आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 118
परशुराम द्वारा पृथ्वी को क्षत्रियहीन करना
परशुराम अपने मारे गए पिता पर विलाप करते हैं, अन्त्येष्टि करते हैं और समस्त क्षत्रिय-जाति के संहार की प्रतिज्ञा करते हैं। वे कार्तवीर्य के पुत्रों और उनके अनुयायियों को मारते हैं, इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियहीन करते हैं, समन्तपञ्चक में रक्त के पाँच सरोवर भरते हैं, और ऋचीक के रोकने पर पृथ्वी ऋत्विजों को तथा स्वर्ण-वेदी कश्यप को दान करके महेन्द्र पर्वत पर तप करने लगते हैं। फिर वैशम्पायन बताते हैं कि चतुर्दशी को परशुराम ने युधिष्ठिर और ब्राह्मणों को दर्शन दिए, और उनसे सम्मानित होकर युधिष्ठिर दक्षिण की ओर चल पड़े।
राम उवाच
श्लोक 1 (3.118.1)
ममापराधात्तैः क्षुद्रैर्हतस्त्वं तात बालिशैः । कार्तवीर्यस्य दायादैर्वने मृग इवेषुभिः ॥
mamāparādhāttaiḥ kṣudrairhatastvaṃ tāta bāliśaiḥ | kārtavīryasya dāyādairvane mṛga iveṣubhiḥ
हे तात, मेरे अपराध के कारण कार्तवीर्य के उन नीच और मूर्ख पुत्रों ने आपको बाणों से वैसे ही मार डाला, जैसे वन में हिरन को मारा जाता है।
श्लोक 2 (3.118.2)
धर्मज्ञस्य कथं तात वर्तमानस्य सत्पथे । मृत्युरेवंविधो युक्तः सर्वभूतेष्वनागसः ॥
dharmajñasya kathaṃ tāta vartamānasya satpathe | mṛtyurevaṃvidho yuktaḥ sarvabhūteṣvanāgasaḥ
हे तात, आप धर्म के ज्ञाता, सन्मार्ग पर चलने वाले और सब प्राणियों के प्रति निरपराध थे; आपके लिए ऐसी मृत्यु कैसे उचित थी?
श्लोक 3 (3.118.3)
किंनु तैर्न कृतंपापं यैर्भवांस्तपसि स्थितः । अयुध्यमानो वृद्धः सन्हतः शरशतैः शितैः ॥
kiṃnu tairna kṛtaṃpāpaṃ yairbhavāṃstapasi sthitaḥ | ayudhyamāno vṛddhaḥ sanhataḥ śaraśataiḥ śitaiḥ
उन्होंने कौन-सा पाप नहीं किया, जिन्होंने तप में स्थित, युद्ध न करने वाले वृद्ध आपको सैकड़ों तीखे बाणों से मार डाला?
श्लोक 4 (3.118.4)
किंनु ते तत्र वक्ष्यन्ति सचिवेषु सुहृत्सु च । अयुध्यमानं धर्मज्ञमेकं हत्वाऽनपत्रपाः ॥
kiṃnu te tatra vakṣyanti saciveṣu suhṛtsu ca | ayudhyamānaṃ dharmajñamekaṃ hatvā'napatrapāḥ
युद्ध न करने वाले, अकेले, धर्मज्ञ पुरुष को मारकर वे निर्लज्ज वहाँ अपने मन्त्रियों और मित्रों के बीच क्या कहेंगे?
