आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 132
विनशन से कश्मीर तक; उशीनर की परीक्षा का आरम्भ
लोमश तीर्थदर्शन आगे बढ़ाते हैं: वह स्थान जहाँ दक्ष के आशीर्वाद से मरने वाले स्वर्ग जाते हैं; विनशन, जहाँ सरस्वती निषादों से छिपने के लिए पृथ्वी में समा जाती है; चमसोद्भेद, जहाँ वह फिर प्रकट होती है; सिन्धु का तीर्थ, प्रभास, विष्णुपद और विपाशा, जहाँ वसिष्ठ के बन्धन खुल गए थे। वे कश्मीर मण्डल, मानसरोवर का द्वार, युगान्त में शिव के दर्शन वाला सरोवर, उज्जानक, कुशवान्, रुक्मिणी का आश्रम, भृगुतुंग पर्वत और वितस्ता दिखाते हैं। जला और उपजला नदियों के पास वे राजा उशीनर की कथा आरम्भ करते हैं, जिनकी परीक्षा लेने इन्द्र बाज़ और अग्नि कबूतर बनकर आए; कबूतर राजा की जाँघ पर शरण लेता है।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.132.1)
इह मर्त्यास्तनूस्त्यक्त्वा स्वर्गं गच्छन्ति भारत । मर्तुकामा नरा राजन्निहायान्ति सहस्रशः ॥
iha martyāstanūstyaktvā svargaṃ gacchanti bhārata | martukāmā narā rājannihāyānti sahasraśaḥ
हे भारत, यहाँ शरीर त्यागने वाले मनुष्य स्वर्ग जाते हैं, और हे राजन्, मरने की इच्छा रखने वाले हज़ारों लोग यहाँ आते हैं।
श्लोक 2 (3.132.2)
एवमाशीः प्रयुक्ता हि दक्षेण यजता पुरा । इह ये वै मरिष्यन्ति ते वै स्वर्गजितो नराः ॥
evamāśīḥ prayuktā hi dakṣeṇa yajatā purā | iha ye vai mariṣyanti te vai svargajito narāḥ
क्योंकि प्राचीन काल में यहाँ यज्ञ करते हुए दक्ष ने यह आशीर्वाद दिया था — "जो यहाँ मरेंगे, वे स्वर्ग को जीत लेंगे।"
श्लोक 3 (3.132.3)
एषा सरस्वती रम्या दिव्या चौघवती नदी । एतद्विनशनं नाम सरस्वत्या विशांपते ॥
eṣā sarasvatī ramyā divyā caughavatī nadī | etadvinaśanaṃ nāma sarasvatyā viśāṃpate
यह रमणीय, दिव्य और प्रवाहपूर्ण नदी सरस्वती है; और हे प्रजानाथ, यह सरस्वती का "विनशन" नामक स्थान है।
श्लोक 4 (3.132.4)
द्वारं निषादराष्ट्रस्य येषां दोषात्सरस्वती । प्रविष्टा पृथिवीं वीर मा निषादा हि मां विदुः ॥
dvāraṃ niṣādarāṣṭrasya yeṣāṃ doṣātsarasvatī | praviṣṭā pṛthivīṃ vīra mā niṣādā hi māṃ viduḥ
यह निषादों के राष्ट्र का द्वार है। हे वीर, उन्हीं के दोषों के कारण सरस्वती यह सोचकर पृथ्वी में समा गई कि "निषाद मुझे न जानें।"
श्लोक 5 (3.132.5)
एष वै चमसोद्भेदो यत्र दृश्या सरस्वती । यत्रैनामभ्यवर्तन्त दिव्याः पुण्याः समुद्रगाः ॥
eṣa vai camasodbhedo yatra dṛśyā sarasvatī | yatraināmabhyavartanta divyāḥ puṇyāḥ samudragāḥ
यह चमसोद्भेद है, जहाँ सरस्वती फिर दिखाई देती है, और जहाँ समुद्र में जाने वाली दिव्य, पवित्र नदियाँ उससे आ मिलीं।
श्लोक 6 (3.132.6)
एतत्सिन्धोर्महत्तीर्थं यत्रागस्त्यमरिंदम । लोपामुद्रा समागम्य भर्तारमवृणीत वै ॥
etatsindhormahattīrthaṃ yatrāgastyamariṃdama | lopāmudrā samāgamya bhartāramavṛṇīta vai
हे शत्रुदमन, यह सिन्धु का महान् तीर्थ है, जहाँ लोपामुद्रा ने अगस्त्य से मिलकर उन्हें पति रूप में वरण किया था।
श्लोक 7 (3.132.7)
एतत्प्रकाशते तीर्थं प्रभासं भास्करद्युते । इन्द्रस्य दयितं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् ॥
etatprakāśate tīrthaṃ prabhāsaṃ bhāskaradyute | indrasya dayitaṃ puṇyaṃ pavitraṃ pāpanāśanam
