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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 123

सुकन्या द्वारा च्यवन के नेत्र-भेदन

लोमश बताते हैं कि भृगुपुत्र च्यवन एक सरोवर के समीप इतने लम्बे समय तक तप करते खड़े रहे कि उनके ऊपर बाँबी बन गई। राजा शर्याति अपने परिवार के साथ वहाँ आए, और उनकी पुत्री सुकन्या ने बाँबी में चमकती दो आँखें देखकर उन्हें काँटे से बेध दिया। क्रुद्ध ऋषि ने राजा की सेना का मल-मूत्र रोक दिया; सुकन्या के बताने पर शर्याति ने क्षमा माँगी और ऋषि की माँग पर उसे उनकी पत्नी के रूप में दे दिया। सुकन्या निष्ठापूर्वक अपने पति की सेवा करने लगी।

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लोमश उवाच

श्लोक 1 (3.123.1)

भृगोर्महर्षेः पुत्रोऽभूच्च्यवनो नाम भारत । समीपे सरसस्तस्य तपस्तेपे महाद्युतिः ॥

bhṛgormaharṣeḥ putro'bhūccyavano nāma bhārata | samīpe sarasastasya tapastepe mahādyutiḥ

हे भारत, महर्षि भृगु के च्यवन नाम के पुत्र थे। उन महातेजस्वी ने इसी सरोवर के समीप तपस्या की।

श्लोक 2 (3.123.2)

स्थाणुभूतो महातेजा वीरस्थानेन पाण्डव । अतिष्ठत चिरं कालमेकदेशे विशांपते ॥

sthāṇubhūto mahātejā vīrasthānena pāṇḍava | atiṣṭhata ciraṃ kālamekadeśe viśāṃpate

हे पाण्डव, हे प्रजानाथ, वे महातेजस्वी वीरासन में स्थित होकर एक ही स्थान पर ठूँठ की भाँति बहुत समय तक खड़े रहे।

श्लोक 3 (3.123.3)

सवल्मीकोऽभवदृषिर्लताभिरिव संवृतः । कालेन महता राजन्समाकीर्णः पिपीलिकैः ॥

savalmīko'bhavadṛṣirlatābhiriva saṃvṛtaḥ | kālena mahatā rājansamākīrṇaḥ pipīlikaiḥ

हे राजन्, बहुत समय बीतने पर वे ऋषि मानो लताओं से ढके हुए, एक बाँबी से घिर गए और चींटियों से भर गए।

श्लोक 4 (3.123.4)

तथा स संवृतो धीमान्मृत्पिण्ड इव सर्वशः । तप्यते स्म तपो घोरं वल्मीकेन समावृतः ॥

tathā sa saṃvṛto dhīmānmṛtpiṇḍa iva sarvaśaḥ | tapyate sma tapo ghoraṃ valmīkena samāvṛtaḥ

इस प्रकार चारों ओर से मिट्टी के ढेले की तरह ढके हुए वे बुद्धिमान ऋषि बाँबी से घिरे हुए घोर तप करते रहे।

श्लोक 5 (3.123.5)

अथ दीर्घस्य कालस्य शर्यातिर्नाम पार्थिवः । आजगाम सरो रम्यं विहर्तुमिदमुत्तमम् ॥

atha dīrghasya kālasya śaryātirnāma pārthivaḥ | ājagāma saro ramyaṃ vihartumidamuttamam

बहुत समय के बाद शर्याति नामक राजा विहार करने के लिए इस सुन्दर और उत्तम सरोवर पर आए।

श्लोक 6 (3.123.6)

तस्य स्त्रीणां सहस्राणि चत्वार्यासन्परिग्रहः । एकैव च सुता सुभ्रूः सुकन्या नाम भारत ॥

tasya strīṇāṃ sahasrāṇi catvāryāsanparigrahaḥ | ekaiva ca sutā subhrūḥ sukanyā nāma bhārata

उनके अन्तःपुर में चार हज़ार स्त्रियाँ थीं, और हे भारत, सुन्दर भौंहों वाली सुकन्या नाम की एक ही पुत्री थी।

श्लोक 7 (3.123.7)

