आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 130
मार्कण्डेय का आश्रम और शिव का वरदान
छह रातों के बाद सोमक के आश्रम से निकलकर युधिष्ठिर उत्तर की ओर जाते हैं और एक बड़ी नदी के किनारे एक मनोहर वन देखकर लोमश से पूछते हैं कि यह आश्रम किसका है। लोमश बताते हैं कि बालमुनि मार्कण्डेय ने यहाँ कठोर तप किया, भयंकर अनावृष्टि में भूख-प्यास से मरते बचे हुए लोगों की रक्षा के लिए गंगा (जो यहाँ वेदनदी कहलाती हैं) और वर्षा का आवाहन किया, और शिव से अनन्य भक्ति तथा मृत्यु से मुक्ति का वर पाया — वही शिव जिन्होंने कभी उनके पिता को सौ वर्ष जीने वाले गुणहीन पुत्र और सोलह वर्ष जीने वाले गुणवान पुत्र में से एक चुनने को कहा था। इस आश्रम में एक रात रहने वाला भी मृत्यु को पार कर जाता है। यह पूरा अध्याय समीक्षित संस्करण में नहीं है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.130.1)
सोमकस्याश्रमे पुण्ये धर्मराजो युधिष्ठिरः । षड्रात्रमुष्य नियतो भ्रात्रादिभिररिंदमः । तस्मान्निर्गम्य सहसा दिशं प्रायात्तथोत्तराम् ॥
somakasyāśrame puṇye dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | ṣaḍrātramuṣya niyato bhrātrādibhirariṃdamaḥ | tasmānnirgamya sahasā diśaṃ prāyāttathottarām
शत्रुओं का दमन करने वाले धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों और साथियों के साथ नियमपूर्वक सोमक के पवित्र आश्रम में छह रातें रहे। फिर वहाँ से शीघ्र निकलकर वे उत्तर दिशा की ओर चल पड़े।
श्लोक 2 (3.130.2)
बहुदूरं ततो गत्वा वनं तत्र मनोहरम् । बहुपुष्पफलाकीर्णं महानद्युपशोभितम् ॥
bahudūraṃ tato gatvā vanaṃ tatra manoharam | bahupuṣpaphalākīrṇaṃ mahānadyupaśobhitam
वहाँ से बहुत दूर जाकर उन्हें एक मनोहर वन मिला, जो अनेक फूलों और फलों से भरा था और एक बड़ी नदी से सुशोभित था।
श्लोक 3 (3.130.3)
दृष्ट्वा पप्रच्छ राजाऽसौ लोमशं मुनिसत्तमम् । किमिदं दृश्यते रम्यं वनं बहुमृगद्विजम् ॥
dṛṣṭvā papraccha rājā'sau lomaśaṃ munisattamam | kimidaṃ dṛśyate ramyaṃ vanaṃ bahumṛgadvijam
उसे देखकर राजा ने मुनिश्रेष्ठ लोमश से पूछा — "यह कौन-सा रमणीय वन दिखाई दे रहा है, जिसमें बहुत-से पशु-पक्षी हैं,
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 4 (3.130.4)
बहुपुष्पफलोपेतं मुनिसङ्घैर्निषेवितम् । स्रवन्त्या च समायुक्तं महत्या पुण्यतोयया ॥
bahupuṣpaphalopetaṃ munisaṅghairniṣevitam | sravantyā ca samāyuktaṃ mahatyā puṇyatoyayā
"जो फूलों और फलों से भरा है, मुनियों के समूह जिसमें रहते हैं, और जो पवित्र जल वाली एक विशाल नदी से युक्त है?
