आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 129
सोमक ने गुरु के साथ नरक भोगा
सोमक मान जाते हैं और पुरोहित जन्तु की बलि देता है, जबकि माताएँ उसे वापस खींचने का व्यर्थ प्रयत्न करती हैं; वपा की आहुति की गन्ध सूँघकर वे गर्भ धारण करती हैं और सौ पुत्र जन्म लेते हैं, जिनमें सोने के चिह्न वाला जन्तु फिर सबसे बड़ा होता है। मृत्यु के बाद सोमक अपने पुरोहित को उसी यज्ञ के कारण नरक में पकते देखते हैं और उसके स्थान पर स्वयं नरक में जाने को तैयार हो जाते हैं। धर्मराज कहते हैं कि कोई दूसरे के कर्म का फल नहीं भोगता, पर सोमक गुरु के साथ ही रहने का आग्रह करते हैं, उनके साथ पाप क्षीण होने तक कष्ट भोगते हैं और फिर उनके साथ अपने पुण्यलोकों का सुख पाते हैं। लोमश पाण्डवों को सोमक का आश्रम दिखाकर वहाँ छह रातें रहने को कहते हैं।
सोमक उवाच
श्लोक 1 (3.129.1)
ब्रह्मन्यद्यद्यथा कार्यं तत्कुरुष्व तथातथा । पुत्रकामतया सर्वंकरिष्यामि वचस्तव ॥
brahmanyadyadyathā kāryaṃ tatkuruṣva tathātathā | putrakāmatayā sarvaṃkariṣyāmi vacastava
सोमक बोले — हे ब्रह्मन्, जो-जो कर्म जिस प्रकार करना हो, आप वैसा ही कीजिए। पुत्रों की कामना से मैं आपकी हर बात मानूँगा।
लोमश उवाच
श्लोक 2 (3.129.2)
ततः स याजयामास सोमकं तेन जन्तुना । मातरस्तु बलात्पुत्रमपाकार्षुः कृपान्विताः ॥
tataḥ sa yājayāmāsa somakaṃ tena jantunā | mātarastu balātputramapākārṣuḥ kṛpānvitāḥ
लोमश बोले — तब पुरोहित ने सोमक से जन्तु के द्वारा यज्ञ कराया। पर करुणा से भरी माताओं ने पुत्र को बलपूर्वक खींच लिया।
श्लोक 3 (3.129.3)
हा हताः स्मेति वाशन्त्यस्तीव्रशोकसमाहताः । तं मातरः प्रत्यकर्षन्गृहीत्वा दक्षिणे करे ॥
hā hatāḥ smeti vāśantyastīvraśokasamāhatāḥ | taṃ mātaraḥ pratyakarṣangṛhītvā dakṣiṇe kare
"हाय, हम मारी गयीं!" — ऐसा विलाप करती हुई, तीव्र शोक से आहत माताओं ने उसका दाहिना हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा।
श्लोक 4 (3.129.4)
सव्ये पाणौ गृहीत्वा तु याजकोपि स्म कर्षति । कुररीणामिवार्तानामपाकृष्य तु तं सुतम् ॥
savye pāṇau gṛhītvā tu yājakopi sma karṣati | kurarīṇāmivārtānāmapākṛṣya tu taṃ sutam
याजक भी उसका बायाँ हाथ पकड़कर खींच रहा था। कुररी पक्षियों की तरह विलाप करती माताओं से उस पुत्र को छीनकर
श्लोक 5 (3.129.5)
विशस्य चैनं विधिवद्वपामस्य जुहाव सः । वपायां हूयमानायां गन्धमाघ्राय मातरः ॥
viśasya cainaṃ vidhivadvapāmasya juhāva saḥ | vapāyāṃ hūyamānāyāṃ gandhamāghrāya mātaraḥ
उसने विधिपूर्वक उसे काटकर उसकी वपा की आहुति दी। वपा की आहुति दिये जाते समय उसकी गन्ध सूँघकर माताएँ
श्लोक 6 (3.129.6)
आर्ता निपेतुः सहसा पृथिव्यां कुरुनन्दन । सर्वाश्च गर्भानलभंस्ततस्ताः पार्थिवाङ्गनाः ॥
ārtā nipetuḥ sahasā pṛthivyāṃ kurunandana | sarvāśca garbhānalabhaṃstatastāḥ pārthivāṅganāḥ
व्याकुल होकर सहसा भूमि पर गिर पड़ीं, हे कुरुनन्दन। और राजा की उन सभी रानियों ने गर्भ धारण किया।
