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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 121

सात्यकि का युद्ध-आग्रह और युधिष्ठिर की सत्यनिष्ठा

प्रभास तीर्थ में सात्यकि बलराम के विलाप का उत्तर देते हैं कि यह शोक का समय नहीं है; वृष्णियों को तुरन्त कूच करके दुर्योधन, कर्ण और कौरवों का नाश करना चाहिए और जब तक युधिष्ठिर अपना व्रत पूरा करें, तब तक अभिमन्यु को राज्य करना चाहिए। श्रीकृष्ण कहते हैं कि युधिष्ठिर अपनी भुजाओं से न जीती गई भूमि कभी स्वीकार नहीं करेंगे और न अपना धर्म छोड़ेंगे। युधिष्ठिर कहते हैं कि उनके लिए रक्षणीय सत्य है, राज्य नहीं, और यादवों को विदा कर देते हैं। इसके बाद पाण्डव लोमश के साथ पवित्र नदी पयोष्णी पर जाते हैं।

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सात्यकिरुवाच

श्लोक 1 (3.121.1)

न राम कालः परिदेवनाय । यदुत्तरं त्वत्र तदेव सर्वे । समाचरामो ह्यनतीतकालं । युधिष्ठिरो यद्यपि नाह किंचित् ॥

na rāma kālaḥ paridevanāya | yaduttaraṃ tvatra tadeva sarve | samācarāmo hyanatītakālaṃ | yudhiṣṭhiro yadyapi nāha kiṃcit

हे राम, यह विलाप करने का समय नहीं है। अब आगे जो करना उचित है, वही हम सब समय बीतने से पहले कर डालें, भले ही युधिष्ठिर कुछ भी न कहें।

श्लोक 2 (3.121.2)

ये नाथवन्तोऽद्य भवन्ति लोके । ते नात्मना कर्म समारभन्ते । तेषां तु कार्येषु भवन्ति नाथाः । शैब्यादयो राम यथा ययातेः ॥

ye nāthavanto'dya bhavanti loke | te nātmanā karma samārabhante | teṣāṃ tu kāryeṣu bhavanti nāthāḥ | śaibyādayo rāma yathā yayāteḥ

हे राम, संसार में जिनके रक्षक होते हैं, वे अपने कार्य स्वयं आरम्भ नहीं करते; उनके कार्यों में उनके रक्षक ही आगे आते हैं, जैसे ययाति के लिए शैब्य आदि आगे आए थे।

श्लोक 3 (3.121.3)

येषां तथा राम समारभन्ते । कार्याणि नाथाः स्वमतेन लोके । ते नाथवन्तः पुरुषप्रवीरा । नानाथवत्कृच्छ्रमवाप्नुवन्ति ॥

yeṣāṃ tathā rāma samārabhante | kāryāṇi nāthāḥ svamatena loke | te nāthavantaḥ puruṣapravīrā | nānāthavatkṛcchramavāpnuvanti

हे राम, संसार में जिनके कार्य उनके रक्षक अपनी ही इच्छा से आरम्भ कर देते हैं, ऐसे रक्षकों वाले श्रेष्ठ वीर अनाथों की तरह कष्ट नहीं पाते।

श्लोक 4 (3.121.4)

कस्मादिमौ रामजनार्दनौ च । प्रद्युम्नसाम्बौ च मया समेतौ । वसन्त्यरण्ये सह सोदरीयै- । स्त्रैलोक्यनाथानभिगम्य पार्थाः ॥

kasmādimau rāmajanārdanau ca | pradyumnasāmbau ca mayā sametau | vasantyaraṇye saha sodarīyai- | strailokyanāthānabhigamya pārthāḥ

फिर, जब ये दोनों, बलराम और जनार्दन, तथा मेरे साथ प्रद्युम्न और साम्ब यहाँ उपस्थित हैं, तब तीनों लोकों के स्वामियों को अपना रक्षक पाकर भी ये पार्थ अपने भाइयों के साथ वन में क्यों रह रहे हैं?

