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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 120

प्रभास में बलराम का शोक

जनमेजय पूछते हैं कि प्रभास में पाण्डवों और वृष्णियों ने क्या किया और क्या बातें कीं। वैशम्पायन बताते हैं कि पाण्डवों को वन के कष्ट में देखकर बलराम ने श्रीकृष्ण से कहा कि धर्म का कोई फल नहीं दीखता, क्योंकि युधिष्ठिर दुःख भोग रहे हैं और दुर्योधन फल-फूल रहा है, फिर भी धरती उसे निगलती नहीं। वे पाण्डवों को निर्वासित करने के लिए भीष्म, कृप, द्रोण और अन्धे धृतराष्ट्र की निन्दा करते हैं, चेतावनी देते हैं कि भीम अपने शत्रुओं में से किसी को जीवित नहीं छोड़ेगा, भीम, सहदेव और नकुल की दिग्विजयों का स्मरण करते हैं, और पूछते हैं कि द्रौपदी और देवताओं के पुत्रों पर ऐसा अन्याय देखकर पृथ्वी कैसे टिकी है।

अध्याय 119अध्याय-सूचीअध्याय 121

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (3.120.1)

प्रभासतीर्थमासाद्यपाण्डवा वृष्णयस्तथा । किमकुर्वन्कथाश्चैषां कास्तत्रासंस्तपोधन ॥

prabhāsatīrthamāsādyapāṇḍavā vṛṣṇayastathā | kimakurvankathāścaiṣāṃ kāstatrāsaṃstapodhana

हे तपोधन, प्रभास तीर्थ पहुँचकर पाण्डवों और वृष्णियों ने क्या किया, और वहाँ उनकी आपस में क्या बातें हुईं?

श्लोक 2 (3.120.2)

ते हि सर्वे महात्मानः सर्वशास्त्रविशारदाः । वृष्णयः पाण्डवाश्चैव सुहृदश्चपरस्परम् ॥

te hi sarve mahātmānaḥ sarvaśāstraviśāradāḥ | vṛṣṇayaḥ pāṇḍavāścaiva suhṛdaścaparasparam

क्योंकि वे सभी — वृष्णि और पाण्डव — महात्मा, सब शास्त्रों में निपुण और एक-दूसरे के मित्र थे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (3.120.3)

प्रभासतीर्थं संप्राप्य पुण्यं तीर्थं महोदधेः । वृष्णयः पाण्डवान्वीराः परिवार्योपतस्थिरे ॥

prabhāsatīrthaṃ saṃprāpya puṇyaṃ tīrthaṃ mahodadheḥ | vṛṣṇayaḥ pāṇḍavānvīrāḥ parivāryopatasthire

महासागर के पवित्र तीर्थ प्रभास में पहुँचकर वीर वृष्णि पाण्डवों को घेरकर उनकी सेवा में उपस्थित हुए।

श्लोक 4 (3.120.4)

ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभः । वनमाली हली रामो बभाषे पुष्करेक्षणम् ॥

tato gokṣīrakundendumṛṇālarajataprabhaḥ | vanamālī halī rāmo babhāṣe puṣkarekṣaṇam

तब गाय के दूध, कुन्द-पुष्प, चन्द्रमा, कमलनाल और चाँदी के समान उज्ज्वल, वनमाला पहने, हलधारी बलराम ने कमलनयन श्रीकृष्ण से कहा—

बलराम उवाच

श्लोक 5 (3.120.5)

न कृष्ण धर्मश्चरितो भवाय । जन्तोरधर्मश्च पराभवाय । युधिष्ठिरो यत्रजटी महात्मा । वनाश्रयः क्लिश्यति चीरवासाः ॥

na kṛṣṇa dharmaścarito bhavāya | jantoradharmaśca parābhavāya | yudhiṣṭhiro yatrajaṭī mahātmā | vanāśrayaḥ kliśyati cīravāsāḥ

हे कृष्ण, आचरण किया हुआ धर्म प्राणी के उत्थान का कारण नहीं बनता, और न अधर्म उसके पतन का — क्योंकि यहाँ महात्मा युधिष्ठिर जटा धारण किए, वल्कल पहने वन में रहकर कष्ट भोग रहे हैं।

श्लोक 6 (3.120.6)