श्लोक 5 (3.130.5)
ऋषीणामाश्रमाः पुण्या दृश्यन्ते विविधा मुने । कस्यायमाश्रमः पुण्यः कस्येमे मुनयोऽमलाः । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं वद त्वं वदतांवर ॥
ṛṣīṇāmāśramāḥ puṇyā dṛśyante vividhā mune | kasyāyamāśramaḥ puṇyaḥ kasyeme munayo'malāḥ | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ vada tvaṃ vadatāṃvara
"हे मुने, यहाँ ऋषियों के अनेक प्रकार के पवित्र आश्रम दिखाई देते हैं। यह पवित्र आश्रम किसका है, और ये निर्मल मुनि किसके हैं? यह मैं सुनना चाहता हूँ; हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, आप बताइए।"
लोमश उवाच
श्लोक 6 (3.130.6)
शृणु राजेन्द्र भद्रं ते वनस्यास्य पुरातनम् । वृत्तान्तं निखिलेनाद्य प्रोच्यमानं मयाऽनघ ॥
śṛṇu rājendra bhadraṃ te vanasyāsya purātanam | vṛttāntaṃ nikhilenādya procyamānaṃ mayā'nagha
हे राजेन्द्र, सुनो, तुम्हारा कल्याण हो। हे निष्पाप, आज मैं इस वन का प्राचीन वृत्तान्त पूरा-पूरा तुम्हें सुनाता हूँ।
श्लोक 7 (3.130.7)
मृकण्डुपुत्रो मेधावी मार्कण्डेयो महामुनिः । बाल एव महाबुद्धिः सर्वविद्याविशारदः ॥
mṛkaṇḍuputro medhāvī mārkaṇḍeyo mahāmuniḥ | bāla eva mahābuddhiḥ sarvavidyāviśāradaḥ
मृकण्डु के पुत्र मेधावी मार्कण्डेय एक महामुनि थे। बालक होते हुए भी वे महाबुद्धिमान और सब विद्याओं में निपुण थे।
श्लोक 8 (3.130.8)
मातापित्रोः प्रियं कुर्वंस्तपोर्थं वनमाविशत् । अत्राश्रमपदं कृत्वा तपस्तेपे सुदारुणम् ॥
mātāpitroḥ priyaṃ kurvaṃstaporthaṃ vanamāviśat | atrāśramapadaṃ kṛtvā tapastepe sudāruṇam
माता-पिता का प्रिय करते हुए वे तप के लिए वन में आए। यहीं आश्रम बनाकर उन्होंने अत्यन्त कठोर तप किया।
श्लोक 9 (3.130.9)
ग्रीष्मे पञ्चतपा भूत्वा वर्षास्वाकाशसंश्रयः । जलस्थः शिशिरे योगी बहुकालमवर्तत ॥
grīṣme pañcatapā bhūtvā varṣāsvākāśasaṃśrayaḥ | jalasthaḥ śiśire yogī bahukālamavartata
ग्रीष्म में वे पञ्चाग्नि के बीच तप करते, वर्षा में खुले आकाश के नीचे रहते और शिशिर में जल में खड़े रहते। इस प्रकार वह योगी बहुत समय तक रहा।
श्लोक 10 (3.130.10)
ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बः पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः । जितेन्द्रियो जितप्राणश्चिन्तयन्दृढमव्ययम् । अनाहारो जितक्रोधश्चिरमेवमवर्तत ॥
ūrdhvabāhurnirālambaḥ pādāṅguṣṭhāgraviṣṭhitaḥ | jitendriyo jitaprāṇaścintayandṛḍhamavyayam | anāhāro jitakrodhaściramevamavartata
भुजाएँ ऊपर उठाए, बिना किसी सहारे के, पैरों के अँगूठों के अग्रभाग पर खड़े होकर, इन्द्रियों और प्राणों को जीतकर, अविनाशी का दृढ़ ध्यान करते हुए, निराहार और क्रोधरहित होकर वे बहुत समय तक इसी प्रकार रहे।
श्लोक 11 (3.130.11)
एतस्मिन्नन्तरे राजन्ननावृष्टिः सुदारुणा । संभूता सर्वसंहर्त्री तया दग्धं चराचरम् ॥
etasminnantare rājannanāvṛṣṭiḥ sudāruṇā | saṃbhūtā sarvasaṃhartrī tayā dagdhaṃ carācaram
