आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 115
वैतरणी नदी और सागर-तट की वेदी
कौशिकी से चलकर युधिष्ठिर गंगा-सागर संगम पर स्नान करते हैं और समुद्र के किनारे-किनारे कलिंग देश पहुँचते हैं। लोमश उन्हें वैतरणी नदी दिखाते हैं, जहाँ कभी रुद्र ने यज्ञ-पशु छीन लिया था और देवताओं ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ भाग देकर प्रसन्न किया था; वहाँ स्नान करके युधिष्ठिर दूर के मुनियों का जप सुनते हैं। फिर लोमश बताते हैं कि विश्वकर्मा द्वारा कश्यप को दान की गई पृथ्वी रोष में डूब गई और फिर समुद्र-तट पर वेदी बनकर उभरी; स्वस्त्ययन और आवश्यक मन्त्रों के बाद युधिष्ठिर सागर पर जाते हैं और महेन्द्र पर्वत पर रात बिताते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.115.1)
ततः प्रयातः कौशिक्याः पाण्डवो जनमेजय । आनुपूर्व्येण सर्वाणि जगामायतनान्यथ ॥
tataḥ prayātaḥ kauśikyāḥ pāṇḍavo janamejaya | ānupūrvyeṇa sarvāṇi jagāmāyatanānyatha
हे जनमेजय, तब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर कौशिकी से चले और क्रमशः सभी पवित्र स्थानों पर गए।
श्लोक 2 (3.115.2)
स सागरं समासाद्य गङ्गायाः संगमे नृप । नदीशतानां पञ्चानां मध्ये चक्रे समाप्लवम् ॥
sa sāgaraṃ samāsādya gaṅgāyāḥ saṃgame nṛpa | nadīśatānāṃ pañcānāṃ madhye cakre samāplavam
हे राजन्, गंगा के संगम पर समुद्र तक पहुँचकर उन्होंने पाँच सौ नदियों के बीच स्नान किया।
श्लोक 3 (3.115.3)
ततः समुद्रतीरेण जगाम वसुधाधिपः । भ्रातृभिः सहितो वीरः कलिङ्गान्प्रति भारत ॥
tataḥ samudratīreṇa jagāma vasudhādhipaḥ | bhrātṛbhiḥ sahito vīraḥ kaliṅgānprati bhārata
हे भारत, फिर वह वीर पृथ्वीपति अपने भाइयों के साथ समुद्र के किनारे-किनारे कलिंग देश की ओर गए।
लोमश उवाच
श्लोक 4 (3.115.4)
एते कलिङ्गाः कौन्तेय यत्र वैतरणी नदी । यत्रायजत धर्मोपि देवाञ्शरणमेत्य वै ॥
ete kaliṅgāḥ kaunteya yatra vaitaraṇī nadī | yatrāyajata dharmopi devāñśaraṇametya vai
हे कुन्तीपुत्र, यह कलिंग देश है, जहाँ वैतरणी नदी बहती है, और जहाँ स्वयं धर्म ने भी देवताओं की शरण लेकर यज्ञ किया था।
श्लोक 5 (3.115.5)
ऋषिभिः समुपायुक्तं यज्ञियं गिरिशोभितम् । उत्तरं तीरमेतद्धि सततं द्विजसेवितम् ॥
ṛṣibhiḥ samupāyuktaṃ yajñiyaṃ giriśobhitam | uttaraṃ tīrametaddhi satataṃ dvijasevitam
ऋषियों से सेवित, यज्ञ के योग्य और पर्वतों से सुशोभित यह उत्तरी तट सदा ब्राह्मणों से भरा रहता है।
श्लोक 6 (3.115.6)
समेन देवयानेन पथा स्वर्गमुपेयुषः । अत्रवै ऋषयोऽन्येऽपि पुरा क्रतुभिरीजिरे ॥
samena devayānena pathā svargamupeyuṣaḥ | atravai ṛṣayo'nye'pi purā kratubhirījire
यहीं प्राचीन काल में दूसरे ऋषियों ने भी यज्ञ किए थे, और वे देवयान के समतल मार्ग से स्वर्ग गए।
श्लोक 7 (3.115.7)
अत्रैव रुद्रो राजेन्द्र पशुमादत्तवान्मखे । पशुमादाय राजेन्द्र भागोयमिति चाब्रवीत् ॥
atraiva rudro rājendra paśumādattavānmakhe | paśumādāya rājendra bhāgoyamiti cābravīt
