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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 137

यवक्रीत को इन्द्र से वर की प्राप्ति

लोमश पाण्डवों को समंगा नदी, कनखल पर्वत तथा अन्य तीर्थ दिखाते हैं, और फिर रैभ्य का आश्रम, जहाँ भरद्वाज के पुत्र यवक्रीत का विनाश हुआ था। रैभ्य और उनके पुत्रों को मिलने वाले सम्मान से जलकर यवक्रीत बिना गुरु के वेद पाने के लिए घोर तप करता है; इन्द्र उसे रोकने का प्रयत्न करते हैं, अंत में एक बूढ़े ब्राह्मण के रूप में गंगा पर बालू से पुल बाँधते दिखाई देते हैं, पर यवक्रीत के न मानने पर उसे वर दे देते हैं। भरद्वाज पुत्र को चेताते हैं कि वरदान से घमण्ड आता है, और बालधि के पुत्र मेधावी की कथा सुनाते हैं, जिसकी आयु जिन पर्वतों पर टिकी थी उनके टूटते ही वह मर गया; वे उसे रैभ्य का अपमान न करने की सीख देते हैं। यवक्रीत वचन तो देता है, पर ऋषियों को सताता रहता है।

अध्याय 136अध्याय-सूचीअध्याय 138

लोमश उवाच

श्लोक 1 (3.137.1)

एषा मधुविला नाम समङ्गा संप्रकाशते । एतत्कर्दमिलं नाम भरतस्याभिषेचनम् ॥

eṣā madhuvilā nāma samaṅgā saṃprakāśate | etatkardamilaṃ nāma bharatasyābhiṣecanam

यह मधुविला नाम वाली समंगा नदी शोभा पा रही है; और यह कर्दमिल नामक स्थान है, जहाँ भरत का अभिषेक हुआ था।

श्लोक 2 (3.137.2)

अलक्ष्म्या किल संयुक्तो वृत्रं हत्वा शचीपतिः । आप्लुतः सर्वपापेभ्यः समङ्गायां व्यमुच्यत ॥

alakṣmyā kila saṃyukto vṛtraṃ hatvā śacīpatiḥ | āplutaḥ sarvapāpebhyaḥ samaṅgāyāṃ vyamucyata

कहते हैं कि वृत्र का वध करने के बाद जब शचीपति इन्द्र अलक्ष्मी से ग्रस्त हो गए, तब समंगा में स्नान करके वे सब पापों से छूट गए।

श्लोक 3 (3.137.3)

एतद्विनशनं कुक्षौ मैनाकस्य नरर्षभ । अदितिर्यत्रपुत्रार्थं तदन्नमपचत्पुरा ॥

etadvinaśanaṃ kukṣau mainākasya nararṣabha | aditiryatraputrārthaṃ tadannamapacatpurā

हे नरश्रेष्ठ, मैनाक पर्वत की कुक्षि में यह विनशन तीर्थ है, जहाँ प्राचीन काल में अदिति ने पुत्र-प्राप्ति के लिए वह अन्न पकाया था।

श्लोक 4 (3.137.4)

एनं पर्वतराजानमारुह्य भरतर्षभाः । अयशस्यामसंशब्द्यामलक्ष्मीं व्यपनोत्स्यथ ॥

enaṃ parvatarājānamāruhya bharatarṣabhāḥ | ayaśasyāmasaṃśabdyāmalakṣmīṃ vyapanotsyatha

हे भरतश्रेष्ठो, इस पर्वतराज पर चढ़कर तुम उस अपयशकारी और न कहने योग्य अलक्ष्मी को दूर कर दोगे।

श्लोक 5 (3.137.5)

एते कनखला राजन्नृषीणां दयिता नगाः । एषा प्रकाशते गङ्गा युधिष्ठिर यशस्विनी ॥

ete kanakhalā rājannṛṣīṇāṃ dayitā nagāḥ | eṣā prakāśate gaṅgā yudhiṣṭhira yaśasvinī

हे राजन्, ये ऋषियों को प्रिय कनखल पर्वत हैं; और हे युधिष्ठिर, यह यशस्विनी गंगा शोभा पा रही है।

श्लोक 6 (3.137.6)

सनत्कुमारो भगवानत्र सिद्धिमगात्पुरा । आजमीढावगाह्यैनां सर्वपापैः प्रमोक्ष्यसे ॥

sanatkumāro bhagavānatra siddhimagātpurā | ājamīḍhāvagāhyaināṃ sarvapāpaiḥ pramokṣyase

