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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 117

रेणुका का दोष और जमदग्नि का वध

अकृतव्रण कथा आगे बढ़ाते हैं: जमदग्नि राजा प्रसेनजित् की पुत्री रेणुका से विवाह करते हैं और उनके पाँच पुत्र होते हैं, जिनमें परशुराम सबसे छोटे हैं। जल में क्रीड़ा करते राजा चित्ररथ को देखकर रेणुका का मन विचलित होता है, तो जमदग्नि पुत्रों को उसका वध करने की आज्ञा देते हैं; चार बड़े पुत्र झिझकते हैं और शापित होते हैं, पर राम माता का सिर काट देते हैं, और वर में माता का पुनर्जीवन, भाइयों का उद्धार और अपने लिए अजेयता पाते हैं। बाद में कार्तवीर्य अर्जुन आश्रम को उजाड़कर होम-धेनु का बछड़ा हर ले जाता है; राम उसकी हज़ार भुजाएँ काटकर उसे मार डालते हैं, और कार्तवीर्य के पुत्र बदला लेने के लिए राम की अनुपस्थिति में युद्ध न करने वाले जमदग्नि को बाणों से मार डालते हैं।

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अकृतव्रण उवाच

श्लोक 1 (3.117.1)

स वेदाध्ययने युक्तो जमदग्निर्महातपाः । तपस्तेपे ततो देवान्नियमाद्वशमानयत् ॥

sa vedādhyayane yukto jamadagnirmahātapāḥ | tapastepe tato devānniyamādvaśamānayat

वेदाध्ययन में लगे महातपस्वी जमदग्नि ने तप किया और अपने नियम-पालन से देवताओं को वश में कर लिया।

श्लोक 2 (3.117.2)

स प्रसेनजितं राजन्नधिगम्य नराधिपम् । रेणुकां वरयामास स च तस्मै ददौ नृपः ॥

sa prasenajitaṃ rājannadhigamya narādhipam | reṇukāṃ varayāmāsa sa ca tasmai dadau nṛpaḥ

हे राजन्, उन्होंने राजा प्रसेनजित् के पास जाकर रेणुका को माँगा, और राजा ने उसे उन्हें दे दिया।

श्लोक 3 (3.117.3)

रेणुकां त्वथ संप्राप्य भार्यां भार्गवनन्दनः । आश्रमस्थस्तया सार्धं तपस्तेपेऽनुकूलया ॥

reṇukāṃ tvatha saṃprāpya bhāryāṃ bhārgavanandanaḥ | āśramasthastayā sārdhaṃ tapastepe'nukūlayā

रेणुका को पत्नी रूप में पाकर भार्गवनन्दन जमदग्नि आश्रम में रहते हुए उस अनुकूल पत्नी के साथ तप करने लगे।

श्लोक 4 (3.117.4)

तस्याः कुमाराश्चत्वारो जज्ञिरे रामपञ्चमाः । सर्वेषामजघन्यस्तु राम आसीज्जघन्यजः ॥

tasyāḥ kumārāścatvāro jajñire rāmapañcamāḥ | sarveṣāmajaghanyastu rāma āsījjaghanyajaḥ

उसके चार पुत्र हुए और पाँचवें परशुराम थे। सबसे छोटे होते हुए भी राम किसी से कम न थे।

श्लोक 5 (3.117.5)

फलाहारेषु सर्वेषु गतेष्वथ सुतेषु वै । रेणुका स्नातुमगमत्कदाचिन्नियतव्रता ॥

phalāhāreṣu sarveṣu gateṣvatha suteṣu vai | reṇukā snātumagamatkadācinniyatavratā

एक बार जब सब पुत्र फल लाने चले गए थे, नियमपूर्वक व्रत पालने वाली रेणुका स्नान करने गई।

श्लोक 6 (3.117.6)

सा तु चित्ररथं नाम मार्तिकावतकं नृपम् । ददर्श रेणुका राजन्नागच्छन्ती यदृच्छया ॥

sā tu citrarathaṃ nāma mārtikāvatakaṃ nṛpam | dadarśa reṇukā rājannāgacchantī yadṛcchayā

हे राजन्, लौटते समय संयोग से रेणुका ने मार्तिकावत देश के राजा चित्ररथ को देखा।

श्लोक 7 (3.117.7)

क्रीडन्तं सलिले दृष्ट्वा सभार्यं पद्ममालिनम् । ऋद्धिमन्तं ततस्तस्य स्पृहयामास रेणुका ॥

krīḍantaṃ salile dṛṣṭvā sabhāryaṃ padmamālinam | ṛddhimantaṃ tatastasya spṛhayāmāsa reṇukā