हे राजेन्द्र, यहीं रुद्र ने एक यज्ञ में बलि-पशु को उठा लिया था; और पशु को लेकर, हे राजन्, उन्होंने कहा — "यह मेरा भाग है।"
श्लोक 8 (3.115.8)
हृते पशौ तदा देवास्तमूचुर्भरतर्षभ । मा परस्वमभिद्रोग्धा माधर्म्यान्नीनशः पथः ॥
hṛte paśau tadā devāstamūcurbharatarṣabha | mā parasvamabhidrogdhā mādharmyānnīnaśaḥ pathaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, पशु के छिन जाने पर देवताओं ने उनसे कहा — "दूसरे की वस्तु का लोभ मत कीजिए; धर्म के मार्गों को नष्ट मत कीजिए।
देवा ऊचुः
श्लोक 9 (3.115.9)
स्वयं यज्ञेश्वरो भूत्वा कर्मणां फलदायकः । यज्ञं विहन्तुं भगवान्नार्हसे जगदीश्वर ॥
svayaṃ yajñeśvaro bhūtvā karmaṇāṃ phaladāyakaḥ | yajñaṃ vihantuṃ bhagavānnārhase jagadīśvara
"आप स्वयं यज्ञों के स्वामी और कर्मों का फल देने वाले हैं; हे भगवन्, हे जगदीश्वर, आपको यज्ञ का नाश नहीं करना चाहिए।"
लोमश उवाच
श्लोक 10 (3.115.10)
इतिकल्याणरूपाभिर्वाग्भिस्ते रुद्रमस्तुवन् । इष्ट्या चैनं तर्पयित्वा मानयांचक्रिरे तदा ॥
itikalyāṇarūpābhirvāgbhiste rudramastuvan | iṣṭyā cainaṃ tarpayitvā mānayāṃcakrire tadā
ऐसे मंगलमय वचनों से उन्होंने रुद्र की स्तुति की, और यज्ञ-भाग से उन्हें तृप्त करके तब उनका सम्मान किया।
श्लोक 11 (3.115.11)
ततः स पशुमुत्सृज्य देवयानेन जग्मिवान् । तत्रानुवंशो रुद्रस्यतं निबोध युधिष्ठिर ॥
tataḥ sa paśumutsṛjya devayānena jagmivān | tatrānuvaṃśo rudrasyataṃ nibodha yudhiṣṭhira
तब वे पशु को छोड़कर देवयान मार्ग से चले गए। हे युधिष्ठिर, यहाँ रुद्र के विषय में जो परम्परागत श्लोक है, उसे सुनो —
श्लोक 12 (3.115.12)
अयातयामं सर्वेभ्यो भागेभ्यो भागमुत्तमम् । देवाः संकल्पयामासुर्भयाद्रुद्रस्य शाश्वतम् ॥
ayātayāmaṃ sarvebhyo bhāgebhyo bhāgamuttamam | devāḥ saṃkalpayāmāsurbhayādrudrasya śāśvatam
"रुद्र के भय से देवताओं ने सब भागों में से उत्तम और सदा ताज़ा रहने वाला भाग उनके लिए सदा के लिए निश्चित कर दिया।"
श्लोक 13 (3.115.13)
इमां गाथामत्र गायन्नपः स्पृशति यो नरः । देवयानोऽस्य पन्थाश्च चक्षुषाऽभिप्रकाशते ॥
imāṃ gāthāmatra gāyannapaḥ spṛśati yo naraḥ | devayāno'sya panthāśca cakṣuṣā'bhiprakāśate
जो मनुष्य यहाँ यह गाथा गाते हुए जल का स्पर्श करता है, उसकी आँखों के सामने देवयान मार्ग प्रकाशित हो उठता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (3.115.14)
ततो वैतरणीं सर्वे पाण्डवा द्रौपदी तथा । अवतीर्य महाभागास्तर्पयांचक्रिरे पितृन् ॥
tato vaitaraṇīṃ sarve pāṇḍavā draupadī tathā | avatīrya mahābhāgāstarpayāṃcakrire pitṛn
तब सब महाभाग पाण्डवों ने और द्रौपदी ने भी वैतरणी में उतरकर पितरों का तर्पण किया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 15 (3.115.15)
उपस्पृश्येह विधिवदस्यां नद्यां तपोबलात् । मानुषादस्मि विषयादपेतः पश्य लोमश ॥
upaspṛśyeha vidhivadasyāṃ nadyāṃ tapobalāt | mānuṣādasmi viṣayādapetaḥ paśya lomaśa
इस नदी में विधिपूर्वक आचमन करके तप के बल से मैं मनुष्य-लोक के विषयों से परे हो गया हूँ। देखिए, लोमश!
