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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 127

मान्धाता का जन्म

युधिष्ठिर पूछते हैं कि मान्धाता का जन्म कैसे हुआ और उन्हें यह नाम कैसे मिला। लोमश बताते हैं कि निःसन्तान राजा युवनाश्व उपवास से प्यासे होकर रात में भृगु के आश्रम में पहुँचे और वह अभिमन्त्रित जल पी गये, जिसे सोये हुए ऋषियों ने उनकी रानी को पुत्र देने के लिए तैयार किया था। भार्गव ऋषि कहते हैं कि अब राजा स्वयं ही गर्भ धारण करेंगे; सौ वर्ष पूरे होने पर उनकी बायीं कोख फाड़कर पुत्र निकलता है, पर राजा की मृत्यु नहीं होती। इन्द्र शिशु के मुँह में अपनी तर्जनी देते हैं, इसलिए देवता उसका नाम मान्धाता ('मुझे पियेगा') रखते हैं। लोमश मान्धाता की विजयों, यज्ञों और दानों का वर्णन करके कुरुक्षेत्र में उनकी यज्ञभूमि दिखाते हैं, और फिर युधिष्ठिर सोमक के विषय में पूछते हैं।

अध्याय 126अध्याय-सूचीअध्याय 128

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (3.127.1)

मान्धाता राजशार्दूलस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । कथं जातो महाब्रह्मन्यौवनाश्वो नृपोत्तमः ॥

māndhātā rājaśārdūlastriṣu lokeṣu viśrutaḥ | kathaṃ jāto mahābrahmanyauvanāśvo nṛpottamaḥ

युधिष्ठिर बोले — हे महाब्राह्मण, राजाओं में सिंह के समान, तीनों लोकों में विख्यात, युवनाश्व के पुत्र नृपश्रेष्ठ मान्धाता का जन्म कैसे हुआ?

श्लोक 2 (3.127.2)

कथं चैनां परां ख्यातिं प्राप्तवानमितद्युतिः । यस्य लोकास्त्रयो वश्या विष्णोरिव महात्मनः ॥

kathaṃ caināṃ parāṃ khyātiṃ prāptavānamitadyutiḥ | yasya lokāstrayo vaśyā viṣṇoriva mahātmanaḥ

और उस अपार तेजस्वी ने ऐसी परम ख्याति कैसे पायी, जिसके वश में तीनों लोक वैसे ही थे जैसे महात्मा विष्णु के?

श्लोक 3 (3.127.3)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं चरितं तस्य धीमतः । सत्यकीर्तेर्हि मान्धातुः कथ्यमानं त्वयाऽनघ ॥

etadicchāmyahaṃ śrotuṃ caritaṃ tasya dhīmataḥ | satyakīrterhi māndhātuḥ kathyamānaṃ tvayā'nagha

हे निष्पाप, मैं उस बुद्धिमान, सत्यकीर्ति मान्धाता का चरित्र आपके मुख से सुनना चाहता हूँ;

श्लोक 4 (3.127.4)

यथा मान्धातृशब्दश्च तस्य शक्रसमद्युतेः । जन्म चाप्रतिवीर्यस्य कुशलो ह्यसि भाषितुम् ॥

yathā māndhātṛśabdaśca tasya śakrasamadyuteḥ | janma cāprativīryasya kuśalo hyasi bhāṣitum

इन्द्र के समान तेजस्वी उस राजा का 'मान्धाता' नाम कैसे पड़ा, और उस अप्रतिम पराक्रमी का जन्म कैसे हुआ — यह बताने में आप कुशल हैं।

लोमश उवाच

श्लोक 5 (3.127.5)

शृणुष्वावहितो राजन्राज्ञस्तस्य महात्मनः । यथा मान्धातृशब्दो वै लोकेषु परिगीयते ॥

śṛṇuṣvāvahito rājanrājñastasya mahātmanaḥ | yathā māndhātṛśabdo vai lokeṣu parigīyate

लोमश बोले — हे राजन्, ध्यान से सुनो कि उस महात्मा राजा का 'मान्धाता' नाम लोकों में कैसे गाया जाने लगा।

