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अनुशासन पर्व · अध्याय 93

तालाब बनवाने और वृक्ष लगाने का फल

युधिष्ठिर पूछते हैं कि बाग़ लगाने और तालाब बनवाने का क्या फल है। भीष्म पृथ्वी की प्रशंसा करते हैं और तालाब की स्थापना को श्रेष्ठ बताते हैं, जो सब प्रकार के प्राणियों को आश्रय देता है; वे वर्ष की प्रत्येक ऋतु में जल रखनेवाले तालाब का फल अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध तक बताते हैं। फिर वे वनस्पतियों की छह जातियाँ गिनाते हैं और कहते हैं कि मनुष्य के लगाए वृक्ष उसके पुत्र बन जाते हैं, देवताओं, पितरों और अतिथियों का सत्कार करते हैं और परलोक में उसका उद्धार करते हैं; अन्त में वे तालाब बनवाने, बाग़ लगाने, यज्ञ करने और सदा सत्य बोलने का उपदेश देते हैं।

अध्याय 92अध्याय-सूचीअध्याय 94

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.93.1)

आरामाणां तटाकानां यत्फलं कुरुपुङ्गव । तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तोऽद्य भरतर्षभ ॥

ārāmāṇāṃ taṭākānāṃ yatphalaṃ kurupuṅgava | tadahaṃ śrotumicchāmi tvatto'dya bharatarṣabha

हे कुरुश्रेष्ठ, हे भरतर्षभ, बाग़ों और तालाबों के बनवाने का क्या फल है, यह मैं आज आपसे सुनना चाहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (13.93.2)

सुप्रदर्शा बलवती चित्रा धातुविभूषिता । उपेता सर्वभूतैश्च श्रेष्ठा भूमिरिहोच्यते ॥

supradarśā balavatī citrā dhātuvibhūṣitā | upetā sarvabhūtaiśca śreṣṭhā bhūmirihocyate

यहाँ पृथ्वी को सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है: वह सुन्दर दीखनेवाली, बलवती, विचित्र, धातुओं से विभूषित और सब प्राणियों से युक्त है।

श्लोक 3 (13.93.3)

तस्याः क्षेत्रविशेषाश्च तटाकानां च बन्धनम् । औदकानि च सर्वाणि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥

tasyāḥ kṣetraviśeṣāśca taṭākānāṃ ca bandhanam | audakāni ca sarvāṇi pravakṣyāmyanupūrvaśaḥ

मैं तुम्हें क्रम से बताऊँगा कि तालाबों के लिए कौन-सी भूमि विशेष उपयुक्त है, तालाबों के बाँध कैसे बनते हैं, और जल से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातें।

श्लोक 4 (13.93.4)

तटाकानां च वक्ष्यामि कृतानां चापि ये गुणाः । त्रिषु लोकेषु सर्वत्र पूजनीयस्तटाकवान् ॥

taṭākānāṃ ca vakṣyāmi kṛtānāṃ cāpi ye guṇāḥ | triṣu lokeṣu sarvatra pūjanīyastaṭākavān

मैं तालाबों के और बनवाए हुए तालाबों के जो गुण हैं, वे भी बताऊँगा; जिसके पास तालाब है, वह तीनों लोकों में सर्वत्र पूजनीय होता है।

श्लोक 5 (13.93.5)

अथवा मित्रसदनं मैत्रं मित्रविवर्धनम् । कीर्तिसंजननं श्रेष्ठं तटाकानां निवेशनम् ॥

athavā mitrasadanaṃ maitraṃ mitravivardhanam | kīrtisaṃjananaṃ śreṣṭhaṃ taṭākānāṃ niveśanam

तालाबों की स्थापना श्रेष्ठ कर्म है: वह मित्रों का आश्रय है, मित्र (सूर्य) को प्रिय है, मित्रता को बढ़ानेवाला है और कीर्ति को जन्म देनेवाला है।

श्लोक 6 (13.93.6)

धर्मस्यार्थस्य कामस्य फलमाहुर्मनीषिणः । तटाकसुकृतं देशे क्षेत्रमेकं महाश्रयम् ॥

dharmasyārthasya kāmasya phalamāhurmanīṣiṇaḥ | taṭākasukṛtaṃ deśe kṣetramekaṃ mahāśrayam

मनीषी कहते हैं कि किसी प्रदेश में भली-भाँति बना हुआ तालाब धर्म, अर्थ और काम तीनों का फल देता है; वह अकेला ही महान् आश्रय है।