दुर्योधनश्चापि महीं प्रशास्ति । न चास्य भूमिर्विवरं ददाति । धर्मादधर्मश्चरितो वरीया- । नितीव मन्येत नरोऽल्पबुद्धिः ॥

duryodhanaścāpi mahīṃ praśāsti | na cāsya bhūmirvivaraṃ dadāti | dharmādadharmaścarito varīyā- | nitīva manyeta naro'lpabuddhiḥ

और दुर्योधन पृथ्वी पर शासन कर रहा है, फिर भी धरती फटकर उसे निगल नहीं लेती। अल्पबुद्धि मनुष्य तो यही मानेगा कि धर्म से बढ़कर अधर्म का आचरण है।

श्लोक 7 (3.120.7)

दुर्योधने चापि विवर्धमाने । युधिष्ठिरे चासुख आत्तराज्ये । हृतस्वराज्यायतनार्थभार्ये । दुर्योधनेनाल्पधिया च पार्थे । किं न्वद्य कर्तव्यमिति प्रजाभिः । शङ्का मिथः संजनिता नराणाम् ॥

duryodhane cāpi vivardhamāne | yudhiṣṭhire cāsukha āttarājye | hṛtasvarājyāyatanārthabhārye | duryodhanenālpadhiyā ca pārthe | kiṃ nvadya kartavyamiti prajābhiḥ | śaṅkā mithaḥ saṃjanitā narāṇām

दुर्योधन फल-फूल रहा है और युधिष्ठिर दुःख में है, उसका राज्य छिन गया है — अल्पबुद्धि दुर्योधन ने पार्थ का अपना राज्य, घर, धन और पत्नी तक हर ली है — ऐसे में प्रजाजन पूछते हैं, "अब क्या करना चाहिए?", और लोगों में आपस में यह शंका उठ खड़ी हुई है।

श्लोक 8 (3.120.8)

अयं स धर्मप्रभवो नरेन्द्रो । धर्मे धृतः सत्यधृतिः प्रदाता । चलेद्धि राज्याच्च सुखाच्च पार्थो । धर्मादपेतस्तु कथं विवर्धेत् ॥

ayaṃ sa dharmaprabhavo narendro | dharme dhṛtaḥ satyadhṛtiḥ pradātā | caleddhi rājyācca sukhācca pārtho | dharmādapetastu kathaṃ vivardhet

यह धर्म से उत्पन्न राजा धर्म में दृढ़, सत्य पर अटल और दानी है। पार्थ भले ही राज्य और सुख से वंचित हो जाए, पर धर्म से हटकर भला कोई कैसे उन्नति कर सकता है?

श्लोक 9 (3.120.9)

कथं नु भीष्मश्च कृपश्च विप्रो । द्रोणश्च राजा च कुलस्य वृद्धः । प्रव्राज्य पार्थान्सुखमाप्नुवन्ति । धिक्पापबुद्धीन्भरतप्रधानान् ॥

kathaṃ nu bhīṣmaśca kṛpaśca vipro | droṇaśca rājā ca kulasya vṛddhaḥ | pravrājya pārthānsukhamāpnuvanti | dhikpāpabuddhīnbharatapradhānān

भीष्म, ब्राह्मण कृपाचार्य, द्रोण और कुल के वृद्ध राजा पार्थों को निर्वासित करके सुख से कैसे रह रहे हैं? धिक्कार है इन पापबुद्धि भरतवंश-प्रधानों को!

श्लोक 10 (3.120.10)

किंनाम वक्ष्यत्यवनिप्रधानः । पितॄन्समागम्य परत्र पापः । पुत्रेषु सम्यक्चरितं मयेति । पुत्रानपापान्व्यपरोप्य राज्यात् ॥

kiṃnāma vakṣyatyavanipradhānaḥ | pitṝnsamāgamya paratra pāpaḥ | putreṣu samyakcaritaṃ mayeti | putrānapāpānvyaparopya rājyāt

वह पापी भूपति परलोक में पितरों से मिलकर क्या कहेगा — "मैंने पुत्रों के साथ उचित व्यवहार किया" — जबकि उसने निष्पाप पुत्रों को राज्य से निकाल दिया है?

