आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 134
अष्टावक्र का जन्म
लोमश पाण्डवों को उद्दालकपुत्र श्वेतकेतु का आश्रम दिखाते हैं, जिन्होंने कभी देवी सरस्वती को मानव रूप में देखा था, और बताते हैं कि श्वेतकेतु और उनके भानजे अष्टावक्र ने राजा जनक के यज्ञ में वादी बन्दी को परास्त किया था। युधिष्ठिर के पूछने पर वे कथा आरम्भ से सुनाते हैं: उद्दालक ने अपने शिष्य कहोल को अपनी विद्या और अपनी पुत्री सुजाता दी; सुजाता के गर्भ में स्थित शिशु ने पिता के पाठ में दोष बताया और आठ स्थानों से टेढ़ा जन्म लेने का शाप पाया। प्रसव के लिए धन माँगने गए कहोल को बन्दी ने शास्त्रार्थ में हराकर जल में डुबो दिया; यह बात बालक से छिपाई गई, जब तक बारह वर्ष की आयु में श्वेतकेतु ने उसे ताना नहीं मारा। माता से सत्य जानकर अष्टावक्र श्वेतकेतु के साथ जनक के यज्ञ की ओर चल पड़ते हैं।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.134.1)
यः कथ्यते मन्त्रविदग्र्यबुद्धि- । रौद्दालकिः श्वेतकेतुः पृथिव्याम् । तस्याश्रमं पश्यत पाण्डवेयाः । सदाफलैरुपपन्नं महीजैः ॥
yaḥ kathyate mantravidagryabuddhi- | rauddālakiḥ śvetaketuḥ pṛthivyām | tasyāśramaṃ paśyata pāṇḍaveyāḥ | sadāphalairupapannaṃ mahījaiḥ
हे पाण्डवो, उद्दालकपुत्र श्वेतकेतु का आश्रम देखो, जिन्हें पृथ्वी पर मन्त्रों के ज्ञाता और अग्रणी बुद्धि वाले कहा जाता है; यह आश्रम सदा फल देने वाले वृक्षों से भरा है।
श्लोक 2 (3.134.2)
साक्षादत्र श्वेतकेतुर्ददर्श । सरस्वतीं मानुषदेहरूपाम् । वेत्स्यामि वाणीमिति संप्रवृत्तां । सरस्वतीं श्वेतकेतुर्बभाषे ॥
sākṣādatra śvetaketurdadarśa | sarasvatīṃ mānuṣadeharūpām | vetsyāmi vāṇīmiti saṃpravṛttāṃ | sarasvatīṃ śvetaketurbabhāṣe
यहीं श्वेतकेतु ने मानव-शरीर धारण किए हुए सरस्वती के साक्षात् दर्शन किए थे; और सामने आई सरस्वती से श्वेतकेतु ने कहा था — "मैं वाणी को जानूँगा।"
श्लोक 3 (3.134.3)
अस्मिन्युगे ब्रह्मकृतां वरिष्ठा- । वास्तां मुनी मातुलभागिनेयौ । अष्टावक्रश्चैव कहोलसूनु- । रौद्दालकिः श्वेतकेतुः पृथिव्याम् ॥
asminyuge brahmakṛtāṃ variṣṭhā- | vāstāṃ munī mātulabhāgineyau | aṣṭāvakraścaiva kaholasūnu- | rauddālakiḥ śvetaketuḥ pṛthivyām
इस युग में दो मुनि थे, मामा और भानजा, जो मन्त्र-रचयिताओं में श्रेष्ठ थे — कहोल के पुत्र अष्टावक्र और पृथ्वी पर प्रसिद्ध उद्दालकपुत्र श्वेतकेतु।
श्लोक 4 (3.134.4)
विदेहराजस्य समीपतस्तौ । धीरावुभौ मातुलभागिनेयौ । प्रविश्य यज्ञायतनं विवादे । वन्दिं निजग्राहतुरप्रमेयौ ॥
videharājasya samīpatastau | dhīrāvubhau mātulabhāgineyau | praviśya yajñāyatanaṃ vivāde | vandiṃ nijagrāhaturaprameyau
मामा-भानजे वे दोनों धीर पुरुष विदेहराज के सामने यज्ञशाला में गए और अपरिमित सामर्थ्य वाले उन दोनों ने शास्त्रार्थ में बन्दी को परास्त किया।
श्लोक 5 (3.134.5)
उपास्स्व कौन्तेय सहानुजस्त्वं । तस्याश्रमं पुण्यतमं प्रविश्य । अष्टावक्रं यस्य दौहित्रमाहु- । र्योऽसौ बन्दिं जनकस्याथ यज्ञे । वादी विप्राग्र्यो बाल एवाभिगम्य । वादे भङ्क्त्वा मज्जयामास नद्याम् ॥
