)

वरश्च गृह्यतां मत्तो यश्च ते संशयो हृदि । तं प्रब्रूहि नरश्रेष्ठ सर्वं सम्पादयामि ते ॥

varaśca gṛhyatāṃ matto yaśca te saṃśayo hṛdi | taṃ prabrūhi naraśreṣṭha sarvaṃ sampādayāmi te

“मुझसे वर माँग लो, और तुम्हारे हृदय में जो संशय है, हे नरश्रेष्ठ, उसे भी कहो; मैं तुम्हारे लिए सब पूरा करूँगा।”

कुशिक उवाच

श्लोक 2 (13.90.2)

यदि प्रीतोसि भगवंस्ततो मे वद भार्गव । कारणं श्रोतुमिच्छामि मद्गृहे वासकारितम् ॥

yadi prītosi bhagavaṃstato me vada bhārgava | kāraṇaṃ śrotumicchāmi madgṛhe vāsakāritam

“हे भगवन्, हे भार्गव, यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे बताइए — मैं जानना चाहता हूँ कि आपने मेरे घर में जो निवास किया, उसका कारण क्या था —”

श्लोक 3 (13.90.3)

शयनं चैकपार्श्वेन दिवसानेकविंशतिम् । न किञ्चिदुक्त्वा गमनं बहिश्च मुनिपुङ्गवः ॥

śayanaṃ caikapārśvena divasānekaviṃśatim | na kiñciduktvā gamanaṃ bahiśca munipuṅgavaḥ

“इक्कीस दिन तक एक ही करवट लेटे रहना, और हे मुनिश्रेष्ठ, बिना कुछ कहे बाहर चले जाना;”

श्लोक 4 (13.90.4)

अन्तर्धानमकस्माच्च पुनरेव च दर्शनम् । पुनश्च शयनं विप्र दिवसानेकविंशतिम् ॥

antardhānamakasmācca punareva ca darśanam | punaśca śayanaṃ vipra divasānekaviṃśatim

“अचानक अदृश्य हो जाना और फिर दिखाई देना; और हे विप्र, फिर इक्कीस दिन तक लेटे रहना;”

श्लोक 5 (13.90.5)

तैलाभ्यक्तस्य गमनं भोजनं च गृहे मम । समुपानीय विविधं यद्दग्धं जातवेदसा ॥

tailābhyaktasya gamanaṃ bhojanaṃ ca gṛhe mama | samupānīya vividhaṃ yaddagdhaṃ jātavedasā

“तेल लगाकर निकल जाना; मेरे घर में अनेक प्रकार का भोजन जुटाकर लाया गया, जिसे अग्नि ने जला डाला;”

श्लोक 6 (13.90.6)

निर्याणं च रथेनाशु सहसा यत्कृतं त्वया । धनानां च विसर्गश्च वनस्यापि च दर्शनम् ॥

niryāṇaṃ ca rathenāśu sahasā yatkṛtaṃ tvayā | dhanānāṃ ca visargaśca vanasyāpi ca darśanam

“आपका सहसा रथ पर शीघ्र निकल पड़ना, धन का बिखेरा जाना और वन का दिखाई देना;”

श्लोक 7 (13.90.7)

प्रासादानां बहूनां च काञ्चनानां महामुने । मणिविद्रुमपादानां पर्यङ्काणां च दर्शनम् ॥

prāsādānāṃ bahūnāṃ ca kāñcanānāṃ mahāmune | maṇividrumapādānāṃ paryaṅkāṇāṃ ca darśanam

“हे महामुने, अनेक सोने के महलों और मणि-मूँगे के पायों वाले पलंगों का दिखाई देना;”

श्लोक 8 (13.90.8)

पुनश्चादर्शनं तस्य श्रोतुमिच्छामि कारणम् । अतीव ह्यत्र मुह्यामि चिन्तयानो भृगूद्वह ॥

punaścādarśanaṃ tasya śrotumicchāmi kāraṇam | atīva hyatra muhyāmi cintayāno bhṛgūdvaha

“और फिर उन सबका अदृश्य हो जाना — मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ। हे भृगुश्रेष्ठ, सोचते-सोचते मैं इसमें बहुत उलझ गया हूँ;”

