Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 122

पयोष्णी तट पर गय के यज्ञ

लोमश युधिष्ठिर को पयोष्णी के तट पर राजा गय के सात अश्वमेध यज्ञों का वर्णन सुनाते हैं, जिनमें हर पात्र और यूप सोने का था और ब्राह्मणों को दी गई दक्षिणा अगणित थी; वे बताते हैं कि वहाँ स्नान करने से मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। पाण्डव स्नान करके वैदूर्य पर्वत और नर्मदा की ओर बढ़ते हैं, जहाँ लोमश त्रेता और द्वापर की सन्धि तथा शर्याति के यज्ञ का वह स्थान दिखाते हैं, जहाँ च्यवन ने इन्द्र को स्तम्भित किया था और अश्विनीकुमारों को सोमपान का अधिकारी बनाया था। युधिष्ठिर पूरी कथा सुनना चाहते हैं।

अध्याय 121अध्याय-सूचीअध्याय 123

लोमश उवाच

श्लोक 1 (3.122.1)

गयेन यजमानेन सोमेनेह पुरंदरः । तर्पितः श्रूयते राजन्स तृप्तो मुदमभ्यगात् ॥

gayena yajamānena someneha puraṃdaraḥ | tarpitaḥ śrūyate rājansa tṛpto mudamabhyagāt

हे राजन्, सुना जाता है कि यहीं यज्ञ करते हुए गय ने सोमरस से इन्द्र को तृप्त किया था, और तृप्त होकर इन्द्र आनन्दित हो उठे थे।

श्लोक 2 (3.122.2)

इह देवैः सहेन्द्रैश्च प्रजापतिभिरेव च । इष्टं बहुविधैर्यज्ञैर्महद्भिर्भूरिदक्षिणैः ॥

iha devaiḥ sahendraiśca prajāpatibhireva ca | iṣṭaṃ bahuvidhairyajñairmahadbhirbhūridakṣiṇaiḥ

यहीं इन्द्र सहित देवताओं ने और प्रजापतियों ने भी बहुत-सी दक्षिणाओं वाले अनेक प्रकार के महान यज्ञ किए थे।

श्लोक 3 (3.122.3)

आधूर्तरजसश्चेह राजा वज्रधरं प्रभुः । तर्पयामास सोमेन हयमेधेषु सप्तसु ॥

ādhūrtarajasaśceha rājā vajradharaṃ prabhuḥ | tarpayāmāsa somena hayamedheṣu saptasu

और यहीं आधूर्तरजा के पुत्र राजा गय ने सात अश्वमेध यज्ञों में वज्रधारी प्रभु इन्द्र को सोमरस से तृप्त किया था।

श्लोक 4 (3.122.4)

तस्य सप्तसु यज्ञेषु सर्वमासीद्धिरण्ययम् । वानस्पत्यं च भौमं च यद्द्रव्यं नियतं मखे ॥

tasya saptasu yajñeṣu sarvamāsīddhiraṇyayam | vānaspatyaṃ ca bhaumaṃ ca yaddravyaṃ niyataṃ makhe

उनके सातों यज्ञों में, यज्ञ के लिए नियत जो भी लकड़ी या मिट्टी की सामग्री होती है, वह सब सोने की बनी थी।

श्लोक 5 (3.122.5)

चषालयूपचमसाः स्थाल्यः पात्र्यः स्रुचः स्रुवाः । तेष्वेव चास्य यज्ञेषु प्रयोगाः सप्त विश्रुताः ॥

caṣālayūpacamasāḥ sthālyaḥ pātryaḥ srucaḥ sruvāḥ | teṣveva cāsya yajñeṣu prayogāḥ sapta viśrutāḥ

यूपों के कड़े, यूप, सोमपान के चमस, स्थालियाँ, पात्र, स्रुच और स्रुव, सब सोने के थे; और उन्हीं यज्ञों में उनके सात प्रसिद्ध प्रयोग सम्पन्न हुए थे।