सा सखीभिः परिवृता दिव्याभरणभूषिता । चङ्क्रम्यमाणा वल्मीकं भार्गवस्य समासदत् ॥

sā sakhībhiḥ parivṛtā divyābharaṇabhūṣitā | caṅkramyamāṇā valmīkaṃ bhārgavasya samāsadat

सखियों से घिरी, दिव्य आभूषणों से सजी वह इधर-उधर घूमती हुई भार्गव की बाँबी के पास आ पहुँची।

श्लोक 8 (3.123.8)

सा वै वसुमतीं तत्र पश्यन्ती सुमनोरमाम् । वनस्पतीन्प्रचिन्वन्ती विजहार सखीवृता ॥

sā vai vasumatīṃ tatra paśyantī sumanoramām | vanaspatīnpracinvantī vijahāra sakhīvṛtā

वहाँ वह मनोहर भूमि को निहारती और वृक्षों से फूल चुनती हुई सखियों के साथ विहार करने लगी।

श्लोक 9 (3.123.9)

रूपेण वयसा चैव मदनेन मदेन च । बभञ्ज वनवृक्षाणां शाखाः परमपुष्पिताः ॥

rūpeṇa vayasā caiva madanena madena ca | babhañja vanavṛkṣāṇāṃ śākhāḥ paramapuṣpitāḥ

अपने रूप, यौवन, कामभाव और उमंग से प्रेरित होकर वह फूलों से लदी वन-वृक्षों की डालियाँ तोड़ने लगी।

श्लोक 10 (3.123.10)

तां सखीरहितामेकामेकवस्त्रामलंकृताम् । ददर्श भार्गवो धीमांश्चरन्तीमिव विद्युतम् ॥

tāṃ sakhīrahitāmekāmekavastrāmalaṃkṛtām | dadarśa bhārgavo dhīmāṃścarantīmiva vidyutam

बुद्धिमान भार्गव ने उसे सखियों से अलग, अकेली, एक वस्त्र पहने और अलंकृत, बिजली की तरह विचरती हुई देखा।

श्लोक 11 (3.123.11)

तां पश्यमानो विजने स रेमे परमद्युतिः । क्षामकण्ठश्च विप्रर्षिस्तपोबलसमन्वितः । तामाबभाषेकल्याणीं सा चास्य न शृणोति वै ॥

tāṃ paśyamāno vijane sa reme paramadyutiḥ | kṣāmakaṇṭhaśca viprarṣistapobalasamanvitaḥ | tāmābabhāṣekalyāṇīṃ sā cāsya na śṛṇoti vai

उस निर्जन स्थान में उसे देखते हुए वे परम तेजस्वी ऋषि प्रसन्न हुए; तपोबल से सम्पन्न उन विप्रर्षि ने क्षीण स्वर में उस कल्याणी को पुकारा, पर उसने उनकी बात नहीं सुनी।

श्लोक 12 (3.123.12)

ततः सुकन्या वल्मीके दृष्ट्वा भार्गवचक्षुषी । कौतूहलात्कण्टकेन बुद्धिमोहबलात्कृता । किंनु खल्विदमित्युक्त्वा निर्बिभेदास्य लोचने ॥

tataḥ sukanyā valmīke dṛṣṭvā bhārgavacakṣuṣī | kautūhalātkaṇṭakena buddhimohabalātkṛtā | kiṃnu khalvidamityuktvā nirbibhedāsya locane

तब बाँबी में भार्गव की आँखें देखकर, कौतूहलवश और बुद्धि के मोह से विवश होकर सुकन्या ने 'यह क्या है?' कहकर काँटे से उनकी आँखें बेध दीं।

श्लोक 13 (3.123.13)

अक्रुद्ध्यत्स तथा विद्धे नेत्रे परममन्युमान् । ततः शर्यातिसैन्यस्य शकृन्मूत्रे समावृणोत् ॥

akruddhyatsa tathā viddhe netre paramamanyumān | tataḥ śaryātisainyasya śakṛnmūtre samāvṛṇot

इस प्रकार आँखें बिंध जाने पर वे अत्यन्त क्रोध से भर उठे, और उन्होंने शर्याति की सेना का मल-मूत्र रोक दिया।

