आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 126
च्यवन द्वारा इन्द्र को क्षमा; यमुना-तट के पुण्य स्थान
च्यवन द्वारा रचे गये भयानक मद को अपनी ओर निगलने आते देख भयभीत इन्द्र मान लेते हैं कि अश्विनीकुमार सोम के भागी होंगे, और ऋषि से क्षमा माँगते हुए कहते हैं कि उन्होंने केवल च्यवन का पराक्रम प्रकट करने के लिए विरोध किया था। च्यवन का क्रोध शान्त होता है; वे मद को मद्यपान, स्त्री, जुए और आखेट में बाँट देते हैं, शर्याति का यज्ञ पूरा कराते हैं और सुकन्या के साथ वन में रहने लगते हैं। इसके बाद लोमश युधिष्ठिर को उस प्रदेश के तीर्थ दिखाते हैं — च्यवन का सरोवर, पुष्कर, आर्चीक पर्वत, चन्द्रमा का तीर्थ, इन्द्र का झरना और यमुना, जहाँ मान्धाता और सोमक ने यज्ञ किये थे।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.126.1)
तं दृष्ट्वा घोरवदनं मदं देवः शतक्रतुः । आयान्तं भक्षयिष्यन्तं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥
taṃ dṛṣṭvā ghoravadanaṃ madaṃ devaḥ śatakratuḥ | āyāntaṃ bhakṣayiṣyantaṃ vyāttānanamivāntakam
लोमश बोले — जब शतक्रतु इन्द्र ने भयंकर मुख वाले मद को यमराज के समान मुँह फैलाए अपनी ओर, उन्हें निगल जाने के लिए, आते देखा,
श्लोक 2 (3.126.2)
भयात्संस्तम्भितभुजः सृक्विणी लेलिहन्मुहुः । ततोऽब्रवीद्देवराजश्च्यवनं भयपीडितः ॥
bhayātsaṃstambhitabhujaḥ sṛkviṇī lelihanmuhuḥ | tato'bravīddevarājaścyavanaṃ bhayapīḍitaḥ
तब भय से उनकी भुजाएँ जड़ हो गयीं और वे बार-बार अपने होंठों के कोने चाटने लगे। फिर भय से पीड़ित देवराज ने च्यवन से कहा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 3 (3.126.3)
सोमार्हावश्विनावेतावद्य प्रभृति भार्गव । भविष्यतः सत्यमेतद्वचो विप्र प्रसीद मे ॥
somārhāvaśvināvetāvadya prabhṛti bhārgava | bhaviṣyataḥ satyametadvaco vipra prasīda me
"हे भार्गव! आज से ये दोनों अश्विनीकुमार सोम के अधिकारी होंगे। हे विप्र, मेरा यह वचन सत्य है; मुझ पर प्रसन्न होइए।
श्लोक 4 (3.126.4)
न ते मिथ्या समारम्भो भवत्वेष परो विधिः । जानामि चाहं विप्रर्षे न मिथ्या त्वं करिष्यसि ॥
na te mithyā samārambho bhavatveṣa paro vidhiḥ | jānāmi cāhaṃ viprarṣe na mithyā tvaṃ kariṣyasi
"आपका कोई भी उपक्रम निष्फल न हो; यही परम विधान रहे। हे ब्रह्मर्षि, मैं यह भी जानता हूँ कि आप कोई काम व्यर्थ नहीं करेंगे।
श्लोक 5 (3.126.5)
सोमपावश्विनावेतौ यथा वाद्य कृतौ त्वया । तथैव मामपि ब्रह्मञ्श्रेयसा योक्तुमर्हसि ॥
somapāvaśvināvetau yathā vādya kṛtau tvayā | tathaiva māmapi brahmañśreyasā yoktumarhasi
"जिस प्रकार आज आपने अश्विनीकुमारों को सोमपायी बना दिया है, उसी प्रकार, हे ब्रह्मन्, मुझे भी कल्याण से युक्त कीजिए।