श्लोक 5 (3.121.5)

निर्यातु साध्यद्य दशार्हसेना । प्रभूतनानायुधचित्रवर्मा । यमक्षयं गच्छतु धार्तराष्ट्रः । सबान्धवो वृष्णिबलाभिभूतः ॥

niryātu sādhyadya daśārhasenā | prabhūtanānāyudhacitravarmā | yamakṣayaṃ gacchatu dhārtarāṣṭraḥ | sabāndhavo vṛṣṇibalābhibhūtaḥ

आज ही अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों और चमकीले कवचों से सजी दाशार्हों की सेना भली-भाँति कूच करे। वृष्णियों के बल से पराजित होकर धृतराष्ट्र का पुत्र अपने बन्धु-बान्धवों सहित यमलोक जाए।

श्लोक 6 (3.121.6)

त्वं ह्येव कोपात्पृथिवीमपीमां । संवेष्टयेस्तिष्ठतु शार्ङ्गधन्वा । स धार्तराष्ट्रं जहि सानुबन्धं । वृत्रं यथा देवपतिर्महेन्द्रः ॥

tvaṃ hyeva kopātpṛthivīmapīmāṃ | saṃveṣṭayestiṣṭhatu śārṅgadhanvā | sa dhārtarāṣṭraṃ jahi sānubandhaṃ | vṛtraṃ yathā devapatirmahendraḥ

आप अकेले ही अपने क्रोध से इस सारी पृथ्वी को घेर सकते हैं। शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्ण अलग खड़े रहें। आप धृतराष्ट्र के पुत्र को उसके अनुयायियों सहित वैसे ही मार डालें, जैसे देवराज महेन्द्र ने वृत्र को मारा था।

श्लोक 7 (3.121.7)

भ्राता च मे यः स सखा गुरुश्च । जनार्दनस्यात्मसमश्च पार्थः । तदर्थमेको हि य उद्यमन्वै । करोति कर्णोऽस्त्रमवारणीयम् ॥

bhrātā ca me yaḥ sa sakhā guruśca | janārdanasyātmasamaśca pārthaḥ | tadarthameko hi ya udyamanvai | karoti karṇo'stramavāraṇīyam

पार्थ भी अलग रहें, जो मेरे भाई, मित्र और गुरु हैं तथा जनार्दन के ही आत्मस्वरूप हैं। क्योंकि उन्हीं के लिए अकेला कर्ण उद्यम करता हुआ ऐसा अस्त्र तैयार कर रहा है, जिसका निवारण नहीं हो सकता।

श्लोक 8 (3.121.8)

यदर्थमैच्छन्मनुजाः सुपुत्रं । शिष्यं गुरुं चाप्रतिकूलवादम् । यदर्थमभ्युद्यतमुत्तमं त- । त्करोति कर्माग्र्यमपारणीयम् ॥

yadarthamaicchanmanujāḥ suputraṃ | śiṣyaṃ guruṃ cāpratikūlavādam | yadarthamabhyudyatamuttamaṃ ta- | tkaroti karmāgryamapāraṇīyam

इसी प्रयोजन के लिए मनुष्य सुयोग्य पुत्र, शिष्य और अनुकूल बोलने वाले गुरु की कामना करते हैं; और इसी के लिए उद्यत होकर मनुष्य वह श्रेष्ठ कर्म करता है, जिसे कोई विफल नहीं कर सकता।

श्लोक 9 (3.121.9)

तस्यास्त्रवर्षाण्यहमुत्तमास्त्रै- । र्विहत्य सर्वाणि रणेऽभिभूय । कायाच्छिरः सर्पविषाग्निकल्पैः । शरोत्तमैरुन्मथिताऽस्मि राम ॥

tasyāstravarṣāṇyahamuttamāstrai- | rvihatya sarvāṇi raṇe'bhibhūya | kāyācchiraḥ sarpaviṣāgnikalpaiḥ | śarottamairunmathitā'smi rāma