यहीं प्राचीन काल में भगवान् सनत्कुमार ने सिद्धि प्राप्त की थी। हे अजमीढवंशी, इसमें स्नान करके तुम सब पापों से मुक्त हो जाओगे।

श्लोक 7 (3.137.7)

अपां ह्रदं च पुण्याख्यं भृगुतुङ्गं च पर्वतम् । तूष्णीं गङ्गां च कौन्तेय सानुजः समुपस्पृश ॥

apāṃ hradaṃ ca puṇyākhyaṃ bhṛgutuṅgaṃ ca parvatam | tūṣṇīṃ gaṅgāṃ ca kaunteya sānujaḥ samupaspṛśa

हे कुन्तीपुत्र, अपने छोटे भाइयों के साथ पुण्य नामक सरोवर, भृगुतुंग पर्वत और तूष्णी गंगा के जल का स्पर्श करो।

श्लोक 8 (3.137.8)

आश्रमः स्थूलशिरसो रमणीयः प्रकाशते । अत्र मानं च कौन्तेय क्रोधं चैव विवर्जय ॥

āśramaḥ sthūlaśiraso ramaṇīyaḥ prakāśate | atra mānaṃ ca kaunteya krodhaṃ caiva vivarjaya

यह स्थूलशिरा मुनि का रमणीय आश्रम शोभा पा रहा है। हे कुन्तीपुत्र, यहाँ मान और क्रोध दोनों को त्याग दो।

श्लोक 9 (3.137.9)

एष रैभ्याश्रमः श्रीमान्पाण्डवेय प्रकाशते । भारद्वाजो यत्रकविर्यवक्रीतो व्यनश्यत ॥

eṣa raibhyāśramaḥ śrīmānpāṇḍaveya prakāśate | bhāradvājo yatrakaviryavakrīto vyanaśyata

हे पाण्डुपुत्र, यह रैभ्य का शोभायमान आश्रम है, जहाँ भरद्वाज के विद्वान् पुत्र यवक्रीत का विनाश हुआ था।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 10 (3.137.10)

कथं युक्तोऽभवदृषिर्भरद्वाजः प्रतापवान् । किमर्थं च यवक्रीतः पुत्रोऽनश्यत वै मुनेः ॥

kathaṃ yukto'bhavadṛṣirbharadvājaḥ pratāpavān | kimarthaṃ ca yavakrītaḥ putro'naśyata vai muneḥ

"प्रतापी ऋषि भरद्वाज किस साधना में लगे थे? और मुनि के पुत्र यवक्रीत का विनाश किस कारण हुआ?"

श्लोक 11 (3.137.11)

एतत्सर्वं यथावृत्तं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । कर्मभिर्देवकल्पानां कीर्त्यमानैर्भृशं रमे ॥

etatsarvaṃ yathāvṛttaṃ śrotumicchāmi tattvataḥ | karmabhirdevakalpānāṃ kīrtyamānairbhṛśaṃ rame

"मैं यह सब ठीक-ठीक, जैसा घटा था वैसा ही सुनना चाहता हूँ। देवतुल्य पुरुषों के कर्मों का वर्णन सुनकर मुझे बड़ा आनन्द मिलता है।"

लोमश उवाच

श्लोक 12 (3.137.12)

भरद्वाजश्च रैभ्यश्च सखायौ संबभूवतुः । तावूषतुरिहात्यन्तं प्रीयमाणौ वनान्तरे ॥

bharadvājaśca raibhyaśca sakhāyau saṃbabhūvatuḥ | tāvūṣaturihātyantaṃ prīyamāṇau vanāntare

भरद्वाज और रैभ्य मित्र बन गए थे; वे दोनों एक-दूसरे से अत्यन्त प्रसन्न रहते हुए यहीं वन में रहते थे।

श्लोक 13 (3.137.13)

रैभ्यस्य तु सुतावास्तामर्वावसुपरावसू । आसीद्यवक्रीः पुत्रस्तु भरद्वाजस्य भारत ॥

raibhyasya tu sutāvāstāmarvāvasuparāvasū | āsīdyavakrīḥ putrastu bharadvājasya bhārata

हे भारत, रैभ्य के दो पुत्र थे — अर्वावसु और परावसु; और भरद्वाज का पुत्र यवक्री था।

श्लोक 14 (3.137.14)

