आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 116
सहस्र अश्वों का कन्या-शुल्क और जमदग्नि का जन्म
युधिष्ठिर महेन्द्र पर्वत के तपस्वियों के बीच एक रात बिताते हैं और परशुराम के अनुचर अकृतव्रण से पूछते हैं कि परशुराम कब दर्शन देंगे और उन्होंने क्षत्रियों को कैसे जीता। अकृतव्रण कथा का आरम्भ हज़ार भुजाओं वाले हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन से करते हैं, जिसके अत्याचार से देवताओं ने उसके वध की प्रार्थना की; फिर बताते हैं कि भृगुवंशी ऋचीक ने वरुण से प्राप्त एक हज़ार श्यामकर्ण घोड़े कन्या-शुल्क में देकर गाधि की पुत्री सत्यवती से विवाह किया। भृगु सत्यवती और उसकी माता को पुत्र-प्राप्ति के लिए अभिमन्त्रित चरु और वृक्ष-आलिंगन का विधान देते हैं, पर दोनों स्त्रियाँ उन्हें आपस में बदल लेती हैं; इस प्रकार सत्यवती से ब्राह्मण जमदग्नि का जन्म होता है, जिनका पुत्र क्षत्रिय-स्वभाव का होना है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.116.1)
स तत्र तामुषित्वैकां रजनीं पृथिवीपतिः । तापसानां परं चक्रे सत्कारं भ्रातृभिः सह ॥
sa tatra tāmuṣitvaikāṃ rajanīṃ pṛthivīpatiḥ | tāpasānāṃ paraṃ cakre satkāraṃ bhrātṛbhiḥ saha
पृथ्वीपति राजा युधिष्ठिर ने वहाँ एक रात निवास किया और अपने भाइयों के साथ तपस्वियों का परम सत्कार किया।
श्लोक 2 (3.116.2)
लोमशस्तस्य तान्सर्वानाचख्यौ तत्र तापसान् । भृगूनङ्गिरसश्चैव वसिष्ठानथ काश्यपान् ॥
lomaśastasya tānsarvānācakhyau tatra tāpasān | bhṛgūnaṅgirasaścaiva vasiṣṭhānatha kāśyapān
लोमश ने वहाँ के सब तपस्वियों का उनसे परिचय कराया — भृगुवंशी, आंगिरस, वसिष्ठवंशी और काश्यप।
श्लोक 3 (3.116.3)
तान्समेत्य स राजर्षिरभिवाद्य कृताञ्जलिः । रामस्यानुचरं वीरमपृच्छदकृतव्रणम् ॥
tānsametya sa rājarṣirabhivādya kṛtāñjaliḥ | rāmasyānucaraṃ vīramapṛcchadakṛtavraṇam
उनके पास जाकर उस राजर्षि ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और फिर परशुराम के वीर अनुचर अकृतव्रण से पूछा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 4 (3.116.4)
कदा नु रामो भगवांस्तापसो दर्शयिष्यति । तमहं तपसा युक्तं द्रष्टुमिच्छामि भार्गवम् ॥
kadā nu rāmo bhagavāṃstāpaso darśayiṣyati | tamahaṃ tapasā yuktaṃ draṣṭumicchāmi bhārgavam
"भगवान् तपस्वी परशुराम कब दर्शन देंगे? मैं तपस्या से सम्पन्न उन भार्गव के दर्शन करना चाहता हूँ।"
अकृतव्रण उवाच
श्लोक 5 (3.116.5)
आयानेवासि विदितो रामस्य विदितात्मनः । प्रीतिस्त्वयि च रामस्य क्षिप्रं त्वां दर्शयिष्यति ॥
