आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 124
अश्विनीकुमारों द्वारा च्यवन को यौवन-दान
अश्विनीकुमार स्नान के बाद सुकन्या को देखते हैं और उससे आग्रह करते हैं कि वह अपने वृद्ध पति को छोड़कर उनमें से किसी एक को वर ले; सुकन्या यह कहकर मना कर देती है कि वह च्यवन में अनुरक्त है। तब वे च्यवन को युवा और रूपवान बनाने का प्रस्ताव रखते हैं, जिसके बाद उसे तीनों में से एक को चुनना होगा। च्यवन की अनुमति से तीनों सरोवर में प्रवेश करते हैं और एक-से रूप और यौवन के साथ बाहर निकलते हैं; सुकन्या अपने ही पति को चुनती है। कृतज्ञ च्यवन वचन देते हैं कि वे इन्द्र के देखते-देखते अश्विनीकुमारों को सोमपान का अधिकारी बनाएँगे।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.124.1)
कस्य चित्त्वथ कालस्य त्रिदशावश्विनौ नृप । कृताभिषेकां विवृतां सुकन्यां तामपश्यताम् ॥
kasya cittvatha kālasya tridaśāvaśvinau nṛpa | kṛtābhiṣekāṃ vivṛtāṃ sukanyāṃ tāmapaśyatām
हे राजन्, कुछ समय बाद दोनों देवता अश्विनीकुमारों ने स्नान करके निर्वस्त्र खड़ी सुकन्या को देखा।
श्लोक 2 (3.124.2)
तां दृष्ट्वा दर्शनीयाङ्गीं देवराजसुतामिव । ऊचतुः समभिद्रुत्य नासत्यावश्विनाविदम् ॥
tāṃ dṛṣṭvā darśanīyāṅgīṃ devarājasutāmiva | ūcatuḥ samabhidrutya nāsatyāvaśvināvidam
देवराज की पुत्री जैसी सुन्दर अंगों वाली उसे देखकर नासत्य अश्विनीकुमार दौड़कर उसके पास आए और बोले:
अश्विनावूचतुः
श्लोक 3 (3.124.3)
कस्य त्वमसि वामोरु वनेऽस्मिन्किं करोषि च । इच्छाव भद्रे ज्ञातुं त्वां तत्त्वमाख्याहि शोभने ॥
kasya tvamasi vāmoru vane'sminkiṃ karoṣi ca | icchāva bhadre jñātuṃ tvāṃ tattvamākhyāhi śobhane
हे सुन्दर जाँघों वाली, तुम किसकी हो और इस वन में क्या करती हो? हे भद्रे, हम तुम्हारे बारे में जानना चाहते हैं; हे शोभने, ठीक-ठीक बताओ।
लोमश उवाच
श्लोक 4 (3.124.4)
ततः सुकन्या संवीता तावुवाच सुरोत्तमौ । शर्यातितनयां वित्तं भार्यां मां च्यवनस्य च ॥
tataḥ sukanyā saṃvītā tāvuvāca surottamau | śaryātitanayāṃ vittaṃ bhāryāṃ māṃ cyavanasya ca
तब सुकन्या ने अपना शरीर ढककर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओं से कहा, 'मुझे शर्याति की पुत्री और च्यवन की पत्नी जानिए।'
सुकन्योवाच
श्लोक 5 (3.124.5)
नाम्ना चाहं सुकन्येति नृलोकेऽस्मिन्प्रतिष्ठिता । साऽहं सर्वात्मना नित्यं भर्तारमनुवर्तिनी ॥
nāmnā cāhaṃ sukanyeti nṛloke'sminpratiṣṭhitā | sā'haṃ sarvātmanā nityaṃ bhartāramanuvartinī
मैं इस मनुष्यलोक में सुकन्या नाम से प्रसिद्ध हूँ, और मैं पूरे मन से सदा अपने पति का अनुसरण करती हूँ।
लोमश उवाच
श्लोक 6 (3.124.6)
अथाश्विनौ प्रहस्यैतामब्रूतां पुनरेव तु । कथं त्वमसि कल्याणि पित्रा दत्ताऽऽगता वने ॥
athāśvinau prahasyaitāmabrūtāṃ punareva tu | kathaṃ tvamasi kalyāṇi pitrā dattā''gatā vane
तब अश्विनीकुमारों ने हँसकर उससे फिर कहा, 'हे कल्याणी, यह कैसे हुआ कि पिता ने तुम्हें दान कर दिया और तुम वन में आ गई?'