रैभ्यो विद्वान्सहापत्यस्तपस्वी चेतरोऽभवत् । तयोश्चाप्यतुला प्रीतिरभवद्भरतर्षभ ॥

raibhyo vidvānsahāpatyastapasvī cetaro'bhavat | tayoścāpyatulā prītirabhavadbharatarṣabha

रैभ्य विद्वान् थे और संतान से युक्त थे, जबकि दूसरे (भरद्वाज) तपस्वी थे। हे भरतश्रेष्ठ, दोनों में अनुपम प्रेम था।

श्लोक 15 (3.137.15)

यवक्रीः पितरं दृष्ट्वा तपस्विनमसत्कृतम् । दृष्ट्वा च सत्कृतं विप्रै रैभ्यं पुत्रैः सहानघः ॥

yavakrīḥ pitaraṃ dṛṣṭvā tapasvinamasatkṛtam | dṛṣṭvā ca satkṛtaṃ viprai raibhyaṃ putraiḥ sahānaghaḥ

हे निष्पाप, यवक्री ने देखा कि उसके तपस्वी पिता का कोई सत्कार नहीं होता, जबकि ब्राह्मण पुत्रों सहित रैभ्य का सत्कार करते हैं;

श्लोक 16 (3.137.16)

पर्यतप्यत तेजस्वी मन्युनाऽभिपरिप्लुतः । तपस्तेपे ततो घोरं वेदज्ञानाय पाण्डव ॥

paryatapyata tejasvī manyunā'bhipariplutaḥ | tapastepe tato ghoraṃ vedajñānāya pāṇḍava

यह देखकर वह तेजस्वी युवक क्रोध से भरकर बहुत संतप्त हुआ। तब हे पाण्डुनन्दन, उसने वेदों का ज्ञान पाने के लिए घोर तप आरम्भ किया।

श्लोक 17 (3.137.17)

सुसमिद्धे महत्यग्नौ शरीरमुपतापयन् । जनयामास संतापमिन्द्रस्य सुमहातपाः ॥

susamiddhe mahatyagnau śarīramupatāpayan | janayāmāsa saṃtāpamindrasya sumahātapāḥ

भली-भाँति प्रज्वलित विशाल अग्नि में अपने शरीर को तपाते हुए उस महान् तपस्वी ने इन्द्र को संताप में डाल दिया।

श्लोक 18 (3.137.18)

तत इन्द्रो यवक्रीतमुपगम्य युधिष्ठिर । अब्रवीत्कस्य हेतोस्त्वमास्थितस्तप उत्तमम् ॥

tata indro yavakrītamupagamya yudhiṣṭhira | abravītkasya hetostvamāsthitastapa uttamam

हे युधिष्ठिर, तब इन्द्र ने यवक्रीत के पास आकर पूछा — "तुम यह उत्तम तप किस कारण कर रहे हो?"

यवक्रीत उवाच

श्लोक 19 (3.137.19)

द्विजानामनधीता वै वेदाः सुरगणार्चित । प्रतिभान्त्विति तप्येहमिदं परमकं तपः ॥

dvijānāmanadhītā vai vedāḥ suragaṇārcita | pratibhāntviti tapyehamidaṃ paramakaṃ tapaḥ

"हे देवगणों से पूजित, मैं यह परम तप इसलिए कर रहा हूँ कि ब्राह्मणों को बिना अध्ययन किए ही वेद प्रकट हो जाएँ।"

श्लोक 20 (3.137.20)

स्वाध्यायार्थं समारम्भो ममायं पाकशासन । तपसा ज्ञातुमिच्छामि सर्वज्ञानानि कौशिक ॥

svādhyāyārthaṃ samārambho mamāyaṃ pākaśāsana | tapasā jñātumicchāmi sarvajñānāni kauśika

"हे पाकशासन, मेरा यह उद्यम स्वाध्याय के लिए है। हे कौशिक, मैं तप के द्वारा सब विद्याएँ जानना चाहता हूँ।"

श्लोक 21 (3.137.21)

कालेन महता वेदाः शक्या गुरुमुखाद्विभो । प्राप्तुं तस्मादयं यत्नः परमो मे समास्थितः ॥

kālena mahatā vedāḥ śakyā gurumukhādvibho | prāptuṃ tasmādayaṃ yatnaḥ paramo me samāsthitaḥ