āyānevāsi vidito rāmasya viditātmanaḥ | prītistvayi ca rāmasya kṣipraṃ tvāṃ darśayiṣyati
तुम्हारे आते-आते ही आत्मज्ञानी परशुराम को तुम्हारा पता चल गया है। तुम पर उनका स्नेह है; वे शीघ्र ही तुम्हें दर्शन देंगे।
श्लोक 6 (3.116.6)
चतुर्दशीमष्टमीं च रामं पश्यन्ति तापसाः । अस्यां रात्र्यां व्यतीतायां भवित्री श्वश्चतुर्दशी ॥
caturdaśīmaṣṭamīṃ ca rāmaṃ paśyanti tāpasāḥ | asyāṃ rātryāṃ vyatītāyāṃ bhavitrī śvaścaturdaśī
तपस्वी लोग चतुर्दशी और अष्टमी को परशुराम के दर्शन करते हैं। यह रात बीतने पर कल चतुर्दशी होगी।
श्लोक 7 (3.116.7)
ततो द्रक्ष्यसि रामं त्वं कृष्णाजिनजटाधरम् ॥
tato drakṣyasi rāmaṃ tvaṃ kṛṣṇājinajaṭādharam
तब तुम काले मृगचर्म और जटा धारण किए परशुराम को देखोगे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 8 (3.116.8)
भवाननुगतो रामं जामदग्न्यं महाबलम् । प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पूर्ववृत्तस्य कर्मणः ॥
bhavānanugato rāmaṃ jāmadagnyaṃ mahābalam | pratyakṣadarśī sarvasya pūrvavṛttasya karmaṇaḥ
आप जमदग्निपुत्र महाबली परशुराम के अनुगामी रहे हैं और उनके पहले किए हुए सब कर्मों के प्रत्यक्ष साक्षी हैं।
श्लोक 9 (3.116.9)
स भवान्कथयत्वद्य यथा रामेण निर्जिताः । आहवे क्षत्रियाः सर्वे कथं केन च हेतुना ॥
sa bhavānkathayatvadya yathā rāmeṇa nirjitāḥ | āhave kṣatriyāḥ sarve kathaṃ kena ca hetunā
अतः आज आप बताइए कि परशुराम ने युद्ध में सब क्षत्रियों को कैसे जीता — किस प्रकार और किस कारण से।
अकृतव्रण उवाच
श्लोक 10 (3.116.10)
हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् । भृगूणां राजशार्दूल वंशे जातस्य भारत ॥
hanta te kathayiṣyāmi mahadākhyānamuttamam | bhṛgūṇāṃ rājaśārdūla vaṃśe jātasya bhārata
अच्छा, हे राजसिंह भारत! मैं तुम्हें यह महान् और उत्तम आख्यान सुनाता हूँ — भृगुवंश में जन्मे
श्लोक 11 (3.116.11)
रामस्य जामदग्न्यस्य चरितं देवसंमितम् । हैहयाधिपतेश्चैव कार्तवीर्यस्य भारत ॥
rāmasya jāmadagnyasya caritaṃ devasaṃmitam | haihayādhipateścaiva kārtavīryasya bhārata
जमदग्निपुत्र परशुराम का देवतुल्य चरित्र, और हैहयों के अधिपति कार्तवीर्य का वृत्तान्त भी, हे भारत।
श्लोक 12 (3.116.12)
रामेण चार्जुनो नाम हैहयाधिपतिर्हतः । तस्य बाहुशतान्यासंस्त्रीणि सप्त च पाण्डव ॥
rāmeṇa cārjuno nāma haihayādhipatirhataḥ | tasya bāhuśatānyāsaṃstrīṇi sapta ca pāṇḍava
हैहयों के अधिपति अर्जुन नामक राजा को परशुराम ने मारा था। हे पाण्डुपुत्र, उसकी भुजाएँ सैकड़ों में थीं — तीन सौ और सात सौ, अर्थात् पूरी एक हज़ार।
श्लोक 13 (3.116.13)