श्लोक 6 (3.127.6)

इक्ष्वाकुवंशप्रभवो युवनाश्वो महीपतिः । सोऽयजत्पृथिवीपालः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥

ikṣvākuvaṃśaprabhavo yuvanāśvo mahīpatiḥ | so'yajatpṛthivīpālaḥ kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ

इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न युवनाश्व नामक एक राजा थे। उस पृथ्वीपालक ने प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ किये।

श्लोक 7 (3.127.7)

अश्वमेधसहस्रं च प्राप्य धर्मभृतांवरः । अन्यैश्च क्रतुभिर्मुख्यैरयजत्स्वाप्तदक्षिणैः ॥

aśvamedhasahasraṃ ca prāpya dharmabhṛtāṃvaraḥ | anyaiśca kratubhirmukhyairayajatsvāptadakṣiṇaiḥ

धर्मधारियों में श्रेष्ठ उस राजा ने एक हज़ार अश्वमेध यज्ञ पूरे किये, और अन्य प्रमुख यज्ञ भी उत्तम दक्षिणा के साथ किये।

श्लोक 8 (3.127.8)

अनपत्यस्तु राजर्षिः स महात्मा महाव्रतः । मन्त्रिष्वाधाय तद्राज्यं वननित्यो बभूव ह । शास्त्रदृष्टेन विधिना संयोज्यात्मानमात्मवान् ॥

anapatyastu rājarṣiḥ sa mahātmā mahāvrataḥ | mantriṣvādhāya tadrājyaṃ vananityo babhūva ha | śāstradṛṣṭena vidhinā saṃyojyātmānamātmavān

परन्तु वह महात्मा, महान व्रतधारी राजर्षि निःसन्तान था। उसने राज्य मन्त्रियों को सौंप दिया और शास्त्र में बताये विधि से अपने चित्त को (इष्टदेव में) लगाकर, संयमी होकर सदा वन में ही रहने लगा।

श्लोक 9 (3.127.9)

स कदाचिन्नृपो राजन्नुपवासेन दुःखितः । पिपासाशुष्कहृदयः प्रविवेशाश्रमं भृगोः ॥

sa kadācinnṛpo rājannupavāsena duḥkhitaḥ | pipāsāśuṣkahṛdayaḥ praviveśāśramaṃ bhṛgoḥ

हे राजन्, एक बार उपवास से कष्ट पाकर, प्यास से सूखे हृदय वाला वह राजा भृगु के आश्रम में पहुँचा।

श्लोक 10 (3.127.10)

तामेव रात्रिं राजेन्द्र महात्मा भृगुनन्दनः । इष्टिं चकार सौद्युम्नेर्महर्षिः पुत्रकारणात् ॥

tāmeva rātriṃ rājendra mahātmā bhṛgunandanaḥ | iṣṭiṃ cakāra saudyumnermaharṣiḥ putrakāraṇāt

हे राजेन्द्र, उसी रात भृगुनन्दन महात्मा महर्षि सुद्युम्न-पुत्र युवनाश्व को पुत्र दिलाने के लिए एक इष्टि कर रहे थे।

श्लोक 11 (3.127.11)

संभृतो मन्त्रपूतेन वारिणा कलशो महान् । तत्रातिष्ठत राजेन्द्र पूर्वमेव समाहितः ॥

saṃbhṛto mantrapūtena vāriṇā kalaśo mahān | tatrātiṣṭhata rājendra pūrvameva samāhitaḥ

हे राजेन्द्र, वहाँ पहले से ही मन्त्रों से पवित्र किये जल से भरा एक बड़ा कलश सावधानी से रखा हुआ था।

श्लोक 12 (3.127.12)

यत्प्राश्य प्रसवेत्तस्य पत्नी शक्रसमं सुतम् । तद्वारि विहितं राजन्यस्मिन्नासीत्सुसंस्कृतम् । तं न्यस्य वेद्यां कलशं सुषुपुस्ते महर्षयः ॥

yatprāśya prasavettasya patnī śakrasamaṃ sutam | tadvāri vihitaṃ rājanyasminnāsītsusaṃskṛtam | taṃ nyasya vedyāṃ kalaśaṃ suṣupuste maharṣayaḥ