"हे प्रभो, गुरु के मुख से वेद बहुत लम्बे समय में ही प्राप्त हो सकते हैं; इसीलिए मैंने यह परम प्रयत्न आरम्भ किया है।"

इन्द्र उवाच

श्लोक 22 (3.137.22)

अमार्ग एष विप्रर्षे येन त्वं यातुमिच्छसि । किं विघातेन ते विप्र गच्छाधीहि गुरोर्मुखात् ॥

amārga eṣa viprarṣe yena tvaṃ yātumicchasi | kiṃ vighātena te vipra gacchādhīhi gurormukhāt

"हे विप्रर्षि, जिस मार्ग से तुम जाना चाहते हो वह मार्ग ही नहीं है। हे ब्राह्मण, अपना नाश करने से तुम्हें क्या मिलेगा? जाओ, गुरु के मुख से अध्ययन करो।"

लोमश उवाच

श्लोक 23 (3.137.23)

एवमुक्त्वा गतः शक्रो यवक्रीरपि भारत । भूय एवाकरोद्यत्नं तपस्यमितविक्रमः ॥

evamuktvā gataḥ śakro yavakrīrapi bhārata | bhūya evākarodyatnaṃ tapasyamitavikramaḥ

हे भारत, ऐसा कहकर इन्द्र चले गए; और अमित पराक्रमी यवक्री ने फिर से तपस्या में और भी अधिक प्रयत्न किया।

श्लोक 24 (3.137.24)

घोरेण तपसा राजंस्तप्यमानो महत्तपः । संतापयामास भृशं देवेन्द्रमिति नः श्रुतम् ॥

ghoreṇa tapasā rājaṃstapyamāno mahattapaḥ | saṃtāpayāmāsa bhṛśaṃ devendramiti naḥ śrutam

हे राजन्, हमने सुना है कि घोर तपस्या के द्वारा महान् तप करते हुए उसने देवराज को बहुत संतप्त कर दिया।

श्लोक 25 (3.137.25)

तं तथा तप्यमानं तु तपस्तीव्रं महामुनिम् । उपेत्य बलभिद्देवो वारयामास वै पुनः ॥

taṃ tathā tapyamānaṃ tu tapastīvraṃ mahāmunim | upetya balabhiddevo vārayāmāsa vai punaḥ

उस महामुनि को इस प्रकार तीव्र तप करते देखकर बल दैत्य का वध करने वाले इन्द्र फिर उसके पास आए और उसे रोकने लगे —

इन्द्र उवाच

श्लोक 26 (3.137.26)

अशक्योऽर्थः समारब्धो नैतद्बुद्धिकृतं तव । प्रतिभास्यन्ति वै वेदास्तव चैव पितुश्च ते ॥

aśakyo'rthaḥ samārabdho naitadbuddhikṛtaṃ tava | pratibhāsyanti vai vedāstava caiva pituśca te

"तुमने ऐसा कार्य आरम्भ किया है जो सिद्ध नहीं हो सकता; यह बुद्धिमानी का काम नहीं है। इस प्रकार न तुम्हें वेद प्रकट होंगे, न तुम्हारे पिता को।"

यवक्रीत उवाच

श्लोक 27 (3.137.27)

न चैतदेवं क्रियते देवराजसमीप्सितम् । महता नियमेनाहं तप्स्ये घोरतरं तपः ॥

na caitadevaṃ kriyate devarājasamīpsitam | mahatā niyamenāhaṃ tapsye ghorataraṃ tapaḥ

"हे देवराज, यदि मेरी यह अभिलाषा इस प्रकार पूरी नहीं होती, तो मैं महान् नियम धारण करके और भी घोर तप करूँगा।"

श्लोक 28 (3.137.28)

समिद्धेऽग्नावुपकृत्याङ्गमङ्गं । होष्यामि वा मघवंस्तन्निबोध । यद्येतदेवं न करोषि कामं । ममेप्सितं देवराजेह सर्वम् ॥

samiddhe'gnāvupakṛtyāṅgamaṅgaṃ | hoṣyāmi vā maghavaṃstannibodha | yadyetadevaṃ na karoṣi kāmaṃ | mamepsitaṃ devarājeha sarvam

"हे मघवन्, यह जान लो — हे देवराज, यदि तुम मेरी सारी अभिलाषा पूरी नहीं करोगे, तो मैं अपना एक-एक अंग काटकर प्रज्वलित अग्नि में होम कर दूँगा।"

लोमश उवाच

श्लोक 29 (3.137.29)