श्लोक 9 (13.90.9)

न चैवात्राधिगच्छामि सर्वस्यास्य विनिश्चयम् । एतदिच्छामि कार्त्स्न्येन सत्यं श्रोतुं तपोधन ॥

na caivātrādhigacchāmi sarvasyāsya viniścayam | etadicchāmi kārtsnyena satyaṃ śrotuṃ tapodhana

“इस सबका निश्चित अर्थ मुझे समझ नहीं आता। हे तपोधन, मैं यह सब सच-सच पूरा सुनना चाहता हूँ।”

च्यवन उवाच

श्लोक 10 (13.90.10)

शृणु सर्वमशेषेण यदिदं येन हेतुना । न हि शक्यमनाख्यातुमेवं पृष्टेन पार्थिव ॥

śṛṇu sarvamaśeṣeṇa yadidaṃ yena hetunā | na hi śakyamanākhyātumevaṃ pṛṣṭena pārthiva

“सब कुछ बिना छोड़े सुनो — यह सब क्या था और किस कारण से हुआ। हे राजन्, इस प्रकार पूछे जाने पर इसे बिना बताए रहना उचित नहीं।”

श्लोक 11 (13.90.11)

पितामहस्य वदतः पुरा देवसमागमे । श्रुतवानस्मि यद्राजंस्तन्मे निगदतः शृणु ॥

pitāmahasya vadataḥ purā devasamāgame | śrutavānasmi yadrājaṃstanme nigadataḥ śṛṇu

“हे राजन्, बहुत पहले देवताओं की सभा में पितामह के बोलते समय मैंने जो सुना था, वह मैं कहता हूँ, सुनो।”

श्लोक 12 (13.90.12)

ब्रह्मक्षत्रविरोधेन भविता कुलसङ्करः । पौत्रस्ते भविता राजंस्तेजोवीर्यसमन्वितः ॥

brahmakṣatravirodhena bhavitā kulasaṅkaraḥ | pautraste bhavitā rājaṃstejovīryasamanvitaḥ

“ब्राह्मणों और क्षत्रियों के विरोध से कुलों का सङ्कर होगा। हे राजन्, तुम्हारा एक पौत्र होगा, जो तेज और पराक्रम से सम्पन्न होगा।”

श्लोक 13 (13.90.13)

ततः स्वकुलरक्षार्थमहं त्वां समुपागतः । चिकीर्षन्कुशिकोच्छेदं संदिधक्षुः कुलं तव ॥

tataḥ svakularakṣārthamahaṃ tvāṃ samupāgataḥ | cikīrṣankuśikocchedaṃ saṃdidhakṣuḥ kulaṃ tava

“तब अपने कुल की रक्षा के लिए मैं तुम्हारे पास आया; मैं कुशिकवंश का नाश करना चाहता था और तुम्हारे कुल को जला डालना चाहता था।”

श्लोक 14 (13.90.14)

ततोऽहमागम्य पुरे त्वामवोचं महीपते । नियमं कञ्चिदारप्स्ये शुश्रूषा क्रियतामिति ॥

tato'hamāgamya pure tvāmavocaṃ mahīpate | niyamaṃ kañcidārapsye śuśrūṣā kriyatāmiti

“हे राजन्, तब तुम्हारे नगर में आकर मैंने तुमसे कहा, ‘मैं कोई नियम आरम्भ करूँगा; मेरी सेवा की जाए।’”

श्लोक 15 (13.90.15)

न च ते दुष्कृतं किञ्चिदहमासादयं गृहे । तेन जीवसि राजर्षे न भवेथास्त्वमन्यथा ॥

na ca te duṣkṛtaṃ kiñcidahamāsādayaṃ gṛhe | tena jīvasi rājarṣe na bhavethāstvamanyathā

“मैंने तुम्हारे घर में तुम्हारा कोई दोष नहीं पाया; हे राजर्षि, इसी से तुम जीवित हो — अन्यथा तुम न बचते।”

श्लोक 16 (13.90.16)

एवं बुद्धिं समास्थाय दिवसानेकविंशतिम् । सुप्तोस्मि यदि मां कश्चिद्बोधयेदिति पार्थिव ॥

evaṃ buddhiṃ samāsthāya divasānekaviṃśatim | suptosmi yadi māṃ kaścidbodhayediti pārthiva