श्लोक 16 (3.115.16)
सर्वाल्लोँकान्प्रपश्यामि प्रसादात्तव सुव्रत । वैखानसानां जपतामेष शब्दो महात्मनाम् ॥
sarvāllom̐kānprapaśyāmi prasādāttava suvrata | vaikhānasānāṃ japatāmeṣa śabdo mahātmanām
हे सुव्रत, आपकी कृपा से मैं सब लोकों को देख रहा हूँ। यह जप करते हुए महात्मा वैखानस मुनियों का शब्द है।
लोमश उवाच
श्लोक 17 (3.115.17)
त्रिशतं वै सहस्राणि योजनानां युधिष्ठिर । यत्रध्वनिं शृणोष्येनं तूष्णीमास्स्व विशांपते ॥
triśataṃ vai sahasrāṇi yojanānāṃ yudhiṣṭhira | yatradhvaniṃ śṛṇoṣyenaṃ tūṣṇīmāssva viśāṃpate
हे युधिष्ठिर, जिस स्थान की यह ध्वनि तुम सुन रहे हो, वह तीन लाख योजन दूर है। हे प्रजापालक, शान्त रहो।
श्लोक 18 (3.115.18)
एतत्स्वयंभुवो राजन्वनं दिव्यं प्रकाशते । यत्रायजत राजेन्द्र विश्वकर्मा प्रतापवान् ॥
etatsvayaṃbhuvo rājanvanaṃ divyaṃ prakāśate | yatrāyajata rājendra viśvakarmā pratāpavān
हे राजन्, यह स्वयम्भू का दिव्य वन प्रकाशित है, जहाँ, हे राजेन्द्र, प्रतापी विश्वकर्मा ने यज्ञ किया था।
श्लोक 19 (3.115.19)
यस्मिन्यज्ञे हि भूर्दत्ता कश्यपाय महात्मने । सपर्वतवनोद्देशा दक्षिणार्थे स्वयंभुवा ॥
yasminyajñe hi bhūrdattā kaśyapāya mahātmane | saparvatavanoddeśā dakṣiṇārthe svayaṃbhuvā
उस यज्ञ में स्वयम्भू ने पर्वतों और वनों सहित पृथ्वी दक्षिणा के रूप में महात्मा कश्यप को दे दी।
श्लोक 20 (3.115.20)
अवासीदच्च कौन्तेय दत्तमात्रा मही तदा । उवाच चापि कुपिता लोकेश्वरमिदं प्रभुम् ॥
avāsīdacca kaunteya dattamātrā mahī tadā | uvāca cāpi kupitā lokeśvaramidaṃ prabhum
हे कुन्तीपुत्र, दान किए जाते ही पृथ्वी उदास होकर धँसने लगी, और कुपित होकर उसने लोकों के स्वामी प्रभु से यह कहा —
पृथिव्युवाच
श्लोक 21 (3.115.21)
न मां मर्त्याय भगवन्कस्मैचिद्दातुमर्हसि । प्रदानं मोघमेतत्ते यास्याम्येषा रसातलम् ॥
na māṃ martyāya bhagavankasmaiciddātumarhasi | pradānaṃ moghametatte yāsyāmyeṣā rasātalam
"हे भगवन्, आपको मुझे किसी मनुष्य को नहीं देना चाहिए। आपका यह दान व्यर्थ है; मैं रसातल को चली जाऊँगी।"
लोमश उवाच
श्लोक 22 (3.115.22)
विषीदन्तीं तु तां दृष्ट्वा कश्यपो भगवानृषिः । प्रसादयांबभूवाथ ततो भूमिं विशांपते ॥
viṣīdantīṃ tu tāṃ dṛṣṭvā kaśyapo bhagavānṛṣiḥ | prasādayāṃbabhūvātha tato bhūmiṃ viśāṃpate
हे प्रजानाथ, उसे दुःखी देखकर भगवान् कश्यप ऋषि ने तब पृथ्वी को प्रसन्न किया।
श्लोक 23 (3.115.23)
ततः प्रसन्ना पृथिवी तपसा तस्य पाण्डव । पुनरुन्नह्य सलिलाद्वेदीरूपास्थिता बभौ ॥
tataḥ prasannā pṛthivī tapasā tasya pāṇḍava | punarunnahya salilādvedīrūpāsthitā babhau
हे पाण्डुनन्दन, तब उसके तप से प्रसन्न होकर पृथ्वी फिर जल से ऊपर उठी और वेदी के रूप में स्थित होकर शोभा पाने लगी।
श्लोक 24 (3.115.24)
सैषा प्रकाशते राजन्वेदीसंस्थानलक्षणा । आरुह्यात्र महाराज वीर्यवान्वै भविष्यसि ॥
saiṣā prakāśate rājanvedīsaṃsthānalakṣaṇā | āruhyātra mahārāja vīryavānvai bhaviṣyasi
हे राजन्, यही वह वेदी के आकार वाली भूमि प्रकाशित है। महाराज, इस पर चढ़कर तुम पराक्रमी बनोगे।
श्लोक 25 (3.115.25)