हे राजन्, इसी बीच एक भयंकर अनावृष्टि हुई, जो सबका संहार करने वाली थी; उससे समस्त चर-अचर जगत् झुलस गया।
श्लोक 12 (3.130.12)
अनावृष्ट्यां प्रवृत्तायां सर्वे च निधनं गताः । केचिदन्ये महात्मानो मुनयो द्विजपुङ्गवाः ॥
anāvṛṣṭyāṃ pravṛttāyāṃ sarve ca nidhanaṃ gatāḥ | kecidanye mahātmāno munayo dvijapuṅgavāḥ
अनावृष्टि के चलते सब मृत्यु को प्राप्त होने लगे। किन्तु कुछ अन्य — महात्मा मुनि और श्रेष्ठ ब्राह्मण,
श्लोक 13 (3.130.13)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राः सर्वाश्च योषितः । पशुपक्षिमृगाः सर्वे क्षुत्पिपासासमाकुलाः । कृशाः शुष्कोष्ठकण्ठाश्च श्रान्ता भ्रान्ता विचेतसः ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāḥ sarvāśca yoṣitaḥ | paśupakṣimṛgāḥ sarve kṣutpipāsāsamākulāḥ | kṛśāḥ śuṣkoṣṭhakaṇṭhāśca śrāntā bhrāntā vicetasaḥ
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और सब स्त्रियाँ, तथा सभी पशु, पक्षी और मृग — भूख-प्यास से व्याकुल, दुबले, सूखे होंठों और कण्ठों वाले, थके, भटकते और अचेत-से —
श्लोक 14 (3.130.14)
केनचित्पुण्यशेषेण मार्कण्डेयस्य धीमतः । आश्रमं शनकैः प्राप्ता मूर्च्छिताः सहसाऽपतन् ॥
kenacitpuṇyaśeṣeṇa mārkaṇḍeyasya dhīmataḥ | āśramaṃ śanakaiḥ prāptā mūrcchitāḥ sahasā'patan
किसी बचे हुए पुण्य के बल से धीरे-धीरे बुद्धिमान मार्कण्डेय के आश्रम तक पहुँचे और वहाँ सहसा मूर्च्छित होकर गिर पड़े।
श्लोक 15 (3.130.15)
समाधिविरतो योगी मार्कण्डेयो महातपाः । तद्वनं निबिडं दृष्ट्वा जनैः क्षुत्तृट्समाकुलैः ॥
samādhivirato yogī mārkaṇḍeyo mahātapāḥ | tadvanaṃ nibiḍaṃ dṛṣṭvā janaiḥ kṣuttṛṭsamākulaiḥ
समाधि से उठने पर महातपस्वी योगी मार्कण्डेय ने देखा कि वह वन भूख-प्यास से व्याकुल लोगों से भरा हुआ है।
श्लोक 16 (3.130.16)
दयार्द्रहृदयो योगी शिवं ध्यात्वा हृदम्बुजे । तेषां संरक्षणार्थाय वेदगन्धिस्वरेण सः । आजुहाव तदा गङ्गां तपोयोगेन भारत ॥
dayārdrahṛdayo yogī śivaṃ dhyātvā hṛdambuje | teṣāṃ saṃrakṣaṇārthāya vedagandhisvareṇa saḥ | ājuhāva tadā gaṅgāṃ tapoyogena bhārata
दया से द्रवित हृदय वाले उस योगी ने हृदय-कमल में शिव का ध्यान किया और, हे भारत, उनकी रक्षा के लिए वेद-ध्वनि से सुवासित स्वर में अपने तपोबल से गंगा का आवाहन किया।
श्लोक 17 (3.130.17)
गङ्गा समागता शीघ्रं तेनाहूताऽतिपावना । नाम्ना वेदनदीत्येव प्रख्याता लोकपावना ॥
gaṅgā samāgatā śīghraṃ tenāhūtā'tipāvanā | nāmnā vedanadītyeva prakhyātā lokapāvanā
उनके बुलाने पर परम पावनी गंगा शीघ्र आ पहुँचीं। लोकों को पवित्र करने वाली वे यहाँ "वेदनदी" नाम से प्रसिद्ध हुईं।
श्लोक 18 (3.130.18)
पर्जन्यश्च समाहूतः सुखं वर्षति भारत । सस्यानि च समृद्धानि फलमूलान्यनेकशः । संभूतान्यत्र राजेन्द्र सर्वे ते रक्षिता जनाः ॥
parjanyaśca samāhūtaḥ sukhaṃ varṣati bhārata | sasyāni ca samṛddhāni phalamūlānyanekaśaḥ | saṃbhūtānyatra rājendra sarve te rakṣitā janāḥ