श्लोक 11 (3.120.11)

नासौ धिया संप्रति पश्यति स्म । किंनाम कृत्वाऽहमचक्षुरेवम् । जातः पृथिव्यामिति पार्थिवेषु । प्रव्राज्यकौन्तेयमिति स्म राज्यात् ॥

nāsau dhiyā saṃprati paśyati sma | kiṃnāma kṛtvā'hamacakṣurevam | jātaḥ pṛthivyāmiti pārthiveṣu | pravrājyakaunteyamiti sma rājyāt

वह अपनी बुद्धि से यह नहीं सोचता कि "मैंने ऐसा कौन-सा कर्म किया था कि राजाओं के बीच पृथ्वी पर इस प्रकार अन्धा जन्मा?" — और न यह कि कुन्तीपुत्र को राज्य से निकालने का क्या फल होगा।

श्लोक 12 (3.120.12)

नूनं समृद्धान्पितृलोकभूमौ । चामीकराभान्क्षितिजान्प्रफुल्लान् । विचित्रवीर्यस्य सुतः सपुत्रः । कृत्वा नृशंसं वत पश्यति स्म ॥

nūnaṃ samṛddhānpitṛlokabhūmau | cāmīkarābhānkṣitijānpraphullān | vicitravīryasya sutaḥ saputraḥ | kṛtvā nṛśaṃsaṃ vata paśyati sma

निश्चय ही, हाय, विचित्रवीर्य का पुत्र अपने पुत्रों सहित यह क्रूर कर्म करके पितृलोक की भूमि में खिले हुए, सोने-सी आभा वाले, समृद्ध वृक्षों को देख रहा है।

श्लोक 13 (3.120.13)

व्यूढोत्तरांसान्पृथुलोहिताक्षा- । निमान्स्म पृच्छन्स शृणोति नूनम् । प्रास्थापयद्यत्स वनं सशङ्को । युधिष्ठिरं सानुजमात्तशस्त्रम् ॥

vyūḍhottarāṃsānpṛthulohitākṣā- | nimānsma pṛcchansa śṛṇoti nūnam | prāsthāpayadyatsa vanaṃ saśaṅko | yudhiṣṭhiraṃ sānujamāttaśastram

निश्चय ही जब वह इन ऊँचे-चौड़े कन्धों और बड़ी-बड़ी लाल आँखों वाले वीरों के बारे में पूछता है, तो सुनता है कि उसी ने भयभीत होकर शस्त्रधारी भाइयों सहित युधिष्ठिर को वन भेज दिया।

श्लोक 14 (3.120.14)

योऽयं परेषां पृतनां समृद्धां । निरायुधो दीर्घभुजो निहन्यात् । श्रुत्वैव शब्दं हि वृकोदरस्य । मुञ्चन्ति सैन्यानि शकृत्समूत्रम् ॥

yo'yaṃ pareṣāṃ pṛtanāṃ samṛddhāṃ | nirāyudho dīrghabhujo nihanyāt | śrutvaiva śabdaṃ hi vṛkodarasya | muñcanti sainyāni śakṛtsamūtram

यह विशालबाहु बिना शस्त्र के ही शत्रुओं की समृद्ध सेना का संहार कर सकता है; वृकोदर की गर्जना सुनते ही सेनाओं का मल-मूत्र छूट जाता है।

श्लोक 15 (3.120.15)

स क्षुत्पिपासाध्वकृशस्तरस्वी । समेत्य नानायुधबाणपाणिः । वने स्मरन्वासमिमं सुघोरं । शेषं न कुर्यादिति निश्चितं मे ॥

sa kṣutpipāsādhvakṛśastarasvī | sametya nānāyudhabāṇapāṇiḥ | vane smaranvāsamimaṃ sughoraṃ | śeṣaṃ na kuryāditi niścitaṃ me

भूख, प्यास और यात्रा से दुर्बल हुआ वह वेगवान् वीर जब नाना प्रकार के आयुध और बाण हाथ में लेकर उनसे भिड़ेगा, तब वन के इस घोर निवास को याद करके किसी को शेष नहीं छोड़ेगा — यह मेरा निश्चय है।

श्लोक 16 (3.120.16)

न ह्यस्य वीर्येण बलेन कश्चि- । त्समः पृथिव्यामपि विद्यतेऽन्यः । स शीतवातातपकर्शिताङ्गो । न शेषमाजावसुहृत्सु कुर्यात् ॥

na hyasya vīryeṇa balena kaści- | tsamaḥ pṛthivyāmapi vidyate'nyaḥ | sa śītavātātapakarśitāṅgo | na śeṣamājāvasuhṛtsu kuryāt

क्योंकि पराक्रम और बल में पृथ्वी पर उसके समान दूसरा कोई नहीं है। सर्दी, हवा और धूप से जिसके अंग सूख गए हैं, वह युद्ध में शत्रुओं में से किसी को शेष नहीं छोड़ेगा।

