आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 128
सोमक का इकलौता पुत्र जन्तु
लोमश राजा सोमक की कथा सुनाते हैं, जिनकी सौ रानियाँ थीं, पर लम्बे प्रयत्न के बाद बुढ़ापे में केवल एक पुत्र जन्तु हुआ। एक दिन चींटी के काटने पर बालक रोता है और सब माताएँ एक साथ विलाप करने लगती हैं; सोमक दौड़कर उसे सान्त्वना देते हैं और फिर अपने पुरोहित से कहते हैं कि एक ही पुत्र होना केवल शोक है। वे सौ पुत्र पाने का कोई उपाय पूछते हैं, और पुरोहित कहता है कि जन्तु की बलि देकर यज्ञ करो — आहुति का धुआँ सूँघकर रानियाँ सौ पुत्रों को जन्म देंगी, और जन्तु भी अपनी ही माता से फिर जन्म लेगा, जिसकी बायीं कोख पर सोने का चिह्न होगा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (3.128.1)
कथंवीर्यः स राजाऽभूत्सोमको ददतांवरः । कर्माण्यस्य प्रभावं च श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
kathaṃvīryaḥ sa rājā'bhūtsomako dadatāṃvaraḥ | karmāṇyasya prabhāvaṃ ca śrotumicchāmi tattvataḥ
युधिष्ठिर बोले — दाताओं में श्रेष्ठ वह राजा सोमक कैसे पराक्रम वाला था? मैं उसके कर्मों और प्रभाव के विषय में यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।
लोमश उवाच
श्लोक 2 (3.128.2)
युधिष्ठिरासीन्नृपतिः सोमको नाम धार्मिकः । तस्य भार्याशतं राजन्सदृशीनामभूत्तदा ॥
yudhiṣṭhirāsīnnṛpatiḥ somako nāma dhārmikaḥ | tasya bhāryāśataṃ rājansadṛśīnāmabhūttadā
लोमश बोले — हे युधिष्ठिर, सोमक नाम का एक धर्मात्मा राजा था। हे राजन्, उसकी सौ रानियाँ थीं, जो सब उसके योग्य थीं।
श्लोक 3 (3.128.3)
स वै यत्नेन महता तासु पुत्रं महीपतिः । कंचिन्नासादयामास कालेन महता ह्यपि ॥
sa vai yatnena mahatā tāsu putraṃ mahīpatiḥ | kaṃcinnāsādayāmāsa kālena mahatā hyapi
उस राजा ने बड़े यत्न से बहुत समय तक प्रयत्न किया, फिर भी उन रानियों से उसे कोई पुत्र प्राप्त नहीं हुआ।
श्लोक 4 (3.128.4)
कदाचित्तस्य वृद्धस्य यतमानस्य धीमतः । जन्तुर्नाम सुतस्तस्य ज्येष्ठायां समजायत ॥
kadācittasya vṛddhasya yatamānasya dhīmataḥ | janturnāma sutastasya jyeṣṭhāyāṃ samajāyata
आखिरकार, जब वह बुद्धिमान राजा बूढ़ा हो चला था और तब भी प्रयत्न कर रहा था, तब उसकी ज्येष्ठ रानी से जन्तु नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ।
श्लोक 5 (3.128.5)
तं जातं मातरः सर्वाः परिवार्य समासते । सततं पृष्ठतः कृत्वा कामभोगान्विशांपते ॥
taṃ jātaṃ mātaraḥ sarvāḥ parivārya samāsate | satataṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā kāmabhogānviśāṃpate
हे प्रजानाथ, उसके जन्म लेते ही सभी माताएँ अपने भोग-विलास को सदा पीछे रखकर उसे घेरकर बैठी रहती थीं।
श्लोक 6 (3.128.6)
ततः पिपीलिका जन्तुं कदाचिददशत्स्फिचि । स दष्टो ह्यरुदद्राजंस्तेन दुःखेन बालकः ॥
tataḥ pipīlikā jantuṃ kadācidadaśatsphici | sa daṣṭo hyarudadrājaṃstena duḥkhena bālakaḥ