हे भारत, मेघों के देवता पर्जन्य का भी आवाहन हुआ और वे सुखद वर्षा करने लगे। हे राजेन्द्र, यहाँ फसलें लहलहा उठीं और अनेक प्रकार के फल-मूल उत्पन्न हुए; वे सब लोग बच गए।
श्लोक 19 (3.130.19)
मार्कण्डेयं प्रशंसन्तो जनाः सर्वे द्विजातयः । चिरं सुखमवर्तन्त तेन संरक्षिता नृप ॥
mārkaṇḍeyaṃ praśaṃsanto janāḥ sarve dvijātayaḥ | ciraṃ sukhamavartanta tena saṃrakṣitā nṛpa
हे नृप, द्विजों सहित सब लोग मार्कण्डेय की प्रशंसा करते हुए, उनके द्वारा रक्षित होकर, बहुत समय तक सुख से रहे।
श्लोक 20 (3.130.20)
एवं विधाय रक्षां स सर्वेषां पुण्यकर्मणाम् । पुनश्चचार च तपः परमेश्वरतुष्टये ॥
evaṃ vidhāya rakṣāṃ sa sarveṣāṃ puṇyakarmaṇām | punaścacāra ca tapaḥ parameśvaratuṣṭaye
इस प्रकार उन सब पुण्यकर्मा लोगों की रक्षा का प्रबन्ध करके वे परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए फिर से तप करने लगे।
श्लोक 21 (3.130.21)
एवं बहुतिथे काले प्रादुरासीन्महेश्वरः ॥
evaṃ bahutithe kāle prādurāsīnmaheśvaraḥ
इस प्रकार बहुत समय बीतने पर महेश्वर प्रकट हुए।
श्लोक 22 (3.130.22)
दृष्ट्वा च सर्वदेवेशं चन्द्रमौलिमुमापतिम् । ब्रह्मविष्ण्वादिभिर्देवैः सिद्धविद्याधरोरगैः ॥
dṛṣṭvā ca sarvadeveśaṃ candramaulimumāpatim | brahmaviṣṇvādibhirdevaiḥ siddhavidyādharoragaiḥ
मुनि ने सब देवताओं के स्वामी, चन्द्रमौलि उमापति को देखा — ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता, सिद्ध, विद्याधर और नाग,
श्लोक 23 (3.130.23)
गन्धर्वयक्षप्रवरैः सकिन्नरपतत्रिभिः । स्तूयमानं महादेवमव्ययं निष्कलं शिवम् । प्रणनाम मुनिर्भक्त्या साष्टाङ्गं च पुनः पुनः ॥
gandharvayakṣapravaraiḥ sakinnarapatatribhiḥ | stūyamānaṃ mahādevamavyayaṃ niṣkalaṃ śivam | praṇanāma munirbhaktyā sāṣṭāṅgaṃ ca punaḥ punaḥ
तथा श्रेष्ठ गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और पक्षी जिनकी स्तुति कर रहे थे — उन अविनाशी, निष्कल, कल्याणकारी महादेव शिव को मुनि ने भक्तिपूर्वक बार-बार साष्टांग प्रणाम किया।
श्लोक 24 (3.130.24)
प्रणम्योत्थाय सहसा बद्धाञ्जलिपुटो मुनिः । तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैर्महादेवं जगत्पतिम् ॥
praṇamyotthāya sahasā baddhāñjalipuṭo muniḥ | tuṣṭāva vividhaiḥ stotrairmahādevaṃ jagatpatim
प्रणाम करके मुनि तुरन्त उठे और हाथ जोड़कर अनेक प्रकार के स्तोत्रों से जगत्पति महादेव की स्तुति की।
श्लोक 25 (3.130.25)
तमुवाच महादेवो मार्कण्डेयं महामुनिम् । वरं वरय भद्रं ते वरदोस्मि मुने तव ॥
tamuvāca mahādevo mārkaṇḍeyaṃ mahāmunim | varaṃ varaya bhadraṃ te varadosmi mune tava
महादेव ने महामुनि मार्कण्डेय से कहा — "वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो। हे मुने, मैं तुम्हें वर देने आया हूँ।"
श्लोक 26 (3.130.26)
एवं संबोधितस्तेन शिवेन परमात्मना । सगद्गदमिदं वाक्यमुवाच परमेश्वरम् ॥
evaṃ saṃbodhitastena śivena paramātmanā | sagadgadamidaṃ vākyamuvāca parameśvaram
परमात्मा शिव के इस प्रकार सम्बोधित करने पर उन्होंने गद्गद वाणी में परमेश्वर से यह वचन कहा —
