Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 131

यमुना और सरस्वती के पवित्र तीर्थ

लोमश युधिष्ठिर को यमुना के किनारे के पवित्र स्थान दिखाते हैं — जहाँ प्रजापति ने सहस्र वर्ष का सत्र किया, जहाँ अम्बरीष और ययाति ने यज्ञ किए, नारायण का आश्रम और राम के सरोवर, और वह स्थान जहाँ एक पिशाची ने अपवित्र स्थानों में रहकर आई एक स्त्री को चेताया था। वे कुरुक्षेत्र के द्वार पर रात बिताते हैं, प्लक्षावतरण तथा भरत और मरुत्त के यज्ञस्थल देखते हैं और स्नान करते हैं। स्नान करके युधिष्ठिर पाते हैं कि वे सब लोकों को, और अर्जुन को भी, देख पा रहे हैं; फिर लोमश उन्हें सरस्वती तथा कुरु के क्षेत्र, प्रजापति की वेदी, दिखाते हैं।

अध्याय 130अध्याय-सूचीअध्याय 132

लोमश उवाच

श्लोक 1 (3.131.1)

अस्मिन्किल स्वयं राजन्निष्टवान्वै प्रजापतिः । सत्रमिष्टीकृतं नाम पुरा वर्षसहस्रिकम् ॥

asminkila svayaṃ rājanniṣṭavānvai prajāpatiḥ | satramiṣṭīkṛtaṃ nāma purā varṣasahasrikam

हे राजन्, कहते हैं कि यहीं स्वयं प्रजापति ने प्राचीन काल में "इष्टीकृत" नामक सत्र किया था, जो सहस्र वर्षों तक चला।

श्लोक 2 (3.131.2)

अम्बरीषश्च नाभाग इष्टवान्यमुनामनु । यत्रेष्ट्वा दशपद्मानि सदस्येभ्योऽभिसृष्टवान् ॥

ambarīṣaśca nābhāga iṣṭavānyamunāmanu | yatreṣṭvā daśapadmāni sadasyebhyo'bhisṛṣṭavān

यहीं नाभाग के पुत्र अम्बरीष ने यमुना के किनारे यज्ञ किए थे; यहीं यज्ञ करके उन्होंने सदस्यों को दस पद्म धन दान में दिया था।

श्लोक 3 (3.131.3)

यज्ञैश्च तपसा चैव परां सिद्धिमवाप सः । देशश्च नाहुषस्यायं यज्वनः पुण्यकर्मणः ॥

yajñaiśca tapasā caiva parāṃ siddhimavāpa saḥ | deśaśca nāhuṣasyāyaṃ yajvanaḥ puṇyakarmaṇaḥ

यज्ञों और तप से उन्होंने परम सिद्धि प्राप्त की। और यह उस पुण्यकर्मा यज्ञकर्ता नहुषपुत्र का देश है —

श्लोक 4 (3.131.4)

सार्वभौमस्य कौन्तेय ययातेरमितौजसः । स्पर्धमानस्य शक्रेण तस्येदं यज्ञवास्त्विह ॥

sārvabhaumasya kaunteya yayāteramitaujasaḥ | spardhamānasya śakreṇa tasyedaṃ yajñavāstviha

हे कुन्तीनन्दन, समस्त पृथ्वी के सम्राट्, अमित तेजस्वी ययाति का, जो इन्द्र से स्पर्धा करते थे; यह उन्हीं की यज्ञभूमि है।

श्लोक 5 (3.131.5)

पश्य नानाविधाकारैरग्निभिर्निचितां महीम् । मज्जन्तीमिव चाक्रान्तां ययातेर्यज्ञकर्मभिः ॥

paśya nānāvidhākārairagnibhirnicitāṃ mahīm | majjantīmiva cākrāntāṃ yayāteryajñakarmabhiḥ

देखो, यह धरती अनेक आकारों की यज्ञवेदियों से भरी हुई है, मानो ययाति के यज्ञकर्मों के भार से दबकर धँस रही हो।

श्लोक 6 (3.131.6)

एषा शम्येकपत्रा सा शकटं चैतदुत्तमम् । पश्य रामह्रदानेतान्पश्य नारायणाश्रमम् ॥

eṣā śamyekapatrā sā śakaṭaṃ caitaduttamam | paśya rāmahradānetānpaśya nārāyaṇāśramam

यह एक पत्ते वाली वह शमी है और यह उत्तम शकट। राम के इन सरोवरों को देखो, नारायण के आश्रम को देखो।

श्लोक 7 (3.131.7)

एतदार्चीकपुत्रस्य योगैर्विचरतो महीम् । प्रसर्पणं महीपाल रौप्यायाममितौजसः ॥

etadārcīkaputrasya yogairvicarato mahīm | prasarpaṇaṃ mahīpāla raupyāyāmamitaujasaḥ