श्लोक 14 (3.123.14)

ततो रुद्धे शकृन्मूत्रे सैन्यमासीत्सुदुःखितम् । तथागतमभिप्रेक्ष्य पर्यपृच्छत्स पार्थिवः ॥

tato ruddhe śakṛnmūtre sainyamāsītsuduḥkhitam | tathāgatamabhiprekṣya paryapṛcchatsa pārthivaḥ

मल-मूत्र रुक जाने से सेना अत्यन्त दुःखी हो गई। उसकी यह दशा देखकर राजा ने पूछा:

शर्यातिरुवाच

श्लोक 15 (3.123.15)

तपोनित्यस्य वृद्धस्य रोषणस्य विशेषतः । केनापकृतमद्येह भार्गवस्य महात्मनः । ज्ञातं वा यदि वाऽज्ञातं तद्द्रुतं ब्रूत माचिरम् ॥

taponityasya vṛddhasya roṣaṇasya viśeṣataḥ | kenāpakṛtamadyeha bhārgavasya mahātmanaḥ | jñātaṃ vā yadi vā'jñātaṃ taddrutaṃ brūta māciram

सदा तप में लगे, वृद्ध और विशेष रूप से क्रोधी महात्मा भार्गव का आज यहाँ किसने अपराध किया है? जान-बूझकर हुआ हो या अनजाने में, शीघ्र बताओ, देर मत करो।

लोमश उवाच

श्लोक 16 (3.123.16)

तमूचुः सैनिकाः सर्वे न विद्मोऽपकृतं वयम् । सर्वोपायैर्यथाकामं भवांस्तदधिगच्छतु ॥

tamūcuḥ sainikāḥ sarve na vidmo'pakṛtaṃ vayam | sarvopāyairyathākāmaṃ bhavāṃstadadhigacchatu

सब सैनिकों ने उनसे कहा, 'हमें किसी अपराध का पता नहीं है। आप जैसे उचित समझें, सब उपायों से इसका पता लगाइए।'

श्लोक 17 (3.123.17)

ततः स पृथिवीपालः साम्ना चोग्रेण च स्वयम् । पर्यपृच्छत्सुहृद्वर्गं पर्यजानन्न चैव ते ॥

tataḥ sa pṛthivīpālaḥ sāmnā cogreṇa ca svayam | paryapṛcchatsuhṛdvargaṃ paryajānanna caiva te

तब राजा ने स्वयं अपने सुहृदों से नरमी और कठोरता दोनों से पूछताछ की, पर वे भी कुछ नहीं जानते थे।

श्लोक 18 (3.123.18)

आनाहार्तं ततो दृष्ट्वा तत्सैन्यमसुखार्दितम् । पितरं दुःखितं दृष्ट्वा सुकन्येदमथाब्रवीत् ॥

ānāhārtaṃ tato dṛṣṭvā tatsainyamasukhārditam | pitaraṃ duḥkhitaṃ dṛṣṭvā sukanyedamathābravīt

तब मल-मूत्र रुकने से पीड़ित और दुःख से व्याकुल सेना को तथा अपने पिता को दुःखी देखकर सुकन्या ने कहा:

सुकन्योवाच

श्लोक 19 (3.123.19)

मयाऽटन्त्येह वल्मीके दृष्टं सत्वमभिज्वलत् । खद्योतवदभिज्ञातं तन्मया विद्धमन्तिकात् ॥

mayā'ṭantyeha valmīke dṛṣṭaṃ satvamabhijvalat | khadyotavadabhijñātaṃ tanmayā viddhamantikāt

यहाँ घूमते हुए मैंने एक बाँबी में किसी जीव को चमकते देखा। उसे जुगनू समझकर मैंने पास जाकर उसे बेध दिया।

लोमश उवाच

श्लोक 20 (3.123.20)

एतच्छ्रुत्वा तु वल्मीकं शर्यातिस्तूर्णमभ्ययात् । तत्रापश्यत्तपोवृद्धं चन्द्रादित्यसमप्रभम् ॥

etacchrutvā tu valmīkaṃ śaryātistūrṇamabhyayāt | tatrāpaśyattapovṛddhaṃ candrādityasamaprabham