upāssva kaunteya sahānujastvaṃ | tasyāśramaṃ puṇyatamaṃ praviśya | aṣṭāvakraṃ yasya dauhitramāhu- | ryo'sau bandiṃ janakasyātha yajñe | vādī viprāgryo bāla evābhigamya | vāde bhaṅktvā majjayāmāsa nadyām
हे कुन्तीनन्दन, अपने छोटे भाइयों के साथ उनके परम पवित्र आश्रम में प्रवेश करके उनकी उपासना करो — उन्हीं की, जिनका दौहित्र अष्टावक्र कहा जाता है; वही विप्रश्रेष्ठ वादी, जिसने बालक रहते हुए ही जनक के यज्ञ में जाकर बन्दी को शास्त्रार्थ में हराया और उसे नदी में डुबो दिया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 6 (3.134.6)
कथंप्रभावः स बभूव विप्र- । स्तथाभूतं यो निजग्राह वन्दिम् । किंचाधिकृत्याथ तयोर्विवादो । विदेहराजस्य समीप आसीत् ॥
kathaṃprabhāvaḥ sa babhūva vipra- | stathābhūtaṃ yo nijagrāha vandim | kiṃcādhikṛtyātha tayorvivādo | videharājasya samīpa āsīt
"वह ब्राह्मण कैसे प्रभाव वाला था, जिसने बन्दी जैसे व्यक्ति को परास्त किया? और विदेहराज के सामने उन दोनों का विवाद किस विषय को लेकर हुआ था?
श्लोक 7 (3.134.7)
अष्टावक्रः केन चासौ बभूव । तत्सर्वं मे लोमश शंस तत्त्वम् ॥
aṣṭāvakraḥ kena cāsau babhūva | tatsarvaṃ me lomaśa śaṃsa tattvam
"और वह अष्टावक्र — आठ स्थानों से टेढ़ा — कैसे हुआ? हे लोमश, यह सब मुझे यथार्थ रूप से बताइए।"
लोमश उवाच
श्लोक 8 (3.134.8)
उद्दालकस्य नियतः शिष्य एको । नाम्ना कहोळेति बभूव राजन् । शुश्रूषुराचार्यवशानुवर्ती । दीर्घं कालं सोऽध्ययनं चकार ॥
uddālakasya niyataḥ śiṣya eko | nāmnā kahoḷeti babhūva rājan | śuśrūṣurācāryavaśānuvartī | dīrghaṃ kālaṃ so'dhyayanaṃ cakāra
हे राजन्, उद्दालक का कहोल नाम का एक संयमी शिष्य था। वह सेवापरायण और आचार्य की आज्ञा में चलने वाला था, और उसने बहुत समय तक अध्ययन किया।
श्लोक 9 (3.134.9)
तं वै विप्राः पर्यभवंस्तु शिष्या- । स्तं च ज्ञात्वा विप्रकारं गुरुः सः । तस्मै प्रादात्सद्य एव श्रुतं च । भार्यां च वै दुहितरं स्वां सुजाताम् ॥
taṃ vai viprāḥ paryabhavaṃstu śiṣyā- | staṃ ca jñātvā viprakāraṃ guruḥ saḥ | tasmai prādātsadya eva śrutaṃ ca | bhāryāṃ ca vai duhitaraṃ svāṃ sujātām
दूसरे ब्राह्मण शिष्य उसका तिरस्कार करते थे; पर गुरु ने उसके इस अपमान को जानकर तुरन्त ही उसे अपनी विद्या भी दे दी और अपनी पुत्री सुजाता भी पत्नी रूप में दे दी।
श्लोक 10 (3.134.10)
तस्यां गर्भः समभवदग्निकल्पः । सोऽधीयानं पितरमथाभ्युवाच । सर्वां रात्रिमध्ययनं करोषि । नेदं पितः सम्यगिवोपवर्तते ॥
tasyāṃ garbhaḥ samabhavadagnikalpaḥ | so'dhīyānaṃ pitaramathābhyuvāca | sarvāṃ rātrimadhyayanaṃ karoṣi | nedaṃ pitaḥ samyagivopavartate
उसके गर्भ में अग्नि के समान तेजस्वी शिशु आया। जब पिता पाठ कर रहे थे, तब उसने उनसे कहा — "पिताजी, आप रात भर पाठ करते हैं, पर यह ठीक से नहीं हो रहा।"
श्लोक 11 (3.134.11)
उपालब्धः शिष्यमध्ये महर्षिः । स तं कोपादुदरस्थं शशाप । यस्माद्वक्रं वर्तमानो ब्रवीषि । तस्माद्वक्रो भवितास्यष्टधैव ॥