श्लोक 6 (3.126.6)
भूय एव तु ते वीर्यं प्रकाशेदिति भार्गव । सुकन्यायाः पितुश्चास्य लोके कीर्तिः प्रथेदिति ॥
bhūya eva tu te vīryaṃ prakāśediti bhārgava | sukanyāyāḥ pituścāsya loke kīrtiḥ prathediti
"हे भार्गव, मैंने यह इसलिए किया कि आपका पराक्रम और भी प्रकट हो, और सुकन्या तथा उसके पिता की कीर्ति संसार में फैले।
श्लोक 7 (3.126.7)
अतो मयैतद्विहितं तव वीर्यप्रकाशनम् । तस्मान्प्रसादं कुरु मे भवत्वेवं यथेच्छसि ॥
ato mayaitadvihitaṃ tava vīryaprakāśanam | tasmānprasādaṃ kuru me bhavatvevaṃ yathecchasi
"इसी कारण मैंने आपके पराक्रम का यह प्रदर्शन रचा। अतः मुझ पर कृपा कीजिए; जैसा आप चाहते हैं, वैसा ही हो।"
लोमश उवाच
श्लोक 8 (3.126.8)
एवमुक्तस्य शक्रेण च्यवनस्य महात्मनः । स मन्युर्व्यगमच्छीघ्रं मुमोच च पुरंदरम् ॥
evamuktasya śakreṇa cyavanasya mahātmanaḥ | sa manyurvyagamacchīghraṃ mumoca ca puraṃdaram
इन्द्र के ऐसा कहने पर महात्मा च्यवन का क्रोध शीघ्र ही शान्त हो गया और उन्होंने पुरन्दर को छोड़ दिया।
श्लोक 9 (3.126.9)
मदं च व्यभजद्राजन्पाने स्त्रीषु च वीर्यवान् । अक्षेषु मृगयायां च पूर्वसृष्टं पुनः पुनः ॥
madaṃ ca vyabhajadrājanpāne strīṣu ca vīryavān | akṣeṣu mṛgayāyāṃ ca pūrvasṛṣṭaṃ punaḥ punaḥ
हे राजन्, फिर उस पराक्रमी ऋषि ने अपने ही रचे हुए मद को थोड़ा-थोड़ा करके मद्यपान, स्त्रियों, जुए और आखेट में बाँट दिया।
श्लोक 10 (3.126.10)
तदा मदं विनिक्षिप्य शक्रं संतर्प्य चेन्दुना । अश्विभ्यां सहितान्देवान्याजयित्वा च तं नृपम् ॥
tadā madaṃ vinikṣipya śakraṃ saṃtarpya cendunā | aśvibhyāṃ sahitāndevānyājayitvā ca taṃ nṛpam
इस प्रकार मद को अलग करके, सोम से इन्द्र को तृप्त करके और राजा शर्याति से अश्विनीकुमारों सहित देवताओं का यजन कराकर,
श्लोक 11 (3.126.11)
विख्याप्य वीर्यं लोकेषु सर्वेषु वदतांवरः । सुकन्यया सहारण्ये विजहारानुकूलया ॥
vikhyāpya vīryaṃ lokeṣu sarveṣu vadatāṃvaraḥ | sukanyayā sahāraṇye vijahārānukūlayā
वक्ताओं में श्रेष्ठ च्यवन ने सब लोकों में अपना पराक्रम विख्यात किया और अपने अनुकूल रहने वाली सुकन्या के साथ वन में सुखपूर्वक विचरने लगे।
श्लोक 12 (3.126.12)
तस्यैतद्द्विजसंघुष्टं सरो राजन्प्रकाशते । अत्रत्वं सह सोदर्यैः पितॄन्देवांश्च तर्पय ॥
tasyaitaddvijasaṃghuṣṭaṃ saro rājanprakāśate | atratvaṃ saha sodaryaiḥ pitṝndevāṃśca tarpaya
हे राजन्, यह उन्हीं का सरोवर है, जो पक्षियों के कलरव से गूँजता हुआ शोभा पा रहा है। यहाँ तुम अपने भाइयों के साथ पितरों और देवताओं का तर्पण करो।
श्लोक 13 (3.126.13)