अश्विनावूचतुः
श्लोक 7 (3.124.7)
भ्राजसेऽस्मिन्वने भीरु विद्युत्सौदामनी यथा । न देवेष्वपि तुल्यां हि त्वया पश्याव भामिनि ॥
bhrājase'sminvane bhīru vidyutsaudāmanī yathā | na deveṣvapi tulyāṃ hi tvayā paśyāva bhāmini
हे भीरु, तुम इस वन में बिजली की कौंध की तरह चमक रही हो। हे भामिनी, देवियों में भी हमें तुम्हारे समान कोई दिखाई नहीं देती।
श्लोक 8 (3.124.8)
अनाभरणसंपन्ना परमाम्बरवर्जिता । शोभयस्यधिकं भद्रे वनमप्यनलंकृता ॥
anābharaṇasaṃpannā paramāmbaravarjitā | śobhayasyadhikaṃ bhadre vanamapyanalaṃkṛtā
हे भद्रे, आभूषणों और उत्तम वस्त्रों के बिना, बिना किसी सजावट के भी तुम इस वन को और अधिक सुन्दर बना रही हो।
श्लोक 9 (3.124.9)
सर्वाभरणसंपन्ना परमाम्बरधारिणी । शोभेथास्त्वनवद्याङ्गि न त्वेवं मलपङ्किनी ॥
sarvābharaṇasaṃpannā paramāmbaradhāriṇī | śobhethāstvanavadyāṅgi na tvevaṃ malapaṅkinī
हे निर्दोष अंगों वाली, सब आभूषणों से सजी और उत्तम वस्त्र पहने तुम कहीं अधिक शोभा पातीं, न कि इस तरह मैल और कीचड़ से लिपटी हुई।
श्लोक 10 (3.124.10)
कस्मादेवंविधा भूत्वा जराजर्जरितं पतिम् । त्वमुपास्से ह कल्याणि कामभोगबहिष्कृतम् ॥
kasmādevaṃvidhā bhūtvā jarājarjaritaṃ patim | tvamupāsse ha kalyāṇi kāmabhogabahiṣkṛtam
हे कल्याणी, ऐसी होकर भी तुम बुढ़ापे से जर्जर और काम-भोग से वंचित पति की सेवा क्यों करती हो?
श्लोक 11 (3.124.11)
असमर्थं परित्राणे पोषणे तु शुचिस्मिते । सा त्वं च्यवनमुत्सृज्य वरयस्वैकमावयोः ॥
asamarthaṃ paritrāṇe poṣaṇe tu śucismite | sā tvaṃ cyavanamutsṛjya varayasvaikamāvayoḥ
हे पवित्र मुस्कान वाली, वह न तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ है, न पालन-पोषण में। तुम च्यवन को छोड़कर हम दोनों में से किसी एक को वर लो।
लोमश उवाच
श्लोक 12 (3.124.12)
पत्यर्थं देवगर्भाभे मा वृथा यौवनं कृथाः । एवमुक्ता सुकन्याऽपि सुरौ ताविदमब्रवीत् ॥
patyarthaṃ devagarbhābhe mā vṛthā yauvanaṃ kṛthāḥ | evamuktā sukanyā'pi surau tāvidamabravīt
'हे देवकन्या जैसी कान्ति वाली, पति के लिए अपना यौवन व्यर्थ मत गँवाओ।' ऐसा कहे जाने पर सुकन्या ने उन दोनों देवताओं से कहा:
श्लोक 13 (3.124.13)
रताऽहं च्यवने पत्यौ मैवं मां पर्यशङ्कतम् । तावब्रूतां पुनस्त्वेनामावां देवभिषग्वरौ ॥
ratā'haṃ cyavane patyau maivaṃ māṃ paryaśaṅkatam | tāvabrūtāṃ punastvenāmāvāṃ devabhiṣagvarau
'मैं अपने पति च्यवन में अनुरक्त हूँ; मेरे विषय में ऐसी शंका मत कीजिए।' तब उन दोनों ने फिर उससे कहा, 'हम देवताओं के श्रेष्ठ वैद्य हैं।'
