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अनुशासन पर्व · अध्याय 91

परशुराम और विश्वामित्र के जन्म की भविष्यवाणी

च्यवन कुशिक को अपने आने का कारण बताते हैं: क्षत्रिय भृगुओं का वध करेंगे, उन्हीं के वंश में और्व जन्म लेंगे, और धनुर्वेद ऋचीक से जमदग्नि तक पहुँचेगा। ऋचीक के गाधि की पुत्री से विवाह द्वारा क्षत्रिय-स्वभाव वाले एक ब्राह्मण (राम) और ब्राह्मण-स्वभाव वाले एक क्षत्रिय विश्वामित्र का जन्म होगा, और तीसरी पीढ़ी में कुशिक का वंश ब्राह्मण हो जाएगा। कुशिक यह स्वीकार कर अपने कुल के ब्राह्मण और धर्मपरायण होने का वर माँगते हैं, च्यवन तीर्थयात्रा को चले जाते हैं, और भीष्म इस कथा का उपसंहार करते हैं।

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च्यवन उवाच

श्लोक 1 (13.91.1)

अवश्यं कथनीयं मे तवैतन्नरपुङ्गव । यदर्थं त्वाहमुच्छेत्तुं सम्प्राप्तो मनुजाधिप ॥

avaśyaṃ kathanīyaṃ me tavaitannarapuṅgava | yadarthaṃ tvāhamucchettuṃ samprāpto manujādhipa

“हे नरश्रेष्ठ, यह तुमसे अवश्य कहना है — जिस कारण मैं तुम्हारा उच्छेद करने आया था, हे राजन्।”

श्लोक 2 (13.91.2)

भृगूणां क्षत्रिया याज्या नित्यमेतज्जनाधिप । ते च भेदं गमिष्यन्ति दैवयुक्तेन हेतुना ॥

bhṛgūṇāṃ kṣatriyā yājyā nityametajjanādhipa | te ca bhedaṃ gamiṣyanti daivayuktena hetunā

“हे राजन्, भृगुओं के यजमान सदा क्षत्रिय रहे हैं; पर दैव-योग से उनके बीच फूट पड़ जाएगी।”

श्लोक 3 (13.91.3)

क्षत्रियाश्च भृगून्सर्वान्वधिष्यन्ति नराधिप । आगर्भादनुकृन्तन्तो दैवदण्डनिपीडिताः ॥

kṣatriyāśca bhṛgūnsarvānvadhiṣyanti narādhipa | āgarbhādanukṛntanto daivadaṇḍanipīḍitāḥ

“हे राजन्, दैव के दण्ड से पीड़ित क्षत्रिय सभी भृगुओं का वध करेंगे, गर्भ तक के शिशुओं को काट डालेंगे।”

श्लोक 4 (13.91.4)

तत उत्पत्स्यतेऽस्माकं कुले गोत्रविवर्धनः । और्वो नाम महातेजा ज्वलितार्कसमद्युतिः ॥

tata utpatsyate'smākaṃ kule gotravivardhanaḥ | aurvo nāma mahātejā jvalitārkasamadyutiḥ

“तब हमारे कुल में गोत्र को बढ़ाने वाला और्व नाम का महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा, जो जलते सूर्य के समान दीप्तिमान होगा।”

श्लोक 5 (13.91.5)

स त्रैलोक्यविनाशाय कोपाग्निं जनयिष्यति । महीं सपर्वतवनां यः करिष्यति भस्मसात् ॥

sa trailokyavināśāya kopāgniṃ janayiṣyati | mahīṃ saparvatavanāṃ yaḥ kariṣyati bhasmasāt

“वह तीनों लोकों के विनाश के लिए क्रोध की अग्नि उत्पन्न करेगा, जो पर्वतों और वनों सहित पृथ्वी को भस्म कर देगी।”

श्लोक 6 (13.91.6)

कञ्चित्कालं तु वह्निं च स एव शमयिष्यति । समुद्रे वडवावक्त्रे प्रक्षिप्य मुनिसत्तमः ॥

kañcitkālaṃ tu vahniṃ ca sa eva śamayiṣyati | samudre vaḍavāvaktre prakṣipya munisattamaḥ

“कुछ समय बाद वही मुनिश्रेष्ठ उस अग्नि को शान्त करेगा, उसे समुद्र में वड़वा के मुख में डालकर।”

श्लोक 7 (13.91.7)