वह कमलों की माला पहने अपनी रानी के साथ जल में क्रीड़ा कर रहा था; उस वैभवशाली राजा को देखकर रेणुका के मन में उसकी कामना जाग उठी।

श्लोक 8 (3.117.8)

व्यभिचाराच्च तस्मात्सा क्लिन्नाम्भसि विचेतना । अन्तरिक्षान्निपतिता नर्मदायां महाह्रदे ॥

vyabhicārācca tasmātsā klinnāmbhasi vicetanā | antarikṣānnipatitā narmadāyāṃ mahāhrade

उस मानसिक व्यभिचार के कारण वह जल में ही काम से आर्द्र होकर सुध-बुध खो बैठी। आकाश से गिरकर वह नर्मदा के एक विशाल कुण्ड में जा पड़ी।

श्लोक 9 (3.117.9)

उत्तीर्य चापि सा यत्नाज्जगाम भरतर्षभ । प्रविवेशाश्रमं त्रस्ता तां वै भर्तान्वबुध्यत ॥

uttīrya cāpi sā yatnājjagāma bharatarṣabha | praviveśāśramaṃ trastā tāṃ vai bhartānvabudhyata

हे भरतश्रेष्ठ, बड़े यत्न से बाहर निकलकर वह चली और डरी हुई आश्रम में आई। उसके पति ने उसकी दशा जान ली।

श्लोक 10 (3.117.10)

स तां दृष्ट्वाच्युतांधैर्याद्ब्राह्म्या लक्ष्म्या विवर्जिताम् । धिक्शब्देन महातेजा गर्हयामास वीर्यवान् ॥

sa tāṃ dṛṣṭvācyutāṃdhairyādbrāhmyā lakṣmyā vivarjitām | dhikśabdena mahātejā garhayāmāsa vīryavān

उसे धैर्य से च्युत और ब्राह्मणोचित तेज से रहित देखकर उस महातेजस्वी, पराक्रमी मुनि ने "धिक्कार है!" कहकर उसकी निन्दा की।

श्लोक 11 (3.117.11)

ततो ज्येष्ठो जामदग्न्यो रुमण्वान्नाम नामतः । आजगाम सुषेणश्च वसुर्विश्वावसुस्तथा ॥

tato jyeṣṭho jāmadagnyo rumaṇvānnāma nāmataḥ | ājagāma suṣeṇaśca vasurviśvāvasustathā

तब जमदग्नि का ज्येष्ठ पुत्र रुमण्वान् आया, और फिर सुषेण, वसु तथा विश्वावसु भी आए।

श्लोक 12 (3.117.12)

तानानुपूर्व्याद्भगवान्वधे मातुरचोदयत् । न च ते जातसंमोहाः किंचिदूचुर्विचेतसः ॥

tānānupūrvyādbhagavānvadhe māturacodayat | na ca te jātasaṃmohāḥ kiṃcidūcurvicetasaḥ

भगवान् जमदग्नि ने क्रम से उन्हें माता का वध करने की आज्ञा दी; किन्तु वे मोह में पड़कर अचेत-से हो गए और कुछ भी न बोले।

श्लोक 13 (3.117.13)

ततः शशाप तान्क्रोधात्ते शप्ताश्चेतनां जहुः । मृगपक्षिसधर्माणः क्षिप्रमासञ्जडोपमाः ॥

tataḥ śaśāpa tānkrodhātte śaptāścetanāṃ jahuḥ | mṛgapakṣisadharmāṇaḥ kṣipramāsañjaḍopamāḥ

तब उन्होंने क्रोध में उन्हें शाप दे दिया; शाप पाकर उनकी चेतना जाती रही और वे तुरन्त पशु-पक्षियों जैसे, जड़ के समान हो गए।

श्लोक 14 (3.117.14)

ततो रामोऽभ्ययात्पश्चादाश्रमं परवीरहा । तमुवाच महामन्युर्जमदग्निर्महातपाः ॥

tato rāmo'bhyayātpaścādāśramaṃ paravīrahā | tamuvāca mahāmanyurjamadagnirmahātapāḥ

तब शत्रुवीरों का संहार करने वाले परशुराम सबसे पीछे आश्रम में आए। महाक्रोधी, महातपस्वी जमदग्नि ने उनसे कहा—

श्लोक 15 (3.117.15)