“हे राजन्, इसी निश्चय से मैं इक्कीस दिन तक सोया रहा, यह सोचकर कि ‘यदि कोई मुझे जगाए —’”

श्लोक 17 (13.90.17)

यदा त्वया सभार्येण संसुप्तो न प्रबोधितः । अहं तदैव ते प्रीतो मनसा राजसत्तम ॥

yadā tvayā sabhāryeṇa saṃsupto na prabodhitaḥ | ahaṃ tadaiva te prīto manasā rājasattama

“जब तुमने पत्नी सहित मुझे सोता देख जगाया नहीं, हे राजश्रेष्ठ, तभी मैं मन से तुम पर प्रसन्न हो गया था।”

श्लोक 18 (13.90.18)

उत्थाय चास्मि निष्क्रान्तो यदि मां त्वं महीपते । पृच्छेः क्व यास्यसीत्येवं शपेयं त्वामिति प्रभो ॥

utthāya cāsmi niṣkrānto yadi māṃ tvaṃ mahīpate | pṛccheḥ kva yāsyasītyevaṃ śapeyaṃ tvāmiti prabho

“उठकर जब मैं बाहर निकला, तो सोचा था कि यदि तुम मुझसे पूछोगे, ‘कहाँ जा रहे हैं?’, तो मैं तुम्हें शाप दूँगा, हे प्रभु।”

श्लोक 19 (13.90.19)

अन्तर्हितः पुनश्चास्मि पुनरेव च ते गृहे । योगमास्थाय संसुप्तो दिवसानेकविंशतिम् ॥

antarhitaḥ punaścāsmi punareva ca te gṛhe | yogamāsthāya saṃsupto divasānekaviṃśatim

“मैं फिर अदृश्य हो गया, और फिर तुम्हारे घर में योग का आश्रय लेकर इक्कीस दिन सोया।”

श्लोक 20 (13.90.20)

क्षुधितौ मामसूयेथां श्रमाद्वेति नराधिप । एतां बुद्धिं समास्थाय कर्शितौ वां क्षुधा मया ॥

kṣudhitau māmasūyethāṃ śramādveti narādhipa | etāṃ buddhiṃ samāsthāya karśitau vāṃ kṣudhā mayā

“‘भूखे होने पर ये दोनों कहीं थकान के कारण मुझसे चिढ़ न जाएँ’ — यही सोचकर, हे राजन्, मैंने तुम दोनों को भूख से दुर्बल किया।”

श्लोक 21 (13.90.21)

न च तेऽभूत्सुसूक्ष्मोपि मन्युर्मनसि पार्थिव । सभार्यस्य नरश्रेष्ठ तेन ते प्रीतिमानहम् ॥

na ca te'bhūtsusūkṣmopi manyurmanasi pārthiva | sabhāryasya naraśreṣṭha tena te prītimānaham

“फिर भी, हे नरश्रेष्ठ, पत्नी सहित तुम्हारे मन में तनिक भी क्रोध नहीं उठा; इसी से मैं तुम पर प्रसन्न हूँ।”

श्लोक 22 (13.90.22)

भोजनं च समानाय्य यत्तदादीपितं मया । क्रुध्येथा यदि मात्सर्यादिति तन्मर्षितं च मे ॥

bhojanaṃ ca samānāyya yattadādīpitaṃ mayā | krudhyethā yadi mātsaryāditi tanmarṣitaṃ ca me

“जो भोजन जुटाकर लाया गया था और जिसे मैंने जला दिया — यह सोचकर कि ‘कहीं यह डाह से क्रुद्ध न हो जाए’ — वह भी तुमने सह लिया।”

श्लोक 23 (13.90.23)

ततोऽहं रथमारुह्य त्वामवोचं नराधिप । सभार्यो मां वहस्वेति तच्च त्वं कृतवांस्तथा ॥

tato'haṃ rathamāruhya tvāmavocaṃ narādhipa | sabhāryo māṃ vahasveti tacca tvaṃ kṛtavāṃstathā