पुत्रं तस्य महाराज ऋचीकं भृगुनन्दनम् । साक्षात्कृत्स्नो धनुर्वेदः समुपस्थास्यतेऽनघ ॥

putraṃ tasya mahārāja ṛcīkaṃ bhṛgunandanam | sākṣātkṛtsno dhanurvedaḥ samupasthāsyate'nagha

“हे महाराज, उसके पुत्र भृगुनन्दन ऋचीक के पास, हे निष्पाप, सम्पूर्ण धनुर्वेद स्वयं उपस्थित होगा।”

श्लोक 8 (13.91.8)

क्षत्रियाणामभावाय दैवयुक्तेन हेतुना । स तु तं प्रतिगृह्यैव पुत्रे संक्रामयिष्यति ॥

kṣatriyāṇāmabhāvāya daivayuktena hetunā | sa tu taṃ pratigṛhyaiva putre saṃkrāmayiṣyati

“क्षत्रियों के विनाश के लिए, दैव-योग से, वह उसे ग्रहण करके अपने पुत्र को सौंप देगा —”

श्लोक 9 (13.91.9)

जमदग्नौ महाभागे तपसा भावितात्मनि । स चापि भृगुशार्दूलस्तं वेदं धारयिष्यति ॥

jamadagnau mahābhāge tapasā bhāvitātmani | sa cāpi bhṛguśārdūlastaṃ vedaṃ dhārayiṣyati

“तप से शुद्धात्मा महाभाग जमदग्नि को; और वह भृगुश्रेष्ठ भी उस विद्या को धारण करेगा।”

श्लोक 10 (13.91.10)

कुलात्तु तव धर्मात्मन्कन्यां सोऽधिगमिष्यति । उद्भावनार्थं भवतो वंशस्य भरतर्षभ ॥

kulāttu tava dharmātmankanyāṃ so'dhigamiṣyati | udbhāvanārthaṃ bhavato vaṃśasya bharatarṣabha

“हे धर्मात्मन्, वह तुम्हारे कुल से एक कन्या को पत्नी रूप में प्राप्त करेगा, हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हारे वंश के अभ्युदय के लिए।”

श्लोक 11 (13.91.11)

क्षत्रहन्ता भवेद्धिंस्र इति दैवं सनातनम् । नारायणमुपास्यास्य वरात्तं पुत्रमृच्छति ॥

kṣatrahantā bhaveddhiṃsra iti daivaṃ sanātanam | nārāyaṇamupāsyāsya varāttaṃ putramṛcchati

“‘वह उग्र क्षत्रिय-संहारक हो’ — यह सनातन दैव-विधान है; नारायण की उपासना करके उन्हीं के वरदान से वह उस पुत्र को पाता है।”

श्लोक 12 (13.91.12)

गाधेर्दुहितरं प्राप्य पौत्रीं तव महातपाः । ब्राह्मणं क्षत्रधर्माणं पुत्रमुत्पादयिष्यति ॥

gādherduhitaraṃ prāpya pautrīṃ tava mahātapāḥ | brāhmaṇaṃ kṣatradharmāṇaṃ putramutpādayiṣyati

“तुम्हारी पौत्री, गाधि की पुत्री को पाकर वह महातपस्वी एक पुत्र उत्पन्न करेगा — ब्राह्मण होकर भी क्षत्रिय-धर्म वाला।”

श्लोक 13 (13.91.13)

क्षत्रियं विप्रधर्माणं बृहस्पतिमिवौजसा । विश्वामित्रं तव कुले गाधेः पुत्रं सुधार्मिकम् । तपसा महता युक्तं प्रदास्यति महाद्युते ॥

kṣatriyaṃ vipradharmāṇaṃ bṛhaspatimivaujasā | viśvāmitraṃ tava kule gādheḥ putraṃ sudhārmikam | tapasā mahatā yuktaṃ pradāsyati mahādyute

“और, हे महाद्युति, तुम्हारे कुल को वह गाधि का पुत्र विश्वामित्र देगा — क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण-धर्म वाला, तेज में बृहस्पति के समान, परम धार्मिक और महान् तप से युक्त।”

श्लोक 14 (13.91.14)

स्त्रियौ तु कारणं तत्र परिवर्ते भविष्यतः । पितामहनियोगाद्वै नान्यथैतद्भविष्यति ॥

striyau tu kāraṇaṃ tatra parivarte bhaviṣyataḥ | pitāmahaniyogādvai nānyathaitadbhaviṣyati