हे राम, मैं अपने उत्तम अस्त्रों से उसकी सारी अस्त्र-वर्षा नष्ट करके, युद्ध में उसे परास्त कर, सर्प के विष और अग्नि के समान उत्तम बाणों से उसका सिर धड़ से अलग कर दूँगा।

श्लोक 10 (3.121.10)

खड्गेन चाहं निशितेन सङ्ख्ये । कायाच्छिरस्तस्य बलात्प्रमथ्य । ततोऽस्य सर्वाननुगान्हनिष्ये । दुर्योधनं चापि कुरूश्च सर्वान् ॥

khaḍgena cāhaṃ niśitena saṅkhye | kāyācchirastasya balātpramathya | tato'sya sarvānanugānhaniṣye | duryodhanaṃ cāpi kurūśca sarvān

अथवा युद्ध में तीखी तलवार से बलपूर्वक उसका सिर धड़ से काट डालूँगा; फिर उसके सब अनुयायियों को, दुर्योधन को भी और समस्त कौरवों को मार डालूँगा।

श्लोक 11 (3.121.11)

आत्तायुधं मामिह रौहिणेय । पश्यन्तु भैमा युधि जातहर्षाः । निघ्नन्तमेकं कुरुयोधमुख्या- । नग्निं महाकक्षमिवान्तकाले ॥

āttāyudhaṃ māmiha rauhiṇeya | paśyantu bhaimā yudhi jātaharṣāḥ | nighnantamekaṃ kuruyodhamukhyā- | nagniṃ mahākakṣamivāntakāle

हे रोहिणीनन्दन, युद्ध में हर्षित भैम योद्धा मुझे यहाँ हथियार उठाए, अकेले ही प्रमुख कौरव योद्धाओं का संहार करते हुए वैसे ही देखें, जैसे प्रलयकाल में अग्नि किसी विशाल सूखे वन को भस्म कर देती है।

श्लोक 12 (3.121.12)

प्रद्युम्नमुक्तान्निशितान्न शक्ताः । सोढुं कृपद्रोणविकर्णकर्णाः । जानासि वीर्यं च तवात्मजस्य । कार्ष्णिर्भवत्येव यथा रणस्थः ॥

pradyumnamuktānniśitānna śaktāḥ | soḍhuṃ kṛpadroṇavikarṇakarṇāḥ | jānāsi vīryaṃ ca tavātmajasya | kārṣṇirbhavatyeva yathā raṇasthaḥ

प्रद्युम्न के छोड़े हुए तीखे बाणों को कृप, द्रोण, विकर्ण और कर्ण सहन नहीं कर सकते। आप अपने इस पुत्र का पराक्रम जानते हैं; रणभूमि में खड़ा होने पर यह कृष्णपुत्र ठीक अपने पिता जैसा हो जाता है।

श्लोक 13 (3.121.13)

साम्बः ससूतं सरथं भुजाभ्यां । दुःशासनं शास्तु बलात्प्रमथ्य । न विद्यते जाम्बवतीसुतस्य । रणेऽविषह्यं हि रणोत्कटस्य ॥

sāmbaḥ sasūtaṃ sarathaṃ bhujābhyāṃ | duḥśāsanaṃ śāstu balātpramathya | na vidyate jāmbavatīsutasya | raṇe'viṣahyaṃ hi raṇotkaṭasya

साम्ब अपनी दोनों भुजाओं से दुःशासन को उसके सारथि और रथ सहित बलपूर्वक मथकर दण्ड दे। रण में उग्र जाम्बवतीनन्दन के लिए युद्ध में कुछ भी असह्य नहीं है।

श्लोक 14 (3.121.14)