हे सूर्य के समान तेजस्वी, वह प्रभास तीर्थ प्रकाशित हो रहा है — इन्द्र का प्रिय, पुण्यमय, पवित्र और पापनाशक।
श्लोक 8 (3.132.8)
एतद्विष्णुपदं नाम दृश्यते तीर्थमुत्तमम् । एषा रम्या विपाशा च नदी परमपावनी ॥
etadviṣṇupadaṃ nāma dṛśyate tīrthamuttamam | eṣā ramyā vipāśā ca nadī paramapāvanī
यहाँ विष्णुपद नामक उत्तम तीर्थ दिखाई देता है, और यह रमणीय, परम पावनी विपाशा नदी है।
श्लोक 9 (3.132.9)
अत्र वै पुत्रशोकेन वसिष्ठो भगवानृषिः । बद्ध्वाऽत्मानं निपतितो विपाशः पुनरुत्थितः ॥
atra vai putraśokena vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ | baddhvā'tmānaṃ nipatito vipāśaḥ punarutthitaḥ
यहीं पुत्रशोक से व्याकुल भगवान् वसिष्ठ ऋषि अपने को बाँधकर इसमें कूद पड़े थे और बन्धनमुक्त होकर फिर निकल आए थे।
श्लोक 10 (3.132.10)
काश्मीरमण्डलं चैतत्सर्वपुण्यमरिंदम । महर्षिभिश्चाध्युषितं पश्येदं भ्रातृभिः सह ॥
kāśmīramaṇḍalaṃ caitatsarvapuṇyamariṃdama | maharṣibhiścādhyuṣitaṃ paśyedaṃ bhrātṛbhiḥ saha
हे शत्रुदमन, और यह कश्मीर मण्डल है, जो सब प्रकार से पुण्यमय है और जहाँ महर्षि निवास करते हैं। अपने भाइयों के साथ इसे देखो।
श्लोक 11 (3.132.11)
यत्रौत्तराणां सर्वेषामृषीणां नाहुषस्य च । अग्नेश्चैवात्र संवादः काश्यपस्य च भारत ॥
yatrauttarāṇāṃ sarveṣāmṛṣīṇāṃ nāhuṣasya ca | agneścaivātra saṃvādaḥ kāśyapasya ca bhārata
हे भारत, यहीं उत्तर के सब ऋषियों का नहुषपुत्र के साथ, और अग्नि का कश्यप के साथ संवाद हुआ था।
श्लोक 12 (3.132.12)
एतद्द्वारं महाराज मानसस्य प्रकाशते । वर्षमस्य गिरेर्मध्ये रामेण श्रीमता कृतम् ॥
etaddvāraṃ mahārāja mānasasya prakāśate | varṣamasya girermadhye rāmeṇa śrīmatā kṛtam
हे महाराज, यह मानसरोवर का द्वार प्रकाशित हो रहा है। इस पर्वत के बीच श्रीमान् राम ने एक निवास-स्थान बनाया था।
श्लोक 13 (3.132.13)
एष वातिकषण्डो वै प्रख्यातः सत्यविक्रमः । नात्यवर्तत यद्द्वारं विदेहादुत्तरं च यः ॥
eṣa vātikaṣaṇḍo vai prakhyātaḥ satyavikramaḥ | nātyavartata yaddvāraṃ videhāduttaraṃ ca yaḥ
यह प्रसिद्ध और सत्यपराक्रमी वातिकषण्ड है, जिसने विदेह के उत्तर में स्थित द्वार का कभी अतिक्रमण नहीं किया।
श्लोक 14 (3.132.14)
इदमाश्चर्यमपरं देशेऽस्मिन्पुरुषर्षभ । क्षीणे युगे तु कौन्तेय शर्वस्य सह पार्षदैः । सहोमया च भवति दर्शनं कामरूपिणः ॥
idamāścaryamaparaṃ deśe'sminpuruṣarṣabha | kṣīṇe yuge tu kaunteya śarvasya saha pārṣadaiḥ | sahomayā ca bhavati darśanaṃ kāmarūpiṇaḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ, इस देश में एक और आश्चर्य है — हे कुन्तीनन्दन, युग के क्षीण होने पर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले शर्व यहाँ अपने पार्षदों और उमा के साथ दर्शन देते हैं।
श्लोक 15 (3.132.15)
अस्मिन्सरसि सत्रैर्वै चैत्रे मासि पिनाकिनम् । यजन्ते याजकाः सम्यक् परिवारं शुभार्थिनः ॥
asminsarasi satrairvai caitre māsi pinākinam | yajante yājakāḥ samyak parivāraṃ śubhārthinaḥ
इस सरोवर पर चैत्र मास में कल्याण चाहने वाले याजक सत्रों द्वारा पिनाकधारी शिव और उनके परिवार का विधिपूर्वक यजन करते हैं।
श्लोक 16 (3.132.16)