अश्विनावूचतुः
श्लोक 14 (3.124.14)
युवानं रूपसंपन्नं करिष्यावः पतिं तव । ततस्तस्यावयोश्चैव वृणीष्वान्यतमं पतिम् । एतेन समयेनैनमामन्त्रय पतिं शुभे ॥
yuvānaṃ rūpasaṃpannaṃ kariṣyāvaḥ patiṃ tava | tatastasyāvayoścaiva vṛṇīṣvānyatamaṃ patim | etena samayenainamāmantraya patiṃ śubhe
हम तुम्हारे पति को युवा और रूपवान बना देंगे। फिर उनमें और हम दोनों में से किसी एक को पति चुन लेना। हे शुभे, इसी शर्त पर तुम अपने पति से बात करो।
लोमश उवाच
श्लोक 15 (3.124.15)
सा तयोर्वचनाद्राजन्नुपसंगम्य भार्गवम् । उवाच वाक्यं यत्ताभ्यामुक्तं भृगुसुतं प्रति ॥
sā tayorvacanādrājannupasaṃgamya bhārgavam | uvāca vākyaṃ yattābhyāmuktaṃ bhṛgusutaṃ prati
हे राजन्, उनके कहने पर वह भार्गव के पास गई और उन दोनों ने जो कहा था, वह भृगुपुत्र से कह सुनाया।
श्लोक 16 (3.124.16)
तच्छ्रुत्वा च्यवनो भार्यामुवाच क्रियतामिति । सा भर्त्रा समनुज्ञाता क्रियतामित्यथाब्रवीत् ॥
tacchrutvā cyavano bhāryāmuvāca kriyatāmiti | sā bhartrā samanujñātā kriyatāmityathābravīt
यह सुनकर च्यवन ने पत्नी से कहा, 'ऐसा ही किया जाए।' पति की अनुमति पाकर उसने भी कहा, 'ऐसा ही किया जाए।'
श्लोक 17 (3.124.17)
श्रुत्वा तदश्विनौ वाक्यं तस्यास्तत्क्रियतामिति । ऊचतू राजपुत्रीं तां पतिस्तव विशत्वपः ॥
śrutvā tadaśvinau vākyaṃ tasyāstatkriyatāmiti | ūcatū rājaputrīṃ tāṃ patistava viśatvapaḥ
उसके 'ऐसा ही किया जाए' वचन सुनकर अश्विनीकुमारों ने राजकुमारी से कहा, 'तुम्हारे पति जल में प्रवेश करें।'
श्लोक 18 (3.124.18)
ततोऽम्भश्च्यवनः शीघ्रं रूपार्थी प्रविवेश ह । अश्विनावपि तद्राजन्सरः प्राविशतां तदा ॥
tato'mbhaścyavanaḥ śīghraṃ rūpārthī praviveśa ha | aśvināvapi tadrājansaraḥ prāviśatāṃ tadā
तब रूप की इच्छा रखने वाले च्यवन शीघ्र ही जल में उतर गए, और हे राजन्, उसी समय अश्विनीकुमारों ने भी उस सरोवर में प्रवेश किया।
श्लोक 19 (3.124.19)
ततो मुहूर्तादुत्तीर्णाः सर्वे ते सरसस्त्रयः । दिव्यरूपधराः सर्वे युवानो मृष्टकुण्डलाः । तुल्यवेषधराश्चैव मनसः प्रीतिवर्धनाः ॥
tato muhūrtāduttīrṇāḥ sarve te sarasastrayaḥ | divyarūpadharāḥ sarve yuvāno mṛṣṭakuṇḍalāḥ | tulyaveṣadharāścaiva manasaḥ prītivardhanāḥ
क्षण भर बाद वे तीनों सरोवर से बाहर निकले, तीनों दिव्य रूप वाले, युवा, चमकते कुण्डल पहने, एक-सी वेशभूषा में और मन को आनन्द देने वाले।
श्लोक 20 (3.124.20)