श्लोक 7 (3.129.7)
ततो दशसु मासेषु सोमकस्य विशांपते । जज्ञे पुत्रशतं पूर्णं तासु सर्वासु भारत ॥
tato daśasu māseṣu somakasya viśāṃpate | jajñe putraśataṃ pūrṇaṃ tāsu sarvāsu bhārata
हे प्रजानाथ भारत, फिर दस महीने बीतने पर उन सब रानियों से सोमक के पूरे सौ पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 8 (3.129.8)
जन्तुर्ज्येष्ठः समभवज्जनित्र्यामेव पूर्ववत् । स तासामिष्ट एवासीन्न तथाऽन्ये निजाः सुताः ॥
janturjyeṣṭhaḥ samabhavajjanitryāmeva pūrvavat | sa tāsāmiṣṭa evāsīnna tathā'nye nijāḥ sutāḥ
जन्तु पहले की तरह अपनी ही माता से ज्येष्ठ पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ। वही उन सबका सबसे प्यारा था; उनके अपने पुत्र भी उतने प्यारे नहीं थे।
श्लोक 9 (3.129.9)
तच्च लक्षणमस्यासीत्सौवर्णं पार्श्व उत्तरे । तस्मिन्पुत्रशते चाग्र्यः स बभूव गुणैरपि ॥
tacca lakṣaṇamasyāsītsauvarṇaṃ pārśva uttare | tasminputraśate cāgryaḥ sa babhūva guṇairapi
उसकी बायीं कोख पर वही सोने का चिह्न था, और उन सौ पुत्रों में वह गुणों में भी सबसे श्रेष्ठ हुआ।
श्लोक 10 (3.129.10)
ततः स लोकमगमत्सोमकस्य गुरुः परम् । अन्वक्षमेव पश्चात्तु सोमकोप्यगमत्परम् ॥
tataḥ sa lokamagamatsomakasya guruḥ param | anvakṣameva paścāttu somakopyagamatparam
फिर सोमक का गुरु परलोक को चला गया, और उसके तुरन्त बाद सोमक भी परलोक को गया।
श्लोक 11 (3.129.11)
अथ तं नरके घोरे पच्यमानं ददर्श सः । तमपृच्छत्किमर्थं त्वं नरके पच्यसे द्विज ॥
atha taṃ narake ghore pacyamānaṃ dadarśa saḥ | tamapṛcchatkimarthaṃ tvaṃ narake pacyase dvija
वहाँ उसने अपने गुरु को भयंकर नरक में पकते देखा और उससे पूछा — "हे द्विज, तुम नरक में क्यों पकाये जा रहे हो?"
श्लोक 12 (3.129.12)
तमब्रवीद्गुरुः सोऽथ पच्यमानोऽग्निना भृशम् । त्वं मया याजितो राजंस्तस्येदं कर्मणः फलम् ॥
tamabravīdguruḥ so'tha pacyamāno'gninā bhṛśam | tvaṃ mayā yājito rājaṃstasyedaṃ karmaṇaḥ phalam
आग में बुरी तरह पकते हुए गुरु ने तब उससे कहा — "हे राजन्, मैंने तुमसे वह यज्ञ कराया था; यह उसी कर्म का फल है।"
श्लोक 13 (3.129.13)
एतच्छ्रुत्वा स राजर्षिर्धर्मराजमथाब्रवीत् । अहमत्र प्रवेक्ष्यामि मुच्यतां मम याजकः ॥
etacchrutvā sa rājarṣirdharmarājamathābravīt | ahamatra pravekṣyāmi mucyatāṃ mama yājakaḥ
यह सुनकर उस राजर्षि ने धर्मराज से कहा — "मैं यहाँ प्रवेश करूँगा; मेरे याजक को छोड़ दिया जाये।
सोमक उवाच
श्लोक 14 (3.129.14)
मत्कृते हि महाभागः पच्यते नरकाग्निना । सोहमात्मानमाधास्ये नरके मुच्यतां गुरुः ॥
matkṛte hi mahābhāgaḥ pacyate narakāgninā | sohamātmānamādhāsye narake mucyatāṃ guruḥ
"क्योंकि मेरे ही कारण यह महाभाग नरक की आग में पक रहा है। मैं स्वयं को नरक में डालूँगा; मेरे गुरु को मुक्त कर दिया जाये।"
धर्म उवाच
श्लोक 15 (3.129.15)
