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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 133

उशीनर, बाज़ और कबूतर

बाज़ राजा उशीनर से कबूतर माँगता है और तर्क देता है कि यह उसका विहित भोजन है, कि जो धर्म बहुतों को हानि पहुँचाए वह धर्म नहीं, और कि भोजन न मिलने से वह और उसका परिवार मर जाएगा। राजा शरणागत को त्यागने से इनकार करते हैं और बदले में कोई भी दूसरा भोजन, यहाँ तक कि अपना पूरा राज्य, देने को कहते हैं। बाज़ कबूतर के बराबर तौल में राजा का अपना मांस माँगता है; राजा अपने शरीर से मांस काटते हैं, और जब कबूतर फिर भी भारी रहता है तो स्वयं तराज़ू पर चढ़ जाते हैं। बाज़ प्रकट करता है कि वह इन्द्र है और कबूतर अग्नि, उशीनर को अमर कीर्ति का वचन देता है, और राजा स्वर्ग चले जाते हैं; लोमश युधिष्ठिर को उन राजा का निवास दिखाते हैं।

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134

श्येन उवाच

श्लोक 1 (3.133.1)

धर्मात्मानं त्वाहुरेकं सर्वे राजन्महीक्षितः । स वै धर्मविरुद्धं त्वं कस्मात्कर्म चिकीर्षसि ॥

dharmātmānaṃ tvāhurekaṃ sarve rājanmahīkṣitaḥ | sa vai dharmaviruddhaṃ tvaṃ kasmātkarma cikīrṣasi

"हे राजन्, पृथ्वी के सब राजा तुम्हें ही एकमात्र धर्मात्मा कहते हैं। तब तुम धर्म के विरुद्ध कर्म क्यों करना चाहते हो?

श्लोक 2 (3.133.2)

विहितं भक्षणं राजन्पीड्यमानस्य मे क्षुधा । माहिंसीर्धर्मलोभेन धर्ममुत्सृज्य मा नशः ॥

vihitaṃ bhakṣaṇaṃ rājanpīḍyamānasya me kṣudhā | māhiṃsīrdharmalobhena dharmamutsṛjya mā naśaḥ

"हे राजन्, यह मेरा विहित भोजन है और मैं भूख से पीड़ित हूँ। धर्म के लोभ में हिंसा मत करो; धर्म को छोड़कर नष्ट मत हो।"

राजोवाच

श्लोक 3 (3.133.3)

संत्रस्तरूपस्त्राणार्थी त्वत्तो भीतो महाद्विज । मत्सकाशमनुप्राप्तः प्राणगृध्नुरयं द्विजः ॥

saṃtrastarūpastrāṇārthī tvatto bhīto mahādvija | matsakāśamanuprāptaḥ prāṇagṛdhnurayaṃ dvijaḥ

"हे महापक्षी, यह पक्षी तुमसे डरकर, भय से काँपता हुआ, रक्षा चाहता हुआ और प्राणों की आस लिए मेरे पास आया है।

श्लोक 4 (3.133.4)

एवमभ्यागतस्येह कपोतस्याभयार्थिनः । अप्रदाने परो धर्मः किं त्वं श्येनेह पश्यसि ॥

evamabhyāgatasyeha kapotasyābhayārthinaḥ | apradāne paro dharmaḥ kiṃ tvaṃ śyeneha paśyasi

"जब कबूतर इस प्रकार अभय माँगता हुआ यहाँ आया है, तो उसे न सौंपने में ही परम धर्म है। हे बाज़, तुम इसमें और क्या देखते हो?

श्लोक 5 (3.133.5)

प्रस्पन्दमानः संभ्रान्तः कपोतः श्येन लक्ष्यते । मत्सकाशं जीवितार्थी तस्य त्यागो विगर्हितः ॥

praspandamānaḥ saṃbhrāntaḥ kapotaḥ śyena lakṣyate | matsakāśaṃ jīvitārthī tasya tyāgo vigarhitaḥ

"हे बाज़, यह कबूतर काँपता हुआ और घबराया हुआ दिख रहा है; यह जीवन की आशा में मेरे पास आया है। इसे त्यागना निन्दनीय है।

श्लोक 6 (3.133.6)

यो हि कश्चिद्द्विजान्हन्याद्गां वा लोकस्य मातरम् । शरणागतं च त्यजते तुल्यं तेषां हि पातकम् ॥

yo hi kaściddvijānhanyādgāṃ vā lokasya mātaram | śaraṇāgataṃ ca tyajate tulyaṃ teṣāṃ hi pātakam