श्लोक 6 (3.122.6)

सप्तैकैकस्य यूपस्य चषालाश्चोपरि स्थिताः । तस्य स्म यूपान्यज्ञेषु भ्राजमानान्हिरण्मयान् । स्वयमुत्थापयामासुर्देवाः सेन्द्रा युधिष्ठिर ॥

saptaikaikasya yūpasya caṣālāścopari sthitāḥ | tasya sma yūpānyajñeṣu bhrājamānānhiraṇmayān | svayamutthāpayāmāsurdevāḥ sendrā yudhiṣṭhira

प्रत्येक यूप के ऊपर सात-सात चषाल लगे थे। हे युधिष्ठिर, उन यज्ञों में उनके चमचमाते स्वर्णमय यूपों को इन्द्र सहित देवताओं ने स्वयं खड़ा किया था।

श्लोक 7 (3.122.7)

तेषु तस्य मखाग्र्येषु गयस्य पृथिवीपतेः । अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ॥

teṣu tasya makhāgryeṣu gayasya pṛthivīpateḥ | amādyadindraḥ somena dakṣiṇābhirdvijātayaḥ

पृथ्वीपति गय के उन श्रेष्ठ यज्ञों में इन्द्र सोमरस से मतवाले हो गए और ब्राह्मण दक्षिणाओं से।

श्लोक 8 (3.122.8)

प्रसङ्ख्यानानसङ्ख्येयान्प्रत्यगृह्णन्द्विजातयः ॥

prasaṅkhyānānasaṅkhyeyānpratyagṛhṇandvijātayaḥ

ब्राह्मणों ने सोने के अनगिनत बड़े-बड़े माप ग्रहण किए।

श्लोक 9 (3.122.9)

सिकता वा यथा लोके यथावा दिवि तारकाः । यथा वा वर्षतो धारा असङ्ख्येयाः स्म केनचित् ॥

sikatā vā yathā loke yathāvā divi tārakāḥ | yathā vā varṣato dhārā asaṅkhyeyāḥ sma kenacit

जैसे संसार में बालू के कण, आकाश में तारे, या बरसते मेघ की धाराएँ किसी के द्वारा गिनी नहीं जा सकतीं,

श्लोक 10 (3.122.10)

तथैव तदसङ्ख्येयं धनं यत्प्रददौ गयः । सदस्येभ्यो महाराज तेषु यज्ञेषु सप्तसु ॥

tathaiva tadasaṅkhyeyaṃ dhanaṃ yatpradadau gayaḥ | sadasyebhyo mahārāja teṣu yajñeṣu saptasu

वैसे ही, हे महाराज, उन सात यज्ञों में गय ने सदस्यों को जो धन दिया, वह भी अगणित था।

श्लोक 11 (3.122.11)

भवेत्सङ्ख्येयमेतद्धि यदेतत्परिकीर्तितम् । न तस्य शक्याः सङ्ख्यातुं दक्षिणादक्षिणावतः ॥

bhavetsaṅkhyeyametaddhi yadetatparikīrtitam | na tasya śakyāḥ saṅkhyātuṃ dakṣiṇādakṣiṇāvataḥ

जिन वस्तुओं का अभी वर्णन किया गया, वे शायद गिनी भी जा सकें, पर उस उदार दाता की दक्षिणाएँ गिनी नहीं जा सकती थीं।

श्लोक 12 (3.122.12)

हिरण्मयीभिर्गोभिश्च कृताभिर्विश्वकर्मणा । ब्राह्मणांस्तर्पयामास नानादिग्भ्यः समागतान् ॥

hiraṇmayībhirgobhiśca kṛtābhirviśvakarmaṇā | brāhmaṇāṃstarpayāmāsa nānādigbhyaḥ samāgatān

विश्वकर्मा द्वारा बनाई गई सोने की गौओं से उन्होंने अनेक दिशाओं से आए ब्राह्मणों को तृप्त किया।