एतद्दृष्ट्वा महीपाल सिकताक्षं च भारत । सैन्धवारण्यमासाद्य कुल्यानां कुरु दर्शनम् ॥
etaddṛṣṭvā mahīpāla sikatākṣaṃ ca bhārata | saindhavāraṇyamāsādya kulyānāṃ kuru darśanam
हे पृथ्वीपाल भारत, इसे और सिकताक्ष तीर्थ को देखकर सैन्धवारण्य में जाओ और वहाँ की नहरों (कुल्याओं) के दर्शन करो।
श्लोक 14 (3.126.14)
पुष्करेषु महाराज सर्वेषु च जलं स्पृश । स्थाणोर्मन्त्राणि च जपन्सिद्धिं प्राप्स्यसि भारत ॥
puṣkareṣu mahārāja sarveṣu ca jalaṃ spṛśa | sthāṇormantrāṇi ca japansiddhiṃ prāpsyasi bhārata
हे महाराज, सभी पुष्कर तीर्थों में जल का स्पर्श करो; और हे भारत, वहाँ स्थाणु (शिव) के मन्त्रों का जप करते हुए तुम सिद्धि प्राप्त करोगे।
श्लोक 15 (3.126.15)
संधिर्द्वयोर्नरश्रेष्ठ त्रेताया द्वापरस्य च । अयं हि दृश्यते पार्थ सर्वपापप्रणाशनः । अत्रोपस्पृश चैव त्वं सर्वपापप्रणाशने ॥
saṃdhirdvayornaraśreṣṭha tretāyā dvāparasya ca | ayaṃ hi dṛśyate pārtha sarvapāpapraṇāśanaḥ | atropaspṛśa caiva tvaṃ sarvapāpapraṇāśane
हे नरश्रेष्ठ पार्थ, यह त्रेता और द्वापर — दो युगों की सन्धि है; यह सब पापों का नाश करने वाला माना जाता है। तुम भी सब पापों को नष्ट करने वाले इस तीर्थ में स्नान करो।
श्लोक 16 (3.126.16)
आर्चीकपर्वतश्चैव निवासो वै मनीषिणाम् । सदाफलः सदास्रोतो मरुतां स्थानमुत्तमम् ॥
ārcīkaparvataścaiva nivāso vai manīṣiṇām | sadāphalaḥ sadāsroto marutāṃ sthānamuttamam
और यह आर्चीक पर्वत है, जो मनीषियों का निवास है; यहाँ सदा फल लगते हैं, जलधाराएँ सदा बहती हैं, और यह मरुद्गणों का उत्तम स्थान है।
श्लोक 17 (3.126.17)
चैत्याश्चैते बहुविधास्त्रिदशानां युधिष्ठिर । एतच्चन्द्रमसस्तीर्थमृषयः पर्युपासते । वैखानसप्रभृतयो वालखिल्यास्तथैव च ॥
caityāścaite bahuvidhāstridaśānāṃ yudhiṣṭhira | etaccandramasastīrthamṛṣayaḥ paryupāsate | vaikhānasaprabhṛtayo vālakhilyāstathaiva ca
हे युधिष्ठिर, ये देवताओं के अनेक प्रकार के चैत्य हैं। यह चन्द्रमा का तीर्थ है, जिसकी उपासना वैखानस आदि ऋषि और वालखिल्य मुनि भी करते हैं।
श्लोक 18 (3.126.18)
शृङ्गाणि त्रीणि पुण्यानि त्रीणि प्रस्रवणानि च । सर्वाण्यनुपरिक्रम्य यथाकाममुपस्पृश ॥
śṛṅgāṇi trīṇi puṇyāni trīṇi prasravaṇāni ca | sarvāṇyanuparikramya yathākāmamupaspṛśa
यहाँ तीन पवित्र शिखर और तीन झरने हैं। उन सबकी परिक्रमा करके इच्छानुसार स्नान करो।
श्लोक 19 (3.126.19)
शान्तनुश्चात्र राजेन्द्र शुनकश्च नराधिपः । नरनारायणौ चोभौ तपस्तप्त्वा चिरं नृप । स्थानं सनातनं प्राप्तावीश्वरध्यानतत्परौ ॥
śāntanuścātra rājendra śunakaśca narādhipaḥ | naranārāyaṇau cobhau tapastaptvā ciraṃ nṛpa | sthānaṃ sanātanaṃ prāptāvīśvaradhyānatatparau