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 27 (3.130.27)
नान्यं वरं वृणे शंभो त्वत्पादपङ्कजे । भक्तिंह्यनन्यसुलभां स्व व्यभिचारिणीम् ॥
nānyaṃ varaṃ vṛṇe śaṃbho tvatpādapaṅkaje | bhaktiṃhyananyasulabhāṃ sva vyabhicāriṇīm
"हे शम्भो, मैं आपके चरण-कमलों में भक्ति के सिवा कोई दूसरा वर नहीं माँगता — ऐसी अनन्य भक्ति जो दूसरों को सुलभ नहीं और जो कभी डगमगाती नहीं।"
लोमश उवाच
श्लोक 28 (3.130.28)
एवमुक्तोऽथ मुनिना भरतगीश्वरेश्वरः । पुनरेवाब्रवीद्वाक्यं मार्कण्डेयं महामुनिम् ॥
evamukto'tha muninā bharatagīśvareśvaraḥ | punarevābravīdvākyaṃ mārkaṇḍeyaṃ mahāmunim
हे भारत, मुनि के ऐसा कहने पर वाणी के स्वामियों के भी स्वामी महादेव ने महामुनि मार्कण्डेय से फिर कहा —
शिव उवाच
श्लोक 29 (3.130.29)
सम्यगाराधितः पित्रा तव पुत्रार्थमादरात् ॥
samyagārādhitaḥ pitrā tava putrārthamādarāt
"पूर्वकाल में तुम्हारे पिता ने पुत्र की कामना से आदरपूर्वक मेरी विधिवत् आराधना की थी।
श्लोक 30 (3.130.30)
शतायुर्निर्गुणः पुत्रः शुभः षोडशवार्षिकः । उभयोरन्यमिच्छ त्वमित्युक्तः सोऽब्रवीच्च माम् ॥
śatāyurnirguṇaḥ putraḥ śubhaḥ ṣoḍaśavārṣikaḥ | ubhayoranyamiccha tvamityuktaḥ so'bravīcca mām
"मैंने उनसे कहा था — 'सौ वर्ष की आयु वाला गुणहीन पुत्र, या सोलह वर्ष का गुणवान पुत्र — दोनों में से एक चुन लो।' यह सुनकर उन्होंने मुझसे कहा —
श्लोक 31 (3.130.31)
निर्गुणो मास्तु देवेश शतायुः षोडशाब्दकः । सुगुणोऽस्तु सुतो मेऽद्य इति पित्रावृतः पुरा ॥
nirguṇo māstu deveśa śatāyuḥ ṣoḍaśābdakaḥ | suguṇo'stu suto me'dya iti pitrāvṛtaḥ purā
"'हे देवेश, मेरा पुत्र सौ वर्ष जीकर भी गुणहीन न हो; सोलह वर्ष का ही सही, पर वह गुणवान हो।' इस प्रकार तुम्हारे पिता ने पहले यही वर चुना था।
श्लोक 32 (3.130.32)
त्वया तप्तेन तपसा तोषितोऽहं भृशं मुने । दीर्घमायुर्मया दत्तं मृत्युश्च प्रतिषेधितः ॥
tvayā taptena tapasā toṣito'haṃ bhṛśaṃ mune | dīrghamāyurmayā dattaṃ mṛtyuśca pratiṣedhitaḥ
"परन्तु हे मुने, तुम्हारे किए हुए तप से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें दीर्घ आयु देता हूँ, और मृत्यु को तुमसे दूर कर दिया गया है।"
लोमश उवाच
श्लोक 33 (3.130.33)
इत्युक्त्वा भगवानीशस्तत्रैवान्तरधीयत । तस्यायमाश्रमः पुण्यस्तस्येमे मुनयोऽमलाः ॥
ityuktvā bhagavānīśastatraivāntaradhīyata | tasyāyamāśramaḥ puṇyastasyeme munayo'malāḥ
यह कहकर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गए। यही उनका पवित्र आश्रम है और ये निर्मल मुनि उन्हीं के हैं।
श्लोक 34 (3.130.34)
अत्रैकरात्रमुषिताः सर्वे मृत्युं तरन्ति वै । अत्रैव भरतश्रेष्ठ प्रयतो वस भूमिप ॥
atraikarātramuṣitāḥ sarve mṛtyuṃ taranti vai | atraiva bharataśreṣṭha prayato vasa bhūmipa
जो यहाँ एक रात भी रहते हैं, वे सब मृत्यु को पार कर जाते हैं। इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, हे भूपाल, संयमपूर्वक तुम भी यहीं निवास करो।