एतेन बालेन हि शम्बरस्य । दैत्यस्य सैन्यं सहसा प्रणुन्नम् । हतः स पापो युधि केवलेन । युद्धेऽद्वितीयो हरितुल्यवीर्यः ॥

etena bālena hi śambarasya | daityasya sainyaṃ sahasā praṇunnam | hataḥ sa pāpo yudhi kevalena | yuddhe'dvitīyo haritulyavīryaḥ

इसी बालक ने दैत्य शम्बर की सेना को सहसा खदेड़ दिया था; युद्ध में अद्वितीय और हरि के समान पराक्रमी इस वीर ने अकेले ही उस पापी को युद्ध में मार डाला था।

श्लोक 15 (3.121.15)

वृत्तोरुरत्यायतपीनबाहु- । रेतेन सङ्ख्ये निहतोऽश्वचक्रः । को नाम साम्बस्य महारथस्य । रणे समक्षं रथमभ्युदीयात् ॥

vṛttoruratyāyatapīnabāhu- | retena saṅkhye nihato'śvacakraḥ | ko nāma sāmbasya mahārathasya | raṇe samakṣaṃ rathamabhyudīyāt

इसी ने गोल जाँघों और लम्बी, पुष्ट भुजाओं वाले अश्वचक्र को युद्ध में मार गिराया था। महारथी साम्ब के रथ के सामने युद्ध में आमने-सामने भला कौन जा सकता है?

श्लोक 16 (3.121.16)

यथा प्रविश्यान्तरमन्तकस्य । काले मनुष्यो न विनिष्क्रमेत । तथा प्रविश्यान्तरमस्य सङ्ख्ये । को नाम जीवन्पुनराव्रजेच्च ॥

yathā praviśyāntaramantakasya | kāle manuṣyo na viniṣkrameta | tathā praviśyāntaramasya saṅkhye | ko nāma jīvanpunarāvrajecca

जैसे काल आने पर यमराज के मुख में प्रवेश करके मनुष्य फिर बाहर नहीं निकलता, वैसे ही युद्ध में इसकी पहुँच में आकर कौन जीवित लौट सकता है?

श्लोक 17 (3.121.17)

द्रोणं च भीष्मं च महारथौ तौ । सुतैर्वृतं चाप्यथ सोमदत्तम् । सर्वाणि सैन्यानि च वासुदेवः । प्रधक्ष्यते सायकवह्निजालैः ॥

droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca mahārathau tau | sutairvṛtaṃ cāpyatha somadattam | sarvāṇi sainyāni ca vāsudevaḥ | pradhakṣyate sāyakavahnijālaiḥ

वासुदेव अपने बाणरूपी अग्नि-जालों से द्रोण और भीष्म, इन दोनों महारथियों को, पुत्रों से घिरे सोमदत्त को और सारी सेनाओं को भस्म कर डालेंगे।

श्लोक 18 (3.121.18)

किंनाम लोकेषु विषह्यमस्ति । कृष्णस्य सर्वेषु सदेवकेषु । आत्तायुधस्योत्तमबाणपाणे- । श्चक्रायुधस्याप्रतिमस्य युद्धे ॥

kiṃnāma lokeṣu viṣahyamasti | kṛṣṇasya sarveṣu sadevakeṣu | āttāyudhasyottamabāṇapāṇe- | ścakrāyudhasyāpratimasya yuddhe

देवताओं सहित समस्त लोकों में ऐसा क्या है जो हथियार उठाए, हाथ में उत्तम बाण लिए, चक्रधारी और युद्ध में अनुपम श्रीकृष्ण के सामने टिक सके?