upālabdhaḥ śiṣyamadhye maharṣiḥ | sa taṃ kopādudarasthaṃ śaśāpa | yasmādvakraṃ vartamāno bravīṣi | tasmādvakro bhavitāsyaṣṭadhaiva
शिष्यों के बीच इस प्रकार उलाहना पाकर महर्षि ने क्रोध में गर्भस्थ शिशु को शाप दिया — "क्योंकि तुम गर्भ में रहते हुए ही टेढ़ी बात बोलते हो, इसलिए तुम आठ प्रकार से टेढ़े होगे।"
श्लोक 12 (3.134.12)
स वै तथा वक्र एवाभ्यजाय- । दष्टावक्रः प्रथितो मानवेषु । अस्यासीद्वै मातुलः श्वेतकेतुः । स तेन तुल्यो वयसा बभूव ॥
sa vai tathā vakra evābhyajāya- | daṣṭāvakraḥ prathito mānaveṣu | asyāsīdvai mātulaḥ śvetaketuḥ | sa tena tulyo vayasā babhūva
सो वह सचमुच टेढ़ा ही उत्पन्न हुआ और मनुष्यों में अष्टावक्र नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्वेतकेतु उसके मामा थे, जो उसी की आयु के थे।
श्लोक 13 (3.134.13)
संपीड्यमाना तु तदा सुजाता । विवर्धमानेन सुतेन कुक्षौ । उवाच भर्तारमिदं रहोगता । प्रसाद्य हीना वसुना धनार्थिनी ॥
saṃpīḍyamānā tu tadā sujātā | vivardhamānena sutena kukṣau | uvāca bhartāramidaṃ rahogatā | prasādya hīnā vasunā dhanārthinī
तब गर्भ में बढ़ते पुत्र से पीड़ित सुजाता ने एकान्त में पति के पास जाकर, निर्धन होने के कारण धन की इच्छा से, उन्हें प्रसन्न करके यह कहा —
सुजातोवाच
श्लोक 14 (3.134.14)
कथं करिष्याम्यधुना महर्षे । मासश्चायं दशमो वर्तते मे । नैवास्ति मे वसु किंचित्प्रदाता । येनाहमेतामापदं निस्तरेयम् ॥
kathaṃ kariṣyāmyadhunā maharṣe | māsaścāyaṃ daśamo vartate me | naivāsti me vasu kiṃcitpradātā | yenāhametāmāpadaṃ nistareyam
"हे महर्षे, अब मैं क्या करूँ? यह मेरा दसवाँ महीना चल रहा है, और कोई धन देने वाला नहीं है जिससे मैं इस संकट से पार हो सकूँ।"
लोमश उवाच
श्लोक 15 (3.134.15)
उक्तस्त्वेवं भार्यया वै कहोळो । वित्तस्यार्थे जनकमथाभ्यगच्छत् । स वै तदा वादविदा निगृह्य । निमज्जितो वन्दिनेहाप्सु विप्रः ॥
uktastvevaṃ bhāryayā vai kahoḷo | vittasyārthe janakamathābhyagacchat | sa vai tadā vādavidā nigṛhya | nimajjito vandinehāpsu vipraḥ
पत्नी के ऐसा कहने पर कहोल धन के लिए जनक के पास गए। वहाँ शास्त्रार्थ में निपुण बन्दी ने उस ब्राह्मण को परास्त करके जल में डुबो दिया।
श्लोक 16 (3.134.16)
उद्दालकस्तं तु तदा निशम्य । सूतेन वादेऽप्सु निमज्जितं तथा । उवाच तां तत्रततः सुजाता- । मष्टावक्रे गूहितव्योऽयमर्थः ॥
uddālakastaṃ tu tadā niśamya | sūtena vāde'psu nimajjitaṃ tathā | uvāca tāṃ tatratataḥ sujātā- | maṣṭāvakre gūhitavyo'yamarthaḥ
जब उद्दालक ने सुना कि सूत बन्दी ने शास्त्रार्थ के बाद उसे इस प्रकार जल में डुबो दिया है, तब उन्होंने सुजाता से कहा — "यह बात अष्टावक्र से छिपाकर रखनी होगी।"
श्लोक 17 (3.134.17)
ररक्ष सा चापि तमस्य मन्त्रं । जातोऽप्यसौ नैव शुश्राव विप्रः । उद्दालकं पितरं सोऽभिमेने । तथाऽष्टावक्रो भ्रातरं श्वेतकेतुम् ॥
rarakṣa sā cāpi tamasya mantraṃ | jāto'pyasau naiva śuśrāva vipraḥ | uddālakaṃ pitaraṃ so'bhimene | tathā'ṣṭāvakro bhrātaraṃ śvetaketum