दत्तात्रेयप्रसादेन विमानं काञ्चनं तथा । ऐश्वर्यं सर्वभूतेषु पृथिव्यां पृथिवीपते ॥
dattātreyaprasādena vimānaṃ kāñcanaṃ tathā | aiśvaryaṃ sarvabhūteṣu pṛthivyāṃ pṛthivīpate
दत्तात्रेय की कृपा से उसके पास सोने का विमान था और पृथ्वी पर सब प्राणियों पर उसका प्रभुत्व था, हे पृथ्वीपति।
श्लोक 14 (3.116.14)
अव्याहतगतिश्चैव रथस्तस्य महात्मनः । रथेन तेन तु सदावरदानेन वीर्यवान् ॥
avyāhatagatiścaiva rathastasya mahātmanaḥ | rathena tena tu sadāvaradānena vīryavān
उस महात्मा का रथ बिना रुकावट सर्वत्र जाता था; और उसी रथ से तथा सदा वरदान के बल से वह पराक्रमी राजा
श्लोक 15 (3.116.15)
ममर्द देवान्यक्षांश्च ऋषींश्चैव समन्ततः । भूतांश्चैव स सर्वांस्तु पीडयामास सर्वतः ॥
mamarda devānyakṣāṃśca ṛṣīṃścaiva samantataḥ | bhūtāṃścaiva sa sarvāṃstu pīḍayāmāsa sarvataḥ
चारों ओर देवताओं, यक्षों और ऋषियों को रौंदता था, और सब ओर समस्त प्राणियों को पीड़ा देता था।
श्लोक 16 (3.116.16)
ततो देवाः समेत्याहुर्ऋषयश्च महाव्रताः । देवदेवं सुरारिघ्नं विष्णुं सत्यपराक्रमम् । भगवन्भूतरक्षार्थमर्जुनं जहि वै प्रभो ॥
tato devāḥ sametyāhurṛṣayaśca mahāvratāḥ | devadevaṃ surārighnaṃ viṣṇuṃ satyaparākramam | bhagavanbhūtarakṣārthamarjunaṃ jahi vai prabho
तब देवताओं और महान् व्रतधारी ऋषियों ने मिलकर देवों के देव, देवशत्रुओं का संहार करने वाले, सत्यपराक्रमी विष्णु से कहा — "भगवन्! प्राणियों की रक्षा के लिए अर्जुन का वध कीजिए, प्रभो।"
श्लोक 17 (3.116.17)
विमानेन च दिव्येन हैहयाधिपतिः प्रभुः । शचीसहायं क्रीडन्तं धर्षयामास वासवम् ॥
vimānena ca divyena haihayādhipatiḥ prabhuḥ | śacīsahāyaṃ krīḍantaṃ dharṣayāmāsa vāsavam
और हैहयों के प्रबल अधिपति ने अपने दिव्य विमान से शची के साथ क्रीड़ा करते हुए इन्द्र का अपमान किया।
श्लोक 18 (3.116.18)
ततस्तु भगवान्देवः शक्रेण सहितस्तदा । कार्तवीर्यविनाशार्थं मन्त्रयामास भारत ॥
tatastu bhagavāndevaḥ śakreṇa sahitastadā | kārtavīryavināśārthaṃ mantrayāmāsa bhārata
तब भगवान् विष्णु ने इन्द्र के साथ कार्तवीर्य के विनाश के लिए मन्त्रणा की, हे भारत।
श्लोक 19 (3.116.19)
यत्तद्भूतहितं कार्यं सुरेन्द्रेण निवेदितम् । संप्रतिश्रुत्य तत्सर्वं भगवाँल्लोकपूजितः । जगाम बदरीं रम्यां स्वमेवाश्रममण्डलम् ॥
yattadbhūtahitaṃ kāryaṃ surendreṇa niveditam | saṃpratiśrutya tatsarvaṃ bhagavām̐llokapūjitaḥ | jagāma badarīṃ ramyāṃ svamevāśramamaṇḍalam
देवराज ने प्राणियों के हित का जो कार्य उनके सामने रखा था, उस सबको करने की प्रतिज्ञा करके लोकपूजित भगवान् अपने आश्रम-मण्डल, रमणीय बदरी को चले गए।