श्लोक 19 (3.121.19)

ततोऽनिरुद्धोऽप्यसिचर्मपाणि- । र्महीमिमां धार्तराष्ट्रैर्विसंज्ञैः । हृतोत्तमाङ्गैर्निहतैः करोतु । कीर्णाङ्कुशैर्वेदिमिवाध्वरेषु ॥

tato'niruddho'pyasicarmapāṇi- | rmahīmimāṃ dhārtarāṣṭrairvisaṃjñaiḥ | hṛtottamāṅgairnihataiḥ karotu | kīrṇāṅkuśairvedimivādhvareṣu

फिर अनिरुद्ध भी हाथ में ढाल-तलवार लेकर इस पृथ्वी को धृतराष्ट्र के मारे गए, अचेत और सिर कटे पुत्रों से वैसे ही ढक दें, जैसे यज्ञों में वेदी कुशों से ढकी जाती है।

श्लोक 20 (3.121.20)

गदोल्मुकौ बाहुकभानुनीथाः । शूरश्च सङ्ख्ये निशठः कुमारः । रणोत्कटौ सारणचारुदेष्णौ । कुलोचितं विप्रथयन्तु कर्म ॥

gadolmukau bāhukabhānunīthāḥ | śūraśca saṅkhye niśaṭhaḥ kumāraḥ | raṇotkaṭau sāraṇacārudeṣṇau | kulocitaṃ viprathayantu karma

गद और उल्मुक, बाहुक, भानु और नीथ, युद्ध में शूर कुमार निशठ, तथा रण में उग्र सारण और चारुदेष्ण, ये सब अपने कुल के योग्य पराक्रम प्रकट करें।

श्लोक 21 (3.121.21)

सवृष्णिभोजान्धकयोधमुख्या । समागता सात्वतशूरसेना । हत्वा रणे तान्धृतराष्ट्रपुत्रा- । न्लोके यशः स्फीतमुपाकरोतु ॥

savṛṣṇibhojāndhakayodhamukhyā | samāgatā sātvataśūrasenā | hatvā raṇe tāndhṛtarāṣṭraputrā- | nloke yaśaḥ sphītamupākarotu

वृष्णि, भोज और अन्धक वंश के प्रमुख योद्धाओं सहित एकत्र हुई सात्वत वीरों की सेना युद्ध में धृतराष्ट्र के उन पुत्रों को मारकर संसार में विपुल यश प्राप्त करे।

श्लोक 22 (3.121.22)

ततोऽभिमन्युः पृथिवीं प्रशास्तु । यावद्व्रतं धर्मभृतांवरिष्ठः । युधिष्ठिरः पारयते महात्मा । द्यूते यथोक्तं कुरुसत्तमेन ॥

tato'bhimanyuḥ pṛthivīṃ praśāstu | yāvadvrataṃ dharmabhṛtāṃvariṣṭhaḥ | yudhiṣṭhiraḥ pārayate mahātmā | dyūte yathoktaṃ kurusattamena

तब तक अभिमन्यु पृथ्वी का शासन करे, जब तक धर्मधारियों में श्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिर उस व्रत को पूरा करते हैं, जिसे कुरुश्रेष्ठ ने द्यूत के समय स्वीकार किया था।

श्लोक 23 (3.121.23)

अस्मत्प्रमुक्तैर्विशिखैर्जितारि- । स्ततो महीं भोक्ष्यति धर्मराजः । निर्धार्तराष्ट्रां हतसूतपुत्रा- । मेतद्धि नः कृत्यतमं यशस्यम् ॥

asmatpramuktairviśikhairjitāri- | stato mahīṃ bhokṣyati dharmarājaḥ | nirdhārtarāṣṭrāṃ hatasūtaputrā- | metaddhi naḥ kṛtyatamaṃ yaśasyam

फिर हमारे छोड़े बाणों से शत्रुओं के जीत लिए जाने पर धर्मराज धृतराष्ट्र के पुत्रों से रहित और सूतपुत्र के मारे जाने के बाद की पृथ्वी का उपभोग करेंगे। यही हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है और यही यश देने वाला है।

वासुदेव उवाच

श्लोक 24 (3.121.24)