अत्रोपस्पृश्य सरसि श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । क्षीणपापः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुते नात्र संशयः ॥
atropaspṛśya sarasi śraddadhāno jitendriyaḥ | kṣīṇapāpaḥ śubhām̐llokānprāpnute nātra saṃśayaḥ
जो श्रद्धालु और जितेन्द्रिय होकर इस सरोवर में आचमन करता है, वह पापरहित होकर शुभ लोकों को प्राप्त करता है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 17 (3.132.17)
एष उज्जानको नाम पावकिर्यत्र शान्तवान् । अरुन्धतीसहायश्च वसिष्ठो भगवानृषिः ॥
eṣa ujjānako nāma pāvakiryatra śāntavān | arundhatīsahāyaśca vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ
यह उज्जानक नामक स्थान है, जहाँ अग्निपुत्र ने शान्ति पाई थी, और अरुन्धती के साथ भगवान् वसिष्ठ ऋषि ने भी।
श्लोक 18 (3.132.18)
ह्रदश्च कुशवानेष यत्र पद्मं कुशेशयम् । आश्रमश्चैव रुक्मिण्या यत्राशाम्यदकोपना ॥
hradaśca kuśavāneṣa yatra padmaṃ kuśeśayam | āśramaścaiva rukmiṇyā yatrāśāmyadakopanā
और यह कुशवान् सरोवर है, जहाँ कुशेशय कमल खिलता है; तथा यह रुक्मिणी का आश्रम है, जहाँ वह क्रोध छोड़कर शान्त हुई थी।
श्लोक 19 (3.132.19)
समाधीनां समासस्तु पाण्डवेय श्रुतस्त्वया । तं द्रक्ष्यसि महाराज भृगुतुङ्गं महागिरिम् ॥
samādhīnāṃ samāsastu pāṇḍaveya śrutastvayā | taṃ drakṣyasi mahārāja bhṛgutuṅgaṃ mahāgirim
हे पाण्डुपुत्र, तुमने उस स्थान के बारे में सुना है जिसमें सब समाधियों का सार है; हे महाराज, उसे — महान् पर्वत भृगुतुंग को — तुम अब देखोगे।
श्लोक 20 (3.132.20)
वितस्तां पश्य राजेन्द्र सर्वपापप्रमोचनीम् । महर्षिभिश्चाध्युषितां शीततोयां सुनिर्मलाम् ॥
vitastāṃ paśya rājendra sarvapāpapramocanīm | maharṣibhiścādhyuṣitāṃ śītatoyāṃ sunirmalām
हे राजेन्द्र, सब पापों से छुड़ाने वाली वितस्ता को देखो, जिसका जल शीतल और अत्यन्त निर्मल है और जिसके तट पर महर्षि रहते हैं।
श्लोक 21 (3.132.21)
जलां चोपजलां चैव यमुनामभितो नदीम् । उशीनरो वै यत्रेष्ट्वा वासवादत्यरिच्यत ॥
jalāṃ copajalāṃ caiva yamunāmabhito nadīm | uśīnaro vai yatreṣṭvā vāsavādatyaricyata
यमुना के दोनों ओर बहने वाली जला और उपजला नदियों को देखो, जहाँ यज्ञ करके उशीनर इन्द्र से भी बढ़ गए थे।
श्लोक 22 (3.132.22)
तां देवसमितिं तस्य वासवश्च विशांपते । अभ्यागच्छन्नृपवरं ज्ञातुमग्निश्च भारत ॥
tāṃ devasamitiṃ tasya vāsavaśca viśāṃpate | abhyāgacchannṛpavaraṃ jñātumagniśca bhārata
हे प्रजानाथ, हे भारत, उनकी उस राजसभा में इन्द्र और अग्नि उस श्रेष्ठ राजा को परखने आए।
श्लोक 23 (3.132.23)
जिज्ञासमानौ वरदौ महात्मानमुशीनरम् । इन्द्रः श्येनः कपोतोऽग्निर्भूत्वा यज्ञेऽभिजग्मतुः ॥
jijñāsamānau varadau mahātmānamuśīnaram | indraḥ śyenaḥ kapoto'gnirbhūtvā yajñe'bhijagmatuḥ
महात्मा उशीनर को परखने की इच्छा से वे दोनों वरदायक देवता उनके यज्ञ में आए — इन्द्र बाज़ बनकर और अग्नि कबूतर बनकर।
श्लोक 24 (3.132.24)
ऊरुं राज्ञः समासाद्य कपोतः श्येनजाद्भयात् । शरणार्थी तदा राजन्निलिल्ये भयपीडितः ॥
ūruṃ rājñaḥ samāsādya kapotaḥ śyenajādbhayāt | śaraṇārthī tadā rājannililye bhayapīḍitaḥ
हे राजन्, बाज़ के भय से भागता हुआ कबूतर शरण की इच्छा से राजा की जाँघ पर आकर भय से काँपता हुआ छिप गया।