श्लोक 20 (3.116.20)
एतस्मिन्नेव काले तु पृथिव्यां पृथिवीपतिः । कान्यकुब्जे महानासीत्पार्थिवः सुमहाबलः । गाधीति विश्रुतो लोके वनवासं जगाम ह ॥
etasminneva kāle tu pṛthivyāṃ pṛthivīpatiḥ | kānyakubje mahānāsītpārthivaḥ sumahābalaḥ | gādhīti viśruto loke vanavāsaṃ jagāma ha
उसी समय पृथ्वी पर कान्यकुब्ज में गाधि नाम से विख्यात एक महान् और अत्यन्त बलवान् राजा था। वह वनवास के लिए चला गया।
श्लोक 21 (3.116.21)
वने तु तस्य वसतः कन्या जज्ञेऽप्सरःसमा । ऋचीको भार्गवस्तां च वरयामास भारत ॥
vane tu tasya vasataḥ kanyā jajñe'psaraḥsamā | ṛcīko bhārgavastāṃ ca varayāmāsa bhārata
वन में रहते हुए उसके अप्सरा-सी सुन्दर एक कन्या उत्पन्न हुई; और हे भारत, भृगुवंशी ऋचीक ने उससे विवाह की याचना की।
श्लोक 22 (3.116.22)
तमुवाच ततो गाधिर्ब्राह्मणं संशितव्रतम् । उचितं नः कुले किंचित्पूर्वैर्यत्संप्रवर्तितम् ॥
tamuvāca tato gādhirbrāhmaṇaṃ saṃśitavratam | ucitaṃ naḥ kule kiṃcitpūrvairyatsaṃpravartitam
तब गाधि ने उस कठोर व्रतधारी ब्राह्मण से कहा — "हमारे कुल में पूर्वजों की चलाई हुई एक रीति है।
गाधिरुवाच
श्लोक 23 (3.116.23)
एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् । सहस्रं वाजिनां शुल्कमिति विद्धि द्विजोत्तम ॥
ekataḥ śyāmakarṇānāṃ pāṇḍurāṇāṃ tarasvinām | sahasraṃ vājināṃ śulkamiti viddhi dvijottama
हे द्विजश्रेष्ठ, जान लीजिए कि कन्या-शुल्क एक हज़ार वेगवान् श्वेत घोड़े हैं, जिनका एक-एक कान काला हो।
श्लोक 24 (3.116.24)
न चापि भगवान्वाच्योदीयतामिति भार्गव । देया मे दुहिता चैव त्वद्विधाय महात्मने ॥
na cāpi bhagavānvācyodīyatāmiti bhārgava | deyā me duhitā caiva tvadvidhāya mahātmane
परन्तु हे भार्गव, आप जैसे पूज्य से "दीजिए" कहना भी उचित नहीं; और मेरी पुत्री आप जैसे महात्मा को ही दी जानी चाहिए।"
ऋचीक उवाच
श्लोक 25 (3.116.25)
एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् । दास्याम्यश्वसहस्रं ते मम भार्या सुताऽस्तु ते ॥
ekataḥ śyāmakarṇānāṃ pāṇḍurāṇāṃ tarasvinām | dāsyāmyaśvasahasraṃ te mama bhāryā sutā'stu te
मैं आपको एक हज़ार वेगवान् श्वेत घोड़े दूँगा, जिनका एक-एक कान काला हो। आपकी पुत्री मेरी पत्नी बने।
गाधिरुवाच
श्लोक 26 (3.116.26)
ददास्यश्वसहस्रं मे तव भार्या सुताऽस्तु मे ॥
dadāsyaśvasahasraṃ me tava bhāryā sutā'stu me
आप मुझे एक हज़ार घोड़े दें, तो मेरी पुत्री आपकी पत्नी होगी।
अकृतव्रण उवाच
श्लोक 27 (3.116.27)