उसे पीकर उसकी पत्नी इन्द्र के समान पुत्र को जन्म देती। हे राजन्, वह जल उसमें भली-भाँति संस्कारित करके रखा गया था। उस कलश को वेदी पर रखकर वे महर्षि सो गये।

श्लोक 13 (3.127.13)

रात्रिजागरणाच्छ्रान्तान्सौद्युम्निः समतीत्य तान् । शुष्ककण्ठः पिपासार्तः पानीयार्थी भृशं नृपः । तं प्रविश्याश्रमं शान्तः पानीयं सोऽभ्ययाचत ॥

rātrijāgaraṇācchrāntānsaudyumniḥ samatītya tān | śuṣkakaṇṭhaḥ pipāsārtaḥ pānīyārthī bhṛśaṃ nṛpaḥ | taṃ praviśyāśramaṃ śāntaḥ pānīyaṃ so'bhyayācata

रात भर जागने से वे थक गये थे। सुद्युम्न-पुत्र उनके पास से गुज़रा; उसका कण्ठ सूख रहा था, वह प्यास से व्याकुल था और पानी के लिए बहुत आतुर था। आश्रम में प्रवेश करके उस राजा ने शान्त भाव से पानी माँगा।

श्लोक 14 (3.127.14)

तस्य श्रान्तस्य शुष्केण कण्ठेन क्रोशतस्तदा । नाश्रौषीत्कश्चन तदा शकुनेरिव वाशतः ॥

tasya śrāntasya śuṣkeṇa kaṇṭhena krośatastadā | nāśrauṣītkaścana tadā śakuneriva vāśataḥ

पर सूखे कण्ठ से पुकारते उस थके हुए राजा की आवाज़ किसी ने नहीं सुनी, जैसे किसी पक्षी का स्वर कोई न सुने।

श्लोक 15 (3.127.15)

ततस्तं कलशं दृष्ट्वा जलपूर्णं स पार्थिवः । अभ्यद्रवत वेगेन पीत्वा चाम्भो व्यवासृजत् ॥

tatastaṃ kalaśaṃ dṛṣṭvā jalapūrṇaṃ sa pārthivaḥ | abhyadravata vegena pītvā cāmbho vyavāsṛjat

तब जल से भरे उस कलश को देखकर राजा वेग से उसकी ओर दौड़ा और जल पीकर उसे छोड़ दिया।

श्लोक 16 (3.127.16)

स पीत्वा शीतलं तोयं पिपासार्तो महीपतिः । निर्वाणमगमद्धीमान्सुसुखी चाभवत्तदा ॥

sa pītvā śītalaṃ toyaṃ pipāsārto mahīpatiḥ | nirvāṇamagamaddhīmānsusukhī cābhavattadā

वह शीतल जल पीकर प्यास से व्याकुल बुद्धिमान राजा को शान्ति मिली और वह बहुत सुखी हुआ।

श्लोक 17 (3.127.17)

ततस्ते प्रत्यबुध्यन्त मुनयः सतपोधनाः । निस्तोयं तं च कलशं ददृशुः सर्व एव ते ॥

tataste pratyabudhyanta munayaḥ satapodhanāḥ | nistoyaṃ taṃ ca kalaśaṃ dadṛśuḥ sarva eva te

तब वे तपोधन मुनि जाग उठे और उन सबने देखा कि वह कलश जल से खाली है।

श्लोक 18 (3.127.18)

कस्य कर्मेदमिति ते पर्यपृच्छन्समागताः । युवनाश्वो ममेत्येवं सत्यं समभिपद्यत ॥

kasya karmedamiti te paryapṛcchansamāgatāḥ | yuvanāśvo mametyevaṃ satyaṃ samabhipadyata

एकत्र होकर उन्होंने पूछा — "यह किसका काम है?" युवनाश्व ने सच-सच स्वीकार किया — "मेरा।"

श्लोक 19 (3.127.19)