हे महीपाल, यह रौप्या के निकट की वह भूमि है जहाँ अमित तेजस्वी आर्चीकपुत्र योगबल से पृथ्वी पर विचरते हुए घूमा करते थे।

श्लोक 8 (3.131.8)

अत्रानुवंशं पठतः शृणु मे कुरुनन्दन । उलूखलैराभरणैः पिशाची यदभाषत ॥

atrānuvaṃśaṃ paṭhataḥ śṛṇu me kurunandana | ulūkhalairābharaṇaiḥ piśācī yadabhāṣata

हे कुरुनन्दन, यहाँ लोग जो परम्परागत श्लोक पढ़ते हैं, उसे मुझसे सुनो — ओखलियों को आभूषण बनाकर पहने हुए एक पिशाची ने जो कहा था।

श्लोक 9 (3.131.9)

युगन्धरे दधि प्राश्य उषित्वा चाच्युतस्थले । तद्वद्भूतलये स्नात्वा सपुत्रा वस्तुमर्हसि ॥

yugandhare dadhi prāśya uṣitvā cācyutasthale | tadvadbhūtalaye snātvā saputrā vastumarhasi

"तुमने युगन्धर में दही खाया, अच्युतस्थल में निवास किया और भूतलय में स्नान किया — और फिर भी तुम पुत्रों सहित यहाँ रहने योग्य हो?

श्लोक 10 (3.131.10)

एकरात्रमुषित्वेह द्वितीयं यदि वत्स्यसि । एतद्वै ते दिवा वृत्तं रात्रौ वृत्तमितोऽन्यथा ॥

ekarātramuṣitveha dvitīyaṃ yadi vatsyasi | etadvai te divā vṛttaṃ rātrau vṛttamito'nyathā

"यहाँ एक रात रह लो। पर यदि दूसरी रात भी रहोगी, तो — दिन में तुम्हारे साथ यह हुआ, रात में इससे कुछ और ही होगा।"

श्लोक 11 (3.131.11)

अद्य चात्र निवत्स्यामः क्षपां भरतसत्तम । द्वारमेतत्तु कौन्तेय कुरुक्षेत्रस्य भारत ॥

adya cātra nivatsyāmaḥ kṣapāṃ bharatasattama | dvārametattu kaunteya kurukṣetrasya bhārata

हे भरतश्रेष्ठ, आज रात हम यहीं रहेंगे। हे कुन्तीपुत्र, हे भारत, यह कुरुक्षेत्र का द्वार है।

श्लोक 12 (3.131.12)

अत्रैव नाहुषो राजा राजन्क्रतुभिरिष्टवान् । ययातिर्बहुरत्नौघैर्यत्रेन्द्रो मुदमभ्यगात् ॥

atraiva nāhuṣo rājā rājankratubhiriṣṭavān | yayātirbahuratnaughairyatrendro mudamabhyagāt

हे राजन्, यहीं नहुषपुत्र राजा ययाति ने रत्नों की राशियों से युक्त अनेक यज्ञ किए थे, जिनसे इन्द्र प्रसन्न हुए थे।

श्लोक 13 (3.131.13)

एतत्प्लक्षावतरणं यमुनातीर्थमुत्तमम् । एतद्वै नाकपृष्ठस्य द्वारमाहुर्मनीषिणः ॥

etatplakṣāvataraṇaṃ yamunātīrthamuttamam | etadvai nākapṛṣṭhasya dvāramāhurmanīṣiṇaḥ

यह प्लक्षावतरण है, यमुना का उत्तम तीर्थ। मनीषी इसे स्वर्ग के शिखर का द्वार कहते हैं।

श्लोक 14 (3.131.14)

अत्रसारस्वतैर्यज्ञैरीजानाः परमर्षयः । यूपोलूखलिकास्तात गच्छन्त्यवभृथप्लवम् ॥

atrasārasvatairyajñairījānāḥ paramarṣayaḥ | yūpolūkhalikāstāta gacchantyavabhṛthaplavam

हे तात, यहाँ परम ऋषि सारस्वत यज्ञों से यजन करके, यूप और ऊखल साथ लिए, अवभृथ-स्नान के लिए जाते हैं।

श्लोक 15 (3.131.15)

अत्रवै भरतो राजा राजन्क्रतुभिरिष्टवान् । हयमेधेन यज्ञेन मेध्यमश्वमवासृजत् ॥

atravai bharato rājā rājankratubhiriṣṭavān | hayamedhena yajñena medhyamaśvamavāsṛjat

हे राजन्, यहीं राजा भरत ने अनेक यज्ञ किए; अश्वमेध यज्ञ में उन्होंने यज्ञ का पवित्र अश्व छोड़ा था —