नान्यः कर्तुः फलं राजन्नुपभुङ्क्ते कदाचन । इमानि तव दृश्यन्ते फलानि वदतांवर ॥
nānyaḥ kartuḥ phalaṃ rājannupabhuṅkte kadācana | imāni tava dṛśyante phalāni vadatāṃvara
धर्म बोले — हे राजन्, कोई भी दूसरे के कर्म का फल कभी नहीं भोगता। हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, ये तुम्हारे अपने कर्मों के फल दिखायी दे रहे हैं।
सोमक उवाच
श्लोक 16 (3.129.16)
पुण्यान्न कामये लोकानृतेऽहं ब्रह्मवादिनम् । इच्छाम्यहमनेनैव सह वस्तुं सुरालये ॥
puṇyānna kāmaye lokānṛte'haṃ brahmavādinam | icchāmyahamanenaiva saha vastuṃ surālaye
सोमक बोले — इस ब्रह्मवादी के बिना मैं पुण्यलोकों की कामना नहीं करता। मैं इसी के साथ रहना चाहता हूँ — चाहे देवलोक में,
श्लोक 17 (3.129.17)
नरके वा धर्मराज कर्मणाऽस्य समो ह्यहम् । पुण्यापुण्यफलं देव सममस्त्वावयोरिदम् ॥
narake vā dharmarāja karmaṇā'sya samo hyaham | puṇyāpuṇyaphalaṃ deva samamastvāvayoridam
या नरक में, हे धर्मराज; क्योंकि इस कर्म में मैं भी इसी के बराबर हूँ। हे देव, पुण्य और पाप का यह फल हम दोनों को समान रूप से मिले।
धर्मराज उवाच
श्लोक 18 (3.129.18)
यद्येवमीप्सितं राजन्भुङ्क्ष्वास्य सहितः फलम् । तुल्यकालं सहानेन पश्चात्प्राप्स्यसि सद्गतिम् ॥
yadyevamīpsitaṃ rājanbhuṅkṣvāsya sahitaḥ phalam | tulyakālaṃ sahānena paścātprāpsyasi sadgatim
धर्मराज बोले — हे राजन्, यदि तुम्हारी यही इच्छा है, तो इसके साथ उतने ही समय तक इसका फल भोगो। उसके बाद तुम्हें सद्गति मिलेगी।
लोमश उवाच
श्लोक 19 (3.129.19)
स चकार तथा सर्वं राजा राजीवलोचनः । क्षीणपापश्च तस्मात्स विमुक्तो गुरुणा सह ॥
sa cakāra tathā sarvaṃ rājā rājīvalocanaḥ | kṣīṇapāpaśca tasmātsa vimukto guruṇā saha
लोमश बोले — कमलनयन राजा ने सब वैसा ही किया, और पाप क्षीण होने पर वह अपने गुरु के साथ वहाँ से मुक्त हो गया।
श्लोक 20 (3.129.20)
लेभे कामाञ्शुभान्राजन्कर्मणा निर्जितान्स्वयम् । सह तेनैव विप्रेण गुरुणा स गुरुप्रियः ॥
lebhe kāmāñśubhānrājankarmaṇā nirjitānsvayam | saha tenaiva vipreṇa guruṇā sa gurupriyaḥ
हे राजन्, फिर गुरु से प्रेम करने वाले उस राजा ने उसी ब्राह्मण गुरु के साथ अपने कर्मों से जीते हुए शुभ भोगों को प्राप्त किया।
श्लोक 21 (3.129.21)
एष तस्याश्रमः पुण्यो य एषोग्रे विराजते । क्षान्त उष्यात्र षड्रात्रं प्राप्नोति सुगतिं नरः ॥
eṣa tasyāśramaḥ puṇyo ya eṣogre virājate | kṣānta uṣyātra ṣaḍrātraṃ prāpnoti sugatiṃ naraḥ
यह उसी का पवित्र आश्रम है, जो सामने शोभा पा रहा है। जो मनुष्य क्षमाशील होकर यहाँ छह रातें रहता है, वह सद्गति पाता है।
श्लोक 22 (3.129.22)
एतस्मिन्नपि राजेन्द्र वत्स्यामो विगतज्वराः । षड्रात्रं नियतात्मानः सज्जीभव कुरूद्वह ॥
etasminnapi rājendra vatsyāmo vigatajvarāḥ | ṣaḍrātraṃ niyatātmānaḥ sajjībhava kurūdvaha
हे राजेन्द्र, हम भी यहाँ निश्चिन्त और संयमित मन से छह रातें रहेंगे। हे कुरुश्रेष्ठ, तैयार हो जाओ।