न युक्तमिति तं प्राह भगवान्भार्गवस्तदा । सुतार्थं स्थापिता ह्यापस्तपसा चैव संभृताः ॥

na yuktamiti taṃ prāha bhagavānbhārgavastadā | sutārthaṃ sthāpitā hyāpastapasā caiva saṃbhṛtāḥ

तब भगवान् भार्गव ने उससे कहा — "यह उचित नहीं हुआ। यह जल पुत्र के लिए रखा गया था और तप से इसे सिद्ध किया गया था।

भार्गव उवाच

श्लोक 20 (3.127.20)

मया ह्यत्राहितं ब्रह्म तप आस्थाय दारुणम् । पुत्रार्थं तव राजर्षे महाबलपराक्रम ॥

mayā hyatrāhitaṃ brahma tapa āsthāya dāruṇam | putrārthaṃ tava rājarṣe mahābalaparākrama

"हे महाबली और पराक्रमी राजर्षि, मैंने कठोर तप करके तुम्हारे पुत्र के लिए इसमें ब्रह्मतेज स्थापित किया था —

श्लोक 21 (3.127.21)

महाबलो महावीर्यस्तपोबलसमन्वितः । यः शक्रमपि वीर्येण गमयेद्यमसादनम् ॥

mahābalo mahāvīryastapobalasamanvitaḥ | yaḥ śakramapi vīryeṇa gamayedyamasādanam

"ऐसा पुत्र, जो महाबली, महापराक्रमी और तपोबल से सम्पन्न हो, और जो अपने पराक्रम से इन्द्र को भी यमलोक भेज सके।

श्लोक 22 (3.127.22)

अनेन विधिना राजन्मयैतदुपपादितम् । अब्भक्षणं त्वया राजन्न युक्तं कृतमद्य वै ॥

anena vidhinā rājanmayaitadupapāditam | abbhakṣaṇaṃ tvayā rājanna yuktaṃ kṛtamadya vai

"हे राजन्, इसी विधि से मैंने यह तैयार किया था। हे राजन्, आज तुम्हारा यह जल पी लेना उचित नहीं हुआ।

श्लोक 23 (3.127.23)

न त्वद्य शक्यमस्माभिरेतत्कर्तुमतोऽन्यथा । नूनं दैवकृतं ह्येतद्यदेवं कृतवानसि ॥

na tvadya śakyamasmābhiretatkartumato'nyathā | nūnaṃ daivakṛtaṃ hyetadyadevaṃ kṛtavānasi

"पर अब हम इसे बदल नहीं सकते। निश्चय ही यह दैव का किया हुआ है कि तुमने ऐसा किया।

श्लोक 24 (3.127.24)

पिपासितेन याः पीता विधिमन्त्रपुरस्कृताः । आपस्त्वया महाराज मत्तपोवीर्यसंभृताः ॥

pipāsitena yāḥ pītā vidhimantrapuraskṛtāḥ | āpastvayā mahārāja mattapovīryasaṃbhṛtāḥ

"हे महाराज, प्यास में तुमने जो जल पिया है, वह विधि और मन्त्रों से संस्कारित और मेरे तप के बल से भरा हुआ था —

श्लोक 25 (3.127.25)

ताभ्यस्त्वमात्मना पुत्रमीदृशं जनयिष्यसि । विधास्यामो वयं तत्र तवेष्टिं परमाद्भुताम् ॥

tābhyastvamātmanā putramīdṛśaṃ janayiṣyasi | vidhāsyāmo vayaṃ tatra taveṣṭiṃ paramādbhutām

"उसी से तुम स्वयं अपने शरीर से ऐसा पुत्र उत्पन्न करोगे। इसके लिए हम तुम्हारे लिए एक परम अद्भुत इष्टि करेंगे,

श्लोक 26 (3.127.26)

यथा शक्रसमं पुत्रं जनयिष्यसि वीर्यवान् । न च प्राणैर्महाराज वियोगस्ते भविष्यति ॥

yathā śakrasamaṃ putraṃ janayiṣyasi vīryavān | na ca prāṇairmahārāja viyogaste bhaviṣyati

"जिससे तुम पराक्रमी होकर इन्द्र के समान पुत्र उत्पन्न करोगे। और हे महाराज, तुम्हारे प्राण भी नहीं जायेंगे।