स तथेति प्रतिज्ञाय राजन्वरुणमब्रवीत् । एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् । सहस्रं वाजिनामेकं शुल्कार्थं प्रतिदीयताम् ॥
sa tatheti pratijñāya rājanvaruṇamabravīt | ekataḥ śyāmakarṇānāṃ pāṇḍurāṇāṃ tarasvinām | sahasraṃ vājināmekaṃ śulkārthaṃ pratidīyatām
"ऐसा ही हो" — यह वचन देकर, हे राजन्, ऋचीक ने वरुण से कहा — "कन्या-शुल्क के लिए एक हज़ार वेगवान् श्वेत घोड़े, जिनका एक-एक कान काला हो, दिए जाएँ।"
श्लोक 28 (3.116.28)
तस्मै प्रादात्सहस्रं वै वाजिनां वरुणस्तदा । तदश्वतीर्थं विख्यातमुत्थिता यत्र ते हयाः ॥
tasmai prādātsahasraṃ vai vājināṃ varuṇastadā | tadaśvatīrthaṃ vikhyātamutthitā yatra te hayāḥ
तब वरुण ने उन्हें एक हज़ार घोड़े दे दिए। जहाँ से वे घोड़े निकले, वह स्थान अश्वतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 29 (3.116.29)
गङ्गायां कान्यकुब्जे वै ददौ सत्यवतीं तदा । ततो गाधिः सुतां चास्मै जन्याश्चासन्सुरास्तदा ॥
gaṅgāyāṃ kānyakubje vai dadau satyavatīṃ tadā | tato gādhiḥ sutāṃ cāsmai janyāścāsansurāstadā
तब गंगा-तट पर कान्यकुब्ज में गाधि ने अपनी पुत्री सत्यवती उन्हें ब्याह दी; उस समय देवता वर-पक्ष के बाराती बने।
श्लोक 30 (3.116.30)
लब्धं हयसहस्रं तु तां च दृष्ट्वा दिवौकसः । विस्मयं परमं जग्मुस्तमेव दिवि संस्तुवन् ॥
labdhaṃ hayasahasraṃ tu tāṃ ca dṛṣṭvā divaukasaḥ | vismayaṃ paramaṃ jagmustameva divi saṃstuvan
प्राप्त हुए उन एक हज़ार घोड़ों को और उस कन्या को देखकर स्वर्गवासी देवता अत्यन्त विस्मित हुए और स्वर्ग में ऋचीक की ही स्तुति करने लगे।
श्लोक 31 (3.116.31)
धर्मेण लब्ध्वा तां भार्यामृचीको द्विजसत्तमः । यथाकामं यथाजोषं तया रेमे सुमध्यया ॥
dharmeṇa labdhvā tāṃ bhāryāmṛcīko dvijasattamaḥ | yathākāmaṃ yathājoṣaṃ tayā reme sumadhyayā
धर्मपूर्वक उसे पत्नी रूप में पाकर द्विजश्रेष्ठ ऋचीक उस पतली कमर वाली के साथ इच्छानुसार और आनन्दपूर्वक रमण करने लगे।
श्लोक 32 (3.116.32)
तं विवाहे कृतेराजन्सभार्यमवलोककः । आजगाम भृगुश्रेष्ठः पुत्रं दृष्ट्वा ननन्द च ॥
taṃ vivāhe kṛterājansabhāryamavalokakaḥ | ājagāma bhṛguśreṣṭhaḥ putraṃ dṛṣṭvā nananda ca
हे राजन्, विवाह हो जाने पर भृगुश्रेष्ठ भृगु पत्नीसहित पुत्र को देखने आए और पुत्र को देखकर आनन्दित हुए।
श्लोक 33 (3.116.33)
भार्यापती तमासीनं भृगुं सुरगणार्चितम् । अर्चित्वा पर्युपासीनौ प्राञ्जली तस्थतुस्तदा ॥
bhāryāpatī tamāsīnaṃ bhṛguṃ suragaṇārcitam | arcitvā paryupāsīnau prāñjalī tasthatustadā
पति-पत्नी ने देवगणों से पूजित, आसन पर विराजमान भृगु की पूजा की और उनकी सेवा करके हाथ जोड़े खड़े रहे।