तेऽब्रुवन्सहिताः सर्वे वृणीष्वान्यतमं शुभे । अस्माकमीप्सितं भद्रे पतित्वे वरवर्णिनि ॥
te'bruvansahitāḥ sarve vṛṇīṣvānyatamaṃ śubhe | asmākamīpsitaṃ bhadre patitve varavarṇini
वे सब एक साथ बोले, 'हे शुभे, हे भद्रे, हे सुन्दर वर्ण वाली, हममें से जिसे तुम चाहो, उसे पति रूप में चुन लो।'
च्यवनाश्विन ऊचुः
श्लोक 21 (3.124.21)
त्वमश्विनोरन्यतरं च्यवनं वा यशस्विनि । यत्र वाऽप्यभिकामाऽसि तं वृणीष्व सुशोभने ॥
tvamaśvinoranyataraṃ cyavanaṃ vā yaśasvini | yatra vā'pyabhikāmā'si taṃ vṛṇīṣva suśobhane
हे यशस्विनी, दोनों अश्विनीकुमारों में से किसी एक को या च्यवन को, जिसकी भी तुम कामना करती हो, हे परम सुन्दरी, उसी को वर लो।
लोमश उवाच
श्लोक 22 (3.124.22)
सा समीक्ष्य तु तान्सर्वांस्तुल्यरूपधरान्स्थितान् । निश्चित्य मनसा बुद्ध्या देवी वव्रे स्वकं पतिम् ॥
sā samīkṣya tu tānsarvāṃstulyarūpadharānsthitān | niścitya manasā buddhyā devī vavre svakaṃ patim
एक-से रूप वाले उन सबको खड़े देखकर उस देवी ने मन और बुद्धि से निश्चय करके अपने ही पति को चुना।
श्लोक 23 (3.124.23)
लब्ध्वा तु च्यवनो भार्यां वयोरूपं च वाञ्छितम् । हृष्टोऽब्रवीन्महातेजास्तौ नासत्याविदं वचः ॥
labdhvā tu cyavano bhāryāṃ vayorūpaṃ ca vāñchitam | hṛṣṭo'bravīnmahātejāstau nāsatyāvidaṃ vacaḥ
पत्नी को और मनचाहा यौवन तथा रूप पाकर महातेजस्वी च्यवन ने प्रसन्न होकर नासत्यों से कहा:
च्यवन उवाच
श्लोक 24 (3.124.24)
यथाऽहं रूपसंपन्नो वयसा च समन्वितः । कृतो भवद्भ्यां वृद्धः सन्भार्यां च प्राप्तवानिमाम् ॥
yathā'haṃ rūpasaṃpanno vayasā ca samanvitaḥ | kṛto bhavadbhyāṃ vṛddhaḥ sanbhāryāṃ ca prāptavānimām
क्योंकि आप दोनों ने मुझ बूढ़े को रूपवान और यौवन से युक्त कर दिया है, और मैंने यह पत्नी भी पा ली है,
श्लोक 25 (3.124.25)
तस्माद्युवां करिष्यामि प्रीत्याऽहं सोमपीथिनौ । मिषतो देवराजस्य सत्यमेतद्ब्रवीमि वाम् ॥
tasmādyuvāṃ kariṣyāmi prītyā'haṃ somapīthinau | miṣato devarājasya satyametadbravīmi vām
इसलिए मैं प्रसन्न होकर देवराज के देखते-देखते आप दोनों को सोमपान का अधिकारी बनाऊँगा। यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ।
लोमश उवाच
श्लोक 26 (3.124.26)
तच्छ्रुत्वा हृष्टमनसौ दिवं तौ प्रतिजग्मतुः । च्यवनश्च सुकन्या च सुराविव विजह्रतुः ॥
tacchrutvā hṛṣṭamanasau divaṃ tau pratijagmatuḥ | cyavanaśca sukanyā ca surāviva vijahratuḥ
यह सुनकर वे दोनों प्रसन्न मन से स्वर्ग लौट गए, और च्यवन तथा सुकन्या देवताओं की भाँति आनन्द से विहार करने लगे।