“फिर, हे राजन्, रथ पर चढ़कर मैंने तुमसे कहा, ‘पत्नी सहित मुझे ढोओ’ — और तुमने वैसा ही किया।”

श्लोक 24 (13.90.24)

अविशङ्को नरपते प्रीतोऽहं चापि तेन ह । धनोत्सर्गेऽपि च कृते न त्वां क्रोधोप्यधर्षयत् ॥

aviśaṅko narapate prīto'haṃ cāpi tena ha | dhanotsarge'pi ca kṛte na tvāṃ krodhopyadharṣayat

“हे राजन्, तुम निःशङ्क रहे, और उससे भी मैं प्रसन्न हूँ। धन लुटा दिए जाने पर भी क्रोध ने तुम्हें नहीं दबाया।”

श्लोक 25 (13.90.25)

ततः प्रीतेन ते राजन्पुनरेतत्कृतं तव । सभार्यस्य वनं भूयस्तद्विद्धि मनुजाधिप ॥

tataḥ prītena te rājanpunaretatkṛtaṃ tava | sabhāryasya vanaṃ bhūyastadviddhi manujādhipa

“तब, हे राजन्, प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारे लिए पत्नी सहित वह वन फिर रच दिया — यह जान लो, हे राजन्।”

श्लोक 26 (13.90.26)

प्रीत्यर्थं तव चैतन्मे स्वर्गसंदर्शनं कृतम् । यत्ते वनेऽस्मिन्नृपते दृष्टं दिव्यं सुदर्शनम् ॥

prītyarthaṃ tava caitanme svargasaṃdarśanaṃ kṛtam | yatte vane'sminnṛpate dṛṣṭaṃ divyaṃ sudarśanam

“तुम्हारी प्रसन्नता के लिए ही मैंने तुम्हें स्वर्ग का दर्शन कराया; इस वन में तुमने जो दिव्य, अद्भुत दृश्य देखा, वह वही था।”

श्लोक 27 (13.90.27)

स्वर्गोद्देशस्त्वया राजन्सशरीरेण पार्थिव । मुहूर्तमनुभूतोऽसौ सभार्येण नृपोत्तम ॥

svargoddeśastvayā rājansaśarīreṇa pārthiva | muhūrtamanubhūto'sau sabhāryeṇa nṛpottama

“हे राजन्, तुमने पत्नी सहित इसी शरीर से स्वर्ग के एक भाग का क्षण भर अनुभव किया।”

श्लोक 28 (13.90.28)

निदर्शनार्थं तपसो धर्मस्य च नराधिप । तत्र यासीत्स्पृहा राजंस्तच्चापि विदितं मया ॥

nidarśanārthaṃ tapaso dharmasya ca narādhipa | tatra yāsītspṛhā rājaṃstaccāpi viditaṃ mayā

“हे राजन्, यह तप और धर्म का प्रभाव दिखाने के लिए था। और वहाँ तुम्हारे मन में जो लालसा उठी, वह भी मैंने जान ली।”

श्लोक 29 (13.90.29)

ब्राह्मण्यं काङ्क्षसे हि त्वं तपश्च पृथिवीपते । अवमत्य नरेन्द्रत्वं देवेन्द्रत्वं च पार्थिव ॥

brāhmaṇyaṃ kāṅkṣase hi tvaṃ tapaśca pṛthivīpate | avamatya narendratvaṃ devendratvaṃ ca pārthiva

“हे राजन्, तुम राजत्व और इन्द्रपद को भी तुच्छ मानकर ब्राह्मणत्व और तप चाहते हो।”

श्लोक 30 (13.90.30)

एवमेतद्यथातत्वं ब्राह्मण्यं तात दुर्लभम् । ब्राह्मण्ये सति चर्षित्वमृषित्वे च तपस्विता ॥

evametadyathātatvaṃ brāhmaṇyaṃ tāta durlabham | brāhmaṇye sati carṣitvamṛṣitve ca tapasvitā

“हे तात, यह सच है कि ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। ब्राह्मणत्व हो तो ऋषित्व होता है, और ऋषित्व में तपस्विता।”

श्लोक 31 (13.90.31)