श्लोक 34 (3.116.34)
ततः स्नुषां स भगवान्प्रहृष्टो भृगुरब्रवीत् । वरं वृणीष्व सुभगे दाता ह्यस्मि तवेप्सितम् ॥
tataḥ snuṣāṃ sa bhagavānprahṛṣṭo bhṛgurabravīt | varaṃ vṛṇīṣva subhage dātā hyasmi tavepsitam
तब भगवान् भृगु ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्रवधू से कहा — "सौभाग्यवती, वर माँगो; तुम जो चाहोगी, मैं दूँगा।"
श्लोक 35 (3.116.35)
सा वै प्रसादयामास तं गुरुं पुत्रकारणात् । आत्मनश्चैव मातुश्च प्रसादं च चकार सः ॥
sā vai prasādayāmāsa taṃ guruṃ putrakāraṇāt | ātmanaścaiva mātuśca prasādaṃ ca cakāra saḥ
उसने पुत्र के लिए अपने लिए और अपनी माता के लिए भी श्वशुर से कृपा की याचना की, और उन्होंने वह कृपा कर दी।
भृगुरुवाच
श्लोक 36 (3.116.36)
ऋतौ त्वं चैव माता च स्नाते पुंसवनाय वै । आलिङ्गेतां पृथग्वृक्षौ साऽश्वत्थं त्वमुदुम्बरम् ॥
ṛtau tvaṃ caiva mātā ca snāte puṃsavanāya vai | āliṅgetāṃ pṛthagvṛkṣau sā'śvatthaṃ tvamudumbaram
ऋतुकाल के बाद स्नान करके पुत्र-प्राप्ति के लिए तुम और तुम्हारी माता अलग-अलग वृक्षों का आलिंगन करना — वह पीपल का और तुम गूलर का।
श्लोक 37 (3.116.37)
चरुद्वयमिदं भद्रे जनन्याश्च तवैव च । विश्वमावर्तयित्वा तु मया यत्नेन साधितम् ॥
carudvayamidaṃ bhadre jananyāśca tavaiva ca | viśvamāvartayitvā tu mayā yatnena sādhitam
हे कल्याणी, ये दो चरु — एक तुम्हारी माता के लिए और एक तुम्हारे लिए — मैंने विश्व का बार-बार ध्यान करते हुए यत्नपूर्वक सिद्ध किए हैं।
अकृतव्रण उवाच
श्लोक 38 (3.116.38)
प्राशितव्यं प्रयत्नेन तेत्युक्त्वाऽदर्शनं गतः । आलिङ्गने चरौ चैव चक्रतुस्ते विपर्ययम् ॥
prāśitavyaṃ prayatnena tetyuktvā'darśanaṃ gataḥ | āliṅgane carau caiva cakratuste viparyayam
"इन्हें यत्नपूर्वक खाना" — दोनों से यह कहकर वे अन्तर्धान हो गए। किन्तु वृक्षों के आलिंगन में और चरु में दोनों ने उलटा कर दिया।
श्लोक 39 (3.116.39)
ततः पुनः स भगवान्काले बहुतिथे गते । दिव्यज्ञानाद्विदित्वा तु भगवानागतः पुनः ॥
tataḥ punaḥ sa bhagavānkāle bahutithe gate | divyajñānādviditvā tu bhagavānāgataḥ punaḥ
फिर बहुत समय बीतने पर भगवान् भृगु दिव्य ज्ञान से यह जानकर पुनः आए।
श्लोक 40 (3.116.40)
अथोवाच महातेजा भृगुः सत्यवतीं स्नुषाम् ॥
athovāca mahātejā bhṛguḥ satyavatīṃ snuṣām
तब महातेजस्वी भृगु ने अपनी पुत्रवधू सत्यवती से कहा—
भृगुरुवाच
श्लोक 41 (3.116.41)
उपयुक्तश्चरुर्भद्रे वृक्षे चालिङ्गनं कृतम् । विपरीतेन ते सुभ्रूर्मात्रा चैवासि वञ्चिता ॥