फिर एक दिन एक चींटी ने जन्तु के कूल्हे पर काट लिया। हे राजन्, काटे जाने के दर्द से वह बालक रोने लगा।
श्लोक 7 (3.128.7)
ततस्ता मातरः सर्वाः प्राक्रोशन्भृशदुःखिताः । प्रवार्य जन्तुं सहसा स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥
tatastā mātaraḥ sarvāḥ prākrośanbhṛśaduḥkhitāḥ | pravārya jantuṃ sahasā sa śabdastumulo'bhavat
तब सब माताएँ अत्यन्त दुःखी होकर सहसा जन्तु को घेरकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं; उनका कोलाहल भारी हो उठा।
श्लोक 8 (3.128.8)
तमार्तनादं सहसा शुश्राव स महीपतिः । अमात्यपर्षदो मध्ये उपविष्टः सहर्त्विजा ॥
tamārtanādaṃ sahasā śuśrāva sa mahīpatiḥ | amātyaparṣado madhye upaviṣṭaḥ sahartvijā
मन्त्रियों की सभा के बीच पुरोहित के साथ बैठे हुए राजा ने सहसा वह आर्तनाद सुना।
श्लोक 9 (3.128.9)
ततः प्रस्थापयामास किमेतदिति पार्थिवः । तस्मै क्षत्ता यथावृत्तमाचचक्षे सुतं प्रति ॥
tataḥ prasthāpayāmāsa kimetaditi pārthivaḥ | tasmai kṣattā yathāvṛttamācacakṣe sutaṃ prati
राजा ने 'यह क्या है' जानने के लिए किसी को भेजा, और द्वारपाल ने उसे पुत्र के साथ घटी बात ज्यों-की-त्यों बता दी।
श्लोक 10 (3.128.10)
त्वरमाणः स चोत्थाय सोमकः सह मन्त्रिभिः । प्रविश्यान्तःपुरं पुत्रमाश्वासयदरिंदमः ॥
tvaramāṇaḥ sa cotthāya somakaḥ saha mantribhiḥ | praviśyāntaḥpuraṃ putramāśvāsayadariṃdamaḥ
शत्रुदमन सोमक तुरन्त उठकर मन्त्रियों के साथ अन्तःपुर में गया और पुत्र को ढाढ़स बँधाया।
श्लोक 11 (3.128.11)
सान्त्वयित्वा तु तं पुत्रं निष्क्रम्यान्तःपुरान्नृपः । ऋत्विजा सहितो राजन्सहामात्य उपाविशत् ॥
sāntvayitvā tu taṃ putraṃ niṣkramyāntaḥpurānnṛpaḥ | ṛtvijā sahito rājansahāmātya upāviśat
हे राजन्, पुत्र को सान्त्वना देकर राजा अन्तःपुर से बाहर आया और पुरोहित तथा मन्त्रियों के साथ बैठ गया।
सोमक उवाच
श्लोक 12 (3.128.12)
धिगस्त्विहैकपुत्रत्वमपुत्रत्वं वरं भवेत् । नित्यातुरत्वाद्भूतानां शोक एवैकपुत्रता ॥
dhigastvihaikaputratvamaputratvaṃ varaṃ bhavet | nityāturatvādbhūtānāṃ śoka evaikaputratā
सोमक बोले — इस संसार में एक ही पुत्र होने को धिक्कार है! इससे तो पुत्रहीन होना अच्छा। प्राणी सदा रोग-कष्ट से घिरे रहते हैं, इसलिए एक पुत्र होना केवल शोक ही है।
श्लोक 13 (3.128.13)
इदं भार्याशतं ब्रह्मन्परीक्ष्यसदृशं प्रभो । पुत्रार्थिना मया वोढं न तासां विद्यते प्रजा ॥
idaṃ bhāryāśataṃ brahmanparīkṣyasadṛśaṃ prabho | putrārthinā mayā voḍhaṃ na tāsāṃ vidyate prajā
हे ब्रह्मन्, हे प्रभो, पुत्र की इच्छा से मैंने परख-परखकर ये सौ योग्य पत्नियाँ ब्याहीं, पर इनसे कोई सन्तान नहीं है।
श्लोक 14 (3.128.14)
एकः कथंचिदुत्पन्नः पुत्रो जन्तुरयं मम । यतमानासु सर्वासु किंनु दुःखमतः परम् ॥
ekaḥ kathaṃcidutpannaḥ putro janturayaṃ mama | yatamānāsu sarvāsu kiṃnu duḥkhamataḥ param
सबके प्रयत्न करने पर किसी तरह मेरा यह एक पुत्र जन्तु उत्पन्न हुआ है। इससे बड़ा दुःख और क्या होगा?