जहीमां मातरं पापां मा च पुत्र व्यथां कृथाः । तत आदाय परशुं रामो मातुः शिरोऽहरत् ॥

jahīmāṃ mātaraṃ pāpāṃ mā ca putra vyathāṃ kṛthāḥ | tata ādāya paraśuṃ rāmo mātuḥ śiro'harat

"अपनी इस पापिनी माता को मार डालो, और पुत्र, दुःख मत करो।" तब परशुराम ने फरसा उठाकर माता का सिर काट डाला।

श्लोक 16 (3.117.16)

ततस्तस्य महाराज जमदग्नेर्महात्मनः । कोपो अगच्छत्सहसा प्रसन्नश्चाब्रवीदिदम् ॥

tatastasya mahārāja jamadagnermahātmanaḥ | kopo agacchatsahasā prasannaścābravīdidam

हे महाराज, तब महात्मा जमदग्नि का क्रोध सहसा शान्त हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर यह कहा—

जमदग्निरुवाच

श्लोक 17 (3.117.17)

ममेदं वचनात्तात कृतं ते कर्म दुष्करम् । वृणीष्व कामान्धर्मज्ञ यावतो वाञ्छसे हृदा ॥

mamedaṃ vacanāttāta kṛtaṃ te karma duṣkaram | vṛṇīṣva kāmāndharmajña yāvato vāñchase hṛdā

हे तात, मेरे कहने से तुमने यह कठिन कर्म किया है। हे धर्मज्ञ, तुम्हारे हृदय में जितनी कामनाएँ हों, वे सब माँग लो।

अकृतव्रण उवाच

श्लोक 18 (3.117.18)

स वव्रे मातुरुत्थानमस्मृतिं च वधस्य वै । पापेन तेन चास्पर्शं भ्रातॄणां प्रकृतिं तथा ॥

sa vavre māturutthānamasmṛtiṃ ca vadhasya vai | pāpena tena cāsparśaṃ bhrātṝṇāṃ prakṛtiṃ tathā

उन्होंने माँगा कि माता जीवित हो उठे, उसे अपने वध की स्मृति न रहे, उन्हें उस पाप का स्पर्श न हो, और भाई अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आएँ;

श्लोक 19 (3.117.19)

अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे दीर्घमायुश्च भारत । ददौ च सर्वान्कामांस्ताञ्जमदग्निर्महातपाः ॥

apratidvandvatāṃ yuddhe dīrghamāyuśca bhārata | dadau ca sarvānkāmāṃstāñjamadagnirmahātapāḥ

तथा युद्ध में उनका कोई प्रतिद्वन्द्वी न हो और उनकी आयु लम्बी हो, हे भारत। महातपस्वी जमदग्नि ने उनकी ये सब कामनाएँ पूरी कर दीं।

श्लोक 20 (3.117.20)

कदाचित्तु तथैवास्य विनिष्क्रान्ताः सुताः प्रभो । अथानूपपतिर्वीरः कार्तवीर्योऽभ्यवर्तत ॥

kadācittu tathaivāsya viniṣkrāntāḥ sutāḥ prabho | athānūpapatirvīraḥ kārtavīryo'bhyavartata

हे प्रभो, एक बार जब उसी प्रकार उनके पुत्र बाहर गए हुए थे, तब अनूप देश का वीर राजा कार्तवीर्य वहाँ आ पहुँचा।

श्लोक 21 (3.117.21)

तमाश्रमपदं प्राप्तमृषिरर्घ्यैः समार्चयत् । स युद्धमदसंमत्तो नाभ्यनन्दत्तथाऽर्चनम् ॥

tamāśramapadaṃ prāptamṛṣirarghyaiḥ samārcayat | sa yuddhamadasaṃmatto nābhyanandattathā'rcanam

जब वह आश्रम में पहुँचा तो ऋषि ने अर्घ्य आदि से उसका सत्कार किया; परन्तु युद्ध के मद में चूर उसने उस सत्कार का आदर नहीं किया।

श्लोक 22 (3.117.22)

प्रमथ्य चाश्रमात्तस्माद्धोमधेनोस्ततोबलात् । जहार वत्सं क्रोशन्त्या बभञ्ज च महाद्रुमान् ॥

pramathya cāśramāttasmāddhomadhenostatobalāt | jahāra vatsaṃ krośantyā babhañja ca mahādrumān

आश्रम को रौंदकर उसने होम-धेनु के बछड़े को, उसके रँभाते रहते, बलपूर्वक हर लिया और बड़े-बड़े वृक्ष तोड़ डाले।

श्लोक 23 (3.117.23)