असंशयं माधव सत्यमेत- । द्गृह्णीम ते वाक्यमदीनसत्व । स्वाभ्यां भुजाभ्यामजितां तु भूमिं । नेच्छेत्कुरूणामृषभः कथंचित् ॥

asaṃśayaṃ mādhava satyameta- | dgṛhṇīma te vākyamadīnasatva | svābhyāṃ bhujābhyāmajitāṃ tu bhūmiṃ | necchetkurūṇāmṛṣabhaḥ kathaṃcit

हे माधव, निःसन्देह यह सत्य है; हे उदारचित्त, हम तुम्हारी बात स्वीकार करते हैं। परन्तु कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपनी भुजाओं से न जीती गई भूमि को किसी भी प्रकार नहीं चाहेंगे।

श्लोक 25 (3.121.25)

न ह्येष कामान्न भयान्न लोभा- । द्युधिष्ठिरो जातु जह्यात्स्वधर्मम् । भीमार्जुनौ चातिरथौ यमौ च । तथैव कृष्णा द्रुपदात्मजेयम् ॥

na hyeṣa kāmānna bhayānna lobhā- | dyudhiṣṭhiro jātu jahyātsvadharmam | bhīmārjunau cātirathau yamau ca | tathaiva kṛṣṇā drupadātmajeyam

युधिष्ठिर काम, भय या लोभ से कभी अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे; न अतिरथी भीम और अर्जुन, न दोनों जुड़वाँ भाई, और न यह द्रुपदकुमारी कृष्णा ही ऐसा करेगी।

श्लोक 26 (3.121.26)

उभौ हि युद्धेऽप्रतिमौ पृथिव्यां । वृकोदरश्चैव धनंजयश्च । कस्मान्न कृत्स्नां पृथिवीं प्रशासे- । न्माद्रीसुताभ्यां च पुरस्कृतोऽयम् ॥

ubhau hi yuddhe'pratimau pṛthivyāṃ | vṛkodaraścaiva dhanaṃjayaśca | kasmānna kṛtsnāṃ pṛthivīṃ praśāse- | nmādrīsutābhyāṃ ca puraskṛto'yam

पृथ्वी पर वृकोदर और धनंजय दोनों ही युद्ध में अप्रतिम हैं; फिर इनके और माद्री के दोनों पुत्रों के द्वारा आगे किए गए ये युधिष्ठिर समूची पृथ्वी पर शासन क्यों न करेंगे?

श्लोक 27 (3.121.27)

यदा तु पाञ्चालपतिर्महात्मा । सकेकयश्चेदिपतिर्वयं च । युध्येम विक्रम्य रणे समेता- । स्तदैव सर्वे रिपवो हि न स्युः ॥

yadā tu pāñcālapatirmahātmā | sakekayaścedipatirvayaṃ ca | yudhyema vikramya raṇe sametā- | stadaiva sarve ripavo hi na syuḥ

जब महात्मा पांचालराज, केकयराज, चेदिराज और हम सब एक साथ मिलकर रण में पराक्रमपूर्वक युद्ध करेंगे, तभी सारे शत्रु समाप्त हो जाएँगे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 28 (3.121.28)

नेदं चित्रं माधव यद्ब्रवीषि । सत्यं तु मे रक्ष्यतमं न राज्यम् । कृष्णस्तु मां वेद यथावदेकः । कृष्णं च वेदाहमथो यथावत् ॥

nedaṃ citraṃ mādhava yadbravīṣi | satyaṃ tu me rakṣyatamaṃ na rājyam | kṛṣṇastu māṃ veda yathāvadekaḥ | kṛṣṇaṃ ca vedāhamatho yathāvat

हे माधव, तुम जो कह रहे हो उसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं; परन्तु मेरे लिए सबसे बढ़कर रक्षा करने योग्य सत्य है, राज्य नहीं। केवल श्रीकृष्ण ही मुझे ठीक-ठीक जानते हैं, और मैं भी श्रीकृष्ण को ठीक-ठीक जानता हूँ।

श्लोक 29 (3.121.29)