अकृतव्रण उवाच
श्लोक 5 (3.118.5)
लालप्यैवं सकरुणं बहु नानाविधं नृप । प्रेतकार्याणि सर्वाणि पितुश्चक्रे महातपाः ॥
lālapyaivaṃ sakaruṇaṃ bahu nānāvidhaṃ nṛpa | pretakāryāṇi sarvāṇi pituścakre mahātapāḥ
हे राजन्, इस प्रकार करुण स्वर में अनेक प्रकार से बहुत विलाप करके उस महातपस्वी ने पिता की सारी अन्त्येष्टि-क्रियाएँ कीं।
श्लोक 6 (3.118.6)
ददाह पितरं चाग्नौ रामः परपुरंजयः । प्रतिजज्ञे वधं चापि सर्वक्षत्रस्य भारत ॥
dadāha pitaraṃ cāgnau rāmaḥ parapuraṃjayaḥ | pratijajñe vadhaṃ cāpi sarvakṣatrasya bhārata
शत्रुओं के नगर जीतने वाले परशुराम ने पिता का अग्नि-संस्कार किया और हे भारत, समस्त क्षत्रिय-जाति के वध की प्रतिज्ञा की।
श्लोक 7 (3.118.7)
संक्रुद्धोऽतिबलः सङ्ख्ये शस्त्रमादाय वीर्यवान् । जघ्निवान्कार्तवीर्यस्य सुतानेकोऽन्तकोपमः ॥
saṃkruddho'tibalaḥ saṅkhye śastramādāya vīryavān | jaghnivānkārtavīryasya sutāneko'ntakopamaḥ
अत्यन्त बलवान् और पराक्रमी राम ने क्रुद्ध होकर युद्ध में शस्त्र उठाया और अकेले ही, यमराज के समान, कार्तवीर्य के पुत्रों का वध कर डाला।
श्लोक 8 (3.118.8)
तेषां चानुगता ये च क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ । तांश्च सर्वानवामृद्नाद्रामः प्रहरतांवरः ॥
teṣāṃ cānugatā ye ca kṣatriyāḥ kṣatriyarṣabha | tāṃśca sarvānavāmṛdnādrāmaḥ praharatāṃvaraḥ
हे क्षत्रियश्रेष्ठ, उनके अनुयायी जो क्षत्रिय थे, उन सबको भी योद्धाओं में श्रेष्ठ राम ने कुचल डाला।
श्लोक 9 (3.118.9)
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः । समन्तपञ्चके पञ्च चकार रुधिरह्रदान् ॥
triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivīṃ kṛtvā niḥkṣatriyāṃ prabhuḥ | samantapañcake pañca cakāra rudhirahradān
तीन गुणा सात — इक्कीस — बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित करके उस प्रभु ने समन्तपञ्चक में रक्त के पाँच सरोवर बना दिए।
श्लोक 10 (3.118.10)
स तेषु तर्पयामास पितॄन्भृगुकुलोद्वहः । साक्षाद्ददर्श चर्चीकं स च रामं न्यवारयत् ॥
sa teṣu tarpayāmāsa pitṝnbhṛgukulodvahaḥ | sākṣāddadarśa carcīkaṃ sa ca rāmaṃ nyavārayat
उन सरोवरों में भृगुकुल के धुरन्धर ने पितरों का तर्पण किया। उन्होंने साक्षात् ऋचीक के दर्शन किए, और ऋचीक ने राम को रोका।
श्लोक 11 (3.118.11)
ततो यज्ञेन महता जामदग्न्यः प्रतापवान् । तर्पयामास देवेन्द्रमृत्विग्भ्यः प्रददौ महीम् ॥
tato yajñena mahatā jāmadagnyaḥ pratāpavān | tarpayāmāsa devendramṛtvigbhyaḥ pradadau mahīm
तब प्रतापी जामदग्न्य ने एक महान् यज्ञ से देवराज इन्द्र को तृप्त किया और ऋत्विजों को पृथ्वी दान कर दी।
श्लोक 12 (3.118.12)
वेदीं चाप्यददद्धैमीं कश्यपाय महात्मने । दशव्यामायतां कृत्वा नवोत्सेधां विशांपते ॥