सैषा सागरमासाद्य राजन्वेदी समाश्रिता । एतामारुह्य भद्रं ते त्वमेकस्तर सागरम् ॥
saiṣā sāgaramāsādya rājanvedī samāśritā | etāmāruhya bhadraṃ te tvamekastara sāgaram
हे राजन्, यह वेदी सागर तक पहुँचकर उसी पर टिकी है। तुम्हारा कल्याण हो — इस पर चढ़कर तुम अकेले सागर को पार करो।
श्लोक 26 (3.115.26)
अहं च ते स्वस्त्ययनं प्रयोक्ष्ये । यथा त्वमेनामधिरोहसेऽद्य । स्पृष्टा हि मर्त्येन ततः समुद्र- । मेषा वेदी प्रविशत्याजमीढ ॥
ahaṃ ca te svastyayanaṃ prayokṣye | yathā tvamenāmadhirohase'dya | spṛṣṭā hi martyena tataḥ samudra- | meṣā vedī praviśatyājamīḍha
और मैं तुम्हारे लिए स्वस्त्ययन करूँगा, जिससे तुम आज इस पर चढ़ सको; क्योंकि हे अजमीढवंशी, मनुष्य के छू लेने पर यह वेदी समुद्र में समा जाती है।
श्लोक 27 (3.115.27)
ओंनमो विश्वगुप्ताय नमो विश्वपराय ते । सान्निध्यं कुरु देवेश सागरे लवणाम्भसि ॥
oṃnamo viśvaguptāya namo viśvaparāya te | sānnidhyaṃ kuru deveśa sāgare lavaṇāmbhasi
"ॐ, उन्हें नमस्कार जिनमें यह विश्व छिपा है; विश्व से परे आपको नमस्कार। हे देवेश, खारे जल वाले इस सागर में आप उपस्थित हों।"
श्लोक 28 (3.115.28)
अग्निर्मित्रो योनिरापोऽथ देव्यो । विष्णो रेतस्त्वममृतस्य नाभिः । एवं ब्रुवन्पाण्डव सत्यवाक्यं । वेदीमिमां त्वं तरसाऽधिरोह ॥
agnirmitro yonirāpo'tha devyo | viṣṇo retastvamamṛtasya nābhiḥ | evaṃ bruvanpāṇḍava satyavākyaṃ | vedīmimāṃ tvaṃ tarasā'dhiroha
"अग्नि और मित्र तुम्हारे उत्पत्ति-स्थान हैं, और जल तथा देवियाँ भी; तुम विष्णु का तेज और अमृत की नाभि हो।" हे पाण्डुनन्दन, यह सत्य वचन बोलते हुए तुम शीघ्र इस वेदी पर चढ़ जाओ।
श्लोक 29 (3.115.29)
अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो । रेतोधा विष्णोरमृतस्य नाभिः । एवं ब्रुवन्पाण्डव सत्यवाक्यं । ततोऽवगाहेत पतिं नदीनाम् ॥
agniśca te yoniriḍā ca deho | retodhā viṣṇoramṛtasya nābhiḥ | evaṃ bruvanpāṇḍava satyavākyaṃ | tato'vagāheta patiṃ nadīnām
"अग्नि तुम्हारा उत्पत्ति-स्थान है और इडा तुम्हारा शरीर; तुम विष्णु के तेज को धारण करने वाले और अमृत की नाभि हो।" हे पाण्डुनन्दन, यह सत्य वचन बोलते हुए तब नदियों के स्वामी सागर में स्नान करना चाहिए।
श्लोक 30 (3.115.30)
अन्यथा हि कुरुश्रेष्ठ देवयोनिरपांपतिः । कुशाग्रेणापि कौन्तेय न स्प्रष्टव्यो महोदधिः ॥
anyathā hi kuruśreṣṭha devayonirapāṃpatiḥ | kuśāgreṇāpi kaunteya na spraṣṭavyo mahodadhiḥ
अन्यथा, हे कुरुश्रेष्ठ, हे कुन्तीपुत्र, देवताओं से उत्पन्न जल के स्वामी इस महासागर को कुश की नोक से भी नहीं छूना चाहिए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 31 (3.115.31)
ततः कृतस्वस्त्ययनो महात्मा । युधिष्ठिरः सागरमभ्यगच्छत् । कृत्वा च तच्छासनमस्य सर्वं । महेन्द्रमासाद्य निशामुवास ॥
tataḥ kṛtasvastyayano mahātmā | yudhiṣṭhiraḥ sāgaramabhyagacchat | kṛtvā ca tacchāsanamasya sarvaṃ | mahendramāsādya niśāmuvāsa
तब स्वस्त्ययन हो जाने पर महात्मा युधिष्ठिर सागर पर गए; और लोमश के सारे निर्देशों का पालन करके महेन्द्र पर्वत पर पहुँचकर उन्होंने वहाँ रात बिताई।