"जो ब्राह्मणों की हत्या करता है, या लोकमाता गौ को मारता है, या शरणागत को त्याग देता है — उन सबका पाप समान है।"

श्येन उवाच

श्लोक 7 (3.133.7)

आहारात्सर्वभूतानि संभवन्ति महीपते । आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः ॥

āhārātsarvabhūtāni saṃbhavanti mahīpate | āhāreṇa vivardhante tena jīvanti jantavaḥ

"हे पृथ्वीपति, आहार से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, आहार से ही बढ़ते हैं और आहार से ही जीवित रहते हैं।

श्लोक 8 (3.133.8)

शक्यते दुस्त्यजेऽप्यर्थे चिररात्राय जीवितुम् । न तु भोजनमुत्सृज्य शक्यं वर्तयितुं चिरम् ॥

śakyate dustyaje'pyarthe cirarātrāya jīvitum | na tu bhojanamutsṛjya śakyaṃ vartayituṃ ciram

"कठिनाई से छूटने वाली वस्तु को छोड़कर भी मनुष्य लम्बे समय तक जी सकता है, पर भोजन छोड़कर कोई लम्बे समय तक नहीं जी सकता।

श्लोक 9 (3.133.9)

भक्ष्याद्विलोपितस्याद्य मम प्राणा विशांपते । विसृज्यकायमेष्यन्ति पन्थानमपुनर्भवम् ॥

bhakṣyādvilopitasyādya mama prāṇā viśāṃpate | visṛjyakāyameṣyanti panthānamapunarbhavam

"हे प्रजानाथ, आज भोजन से वंचित होकर मेरे प्राण शरीर छोड़कर उस मार्ग पर चले जाएँगे जहाँ से लौटना नहीं होता।

श्लोक 10 (3.133.10)

प्रमृते मयि धर्मात्मन्पुत्रदारादि नङ्क्ष्यति । रक्षमाणः कपोतं त्वं बहून्प्राणान्न रक्षसि ॥

pramṛte mayi dharmātmanputradārādi naṅkṣyati | rakṣamāṇaḥ kapotaṃ tvaṃ bahūnprāṇānna rakṣasi

"हे धर्मात्मन्, मेरे मरने पर मेरी पत्नी, बच्चे आदि भी नष्ट हो जाएँगे। कबूतर की रक्षा करते हुए तुम बहुत-से प्राणों की रक्षा नहीं कर रहे।

श्लोक 11 (3.133.11)

बहून्यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुवर्त्म तत् । अविरोधी तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम ॥

bahūnyo bādhate dharmo na sa dharmaḥ kuvartma tat | avirodhī tu yo dharmaḥ sa dharmaḥ satyavikrama

"जो धर्म बहुतों को हानि पहुँचाता है, वह धर्म नहीं, कुमार्ग है। हे सत्यपराक्रमी, जो धर्म किसी का विरोधी नहीं, वही सच्चा धर्म है।

श्लोक 12 (3.133.12)

विरोधिषु महीपाल निश्चित्य गुरुलाघवम् । न बाधा विद्यते यत्र तं धर्मं समुपाचरेत् ॥

virodhiṣu mahīpāla niścitya gurulāghavam | na bādhā vidyate yatra taṃ dharmaṃ samupācaret

"हे पृथ्वीपाल, जब धर्म परस्पर टकराएँ, तो उनके गौरव-लाघव का निश्चय करके उस धर्म का आचरण करना चाहिए जिसमें किसी की हानि न हो।

श्लोक 13 (3.133.13)

गुरुलाघवमाज्ञाय धर्माधर्मविनिश्चये । यतो भूयांस्ततो राजन्कुरु धर्मविनिश्चयम् ॥

gurulāghavamājñāya dharmādharmaviniścaye | yato bhūyāṃstato rājankuru dharmaviniścayam

"हे राजन्, धर्म और अधर्म का निर्णय करते समय छोटे-बड़े का विचार करो, और जिधर अधिक हित हो, उधर ही धर्म का निश्चय करो।"

राजोवाच

श्लोक 14 (3.133.14)

बहुकल्याणसंयुक्तं भाषसे विहगोत्तम । सुपर्णः पक्षिराट् किं त्वं धर्मं ज्ञात्वाऽभिभाषसे ॥

bahukalyāṇasaṃyuktaṃ bhāṣase vihagottama | suparṇaḥ pakṣirāṭ kiṃ tvaṃ dharmaṃ jñātvā'bhibhāṣase

"हे पक्षिश्रेष्ठ, तुम बहुत कल्याणकारी बातें कहते हो। क्या तुम पक्षिराज सुपर्ण हो, जो धर्म को जानकर ऐसा बोल रहे हो?