श्लोक 17 (3.120.17)

प्राच्यां नृपानेकरथेन जित्वा । वृकोदरः सानुचरान्रणेषु । स्वस्त्यागमद्योऽतिरथस्तरस्वी । सोऽयं वने क्लिश्यति चीरवासाः ॥

prācyāṃ nṛpānekarathena jitvā | vṛkodaraḥ sānucarānraṇeṣu | svastyāgamadyo'tirathastarasvī | so'yaṃ vane kliśyati cīravāsāḥ

जिस महारथी, वेगवान् वृकोदर ने अकेले रथ से पूर्व दिशा के राजाओं को उनके अनुचरों सहित युद्धों में जीता और सकुशल लौट आया, वही आज वल्कल पहने वन में कष्ट पा रहा है।

श्लोक 18 (3.120.18)

यः सिन्धुकूले व्यजयन्नृदेवा- । न्समागतान्दाक्षिणात्यान्महीपान् । तं पश्यतेमं सहदेवमद्य । तरस्विनं तापसवेषरूपम् ॥

yaḥ sindhukūle vyajayannṛdevā- | nsamāgatāndākṣiṇātyānmahīpān | taṃ paśyatemaṃ sahadevamadya | tarasvinaṃ tāpasaveṣarūpam

इस सहदेव को आज देखो, जिस पराक्रमी ने सिन्धु के तट पर एकत्र हुए दक्षिण के राजाओं को जीता था — वही अब तपस्वी का वेश धारण किए है।

श्लोक 19 (3.120.19)

यः पार्थिवानेकरथेन वीरो । दिशं प्रतीचीं प्रतियुद्धशौण्डः । जिग्ये रणे तं नकुलं वनेऽस्मि- । न्संपश्यतैनं मलदिग्धगात्रम् ॥

yaḥ pārthivānekarathena vīro | diśaṃ pratīcīṃ pratiyuddhaśauṇḍaḥ | jigye raṇe taṃ nakulaṃ vane'smi- | nsaṃpaśyatainaṃ maladigdhagātram

जिस वीर ने युद्ध-कुशल होकर अकेले रथ से पश्चिम दिशा के राजाओं को रण में जीता था, उस नकुल को इस वन में धूल-मिट्टी से सने शरीर के साथ देखो।

श्लोक 20 (3.120.20)

सत्रे समृद्धेऽतिरथस्य राज्ञो । वेदीतलादुत्पतिता सुता या । सेयं वने वासमिमं सुदुःखं । कथं सहत्यद्य सती सुखार्हा ॥

satre samṛddhe'tirathasya rājño | vedītalādutpatitā sutā yā | seyaṃ vane vāsamimaṃ suduḥkhaṃ | kathaṃ sahatyadya satī sukhārhā

महारथी राजा द्रुपद के समृद्ध यज्ञ में वेदी से जो पुत्री प्रकट हुई थी, वह सुख के योग्य साध्वी आज वन के इस अत्यन्त दुःखद निवास को कैसे सह रही है?

श्लोक 21 (3.120.21)

त्रिवर्गमुख्यस्य समीरणस्य । देवेश्वरस्याप्यथवाऽश्विनोश्च । एषां सुराणां तनयाः कथंनु । वने चरन्त्यस्तसुखाः सुखार्हाः ॥

trivargamukhyasya samīraṇasya | deveśvarasyāpyathavā'śvinośca | eṣāṃ surāṇāṃ tanayāḥ kathaṃnu | vane carantyastasukhāḥ sukhārhāḥ

त्रिवर्ग में प्रधान धर्म, वायु, देवराज इन्द्र और दोनों अश्विनीकुमारों — इन देवताओं के पुत्र, जो सुख के योग्य हैं, सुख से वंचित होकर वन में कैसे भटक रहे हैं?

श्लोक 22 (3.120.22)

जिते हि धर्मस्य सुते सभार्ये । सभ्रातृके सानुचरे निरस्ते । दुर्योधने चापि विवर्धमाने । कथं न सीदत्यवनिः सशैला ॥

jite hi dharmasya sute sabhārye | sabhrātṛke sānucare niraste | duryodhane cāpi vivardhamāne | kathaṃ na sīdatyavaniḥ saśailā

जब धर्मपुत्र पत्नी, भाइयों और अनुचरों सहित हराकर निकाल दिया गया है और दुर्योधन फल-फूल रहा है, तब पर्वतों सहित यह पृथ्वी धँस क्यों नहीं जाती?

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