“उस अदला-बदली में दोनों स्त्रियाँ कारण बनेंगी; यह पितामह की आज्ञा से होगा, अन्यथा नहीं।”

श्लोक 15 (13.91.15)

तृतीये पुरुषे तुभ्यं ब्राह्मणत्वमुपैष्यति । भविता त्वं च सम्बन्धी भृगूणां भावितात्मनाम् ॥

tṛtīye puruṣe tubhyaṃ brāhmaṇatvamupaiṣyati | bhavitā tvaṃ ca sambandhī bhṛgūṇāṃ bhāvitātmanām

“तीसरी पीढ़ी में तुम्हारे वंश को ब्राह्मणत्व प्राप्त होगा, और तुम शुद्धात्मा भृगुओं के सम्बन्धी बनोगे।”

भीष्म उवाच

श्लोक 16 (13.91.16)

कुशिकस्तु मुनेर्वाक्यं च्यवनस्य महात्मनः । श्रुत्वा हृष्टोऽभवद्राजा वाक्यं चेदमुवाच ह । एवमस्त्विति धर्मात्मा तदा भरतसत्तम ॥

kuśikastu munervākyaṃ cyavanasya mahātmanaḥ | śrutvā hṛṣṭo'bhavadrājā vākyaṃ cedamuvāca ha | evamastviti dharmātmā tadā bharatasattama

महात्मा च्यवन मुनि के वचन सुनकर राजा कुशिक हर्षित हुआ और यह वचन बोला, “ऐसा ही हो” — हे भरतश्रेष्ठ, वह धर्मात्मा राजा तब ऐसा बोला।

श्लोक 17 (13.91.17)

च्यवनस्तु महातेजाः पुनरेव नराधिपम् । वरार्थं चोदयामास तमुवाच स पार्थिवः ॥

cyavanastu mahātejāḥ punareva narādhipam | varārthaṃ codayāmāsa tamuvāca sa pārthivaḥ

महातेजस्वी च्यवन ने फिर राजा को वर माँगने के लिए प्रेरित किया; तब उस राजा ने उनसे कहा।

कुशिक उवाच

श्लोक 18 (13.91.18)

बाढमेवं ग्रहीष्यामि कामांस्त्वत्तो महामुने । ब्रह्मभूतं कुलं मेऽस्तु धर्मे चास्य मनो भवेत् ॥

bāḍhamevaṃ grahīṣyāmi kāmāṃstvatto mahāmune | brahmabhūtaṃ kulaṃ me'stu dharme cāsya mano bhavet

“ठीक है, हे महामुनि, मैं आपसे अपनी कामना इस प्रकार ग्रहण करूँगा: मेरा कुल ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो और इसका मन धर्म में लगा रहे।”

भीष्म उवाच

श्लोक 19 (13.91.19)

एवमुक्तस्तथेत्येवं प्रत्युक्त्वा च्यवनो मुनिः । अभ्यनुज्ञाय नृपतिं तीर्थयात्रां ययौ तदा ॥

evamuktastathetyevaṃ pratyuktvā cyavano muniḥ | abhyanujñāya nṛpatiṃ tīrthayātrāṃ yayau tadā

ऐसा कहे जाने पर मुनि च्यवन ने “ऐसा ही हो” कहकर राजा को विदा किया और तब तीर्थयात्रा को चले गए।

श्लोक 20 (13.91.20)

एतत्ते कथितं सर्वमशेषेण मया नृप । भृगूणां कुशिकानां च अभिसम्बन्धकारणम् ॥

etatte kathitaṃ sarvamaśeṣeṇa mayā nṛpa | bhṛgūṇāṃ kuśikānāṃ ca abhisambandhakāraṇam

हे राजन्, भृगुओं और कुशिकों के पारस्परिक सम्बन्ध का यह सारा कारण मैंने तुम्हें पूरा बता दिया।

श्लोक 21 (13.91.21)

यथोक्तमृषिणा चापि तदा तदभवन्नृप । जन्म रामस्य च मुनेर्विश्वामित्रस्य चैव हि ॥

yathoktamṛṣiṇā cāpi tadā tadabhavannṛpa | janma rāmasya ca munerviśvāmitrasya caiva hi

और जैसा ऋषि ने कहा था, हे राजन्, वैसा ही हुआ — राम और मुनि विश्वामित्र का जन्म।

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