निश्चयं तमभिज्ञाय मुनेस्तस्य महात्मनः । प्रतिवारणहेत्वर्थं बुद्ध्या संचिन्त्य बुद्धिमान् ॥

niścayaṃ tamabhijñāya munestasya mahātmanaḥ | prativāraṇahetvarthaṃ buddhyā saṃcintya buddhimān

उस महात्मा मुनि का यह निश्चय जानकर बुद्धिमान् इन्द्र ने उसे रोकने का उपाय बुद्धि से भली-भाँति सोचा।

श्लोक 30 (3.137.30)

तत इन्द्रोऽकरोद्रूपं ब्राह्मणस्य तपस्विनः । अनेकशतवर्षस्य दुर्बलस्य सयक्ष्मणः ॥

tata indro'karodrūpaṃ brāhmaṇasya tapasvinaḥ | anekaśatavarṣasya durbalasya sayakṣmaṇaḥ

तब इन्द्र ने सैकड़ों वर्षों के बूढ़े, दुर्बल और क्षय-रोग से पीड़ित एक तपस्वी ब्राह्मण का रूप धारण किया।

श्लोक 31 (3.137.31)

यवक्रीतस्य यत्तीर्थमुचितं शौचकर्मणि । भागीरथ्यां तत्र सेतुं वालुकाभिश्चकार सः ॥

yavakrītasya yattīrthamucitaṃ śaucakarmaṇi | bhāgīrathyāṃ tatra setuṃ vālukābhiścakāra saḥ

भागीरथी के जिस घाट पर यवक्रीत शौच-स्नान किया करता था, वहीं वे बालू से पुल बाँधने लगे।

श्लोक 32 (3.137.32)

यदाऽस्य वदतो वाक्यं न स चक्रे द्विजोत्तमः । वालुकाभिस्ततः शक्रो गङ्गां समभिपूरयन् ॥

yadā'sya vadato vākyaṃ na sa cakre dvijottamaḥ | vālukābhistataḥ śakro gaṅgāṃ samabhipūrayan

जब उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उनकी बात नहीं मानी, तब इन्द्र गंगा को बालू से भरने लगे।

श्लोक 33 (3.137.33)

वालुकामुष्टिमनिशं भागीरथ्यां व्यसर्जयत् । स्नातुमभ्यागतं शक्रो यवक्रीतमदर्शयत् ॥

vālukāmuṣṭimaniśaṃ bhāgīrathyāṃ vyasarjayat | snātumabhyāgataṃ śakro yavakrītamadarśayat

वे निरन्तर मुट्ठी-भर बालू भागीरथी में डालते रहे; और इस प्रकार स्नान करने आए यवक्रीत को इन्द्र ने अपना यह काम दिखाया।

श्लोक 34 (3.137.34)

तं ददर्श यवक्रीतो यत्नवन्तं निबन्धने । प्रहसंश्चाब्रवीद्वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ॥

taṃ dadarśa yavakrīto yatnavantaṃ nibandhane | prahasaṃścābravīdvākyamidaṃ sa munipuṅgavaḥ

यवक्रीत ने उन्हें पुल बाँधने में जुटा देखा, और उस श्रेष्ठ मुनि ने हँसते हुए यह कहा —

यवक्रीत उवाच

श्लोक 35 (3.137.35)

किमिदं वर्तते ब्रह्मन्किंच ते ह चिकीर्षितम् । अतीव हि महान्यत्नः क्रियतेऽयं निरर्थकः ॥

kimidaṃ vartate brahmankiṃca te ha cikīrṣitam | atīva hi mahānyatnaḥ kriyate'yaṃ nirarthakaḥ

"हे ब्रह्मन्, यह क्या हो रहा है? आप क्या करना चाहते हैं? आप बहुत भारी परिश्रम कर रहे हैं, पर यह निरर्थक है।"

इन्द्र उवाच

श्लोक 36 (3.137.36)

बन्धिष्ये सेतुना गङ्गां सुखः पन्था भविष्यति । क्लिश्यते हि जनस्तात तरमाणः पुनःपुनः ॥

bandhiṣye setunā gaṅgāṃ sukhaḥ panthā bhaviṣyati | kliśyate hi janastāta taramāṇaḥ punaḥpunaḥ

"मैं पुल बनाकर गंगा को बाँध दूँगा, जिससे सुगम मार्ग बन जाएगा; क्योंकि वत्स, लोग बार-बार पार उतरते हुए बहुत कष्ट पाते हैं।"