श्लोक 7 (13.93.7)

चतुर्विधानां भूतानां तटाकमुपलक्षयेत् । तटाकानि च सर्वाणि दिशन्ति श्रियमुत्तमाम् ॥

caturvidhānāṃ bhūtānāṃ taṭākamupalakṣayet | taṭākāni ca sarvāṇi diśanti śriyamuttamām

तालाब को चारों प्रकार के प्राणियों के काम आनेवाला समझना चाहिए; सभी तालाब उत्तम श्री प्रदान करते हैं।

श्लोक 8 (13.93.8)

देवा मनुष्यगन्धर्वाः पितरोरगराक्षसाः । स्थावराणि च भूतानि संश्रयन्ति जलाशयम् ॥

devā manuṣyagandharvāḥ pitaroragarākṣasāḥ | sthāvarāṇi ca bhūtāni saṃśrayanti jalāśayam

देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस और सब स्थावर प्राणी जलाशय का आश्रय लेते हैं।

श्लोक 9 (13.93.9)

तस्मात्तांस्ते प्रवक्ष्यामि तटाके ये गुणाः स्मृताः । या च तत्र फलावाप्तिर्ऋषिभिः समुदाहृताः ॥

tasmāttāṃste pravakṣyāmi taṭāke ye guṇāḥ smṛtāḥ | yā ca tatra phalāvāptirṛṣibhiḥ samudāhṛtāḥ

इसलिए मैं तुम्हें बताऊँगा कि तालाब के कौन-से गुण माने गए हैं और उसके विषय में ऋषियों ने कौन-सा फल बताया है।

श्लोक 10 (13.93.10)

वर्षाकाले तटाके तु सलिलं यस्य तिष्ठति । अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिणः ॥

varṣākāle taṭāke tu salilaṃ yasya tiṣṭhati | agnihotraphalaṃ tasya phalamāhurmanīṣiṇaḥ

जिसके तालाब में वर्षा ऋतु में जल बना रहता है, उसे अग्निहोत्र का फल मिलता है, ऐसा मनीषी कहते हैं।

श्लोक 11 (13.93.11)

शरत्काले तु सलिलं तटाके यस्य तिष्ठति । गोसहस्रस्य स प्रेत्य लभते फलमुत्तमम् ॥

śaratkāle tu salilaṃ taṭāke yasya tiṣṭhati | gosahasrasya sa pretya labhate phalamuttamam

जिसके तालाब में शरद ऋतु में जल बना रहता है, वह मरने के बाद एक हजार गौओं के दान का उत्तम फल पाता है।

श्लोक 12 (13.93.12)

हेमन्तकाले सलिलं तटाके यस्य तिष्ठति । स वै बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते फलम् ॥

hemantakāle salilaṃ taṭāke yasya tiṣṭhati | sa vai bahusuvarṇasya yajñasya labhate phalam

जिसके तालाब में हेमन्त ऋतु में जल बना रहता है, वह बहुत सोने की दक्षिणा वाले यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 13 (13.93.13)

यस्य वै शैशिरे काले तटाके सलिलं भवेत् । तस्याग्निष्टोमयज्ञस्य फलमाहुर्मनीषिणः ॥

yasya vai śaiśire kāle taṭāke salilaṃ bhavet | tasyāgniṣṭomayajñasya phalamāhurmanīṣiṇaḥ

जिसके तालाब में शिशिर ऋतु में जल रहता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है, ऐसा मनीषी कहते हैं।

श्लोक 14 (13.93.14)

तटाकं सुकृतं यस्य वसन्ते तु महाश्रयम् । अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं स समुपाश्नुते ॥

taṭākaṃ sukṛtaṃ yasya vasante tu mahāśrayam | atirātrasya yajñasya phalaṃ sa samupāśnute

जिसका भली-भाँति बना हुआ महान् आश्रय रूप तालाब वसन्त ऋतु में भी जलवाला रहता है, वह अतिरात्र यज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 15 (13.93.15)

निदाघकाले पानीयं तटाके यस्य तिष्ठति । वाजिमेधफलं तस्य फलं वै मुनयो विदुः ॥

nidāghakāle pānīyaṃ taṭāke yasya tiṣṭhati | vājimedhaphalaṃ tasya phalaṃ vai munayo viduḥ

जिसके तालाब में ग्रीष्म ऋतु में पीने का जल रहता है, उसे अश्वमेध का फल मिलता है, ऐसा मुनि जानते हैं।

श्लोक 16 (13.93.16)