श्लोक 15 (3.133.15)

तथाहि धर्मसंयुक्तं बहुचित्रं च भाषसे । न तेऽस्त्यविदितं किंचिदिति त्वां लक्षयाम्यहम् । शरणैषिपरित्यागं कथं साध्विति मन्यसे ॥

tathāhi dharmasaṃyuktaṃ bahucitraṃ ca bhāṣase | na te'styaviditaṃ kiṃciditi tvāṃ lakṣayāmyaham | śaraṇaiṣiparityāgaṃ kathaṃ sādhviti manyase

"तुम धर्म से युक्त अनेक अद्भुत बातें कहते हो, और मुझे लगता है कि तुमसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। फिर तुम शरणागत के त्याग को उचित कैसे मानते हो?

श्लोक 16 (3.133.16)

आहारार्थं समारम्भस्तव चायं विहंगम । शक्यश्चाप्यन्यथा कर्तुमाहारोऽप्यधिकस्त्वया ॥

āhārārthaṃ samārambhastava cāyaṃ vihaṃgama | śakyaścāpyanyathā kartumāhāro'pyadhikastvayā

"हे विहंगम, तुम्हारा यह सारा प्रयत्न भोजन के लिए है; पर भोजन तो दूसरे उपाय से भी मिल सकता है, और इससे अधिक भी।

श्लोक 17 (3.133.17)

गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषोपि वा । त्वदर्थमद्य क्रियतां यच्चान्यदिह काङ्क्षसि ॥

govṛṣo vā varāho vā mṛgo vā mahiṣopi vā | tvadarthamadya kriyatāṃ yaccānyadiha kāṅkṣasi

"आज तुम्हारे लिए बैल, सूअर, हिरन या भैंसा — या जो कुछ और तुम चाहो — तैयार कराया जाए।"

श्येन उवाच

श्लोक 18 (3.133.18)

न वराहं न चोक्षाणं न मृगान्विविधांस्तथा । भक्षयामि महाराज किं ममान्येन केनचित् ॥

na varāhaṃ na cokṣāṇaṃ na mṛgānvividhāṃstathā | bhakṣayāmi mahārāja kiṃ mamānyena kenacit

"हे महाराज, मैं न सूअर खाता हूँ, न बैल, न तरह-तरह के हिरन। मुझे किसी दूसरे भोजन से क्या?

श्लोक 19 (3.133.19)

यस्तु मे दैवविहितो भक्षः क्षत्रियपुङ्गव । तमुत्सृज महीपाल कपोतमिममेव मे ॥

yastu me daivavihito bhakṣaḥ kṣatriyapuṅgava | tamutsṛja mahīpāla kapotamimameva me

"हे क्षत्रियश्रेष्ठ, हे पृथ्वीपाल, जो भोजन दैव ने मेरे लिए नियत किया है — यही कबूतर — उसे मुझे सौंप दो।

श्लोक 20 (3.133.20)

श्येनाः कपोतान्स्वादन्ति श्रुतिरेषा सनातनी । मा राजन्सारमज्ञात्वा कदलीस्कन्धमासज ॥

śyenāḥ kapotānsvādanti śrutireṣā sanātanī | mā rājansāramajñātvā kadalīskandhamāsaja

"बाज़ कबूतरों को खाते हैं — यह सनातन श्रुति है। हे राजन्, सार को जाने बिना केले के खोखले तने से मत चिपको।"

राजोवाच

श्लोक 21 (3.133.21)

राष्ट्रं शिवीनामृद्धं वै शाधि पक्षिभिरर्चितः । कृत्स्नमेतन्मया दत्तं राजवद्विहगोत्तम ॥

rāṣṭraṃ śivīnāmṛddhaṃ vai śādhi pakṣibhirarcitaḥ | kṛtsnametanmayā dattaṃ rājavadvihagottama