श्लोक 27 (3.127.27)

मा खिदस्त्वं हि राजेन्द्र दैवं हि बलवत्तरम् । गर्भधारणजं वाऽपि न खेदं समवाप्स्यसि ॥

mā khidastvaṃ hi rājendra daivaṃ hi balavattaram | garbhadhāraṇajaṃ vā'pi na khedaṃ samavāpsyasi

"हे राजेन्द्र, खेद मत करो, क्योंकि दैव अधिक बलवान है। गर्भ धारण करने से होने वाला कष्ट भी तुम्हें नहीं होगा।"

लोमश उवाच

श्लोक 28 (3.127.28)

ततो वर्षशते पूर्णे तस्य राज्ञो महात्मनः । वामं पार्श्वं विनिर्भिद्य सुतः सूर्य इव स्थितः ॥

tato varṣaśate pūrṇe tasya rājño mahātmanaḥ | vāmaṃ pārśvaṃ vinirbhidya sutaḥ sūrya iva sthitaḥ

फिर पूरे सौ वर्ष बीतने पर उस महात्मा राजा की बायीं कोख फाड़कर सूर्य के समान

श्लोक 29 (3.127.29)

निश्चक्राम महातेजा न च तं मृत्युराविशत् । युवनाश्वं नरपतिं तदद्भुतमिवाभवत् ॥

niścakrāma mahātejā na ca taṃ mṛtyurāviśat | yuvanāśvaṃ narapatiṃ tadadbhutamivābhavat

एक महातेजस्वी पुत्र बाहर निकला; फिर भी राजा युवनाश्व को मृत्यु ने नहीं छुआ। यह एक अद्भुत-सी बात थी।

श्लोक 30 (3.127.30)

ततः शक्रो महातेजास्तं दिदृक्षुरुपागमत् । ततो देवा महेन्द्रं तमपृच्छन्धास्यतीति किम् ॥

tataḥ śakro mahātejāstaṃ didṛkṣurupāgamat | tato devā mahendraṃ tamapṛcchandhāsyatīti kim

तब महातेजस्वी इन्द्र उसे देखने की इच्छा से आये। तब देवताओं ने महेन्द्र से पूछा — "यह क्या पियेगा?"

श्लोक 31 (3.127.31)

प्रदेशिनीं ततोऽस्यास्ये शक्रः समभिसंदधे । मामयं धास्यतीत्येवं भाषिते चैव वज्रिणा । मांधातेति च नामास्य चक्रुः सेन्द्रा दिवौकसः ॥

pradeśinīṃ tato'syāsye śakraḥ samabhisaṃdadhe | māmayaṃ dhāsyatītyevaṃ bhāṣite caiva vajriṇā | māṃdhāteti ca nāmāsya cakruḥ sendrā divaukasaḥ

तब इन्द्र ने अपनी तर्जनी उसके मुँह में दे दी। वज्रधारी ने कहा — "यह मुझे पियेगा" (मां धास्यति); इसी से इन्द्र सहित देवताओं ने उसका नाम 'मान्धाता' रखा।

श्लोक 32 (3.127.32)

प्रदेशिनीं शक्रदत्तामास्वाद्य स शिशुस्तदा । अवर्धत महातेजाः किष्कून्राजंस्त्रयोदश ॥

pradeśinīṃ śakradattāmāsvādya sa śiśustadā | avardhata mahātejāḥ kiṣkūnrājaṃstrayodaśa

हे राजन्, इन्द्र की दी हुई तर्जनी का स्वाद लेकर वह शिशु उसी समय तेरह किष्कु (हाथ) बढ़ गया।

श्लोक 33 (3.127.33)

वेदास्तं सधनुर्वेदा दिव्यान्यस्त्राणि चेश्वरम् । उपतस्थुर्महाराजं ध्यातमात्राणि सर्वशः ॥

vedāstaṃ sadhanurvedā divyānyastrāṇi ceśvaram | upatasthurmahārājaṃ dhyātamātrāṇi sarvaśaḥ