भविष्यत्येष ते कामः कुशिकात्कौशिको द्विजः ॥

bhaviṣyatyeṣa te kāmaḥ kuśikātkauśiko dvijaḥ

“तुम्हारी यह कामना पूरी होगी: कुशिक से कौशिक नाम का एक द्विज होगा।”

श्लोक 32 (13.90.32)

तृतीयं पुरुषं प्राप्य ब्राह्मणत्वं गमिष्यति । वंशस्ते पार्थिवश्रेष्ठ भृगूणामेव तेजसा ॥

tṛtīyaṃ puruṣaṃ prāpya brāhmaṇatvaṃ gamiṣyati | vaṃśaste pārthivaśreṣṭha bhṛgūṇāmeva tejasā

“तीसरी पीढ़ी को पाकर तुम्हारा वंश ब्राह्मणत्व को प्राप्त होगा, हे राजश्रेष्ठ — भृगुओं के ही तेज से।”

श्लोक 33 (13.90.33)

पौत्रस्ते भविता विप्रस्तपस्वी पावकद्युतिः । जमदग्नौ महाभाग तपसा भावितात्मनि ॥

pautraste bhavitā viprastapasvī pāvakadyutiḥ | jamadagnau mahābhāga tapasā bhāvitātmani

“तुम्हारा पौत्र ब्राह्मण, तपस्वी और अग्नि के समान दीप्तिमान होगा — जमदग्नि में, हे महाभाग, जिनकी आत्मा तप से परिपक्व है।”

श्लोक 34 (13.90.34)

यः स देवमनुष्याणां भयमुत्पादयिष्यति । त्रयाणामेव लोकानां सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

yaḥ sa devamanuṣyāṇāṃ bhayamutpādayiṣyati | trayāṇāmeva lokānāṃ satyametadbravīmi te

“वह देवताओं, मनुष्यों और तीनों लोकों में भय उत्पन्न करेगा — यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।”

श्लोक 35 (13.90.35)

वरं गृहाण राजर्षे यस्ते मनसि वर्तते । तीर्थयात्रां गमिष्यामि पुरा कालोऽतिवर्तते ॥

varaṃ gṛhāṇa rājarṣe yaste manasi vartate | tīrthayātrāṃ gamiṣyāmi purā kālo'tivartate

“हे राजर्षि, तुम्हारे मन में जो वर है, उसे माँग लो। मैं तीर्थयात्रा को जाऊँगा; समय बीता जा रहा है।”

कुशिक उवाच

श्लोक 36 (13.90.36)

एष एव वरो मेऽद्य यत्त्वं प्रीतो महामुने । भवत्वेतद्यथार्थत्वं भवेत्पौत्रो ममानघ ॥

eṣa eva varo me'dya yattvaṃ prīto mahāmune | bhavatvetadyathārthatvaṃ bhavetpautro mamānagha

“हे महामुने, आज यही मेरा वर है कि आप प्रसन्न हैं। हे निष्पाप, यह वैसा ही सिद्ध हो जैसा आपने कहा, और मेरा पौत्र हो।”

श्लोक 37 (13.90.37)

ब्राह्मण्यं मे कुलस्यास्तु भगवन्नेष मे वरः । पुनश्चाख्यातुमिच्छामि भगवन्विस्तरेण वै ॥

brāhmaṇyaṃ me kulasyāstu bhagavanneṣa me varaḥ | punaścākhyātumicchāmi bhagavanvistareṇa vai

“हे भगवन्, मेरे कुल को ब्राह्मणत्व मिले — यही मेरा वर है। और मैं यह फिर विस्तार से सुनना चाहता हूँ,”

श्लोक 38 (13.90.38)

कथमेष्यति विप्रत्वं कुलं मे भृगुनन्दन । कश्चासौ भविता बन्धुर्मम कश्चापि सम्मतः ॥

kathameṣyati vipratvaṃ kulaṃ me bhṛgunandana | kaścāsau bhavitā bandhurmama kaścāpi sammataḥ

“हे भृगुनन्दन, कि मेरे कुल को ब्राह्मणत्व कैसे मिलेगा; और वह बन्धु कौन होगा, तथा और कौन माननीय होगा।”

अध्याय 89अध्याय-सूचीअध्याय 91