यवक्रीत उवाच

श्लोक 37 (3.137.37)

नायं शक्यस्त्वया बद्धुं महानोघस्तपोधन । अशक्याद्विनिवर्तस्व शक्यमर्थं समारभ ॥

nāyaṃ śakyastvayā baddhuṃ mahānoghastapodhana | aśakyādvinivartasva śakyamarthaṃ samārabha

"हे तपोधन, यह महान् प्रवाह आपसे नहीं बाँधा जा सकता। असम्भव से हटकर कोई सम्भव कार्य आरम्भ कीजिए।"

इन्द्र उवाच

श्लोक 38 (3.137.38)

यथैव भवता चेदं तपो वेदार्थमुद्यतम् । अशक्यं तद्वदस्माभिरयं भारः समाहितः ॥

yathaiva bhavatā cedaṃ tapo vedārthamudyatam | aśakyaṃ tadvadasmābhirayaṃ bhāraḥ samāhitaḥ

"जैसे तुमने वेदों के लिए यह तप आरम्भ किया है, जो असम्भव है, वैसे ही मैंने भी यह भार उठाया है।"

यवक्रीत उवाच

श्लोक 39 (3.137.39)

यथा तव निरर्थोऽयमारम्भस्त्रिदशेश्वर । तथा यदि ममापीदं मन्यसे पाकशासन ॥

yathā tava nirartho'yamārambhastridaśeśvara | tathā yadi mamāpīdaṃ manyase pākaśāsana

"हे त्रिदशेश्वर पाकशासन, यदि आप मेरे इस कार्य को भी अपने इस आरम्भ की तरह निरर्थक मानते हैं,"

श्लोक 40 (3.137.40)

क्रियतां यद्भवेच्छक्यं त्वया सुरगणेश्वर । वरांश्च मे प्रयच्छान्यान्यैर्विद्वान्भवितास्म्यहम् ॥

kriyatāṃ yadbhavecchakyaṃ tvayā suragaṇeśvara | varāṃśca me prayacchānyānyairvidvānbhavitāsmyaham

"तो हे सुरगणेश्वर, जो आपके लिए सम्भव हो वही कीजिए, और मुझे दूसरे वर दीजिए जिनसे मैं विद्वान् बन जाऊँ।"

लोमश उवाच

श्लोक 41 (3.137.41)

तस्मै प्रादाद्वरानिन्द्र उक्तवान्यान्महातपाः । प्रतिभास्यन्ति ते वेदाः पित्रा सह यथेप्सिताः ॥

tasmai prādādvarānindra uktavānyānmahātapāḥ | pratibhāsyanti te vedāḥ pitrā saha yathepsitāḥ

उस महातपस्वी ने जो वर माँगे थे, इन्द्र ने उसे वे वर दे दिए — "तुम्हें और तुम्हारे पिता को इच्छानुसार वेद प्रकट हो जाएँगे।"

श्लोक 42 (3.137.42)

यच्चान्यत्काङ्क्षसे कामं यवक्रीर्गम्यतामिति । स लब्धकामः पितरं समेत्याथेदमब्रवीत् ॥

yaccānyatkāṅkṣase kāmaṃ yavakrīrgamyatāmiti | sa labdhakāmaḥ pitaraṃ sametyāthedamabravīt

"और जो कुछ अन्य कामना तुम रखते हो, वह भी पूरी होगी। अब जाओ, यवक्री।" इस प्रकार मनोरथ पूरा होने पर वह पिता के पास जाकर बोला —

यवक्रीत उवाच

श्लोक 43 (3.137.43)

प्रतिभास्यन्ति वै वेदा मम तातस्य चोभयोः । अपि चान्यान्भविष्यावो वरा लब्धास्तथा मया ॥

pratibhāsyanti vai vedā mama tātasya cobhayoḥ | api cānyānbhaviṣyāvo varā labdhāstathā mayā

"मुझे और मेरे पिता, दोनों को वेद प्रकट हो जाएँगे, और हम दूसरों से बढ़कर होंगे — ऐसे वर मैंने प्राप्त किए हैं।"

भरद्वाज उवाच

श्लोक 44 (3.137.44)

दर्पस्ते भविता तात वराँल्लब्ध्वा यथेप्सितान् । स दर्पपूर्णः कृपणः क्षिप्रमेव विनङ्क्ष्यसि ॥

darpaste bhavitā tāta varām̐llabdhvā yathepsitān | sa darpapūrṇaḥ kṛpaṇaḥ kṣiprameva vinaṅkṣyasi