धनुर्वेद सहित सभी वेद और दिव्य अस्त्र उस प्रभु महाराज के स्मरण करते ही उसकी सेवा में उपस्थित हो गये।

श्लोक 34 (3.127.34)

धनुराजगवं नाम शराः शृङ्गोद्भवाश्च ये । अभेद्यं कवचं चैव सद्यस्तमुपशिश्रियुः ॥

dhanurājagavaṃ nāma śarāḥ śṛṅgodbhavāśca ye | abhedyaṃ kavacaṃ caiva sadyastamupaśiśriyuḥ

आजगव नामक धनुष, सींग से बने बाण और अभेद्य कवच तुरन्त उसके पास आ गये।

श्लोक 35 (3.127.35)

सोऽभिषिक्तो भगवता स्वयं शक्रेण भारत । धर्मेण व्यजयल्लोकांस्त्रीन्विष्णुरिव विक्रमैः ॥

so'bhiṣikto bhagavatā svayaṃ śakreṇa bhārata | dharmeṇa vyajayallokāṃstrīnviṣṇuriva vikramaiḥ

हे भारत, स्वयं भगवान् इन्द्र ने उसका अभिषेक किया, और उसने धर्म के द्वारा तीनों लोकों को वैसे ही जीत लिया जैसे विष्णु ने अपने पगों से।

श्लोक 36 (3.127.36)

तस्याप्रतिहतं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः । रत्नानि चैव राजर्षिं स्वयमेवोपतस्थिरे ॥

tasyāpratihataṃ cakraṃ prāvartata mahātmanaḥ | ratnāni caiva rājarṣiṃ svayamevopatasthire

उस महात्मा का शासन-चक्र बिना रुकावट चलता रहा, और रत्न स्वयं ही उस राजर्षि के पास आ जाते थे।

श्लोक 37 (3.127.37)

तस्येयं वसुसंपूर्णा वसुधा वसुधाधिप । तेनेष्टं विविधैर्यज्ञैर्बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ॥

tasyeyaṃ vasusaṃpūrṇā vasudhā vasudhādhipa | teneṣṭaṃ vividhairyajñairbahubhiḥ svāptadakṣiṇaiḥ

हे पृथ्वीनाथ, धन-धान्य से भरी यह पृथ्वी उसी की थी। उसने उत्तम दक्षिणा वाले अनेक प्रकार के बहुत-से यज्ञ किये।

श्लोक 38 (3.127.38)

चितचैत्यो महातेजा धर्मान्प्राप्य च पुष्कलान् । शक्रस्यार्धासनं राजँल्लब्धवानमितद्युतिः ॥

citacaityo mahātejā dharmānprāpya ca puṣkalān | śakrasyārdhāsanaṃ rājam̐llabdhavānamitadyutiḥ

हे राजन्, अग्निचयन करके उस महातेजस्वी, अपार कान्ति वाले राजा ने प्रचुर धर्म अर्जित किया और इन्द्र का आधा आसन प्राप्त किया।

श्लोक 39 (3.127.39)

एकाह्ना पृथिवी तेन धर्मनित्येन धीमता । विजिता शासनादेव सरत्नाकरपत्तना ॥

ekāhnā pṛthivī tena dharmanityena dhīmatā | vijitā śāsanādeva saratnākarapattanā

उस धर्मनिष्ठ, बुद्धिमान राजा ने केवल अपनी आज्ञा से ही एक दिन में रत्नों की खानों और नगरों सहित सारी पृथ्वी जीत ली।

श्लोक 40 (3.127.40)

तस्य चैत्यैर्महाराज क्रतूनां दक्षिणावताम् । चतुरन्ता मही व्याप्ता नासीत्किंचिदनावृतम् ॥

tasya caityairmahārāja kratūnāṃ dakṣiṇāvatām | caturantā mahī vyāptā nāsītkiṃcidanāvṛtam

हे महाराज, उसके दक्षिणायुक्त यज्ञों की वेदियों से चारों दिशाओं तक फैली पृथ्वी ढक गयी थी; कोई स्थान खाली नहीं बचा था।

श्लोक 41 (3.127.41)