हे राजेन्द्र, यहीं शान्तनु और राजा शुनक ने, तथा नर और नारायण दोनों ने भी, दीर्घ काल तक तप करके, ईश्वर के ध्यान में तत्पर रहकर, सनातन धाम प्राप्त किया।
श्लोक 20 (3.126.20)
इह नित्याश्रया देवाः पितरश्च महर्षिभिः । आर्चीकपर्वते तेपुस्तान्यजस्व युधिष्ठिर ॥
iha nityāśrayā devāḥ pitaraśca maharṣibhiḥ | ārcīkaparvate tepustānyajasva yudhiṣṭhira
यहाँ देवता सदा निवास करते हैं, और पितरों ने महर्षियों के साथ आर्चीक पर्वत पर तप किया था। हे युधिष्ठिर, उनका पूजन करो।
श्लोक 21 (3.126.21)
इह ते वै चरून्प्राश्नन्नृषयश्च विशांपते । यमुना चाक्षयस्रोताः कृष्णश्चेह तपोरतः ॥
iha te vai carūnprāśnannṛṣayaśca viśāṃpate | yamunā cākṣayasrotāḥ kṛṣṇaśceha taporataḥ
हे प्रजानाथ, यहाँ उन्होंने और ऋषियों ने चरु का भोजन किया था। यहाँ अक्षय धारा वाली यमुना है, और यहीं श्रीकृष्ण ने तप किया था।
श्लोक 22 (3.126.22)
यमौ च भीमसेनश्च कृष्णा चामित्रकर्शन । सर्वे चात्र गमिष्यामस्त्वयैव सह पाण्डव ॥
yamau ca bhīmasenaśca kṛṣṇā cāmitrakarśana | sarve cātra gamiṣyāmastvayaiva saha pāṇḍava
हे शत्रुओं को क्षीण करने वाले पाण्डुनन्दन, नकुल-सहदेव, भीमसेन और द्रौपदी — हम सब तुम्हारे ही साथ वहाँ चलेंगे।
श्लोक 23 (3.126.23)
एतत्प्रस्रवणं पुण्यमिन्द्रस्य मनुजेश्वर । यत्रधाता विधाता च वरुणश्चोर्ध्वमागताः ॥
etatprasravaṇaṃ puṇyamindrasya manujeśvara | yatradhātā vidhātā ca varuṇaścordhvamāgatāḥ
हे मनुजेश्वर, यह इन्द्र का पवित्र झरना है, जहाँ से धाता, विधाता और वरुण ऊर्ध्वलोक को गये थे।
श्लोक 24 (3.126.24)
इह तेऽप्यवसन्राजञ्शान्ताः परमधर्मिणः । मैत्राणामृजुबुद्धीनामयं गिरिवरः शुभः ॥
iha te'pyavasanrājañśāntāḥ paramadharmiṇaḥ | maitrāṇāmṛjubuddhīnāmayaṃ girivaraḥ śubhaḥ
हे राजन्, यहाँ वे शान्त और परम धर्मात्मा भी निवास करते थे। यह सुन्दर श्रेष्ठ पर्वत मैत्रीभाव वाले और सरल बुद्धि वाले लोगों का है।
श्लोक 25 (3.126.25)
एषा सा यमुना राजन्महर्षिगणसेविता । नानायज्ञचिता राजन्पुण्या पापभयापहा ॥
eṣā sā yamunā rājanmaharṣigaṇasevitā | nānāyajñacitā rājanpuṇyā pāpabhayāpahā
हे राजन्, यह वही यमुना है, जिसका सेवन महर्षियों के समूह करते हैं; इसके तट अनेक यज्ञों की वेदियों से भरे हैं; यह पवित्र है और पाप के भय को दूर करती है।
श्लोक 26 (3.126.26)
अत्रराजा महेष्वासो मांधाताऽयजत स्वयम् । साहदेविश्च कौन्तेय सोमको ददतांवरः ॥
atrarājā maheṣvāso māṃdhātā'yajata svayam | sāhadeviśca kaunteya somako dadatāṃvaraḥ
हे कुन्तीनन्दन, यहीं महान धनुर्धर राजा मान्धाता ने स्वयं यज्ञ किया था, और दाताओं में श्रेष्ठ सहदेव-पुत्र सोमक ने भी।