vedīṃ cāpyadadaddhaimīṃ kaśyapāya mahātmane | daśavyāmāyatāṃ kṛtvā navotsedhāṃ viśāṃpate
हे प्रजापालक, उन्होंने महात्मा कश्यप को एक स्वर्ण-वेदी भी दी, जो दस व्याम लम्बी और नौ व्याम ऊँची बनाई गई थी।
श्लोक 13 (3.118.13)
तां कश्यपस्यानुमते ब्राह्मणाः खण्डशस्तदा । व्यभजंस्ते तदा राजन्प्रख्याताः खाण्डवायनाः ॥
tāṃ kaśyapasyānumate brāhmaṇāḥ khaṇḍaśastadā | vyabhajaṃste tadā rājanprakhyātāḥ khāṇḍavāyanāḥ
कश्यप की अनुमति से ब्राह्मणों ने तब उसके टुकड़े-टुकड़े करके बाँट लिए, और हे राजन्, तभी से वे खाण्डवायन नाम से प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 14 (3.118.14)
स प्रदाय महीं तस्मै कश्यपाय महात्मने । तपः सुमहदास्थाय महाबलपराक्रमः । अस्मिन्महेन्द्रे शैलेन्द्रे वसत्यमितविक्रमः ॥
sa pradāya mahīṃ tasmai kaśyapāya mahātmane | tapaḥ sumahadāsthāya mahābalaparākramaḥ | asminmahendre śailendre vasatyamitavikramaḥ
महात्मा कश्यप को पृथ्वी देकर वे महाबली, पराक्रमी और अपार विक्रम वाले राम घोर तपस्या में लगकर इसी पर्वतराज महेन्द्र पर निवास करते हैं।
श्लोक 15 (3.118.15)
एवं वैरमभूत्तस्य क्षत्रियैर्लोकवासिभिः । पृथिवी चापि विजिता रामेणामिततेजसा ॥
evaṃ vairamabhūttasya kṣatriyairlokavāsibhiḥ | pṛthivī cāpi vijitā rāmeṇāmitatejasā
इस प्रकार संसार में रहने वाले क्षत्रियों से उनका वैर हुआ, और इस प्रकार अपार तेज वाले राम ने पृथ्वी को जीत लिया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (3.118.16)
ततश्चतुर्दशीं रामः समयेन महामनाः । दर्शयामास तान्विप्रान्धर्मराजं च सानुजम् ॥
tataścaturdaśīṃ rāmaḥ samayena mahāmanāḥ | darśayāmāsa tānviprāndharmarājaṃ ca sānujam
फिर चतुर्दशी को, अपने नियम के अनुसार, महामना परशुराम ने उन ब्राह्मणों को और भाइयों सहित धर्मराज युधिष्ठिर को दर्शन दिए।
श्लोक 17 (3.118.17)
स तमानर्च राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितः प्रभुः । द्विजानां च परां पूजां चक्रे नृपतिसत्तमः ॥
sa tamānarca rājendra bhrātṛbhiḥ sahitaḥ prabhuḥ | dvijānāṃ ca parāṃ pūjāṃ cakre nṛpatisattamaḥ
हे राजेन्द्र, प्रभु युधिष्ठिर ने भाइयों के साथ उनकी पूजा की, और उस नृपश्रेष्ठ ने ब्राह्मणों का भी परम सत्कार किया।
श्लोक 18 (3.118.18)
अर्चित्वा जामदग्न्यं स पूजितस्तेन चोदितः । महेन्द्र उष्य तां रात्रिं प्रययौ दक्षिणामुखः ॥
arcitvā jāmadagnyaṃ sa pūjitastena coditaḥ | mahendra uṣya tāṃ rātriṃ prayayau dakṣiṇāmukhaḥ
जामदग्न्य परशुराम की पूजा करके और उनसे सम्मानित होकर, उन्हीं की प्रेरणा से युधिष्ठिर ने वह रात महेन्द्र पर्वत पर बिताई और फिर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।