upayuktaścarurbhadre vṛkṣe cāliṅganaṃ kṛtam | viparītena te subhrūrmātrā caivāsi vañcitā
हे कल्याणी, चरु खाया गया और वृक्ष का आलिंगन भी हुआ, पर उलटे क्रम से; हे सुन्दर भौंहों वाली, तुम्हारी माता ने तुम्हें छल लिया है।
श्लोक 42 (3.116.42)
ब्राह्मणः क्षत्रवृत्तिर्वै तव पुत्रो भविष्यति ॥
brāhmaṇaḥ kṣatravṛttirvai tava putro bhaviṣyati
तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होकर भी क्षत्रिय का आचरण करने वाला होगा;
श्लोक 43 (3.116.43)
क्षत्रियो ब्राह्मणाचारो मातुस्तव सुतो महान् । भविष्यति महावीर्यः साधूनां मार्गमास्थितः ॥
kṣatriyo brāhmaṇācāro mātustava suto mahān | bhaviṣyati mahāvīryaḥ sādhūnāṃ mārgamāsthitaḥ
और तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण का आचरण करने वाला, महापराक्रमी और सत्पुरुषों के मार्ग पर चलने वाला महान् पुरुष होगा।
अकृतव्रण उवाच
श्लोक 44 (3.116.44)
ततः प्रसादयामास श्वशुरं सा पुनःपुनः । न मे पुत्रो भवेदीदृक्कामं पौत्रो भवेदिति ॥
tataḥ prasādayāmāsa śvaśuraṃ sā punaḥpunaḥ | na me putro bhavedīdṛkkāmaṃ pautro bhavediti
तब उसने बार-बार श्वशुर से विनती की — "मेरा पुत्र ऐसा न हो; चाहे पौत्र ऐसा हो जाए।"
श्लोक 45 (3.116.45)
एवमस्त्विति सा तेन पाण्डव प्रतिनन्दिता । कालं प्रतीक्षती गर्भं धारयामास यत्नतः ॥
evamastviti sā tena pāṇḍava pratinanditā | kālaṃ pratīkṣatī garbhaṃ dhārayāmāsa yatnataḥ
हे पाण्डव, "ऐसा ही हो" कहकर भृगु ने उसका अभिनन्दन किया। वह समय की प्रतीक्षा करती हुई यत्नपूर्वक गर्भ धारण किए रही।
श्लोक 46 (3.116.46)
जमदग्निं ततः पुत्रं जज्ञे सा काल आगते । तेजसा वर्चसा चैव युक्तं भार्गवनन्दनम् ॥
jamadagniṃ tataḥ putraṃ jajñe sā kāla āgate | tejasā varcasā caiva yuktaṃ bhārgavanandanam
समय आने पर उसने जमदग्नि नामक पुत्र को जन्म दिया, जो तेज और कान्ति से युक्त, भृगुवंश को आनन्द देने वाला था।
श्लोक 47 (3.116.47)
स वर्धमानस्तेजस्वी वेदस्याध्ययनेन च । बहूनृषीन्महातेजाः पाण्डवेयात्यवर्तत ॥
sa vardhamānastejasvī vedasyādhyayanena ca | bahūnṛṣīnmahātejāḥ pāṇḍaveyātyavartata
बड़े होते हुए उस महातेजस्वी ने वेदाध्ययन के द्वारा अनेक ऋषियों को पीछे छोड़ दिया, हे पाण्डुनन्दन।
श्लोक 48 (3.116.48)
तं तु कृत्स्नो धनुर्वेदः प्रत्यभाद्भरतर्षभ । चतुर्विधानि चास्त्राणि भास्करोपमवर्चसम् ॥
taṃ tu kṛtsno dhanurvedaḥ pratyabhādbharatarṣabha | caturvidhāni cāstrāṇi bhāskaropamavarcasam
हे भरतश्रेष्ठ, सूर्य के समान तेजस्वी जमदग्नि को सम्पूर्ण धनुर्वेद और चारों प्रकार के अस्त्र स्वतः प्राप्त हो गए।