स कुलं तारयेत्सर्वं यस्य खाते जलाशये । गावः पिबन्ति सलिलं साधवश्च नराः सदा ॥

sa kulaṃ tārayetsarvaṃ yasya khāte jalāśaye | gāvaḥ pibanti salilaṃ sādhavaśca narāḥ sadā

जिसके खुदवाए हुए जलाशय में गौएँ और सज्जन सदा जल पीते हैं, वह अपने सारे कुल को तार देता है।

श्लोक 17 (13.93.17)

तटाके यस्य गावस्तु पिबन्ति तृषिता जलम् । मृगपक्षिमनुष्याश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत ॥

taṭāke yasya gāvastu pibanti tṛṣitā jalam | mṛgapakṣimanuṣyāśca so'śvamedhaphalaṃ labheta

जिसके तालाब में प्यासी गौएँ, मृग, पक्षी और मनुष्य जल पीते हैं, वह अश्वमेध का फल पाता है।

श्लोक 18 (13.93.18)

यत्पिबन्ति जलं तत्र स्नायन्ते विश्रमन्ति च । तटाके यस्य तत्सर्वं प्रेत्यानन्त्याय कल्पते ॥

yatpibanti jalaṃ tatra snāyante viśramanti ca | taṭāke yasya tatsarvaṃ pretyānantyāya kalpate

वहाँ जो जल पिया जाता है, जो स्नान और विश्राम होता है, वह सब तालाब के स्वामी के लिए परलोक में अनन्त फल देनेवाला होता है।

श्लोक 19 (13.93.19)

दुर्लभं सलिलं तात विशेषेण परत्र वै । पानीयस्य प्रदानेन प्रीतिर्भवति शाश्वती ॥

durlabhaṃ salilaṃ tāta viśeṣeṇa paratra vai | pānīyasya pradānena prītirbhavati śāśvatī

हे तात, जल दुर्लभ है, विशेषकर परलोक में; जल का दान करने से स्थायी प्रीति प्राप्त होती है।

श्लोक 20 (13.93.20)

तिलान्ददत पानीयं दीपान्ददत जागृत । ज्ञातिभिः सह मोदध्वमेतत्प्रेत्य सुदुर्लभम् ॥

tilāndadata pānīyaṃ dīpāndadata jāgṛta | jñātibhiḥ saha modadhvametatpretya sudurlabham

तिल और जल दो, दीपक दो और सावधान रहो; अपने जाति-बन्धुओं के साथ आनन्द करो, क्योंकि मरने के बाद यह अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 21 (13.93.21)

सर्वदानैर्गुरुतरं सर्वदानैर्विशिष्यते । पानीयं नरशार्दूल तस्माद्दातव्यमेव हि ॥

sarvadānairgurutaraṃ sarvadānairviśiṣyate | pānīyaṃ naraśārdūla tasmāddātavyameva hi

हे नरशार्दूल, जल सब दानों से भारी है और सब दानों से श्रेष्ठ है; इसलिए उसका दान अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 22 (13.93.22)

एवमेतत्तटाकस्य कीर्तितं फलमुत्तमम् । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वृक्षाणामवरोपणम् ॥

evametattaṭākasya kīrtitaṃ phalamuttamam | ata ūrdhvaṃ pravakṣyāmi vṛkṣāṇāmavaropaṇam

इस प्रकार तालाबों का उत्तम फल बताया गया। अब आगे मैं वृक्षों के रोपने के विषय में कहूँगा।

श्लोक 23 (13.93.23)

स्थावराणां च भूतानां जातयः षट् प्रकीर्तिताः । वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातयः ॥

sthāvarāṇāṃ ca bhūtānāṃ jātayaḥ ṣaṭ prakīrtitāḥ | vṛkṣagulmalatāvallyastvaksārāstṛṇajātayaḥ

स्थावर प्राणियों की छह जातियाँ बताई गई हैं: वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार और तृण।

श्लोक 24 (13.93.24)

एता जात्यस्तु वृक्षाणां तेषां रोपे गुणास्त्विमे । कीर्तिश्च मानुषे लोके प्रेत्य चैव फलं शुभम् ॥

etā jātyastu vṛkṣāṇāṃ teṣāṃ rope guṇāstvime | kīrtiśca mānuṣe loke pretya caiva phalaṃ śubham

ये वृक्षों की जातियाँ हैं और इनके रोपने में ये गुण हैं: मनुष्यलोक में कीर्ति और मरने के बाद शुभ फल।

श्लोक 25 (13.93.25)