आगताय च रामाय तदाचष्ट पिता स्वयम् । गां च रोरुदतीं दृष्ट्वा कोपो रामं समाविशत् । स मन्युवशमापन्नः कार्तवीर्यमुपाद्रवत् ॥

āgatāya ca rāmāya tadācaṣṭa pitā svayam | gāṃ ca rorudatīṃ dṛṣṭvā kopo rāmaṃ samāviśat | sa manyuvaśamāpannaḥ kārtavīryamupādravat

जब परशुराम लौटे तो पिता ने स्वयं उन्हें यह सब बताया; और गाय को रोते-बिलखते देखकर राम क्रोध से भर गए। क्रोध के वश होकर वे कार्तवीर्य पर टूट पड़े।

श्लोक 24 (3.117.24)

तस्याथ युधि विक्रम्य भार्गवः परवीरहा । चिच्छेद निशितैर्भल्लैर्बाहून्परिघसंनिभान् ॥

tasyātha yudhi vikramya bhārgavaḥ paravīrahā | ciccheda niśitairbhallairbāhūnparighasaṃnibhān

युद्ध में उस पर पराक्रम दिखाते हुए शत्रुवीरों का संहार करने वाले भार्गव ने तीखे भल्ल बाणों से उसकी परिघ जैसी भुजाएँ काट डालीं—

श्लोक 25 (3.117.25)

सहस्रसंमितान्राजन्प्रगृह्य रुचिरं धनुः । अभिभूतः स रामेण संयुक्तः कालधर्मणा ॥

sahasrasaṃmitānrājanpragṛhya ruciraṃ dhanuḥ | abhibhūtaḥ sa rāmeṇa saṃyuktaḥ kāladharmaṇā

हे राजन्, सुन्दर धनुष हाथ में लेकर उन्होंने उसकी गिनती में एक हज़ार भुजाएँ काट दीं। राम से पराजित होकर वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 26 (3.117.26)

अर्जुनस्याथ दायादा रामेण कृतमन्यवः । आश्रमस्थं विना रामं जमदग्निमुपाद्रवन् ॥

arjunasyātha dāyādā rāmeṇa kṛtamanyavaḥ | āśramasthaṃ vinā rāmaṃ jamadagnimupādravan

तब कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों ने परशुराम पर क्रुद्ध होकर, राम की अनुपस्थिति में आश्रम में रहने वाले जमदग्नि पर आक्रमण किया।

श्लोक 27 (3.117.27)

ते तं जघ्नुर्महावीर्यमयुध्यन्तं तपस्विनम् । असकृद्रामरामेति विक्रोशन्तमनाथवत् ॥

te taṃ jaghnurmahāvīryamayudhyantaṃ tapasvinam | asakṛdrāmarāmeti vikrośantamanāthavat

उन्होंने उस महापराक्रमी तपस्वी को, जो लड़ नहीं रहे थे और अनाथ की भाँति बार-बार "राम! राम!" पुकार रहे थे, मार डाला।

श्लोक 28 (3.117.28)

कार्तवीर्यस्य पुत्रास्तु जमदग्निं युधिष्ठिर । घातयित्वा शरैर्जग्मुर्यथागतमरिंदमाः ॥

kārtavīryasya putrāstu jamadagniṃ yudhiṣṭhira | ghātayitvā śarairjagmuryathāgatamariṃdamāḥ

हे युधिष्ठिर, शत्रुओं का दमन करने वाले कार्तवीर्य के पुत्र जमदग्नि को बाणों से मारकर जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 29 (3.117.29)

अपक्रान्तेषु वै तेषु जमदग्नौ तथा गते । समित्पाणिरुपागच्छदाश्रमं भृगुनन्दनः ॥

apakrānteṣu vai teṣu jamadagnau tathā gate | samitpāṇirupāgacchadāśramaṃ bhṛgunandanaḥ

उनके चले जाने पर, जब जमदग्नि उस दशा में पड़े थे, भृगुनन्दन परशुराम हाथ में समिधा लिए आश्रम में आए।

श्लोक 30 (3.117.30)

स दृष्ट्वा पितरं वीरस्तदा मृत्युवशं गतम् । अनर्हं तं तथाभूतं विललाप सुदुःखितः ॥

sa dṛṣṭvā pitaraṃ vīrastadā mṛtyuvaśaṃ gatam | anarhaṃ taṃ tathābhūtaṃ vilalāpa suduḥkhitaḥ

पिता को मृत्यु के वश में पड़ा देखकर, जो ऐसी दशा के कदापि योग्य न थे, वह वीर अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगा।

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