श्लोक 13 (3.122.13)

अल्पावशेषा पृथिवी चैत्यैरासीत्समाचिता । गयस्य यजमानस्य तत्रतत्र विशांपते ॥

alpāvaśeṣā pṛthivī caityairāsītsamācitā | gayasya yajamānasya tatratatra viśāṃpate

हे प्रजानाथ, यज्ञ करते हुए गय के बनवाए यज्ञ-स्थलों से पृथ्वी जगह-जगह ऐसी भर गई थी कि उसका थोड़ा ही भाग खाली बचा।

श्लोक 14 (3.122.14)

स लोकान्प्राप्तवानैन्द्रान्कर्मणा तेन भरत । सलोकतां तस्य गच्छेत्पयोष्ण्यां य उपस्पृशेत् ॥

sa lokānprāptavānaindrānkarmaṇā tena bharata | salokatāṃ tasya gacchetpayoṣṇyāṃ ya upaspṛśet

हे भारत, उस कर्म से उन्होंने इन्द्र के लोक प्राप्त किए; जो पयोष्णी में स्नान करता है, वह उन्हीं के लोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 15 (3.122.15)

तस्मात्त्वमत्र राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितोऽच्युत । उपस्पृश्य महीपाल धूतपाप्मा भविष्यसि ॥

tasmāttvamatra rājendra bhrātṛbhiḥ sahito'cyuta | upaspṛśya mahīpāla dhūtapāpmā bhaviṣyasi

इसलिए हे राजेन्द्र, हे अच्युत, अपने भाइयों के साथ यहाँ स्नान करो; हे महीपाल, तुम पापों से मुक्त हो जाओगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (3.122.16)

स पयोष्ण्यां नरश्रेष्ठः स्नात्वा वै भ्रातृभिः सह । वैदूर्यपर्वतं चैव नर्मदां च महानदीम् ॥

sa payoṣṇyāṃ naraśreṣṭhaḥ snātvā vai bhrātṛbhiḥ saha | vaidūryaparvataṃ caiva narmadāṃ ca mahānadīm

नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ पयोष्णी में स्नान किया, और फिर वैदूर्य पर्वत तथा महानदी नर्मदा

श्लोक 17 (3.122.17)

उद्दिश्य पाण्डवश्रेष्ठः स प्रतस्थे महीपतिः । समागमत तेजस्वी भ्रातृभिः सहितोऽनघ ॥

uddiśya pāṇḍavaśreṣṭhaḥ sa pratasthe mahīpatiḥ | samāgamata tejasvī bhrātṛbhiḥ sahito'nagha

को लक्ष्य करके पाण्डवश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर चल पड़े; हे निष्पाप, वह तेजस्वी राजा अपने भाइयों के साथ वहाँ जा पहुँचे।

श्लोक 18 (3.122.18)

तत्रास्य सर्वाण्याचख्यौ लोमशो भगवानृषिः । तीर्थानि रमणीयानि पुण्यान्यायतनानि च ॥

tatrāsya sarvāṇyācakhyau lomaśo bhagavānṛṣiḥ | tīrthāni ramaṇīyāni puṇyānyāyatanāni ca

वहाँ भगवान् लोमश ऋषि ने उन्हें सब रमणीय तीर्थों और पवित्र देवस्थानों के बारे में बताया।

श्लोक 19 (3.122.19)

यथायोगं यथाप्रीति प्रययौ भ्रातृभिः सह । तत्रतत्राददद्वित्तं ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः ॥

yathāyogaṃ yathāprīti prayayau bhrātṛbhiḥ saha | tatratatrādadadvittaṃ brāhmaṇebhyaḥ sahasraśaḥ

वे अपने भाइयों के साथ सुविधा और रुचि के अनुसार आगे बढ़ते गए और जगह-जगह ब्राह्मणों को हज़ारों की संख्या में धन देते गए।