तेन पद्मसहस्राणि गवां दश महात्मना । ब्राह्मणेभ्यो महाराज दत्तानीति प्रचक्षते ॥

tena padmasahasrāṇi gavāṃ daśa mahātmanā | brāhmaṇebhyo mahārāja dattānīti pracakṣate

हे महाराज, कहते हैं कि उस महात्मा ने ब्राह्मणों को दस हज़ार पद्म गौएँ दान की थीं।

श्लोक 42 (3.127.42)

तेन द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महात्मना । वृष्टं सस्यविवृद्ध्यर्थं मिषतो वज्रपाणिनः ॥

tena dvādaśavārṣikyāmanāvṛṣṭyāṃ mahātmanā | vṛṣṭaṃ sasyavivṛddhyarthaṃ miṣato vajrapāṇinaḥ

बारह वर्ष की अनावृष्टि के समय उस महात्मा ने वज्रधारी इन्द्र के देखते-देखते फसलों की बढ़ती के लिए वर्षा करायी।

श्लोक 43 (3.127.43)

तेन सोमकुलोत्पन्नो गान्धाराधिपतिर्महान् । गर्जन्निव महामेघः प्रमथ्य निहतः शरैः ॥

tena somakulotpanno gāndhārādhipatirmahān | garjanniva mahāmeghaḥ pramathya nihataḥ śaraiḥ

उसने चन्द्रवंश में उत्पन्न, महामेघ के समान गरजने वाले महान गान्धारराज को बाणों से मथकर मार डाला।

श्लोक 44 (3.127.44)

प्रजाश्चतुर्विधास्तेन त्राता राजन्कृतात्मना । तेनात्मतपसा लोकास्तापिताश्चातितेजसा ॥

prajāścaturvidhāstena trātā rājankṛtātmanā | tenātmatapasā lokāstāpitāścātitejasā

हे राजन्, उस संयमी राजा ने चारों प्रकार की प्रजा की रक्षा की, और अपने तप तथा अत्यन्त तेज से सब लोकों को तपा दिया।

श्लोक 45 (3.127.45)

तस्यैतद्देवयजनं स्थानमादित्यवर्चसः । पश्य पुण्यतमे देशे कुरुक्षेत्रस्य मध्यतः ॥

tasyaitaddevayajanaṃ sthānamādityavarcasaḥ | paśya puṇyatame deśe kurukṣetrasya madhyataḥ

देखो, सूर्य के समान तेजस्वी उस राजा की यह यज्ञभूमि परम पवित्र प्रदेश में, कुरुक्षेत्र के मध्य में है।

श्लोक 46 (3.127.46)

तथा त्वमपि राजेन्द्र मान्धातेव महीपतिः । धर्मं कृत्वा महीं रक्ष स्वर्गलोकं गमिष्यसि ॥

tathā tvamapi rājendra māndhāteva mahīpatiḥ | dharmaṃ kṛtvā mahīṃ rakṣa svargalokaṃ gamiṣyasi

हे राजेन्द्र, उसी प्रकार तुम भी राजा मान्धाता की तरह धर्म का आचरण करके और पृथ्वी की रक्षा करके स्वर्गलोक को जाओगे।

श्लोक 47 (3.127.47)

एतत्ते सर्वमाख्यातं मान्धातुश्चरितं महत् । जन्म चाग्र्यं महीपाल यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥

etatte sarvamākhyātaṃ māndhātuścaritaṃ mahat | janma cāgryaṃ mahīpāla yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi

हे पृथ्वीपाल, तुमने मुझसे जो पूछा था — मान्धाता का महान चरित्र और उनका अद्भुत जन्म — वह सब मैंने तुम्हें सुना दिया।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 48 (3.127.48)

एवमुक्तः स कौन्तेयो लोमशेन महर्षिणा । पप्रच्छानन्तरं भूयः सोमकं प्रति भारत ॥

evamuktaḥ sa kaunteyo lomaśena maharṣiṇā | papracchānantaraṃ bhūyaḥ somakaṃ prati bhārata

वैशम्पायन बोले — हे भारत, महर्षि लोमश के ऐसा कहने पर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने इसके बाद फिर सोमक के विषय में पूछा।

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