श्लोक 15 (3.128.15)
वयश्च समतीतं मे सभार्यस्य द्विजोत्तम । आसां प्राणाः समायत्ता मम चात्रैकपुत्रके ॥
vayaśca samatītaṃ me sabhāryasya dvijottama | āsāṃ prāṇāḥ samāyattā mama cātraikaputrake
हे द्विजश्रेष्ठ, पत्नियों सहित मेरी आयु बीत चुकी है। इनके और मेरे प्राण इसी एक पुत्र पर टिके हैं।
श्लोक 16 (3.128.16)
स्यात्तु कर्म तथा युक्तं येन पुत्रशतं भवेत् । महता लघुना वाऽपि कर्मणा दुष्करेण वा ॥
syāttu karma tathā yuktaṃ yena putraśataṃ bhavet | mahatā laghunā vā'pi karmaṇā duṣkareṇa vā
क्या कोई ऐसा उपयुक्त कर्म है जिससे सौ पुत्र हो जायें — चाहे वह बड़ा हो या छोटा, या कठिन ही क्यों न हो?
ऋत्विगुवाच
श्लोक 17 (3.128.17)
अस्ति चैतादृशं कर्म येन पुत्रशतं भवेत् । यदि शक्नोषि तत्कर्तुमथ वक्ष्यामि सोमक ॥
asti caitādṛśaṃ karma yena putraśataṃ bhavet | yadi śaknoṣi tatkartumatha vakṣyāmi somaka
ऋत्विक् बोले — हाँ, ऐसा एक कर्म है जिससे सौ पुत्र हो सकते हैं। हे सोमक, यदि तुम उसे कर सको, तो मैं बताऊँ।
सोमक उवाच
श्लोक 18 (3.128.18)
कार्यं वा यदि वाऽकार्यं येन पुत्रशतं भवेत् । कृतमेवेति तद्विद्धि भगवान्प्रब्रवीतु मे ॥
kāryaṃ vā yadi vā'kāryaṃ yena putraśataṃ bhavet | kṛtameveti tadviddhi bhagavānprabravītu me
सोमक बोले — वह करने योग्य हो या न करने योग्य, जिससे सौ पुत्र हों, उसे किया हुआ ही समझिए। पूज्यवर, आप मुझे बताइए।
ऋत्विगुवाच
श्लोक 19 (3.128.19)
यजस्व जन्तुना राजंस्त्वं मया वितते क्रतौ । ततः पुत्रशतं श्रीमद्भविष्यत्यचिरेण ते ॥
yajasva jantunā rājaṃstvaṃ mayā vitate kratau | tataḥ putraśataṃ śrīmadbhaviṣyatyacireṇa te
ऋत्विक् बोले — हे राजन्, मेरे द्वारा किये जाने वाले यज्ञ में तुम जन्तु की आहुति दो। तब शीघ्र ही तुम्हारे सौ तेजस्वी पुत्र होंगे।
श्लोक 20 (3.128.20)
वपायां हूयमानायां धूममाघ्राय मातरः । ततस्ताः सुमहावीर्याञ्जनयिष्यन्ति ते सुतान् ॥
vapāyāṃ hūyamānāyāṃ dhūmamāghrāya mātaraḥ | tatastāḥ sumahāvīryāñjanayiṣyanti te sutān
जब उसकी वपा की आहुति दी जायेगी, तब माताएँ उसका धुआँ सूँघेंगी और फिर वे तुम्हारे लिए महापराक्रमी पुत्रों को जन्म देंगी।
श्लोक 21 (3.128.21)
तस्यामेव तु ते जन्तुर्भविता पुनरात्मजः । उत्तरे चास्य सौवर्णं लक्ष्म पार्श्वे भविष्यति ॥
tasyāmeva tu te janturbhavitā punarātmajaḥ | uttare cāsya sauvarṇaṃ lakṣma pārśve bhaviṣyati
और जन्तु भी उसी माता से फिर तुम्हारा पुत्र बनकर जन्म लेगा, और उसकी बायीं कोख पर सोने का चिह्न होगा।