श्लोक 16 (3.131.16)

असकृत्कृष्णसारङ्गं धर्मेणाप्य च मेदिनीम् । अत्रैव पुरुषव्याघ्र मरुत्तः सत्रमुत्तमम् । प्राप चैवर्षिमुख्येन संवर्तेनाभिपालितः ॥

asakṛtkṛṣṇasāraṅgaṃ dharmeṇāpya ca medinīm | atraiva puruṣavyāghra maruttaḥ satramuttamam | prāpa caivarṣimukhyena saṃvartenābhipālitaḥ

धर्मपूर्वक पृथ्वी को जीतकर उन्होंने बार-बार श्यामकर्ण अश्व छोड़ा। और हे पुरुषसिंह, यहीं मरुत्त ने ऋषिश्रेष्ठ संवर्त के संरक्षण में उत्तम सत्र सम्पन्न किया था।

श्लोक 17 (3.131.17)

अत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र सर्वाल्लोँकान्प्रपश्यति । पूयते दुष्कृताच्चैव अत्रापि समुपस्पृश ॥

atropaspṛśya rājendra sarvāllom̐kānprapaśyati | pūyate duṣkṛtāccaiva atrāpi samupaspṛśa

हे राजेन्द्र, यहाँ जल का आचमन करने से मनुष्य सब लोकों को देखता है और पापों से शुद्ध हो जाता है। तुम भी यहाँ आचमन करो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (3.131.18)

तत्र सभ्रातृकः स्नात्वा स्तूयमानो महर्षिभिः । लोमशं पाण्डवश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ॥

tatra sabhrātṛkaḥ snātvā stūyamāno maharṣibhiḥ | lomaśaṃ pāṇḍavaśreṣṭha idaṃ vacanamabravīt

भाइयों सहित वहाँ स्नान करके, महर्षियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने लोमश से यह कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 19 (3.131.19)

सर्वाँल्लोकान्प्रपश्यामि तपसा सत्यविक्रम । इहस्थः पाण्डवश्रेष्ठं पश्यामि श्वेतवाहनम् ॥

sarvām̐llokānprapaśyāmi tapasā satyavikrama | ihasthaḥ pāṇḍavaśreṣṭhaṃ paśyāmi śvetavāhanam

"हे सत्यपराक्रमी, तप के प्रभाव से मैं सब लोकों को देख रहा हूँ। यहाँ खड़े-खड़े मैं श्वेत घोड़ों वाले पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन को देख रहा हूँ।"

लोमश उवाच

श्लोक 20 (3.131.20)

एवमेतन्महाबाहो पश्यन्ति परमर्षयः । इह स्नात्वा तपोयुक्तांस्त्रील्लोँकान्सचराचरान् ॥

evametanmahābāho paśyanti paramarṣayaḥ | iha snātvā tapoyuktāṃstrīllom̐kānsacarācarān

हे महाबाहो, ऐसा ही है। यहाँ स्नान करके तपस्वी परम ऋषि चर-अचर सहित तीनों लोकों को देखते हैं।

श्लोक 21 (3.131.21)

सरस्वतीमिमां पुण्यां पुण्यैकशरणावृताम् । यत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ धूतपाप्मा भविष्यसि ॥

sarasvatīmimāṃ puṇyāṃ puṇyaikaśaraṇāvṛtām | yatra snātvā naraśreṣṭha dhūtapāpmā bhaviṣyasi

यह पवित्र सरस्वती है, जो उसे ही एकमात्र शरण मानने वाले पुण्यात्माओं से घिरी है। हे नरश्रेष्ठ, इसमें स्नान करके तुम पापरहित हो जाओगे।

श्लोक 22 (3.131.22)

इह सारस्वतैर्यज्ञैरिष्टवन्तः सुरर्षयः । ऋषयश्चैव कौन्तेय तथा राजर्षयोपि च ॥

iha sārasvatairyajñairiṣṭavantaḥ surarṣayaḥ | ṛṣayaścaiva kaunteya tathā rājarṣayopi ca

हे कुन्तीनन्दन, यहाँ देवर्षियों ने सारस्वत यज्ञ किए थे, तथा ऋषियों और राजर्षियों ने भी।

श्लोक 23 (3.131.23)

वेदी प्रजापतेरेषा समन्तात्पञ्चयोजना । कुरोर्वै यज्ञशीलस्य क्षेत्रमेतन्महात्मनः ॥

vedī prajāpatereṣā samantātpañcayojanā | kurorvai yajñaśīlasya kṣetrametanmahātmanaḥ

यह प्रजापति की वेदी है, जो चारों ओर पाँच योजन तक फैली है; और यह यज्ञप्रेमी महात्मा कुरु का क्षेत्र है।

अध्याय 130अध्याय-सूचीअध्याय 132