यह सुनकर शर्याति तुरन्त बाँबी के पास गए और वहाँ उन्होंने तप में बढ़े-चढ़े, चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रभा वाले ऋषि को देखा।

श्लोक 21 (3.123.21)

अयाचदथ सैन्यार्थं प्राञ्जलिः पृथिवीपतिः । अज्ञानाद्बालया यत्ते कृतं तत्क्षन्तुमर्हसि ॥

ayācadatha sainyārthaṃ prāñjaliḥ pṛthivīpatiḥ | ajñānādbālayā yatte kṛtaṃ tatkṣantumarhasi

तब पृथ्वीपति ने सेना के लिए हाथ जोड़कर याचना की, 'मेरी बालिका ने अनजाने में आपके साथ जो किया है, उसे आप क्षमा करें।'

श्लोक 22 (3.123.22)

ततोऽब्रवीन्महीपालं च्यवनो भार्गवस्तदा । अपमानादहं विद्धो ह्यनया दर्पपूर्णया ॥

tato'bravīnmahīpālaṃ cyavano bhārgavastadā | apamānādahaṃ viddho hyanayā darpapūrṇayā

तब भार्गव च्यवन ने राजा से कहा, 'इस घमंड से भरी कन्या ने अपमान करते हुए मुझे बेधा है।'

च्यवन उवाच

श्लोक 23 (3.123.23)

रूपौदार्यसमायुक्तां लोभमोहबलात्कृताम् । तामेव प्रतिगृह्याहं राजन्दुहितरं तव । क्षंस्यामीति महीपाल सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

rūpaudāryasamāyuktāṃ lobhamohabalātkṛtām | tāmeva pratigṛhyāhaṃ rājanduhitaraṃ tava | kṣaṃsyāmīti mahīpāla satyametadbravīmi te

यह रूप और उदारता से सम्पन्न है और लोभ तथा मोह के वश होकर इसने यह किया है। हे राजन्, तुम्हारी इसी पुत्री को पाकर मैं क्षमा करूँगा; हे महीपाल, यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।

लोमश उवाच

श्लोक 24 (3.123.24)

ऋषेर्वचनमाज्ञाय शर्यातिरविचारयन् । ददौ दुहितरं तस्मै च्यवनाय महात्मने ॥

ṛṣervacanamājñāya śaryātiravicārayan | dadau duhitaraṃ tasmai cyavanāya mahātmane

ऋषि के वचन सुनकर शर्याति ने बिना कुछ सोचे-विचारे अपनी पुत्री महात्मा च्यवन को दे दी।

श्लोक 25 (3.123.25)

प्रतिगृह्य च तां कन्यां भगवान्प्रससाद ह । प्राप्तप्रसादो राजा वै ससैन्यः पुरमाव्रजत् ॥

pratigṛhya ca tāṃ kanyāṃ bhagavānprasasāda ha | prāptaprasādo rājā vai sasainyaḥ puramāvrajat

उस कन्या को पाकर भगवान् च्यवन प्रसन्न हो गए, और उनकी कृपा पाकर राजा सेना सहित अपने नगर लौट गए।

श्लोक 26 (3.123.26)

सुकन्याऽपि पतिं लब्ध्वा तपस्विनमनिन्दिता । नित्यं पर्यचरत्प्रीत्या तपसा नियमेन च ॥

sukanyā'pi patiṃ labdhvā tapasvinamaninditā | nityaṃ paryacaratprītyā tapasā niyamena ca

निर्दोष सुकन्या भी तपस्वी पति को पाकर प्रेम, तप और नियम के साथ सदा उनकी सेवा करने लगी।

श्लोक 27 (3.123.27)

अग्नीनामतिथीनां च शुश्रूषुरनसूयिका । समाराधयत क्षिप्रं च्यवनं सा शुभानना ॥

agnīnāmatithīnāṃ ca śuśrūṣuranasūyikā | samārādhayata kṣipraṃ cyavanaṃ sā śubhānanā

अग्नियों और अतिथियों की सेवा में लगी, ईर्ष्या से रहित उस सुमुखी ने शीघ्र ही च्यवन को प्रसन्न कर लिया।

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