लभते नाम लोके च पितृभिश्च महीयते । देवलोके गतस्यापि नाम तस्य न नश्यति ॥

labhate nāma loke ca pitṛbhiśca mahīyate | devaloke gatasyāpi nāma tasya na naśyati

वह लोक में नाम पाता है और पितरों के साथ सम्मानित होता है; देवलोक में चले जाने पर भी उसका नाम नष्ट नहीं होता।

श्लोक 26 (13.93.26)

अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत । तारयेद्वृक्षरोपी च तस्माद्वृक्षांश्च रोपयेत् ॥

atītānāgate cobhe pitṛvaṃśaṃ ca bhārata | tārayedvṛkṣaropī ca tasmādvṛkṣāṃśca ropayet

हे भारत, वृक्ष लगानेवाला अतीत और भविष्य की पीढ़ियों को और पितृ-वंश को भी तार देता है; इसलिए वृक्ष अवश्य लगाने चाहिए।

श्लोक 27 (13.93.27)

तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः । परलोकगतः स्वर्गं लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ॥

tasya putrā bhavantyete pādapā nātra saṃśayaḥ | paralokagataḥ svargaṃ lokāṃścāpnoti so'vyayān

ये वृक्ष उसके पुत्र हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं; परलोक जाकर वह स्वर्ग और अविनाशी लोकों को पाता है।

श्लोक 28 (13.93.28)

पुष्पैः सुरगणान्वृक्षाः फलैश्चापि तथा पितॄन् । छायया चातिथिं तात पूजयन्ति महीरुहाः ॥

puṣpaiḥ suragaṇānvṛkṣāḥ phalaiścāpi tathā pitṝn | chāyayā cātithiṃ tāta pūjayanti mahīruhāḥ

हे तात, वृक्ष फूलों से देवगणों का, फलों से पितरों का और छाया से अतिथि का सत्कार करते हैं।

श्लोक 29 (13.93.29)

किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवाः । तथा ऋषिगणाश्चैव संश्रयन्ति महीरुहान् ॥

kinnaroragarakṣāṃsi devagandharvamānavāḥ | tathā ṛṣigaṇāścaiva saṃśrayanti mahīruhān

किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, गन्धर्व, मनुष्य और ऋषिगण, सब वृक्षों का आश्रय लेते हैं।

श्लोक 30 (13.93.30)

पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् । वृक्षदं पुत्रवद्वृक्षास्तारयन्ति परत्र तु ॥

puṣpitāḥ phalavantaśca tarpayantīha mānavān | vṛkṣadaṃ putravadvṛkṣāstārayanti paratra tu

फूलों और फलों से लदे वृक्ष यहाँ मनुष्यों को तृप्त करते हैं; वृक्ष देनेवाले को वे पुत्र की भाँति परलोक में तार देते हैं।

श्लोक 31 (13.93.31)

तस्मात्तटाके सद्वृक्षा रोप्याः श्रेयोर्थिना सदा । पुत्रवत्परिपाल्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ॥

tasmāttaṭāke sadvṛkṣā ropyāḥ śreyorthinā sadā | putravatparipālyāśca putrāste dharmataḥ smṛtāḥ

इसलिए कल्याण चाहनेवाले को तालाब के पास सदा उत्तम वृक्ष लगाने चाहिए और पुत्रों की भाँति उनका पालन करना चाहिए; धर्म के अनुसार वे उसके पुत्र माने गए हैं।

श्लोक 32 (13.93.32)

तटाककृद्वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः । एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः ॥

taṭākakṛdvṛkṣaropī iṣṭayajñaśca yo dvijaḥ | ete svarge mahīyante ye cānye satyavādinaḥ

तालाब बनवानेवाला, वृक्ष लगानेवाला और यज्ञ करनेवाला द्विज स्वर्ग में सम्मानित होते हैं, और उनके साथ वे भी जो सत्य बोलते हैं।

श्लोक 33 (13.93.33)

तस्मात्तटाकं कुर्वीत आरामांश्चैव रोपयेत् । यजेच्च विविधैर्यज्ञैः सत्यं च सततं वदेत् ॥

tasmāttaṭākaṃ kurvīta ārāmāṃścaiva ropayet | yajecca vividhairyajñaiḥ satyaṃ ca satataṃ vadet

इसलिए तालाब बनवाना चाहिए, बाग़ लगाने चाहिए, अनेक प्रकार के यज्ञ करने चाहिए और सदा सत्य बोलना चाहिए।

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