"पक्षियों द्वारा पूजित होकर तुम शिबियों के समृद्ध राष्ट्र पर शासन करो। हे पक्षिश्रेष्ठ, यह सारा राज्य मैंने तुम्हें राजा की भाँति दे दिया।

श्लोक 22 (3.133.22)

यं वा कामयसे कामं श्येन सर्वं ददानि ते । विनेमं पक्षिणं श्येन शरणार्थिनमागतम् ॥

yaṃ vā kāmayase kāmaṃ śyena sarvaṃ dadāni te | vinemaṃ pakṣiṇaṃ śyena śaraṇārthinamāgatam

"हे बाज़, या जो कुछ भी तुम चाहो, वह सब मैं तुम्हें दूँगा — केवल इस शरणागत पक्षी को छोड़कर।

श्लोक 23 (3.133.23)

येनेमं स्थापयेथास्त्वं कर्मणा पक्षिसत्तम । तदाचक्ष्व करिष्यामि न हि दास्ये कपोतकम् ॥

yenemaṃ sthāpayethāstvaṃ karmaṇā pakṣisattama | tadācakṣva kariṣyāmi na hi dāsye kapotakam

"हे पक्षिश्रेष्ठ, बताओ कि मैं ऐसा कौन-सा कर्म करूँ जिससे तुम इसे छोड़ दो; मैं वही करूँगा, पर इस नन्हे कबूतर को नहीं दूँगा।"

श्येन उवाच

श्लोक 24 (3.133.24)

उशीनर कपोते ते यदि स्नेहो नराधिप । आत्मनो मांसमुत्कृत्य कपोततुलया धृतम् ॥

uśīnara kapote te yadi sneho narādhipa | ātmano māṃsamutkṛtya kapotatulayā dhṛtam

"हे नराधिप उशीनर, यदि तुम्हें कबूतर से इतना स्नेह है, तो अपने शरीर का मांस काटकर उसे कबूतर के साथ तराज़ू पर तौलो।

श्लोक 25 (3.133.25)

यदा समं कपोतेन तव मांसं नृपोत्तम । त्वया प्रदेयं तन्मह्यं सा मे तुष्टिर्भविष्यति ॥

yadā samaṃ kapotena tava māṃsaṃ nṛpottama | tvayā pradeyaṃ tanmahyaṃ sā me tuṣṭirbhaviṣyati

"हे नृपश्रेष्ठ, जब तुम्हारा मांस कबूतर के बराबर हो जाए, तब वह तुम मुझे दे देना; उसी से मुझे संतोष होगा।"

राजोवाच

श्लोक 26 (3.133.26)

अनुग्रहमिमं मन्ये श्येन यन्माभियाचसे । तस्मात्तेऽद्य प्रदास्यामि स्वमांसं तुलया धृतम् ॥

anugrahamimaṃ manye śyena yanmābhiyācase | tasmātte'dya pradāsyāmi svamāṃsaṃ tulayā dhṛtam

"हे बाज़, तुम जो मुझसे यह माँग रहे हो, उसे मैं अपने ऊपर अनुग्रह मानता हूँ। इसलिए आज मैं तुम्हें तराज़ू पर तौलकर अपना मांस दूँगा।"

लोमश उवाच

श्लोक 27 (3.133.27)

अथोत्कृत्य स्वमांसं तु राजा परमधर्मवित् । तुलयामास कौन्तेय कपोतेन समं विभो ॥

athotkṛtya svamāṃsaṃ tu rājā paramadharmavit | tulayāmāsa kaunteya kapotena samaṃ vibho

हे कुन्तीनन्दन, हे प्रभो, तब परम धर्मज्ञ राजा ने अपना मांस काटकर उसे कबूतर के साथ तौला।

श्लोक 28 (3.133.28)

ध्रियमाणः कपोतस्तु मांसेनात्यतिरिच्यते । पुनश्चोत्कृत्यमांसानि राजा प्रादादुशीनरः ॥

dhriyamāṇaḥ kapotastu māṃsenātyatiricyate | punaścotkṛtyamāṃsāni rājā prādāduśīnaraḥ

पर तराज़ू पर कबूतर मांस से भारी निकला। राजा उशीनर ने फिर से मांस काटकर दिया।

श्लोक 29 (3.133.29)

न विद्यते यदा मांसं कपोतेन समं धृतम् । तत उत्कृत्तमांसोऽसावारुरोह स्वयं तुलाम् ॥

na vidyate yadā māṃsaṃ kapotena samaṃ dhṛtam | tata utkṛttamāṃso'sāvāruroha svayaṃ tulām