लोमश उवाच

श्लोक 20 (3.122.20)

देवानामेति कौन्तेय तथा राज्ञां सलोकताम् । वैदूर्यपर्वतं दृष्ट्वा नर्मदामवतीर्य च ॥

devānāmeti kaunteya tathā rājñāṃ salokatām | vaidūryaparvataṃ dṛṣṭvā narmadāmavatīrya ca

हे कुन्तीनन्दन, वैदूर्य पर्वत का दर्शन करके और नर्मदा में उतरकर मनुष्य देवताओं और राजाओं के लोक प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (3.122.21)

सन्धिरेष नरश्रेष्ठ त्रेताया द्वापरस्य च । एनमासाद्य कौन्तेय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

sandhireṣa naraśreṣṭha tretāyā dvāparasya ca | enamāsādya kaunteya sarvapāpaiḥ pramucyate

हे नरश्रेष्ठ, यह त्रेता और द्वापर युगों की सन्धि है; हे कौन्तेय, यहाँ पहुँचकर मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 22 (3.122.22)

एष शर्यातियज्ञस्य देशस्तात प्रकाशते । साक्षाद्यत्रापिबत्सोममश्विभ्यां सह वासवः ॥

eṣa śaryātiyajñasya deśastāta prakāśate | sākṣādyatrāpibatsomamaśvibhyāṃ saha vāsavaḥ

हे तात, यह शर्याति के यज्ञ का स्थान दिखाई दे रहा है, जहाँ इन्द्र ने अश्विनीकुमारों के साथ स्वयं सोमपान किया था।

श्लोक 23 (3.122.23)

चुकोप भार्गवश्चापि महेन्द्रस्य महातपाः । संस्तम्भयामास च तं वासवं च्यवनः प्रभुः ॥

cukopa bhārgavaścāpi mahendrasya mahātapāḥ | saṃstambhayāmāsa ca taṃ vāsavaṃ cyavanaḥ prabhuḥ

और महातपस्वी भार्गव महेन्द्र पर क्रुद्ध हो गए थे; उन समर्थ च्यवन ने स्वयं इन्द्र को स्तम्भित कर दिया था।

श्लोक 24 (3.122.24)

सुकन्यां चापि भार्यां स राजपुत्रीमवाप्तवान् । नासत्यौ च महाभाग कृतवान्सोमपीथिनौ ॥

sukanyāṃ cāpi bhāryāṃ sa rājaputrīmavāptavān | nāsatyau ca mahābhāga kṛtavānsomapīthinau

उन्होंने राजकुमारी सुकन्या को पत्नी रूप में प्राप्त किया, और हे महाभाग, उन्होंने दोनों नासत्यों को सोमपान का अधिकारी बनाया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 25 (3.122.25)

कथं विष्टम्भितस्तेन भगवान्पाकशासनः । किमर्थं भार्गवश्चापि कोपं चक्रे महातपाः ॥

kathaṃ viṣṭambhitastena bhagavānpākaśāsanaḥ | kimarthaṃ bhārgavaścāpi kopaṃ cakre mahātapāḥ

उन्होंने भगवान् पाकशासन इन्द्र को कैसे स्तम्भित कर दिया? और महातपस्वी भार्गव ने क्रोध क्यों किया?

श्लोक 26 (3.122.26)

नासत्यौ च कथं ब्रह्मन्कृतवान्सोमपीथिनौ । एतत्सर्वं यथावृत्तमाख्यातु भगवान्मम ॥

nāsatyau ca kathaṃ brahmankṛtavānsomapīthinau | etatsarvaṃ yathāvṛttamākhyātu bhagavānmama

और हे ब्रह्मन्, उन्होंने नासत्यों को सोमपान का अधिकारी कैसे बनाया? आप यह सब जैसा हुआ था, वैसा मुझे बताइए।

अध्याय 121अध्याय-सूचीअध्याय 123