सुजाता ने उनकी उस बात को गुप्त रखा, और जन्म लेने के बाद भी उस ब्राह्मण बालक ने यह बात कभी नहीं सुनी। वह उद्दालक को ही अपना पिता मानता था, और अष्टावक्र श्वेतकेतु को अपना भाई।
श्लोक 18 (3.134.18)
ततो वर्षे द्वादशे श्वेतकेतु- । रष्टावक्रं पितुरङ्के निषण्णम् । अपाकर्षद्गृह्यपाणौ रुदन्तं । नायं तवाङ्कः पितुरित्युक्तवांश्च ॥
tato varṣe dvādaśe śvetaketu- | raṣṭāvakraṃ pituraṅke niṣaṇṇam | apākarṣadgṛhyapāṇau rudantaṃ | nāyaṃ tavāṅkaḥ piturityuktavāṃśca
फिर बारहवें वर्ष में, जब अष्टावक्र पिता की गोद में बैठा था, श्वेतकेतु ने उसका हाथ पकड़कर उसे खींच लिया — वह रोता रहा — और कहा, "यह तुम्हारे पिता की गोद नहीं है।"
श्लोक 19 (3.134.19)
यत्तेनोक्तं दुरुक्तं तत्तदानीं । हृदि स्थितं तस्य सुदुःखमासीत् । गृहं गत्वा मातरं सोऽथ विप्रः । पप्रच्छेदं क्व नु तातो ममेति ॥
yattenoktaṃ duruktaṃ tattadānīṃ | hṛdi sthitaṃ tasya suduḥkhamāsīt | gṛhaṃ gatvā mātaraṃ so'tha vipraḥ | papracchedaṃ kva nu tāto mameti
उस समय कही गई वह कठोर बात उसके हृदय में बैठ गई और उसे बहुत दुःख हुआ। घर जाकर उस ब्राह्मण बालक ने माता से पूछा — "मेरे पिता कहाँ हैं?"
श्लोक 20 (3.134.20)
ततः सुजाता परमार्तरूपा । शापाद्भीता तत्त्वमस्याचचक्षे । तद्वै तत्त्वंसर्वमाज्ञाय रात्रा- । वित्यब्रवीच्छ्वेतकेतुं स विप्रः ॥
tataḥ sujātā paramārtarūpā | śāpādbhītā tattvamasyācacakṣe | tadvai tattvaṃsarvamājñāya rātrā- | vityabravīcchvetaketuṃ sa vipraḥ
तब अत्यन्त दुःखी सुजाता ने शाप के भय से उसे सच्ची बात बता दी। सारा सत्य जानकर उस ब्राह्मण ने रात में श्वेतकेतु से कहा —
अष्टावक्र उवाच
श्लोक 21 (3.134.21)
गच्छाव यज्ञं जनकस्य राज्ञो । बह्वाश्चर्यः श्रूयते तस्य यज्ञः । श्रोष्यावोऽत्र ब्राह्मणानां विवाद- । मन्नं चाग्र्यं तत्रभोक्ष्यावहे च ॥
gacchāva yajñaṃ janakasya rājño | bahvāścaryaḥ śrūyate tasya yajñaḥ | śroṣyāvo'tra brāhmaṇānāṃ vivāda- | mannaṃ cāgryaṃ tatrabhokṣyāvahe ca
"चलो, हम दोनों राजा जनक के यज्ञ में चलें; सुना है उनका यज्ञ अनेक आश्चर्यों से भरा है। वहाँ हम ब्राह्मणों का शास्त्रार्थ सुनेंगे और उत्तम भोजन भी करेंगे।
श्लोक 22 (3.134.22)
विचक्षणत्वं च भविष्यते नौ । शिवश्च सौम्यश्च हि ब्रह्मघोषः ॥
vicakṣaṇatvaṃ ca bhaviṣyate nau | śivaśca saumyaśca hi brahmaghoṣaḥ
"और हमारी विवेक-बुद्धि भी बढ़ेगी, क्योंकि वेदों का घोष मंगलकारी और सौम्य होता है।"
लोमश उवाच
श्लोक 23 (3.134.23)
तौ जग्मतुर्मातुलभागिनेयौ । यज्ञं समृद्धं जनकस्य राज्ञः । अष्टावक्रः पथि राज्ञा समेत्य । प्रोत्सार्यमाणो वाक्यमिदं जगाद ॥
tau jagmaturmātulabhāgineyau | yajñaṃ samṛddhaṃ janakasya rājñaḥ | aṣṭāvakraḥ pathi rājñā sametya | protsāryamāṇo vākyamidaṃ jagāda
मामा-भानजे दोनों राजा जनक के समृद्ध यज्ञ में गए। मार्ग में अष्टावक्र की राजा से भेंट हुई, और जब उन्हें रास्ते से हटाया जा रहा था, तब उन्होंने यह वचन कहा —