यदैव कालं पुरुषप्रवीरो । वेत्स्यत्ययं माधव विक्रमस्य । तदा रणे त्वं च शिनिप्रवीर । सुयोधनं जेष्यसि केशवश्च ॥

yadaiva kālaṃ puruṣapravīro | vetsyatyayaṃ mādhava vikramasya | tadā raṇe tvaṃ ca śinipravīra | suyodhanaṃ jeṣyasi keśavaśca

हे माधव, जब ये पुरुषश्रेष्ठ जान लेंगे कि पराक्रम का समय आ गया है, तब हे शिनिवंश के वीर, तुम और केशव युद्ध में सुयोधन को जीत लोगे।

श्लोक 30 (3.121.30)

प्रतिप्रयान्त्वद्य दशार्हवीरा । दृष्टोऽस्मि नाथैर्नरलोकनाथैः । धर्मेऽप्रमादं कुरुताप्रमेया । द्रष्टाऽस्मि भूयः सुखिनः समेतान् ॥

pratiprayāntvadya daśārhavīrā | dṛṣṭo'smi nāthairnaralokanāthaiḥ | dharme'pramādaṃ kurutāprameyā | draṣṭā'smi bhūyaḥ sukhinaḥ sametān

दाशार्ह वीर आज लौट जाएँ। मनुष्यलोक के रक्षक आप सब मेरे रक्षकों ने मुझे दर्शन दिए हैं। हे अपरिमित बल वालो, धर्म में प्रमाद न करना; मैं फिर आप सबको सुखी और एक साथ देखूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (3.121.31)

तेऽन्योन्यमामन्त्र्य तथाऽभिवाद्य । वृद्धान्परिष्वज्य शिशूंश्च सर्वान् । यदुप्रवीराः स्वगृहाणि जग्मु- । स्ते चापि तीर्थान्यनुसंविचेरुः ॥

te'nyonyamāmantrya tathā'bhivādya | vṛddhānpariṣvajya śiśūṃśca sarvān | yadupravīrāḥ svagṛhāṇi jagmu- | ste cāpi tīrthānyanusaṃviceruḥ

तब एक-दूसरे से विदा लेकर, अभिवादन करके और बड़ों तथा सब बालकों को गले लगाकर यदुवंशी वीर अपने-अपने घर चले गए, और पाण्डव भी तीर्थों में विचरने लगे।

श्लोक 32 (3.121.32)

विसृज्य वृष्णीननु धर्मराजो । विदर्भराजोपचितां सुतीर्थाम् । जगाम पुण्यां सरितं पयोष्णीं । सभ्रातृभृत्यः सह लोमशेन ॥

visṛjya vṛṣṇīnanu dharmarājo | vidarbharājopacitāṃ sutīrthām | jagāma puṇyāṃ saritaṃ payoṣṇīṃ | sabhrātṛbhṛtyaḥ saha lomaśena

वृष्णियों को विदा करके धर्मराज अपने भाइयों, सेवकों और लोमश के साथ विदर्भराज द्वारा सँवारे गए उत्तम घाटों वाली पवित्र नदी पयोष्णी पर गए।

श्लोक 33 (3.121.33)

सुतेन सोमेन विमिश्रतोयां । पयः पयोष्णीं प्रति सोऽध्युवास । द्विजातिमुख्यैर्मुदितैर्महात्मा । संस्तूयमानः स्तुतिभिर्वराभिः ॥

sutena somena vimiśratoyāṃ | payaḥ payoṣṇīṃ prati so'dhyuvāsa | dvijātimukhyairmuditairmahātmā | saṃstūyamānaḥ stutibhirvarābhiḥ

निचोड़े गए सोमरस से मिश्रित जल वाली पयोष्णी के तट पर वह महात्मा राजा केवल उसका जल पीकर रहे, और प्रसन्न श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्तम स्तुतियों से उनकी प्रशंसा करते रहे।

अध्याय 120अध्याय-सूचीअध्याय 122