जब कबूतर के बराबर तौलने को मांस न बचा, तब मांस कटे हुए राजा स्वयं ही तराज़ू पर चढ़ गए।

श्येन उवाच

श्लोक 30 (3.133.30)

इन्द्रोऽहमस्मि धर्मज्ञ कपोतो हव्यवाडयम् । जिज्ञासमानौ धर्मे त्वां यज्ञवाटमुपागतौ ॥

indro'hamasmi dharmajña kapoto havyavāḍayam | jijñāsamānau dharme tvāṃ yajñavāṭamupāgatau

"हे धर्मज्ञ, मैं इन्द्र हूँ और यह कबूतर हव्यवाहन अग्नि है। तुम्हारे धर्म की परीक्षा लेने के लिए हम दोनों तुम्हारी यज्ञशाला में आए थे।

श्लोक 31 (3.133.31)

यत्ते मांसानि गात्रेभ्य उत्कृत्तानि विशांपते । एषा ते शाश्वती कीर्तिर्लोकानभिभविष्यति ॥

yatte māṃsāni gātrebhya utkṛttāni viśāṃpate | eṣā te śāśvatī kīrtirlokānabhibhaviṣyati

"हे प्रजानाथ, तुमने अपने अंगों से जो मांस काटा है, उससे तुम्हारी कीर्ति शाश्वत होगी और सब लोकों पर छा जाएगी।

श्लोक 32 (3.133.32)

यावल्लोके मनुष्यास्त्वां कथयिष्यन्ति पार्थिव । तावत्कीर्तिश्च लोकाश्च स्थास्यन्ति तव शाश्वताः ॥

yāvalloke manuṣyāstvāṃ kathayiṣyanti pārthiva | tāvatkīrtiśca lokāśca sthāsyanti tava śāśvatāḥ

"हे पार्थिव, जब तक संसार में लोग तुम्हारी कथा कहते रहेंगे, तब तक तुम्हारी कीर्ति और तुम्हारे लोक शाश्वत बने रहेंगे।"

लोमश उवाच

श्लोक 33 (3.133.33)

इत्युक्त्वा भूमिपतये तस्मै दत्त्वा यथेप्सितम् । प्रशस्य जग्मतू राजन्निन्द्राग्नी तुष्टमानसौ ॥

ityuktvā bhūmipataye tasmai dattvā yathepsitam | praśasya jagmatū rājannindrāgnī tuṣṭamānasau

हे राजन्, उस भूपति से यह कहकर और उसे मनचाहा वर देकर, उसकी प्रशंसा करते हुए इन्द्र और अग्नि प्रसन्न मन से चले गए।

श्लोक 34 (3.133.34)

उशीनरोऽपिधर्मात्मा धर्मेणावृत्यरोदसी । विभ्राजमानो वपुषाऽप्यारुरोह त्रिविष्टपम् ॥

uśīnaro'pidharmātmā dharmeṇāvṛtyarodasī | vibhrājamāno vapuṣā'pyāruroha triviṣṭapam

धर्मात्मा उशीनर भी अपने धर्म से पृथ्वी और आकाश को व्याप्त करके देदीप्यमान शरीर के साथ स्वर्ग को चले गए।

श्लोक 35 (3.133.35)

तदेतत्सदनं राजन्राज्ञस्तस्य महात्मनः । पश्यस्वैतन्मया सार्धं पुण्यं पापप्रमोचनम् ॥

tadetatsadanaṃ rājanrājñastasya mahātmanaḥ | paśyasvaitanmayā sārdhaṃ puṇyaṃ pāpapramocanam

हे राजन्, यह उसी महात्मा राजा का निवास है। मेरे साथ इस पवित्र और पापों से छुड़ाने वाले स्थान को देखो।

श्लोक 36 (3.133.36)

तत्र वै सततं देवा मुनयश्च सनातनाः । दृश्यन्ते ब्राह्मणै राजन्पुण्यवद्भिर्महात्मभिः ॥

tatra vai satataṃ devā munayaśca sanātanāḥ | dṛśyante brāhmaṇai rājanpuṇyavadbhirmahātmabhiḥ

हे राजन्, यहाँ पुण्यवान् महात्मा ब्राह्मणों को देवता और सनातन मुनि सदा दिखाई देते हैं।

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