"वत्स, मनचाहे वर पाकर तुममें घमण्ड आ जाएगा; और घमण्ड से भरकर, दीन बनकर, तुम शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे।"

श्लोक 45 (3.137.45)

अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा देवैरुदाहृताः । मुनिरासीत्पुरा पुत्र बालधिर्नाम विश्रुतः ॥

atrāpyudāharantīmā gāthā devairudāhṛtāḥ | munirāsītpurā putra bāladhirnāma viśrutaḥ

"इस विषय में लोग देवताओं द्वारा कही गई ये गाथाएँ सुनाते हैं। वत्स, प्राचीन काल में बालधि नाम के एक प्रसिद्ध मुनि थे।"

श्लोक 46 (3.137.46)

स पुत्रशोकादुद्विग्नस्तपस्तेपे सुदुष्करम् । भवेन्मम सुतोऽमर्त्य इतितं लब्धवांश्च सः ॥

sa putraśokādudvignastapastepe suduṣkaram | bhavenmama suto'martya ititaṃ labdhavāṃśca saḥ

"पुत्र-शोक से व्याकुल होकर उन्होंने अत्यन्त कठिन तप किया, इस कामना से कि 'मेरा पुत्र अमर हो'; और उन्होंने ऐसा पुत्र पा भी लिया।"

श्लोक 47 (3.137.47)

तस्य प्रसादो वै देवैः कृतो न त्वमरैः समः । नामर्त्यो विद्यते मर्त्यो निमित्तायुर्भविष्यति ॥

tasya prasādo vai devaiḥ kṛto na tvamaraiḥ samaḥ | nāmartyo vidyate martyo nimittāyurbhaviṣyati

"देवताओं ने उन पर कृपा तो की, पर उसे अमरों के समान नहीं बनाया — 'कोई मरणशील अमर नहीं हो सकता; उसकी आयु किसी निमित्त पर टिकी रहेगी।'"

बालधिरुवाच

श्लोक 48 (3.137.48)

यथेमे पर्वताः शश्वत्तिष्ठन्ति सुरसत्तमाः । तावज्जीवेन्मम सुतो निर्वाणमुत मे मतः ॥

yatheme parvatāḥ śaśvattiṣṭhanti surasattamāḥ | tāvajjīvenmama suto nirvāṇamuta me mataḥ

"हे देवश्रेष्ठो, जैसे ये पर्वत सदा स्थिर रहते हैं, वैसे ही जब तक ये रहें तब तक मेरा पुत्र जीवित रहे; इसी को मैं अपनी शान्ति मानता हूँ।"

भरद्वाज उवाच

श्लोक 49 (3.137.49)

तस्य पुत्रस्तदा जज्ञे मेधावी क्रोधनस्तदा । स तु लब्धवरो दर्पादृषींश्चैवावमन्यत ॥

tasya putrastadā jajñe medhāvī krodhanastadā | sa tu labdhavaro darpādṛṣīṃścaivāvamanyata

"तब उनके यहाँ मेधावी नाम का पुत्र जन्मा, जो क्रोधी स्वभाव का था। वर प्राप्त होने के कारण वह घमण्ड में आकर ऋषियों का अपमान करने लगा।"

श्लोक 50 (3.137.50)

विकुर्वाणो मुनीनां च व्यचरत्स महीमिमाम् । आससाद महावीर्यं धनुषाक्षं मनीषिणम् ॥

vikurvāṇo munīnāṃ ca vyacaratsa mahīmimām | āsasāda mahāvīryaṃ dhanuṣākṣaṃ manīṣiṇam

"मुनियों को सताता हुआ वह इस पृथ्वी पर घूमता रहा, और एक दिन महापराक्रमी, ज्ञानी धनुषाक्ष के पास जा पहुँचा।"

श्लोक 51 (3.137.51)

तस्यापचक्रे मेधावी तं शशाप स वीर्यवान् । भव भस्मेति चोक्तः स न भस्म समपद्यत ॥

tasyāpacakre medhāvī taṃ śaśāpa sa vīryavān | bhava bhasmeti coktaḥ sa na bhasma samapadyata

"मेधावी ने उनका अपमान किया, तब उस शक्तिशाली मुनि ने उसे शाप दिया — 'भस्म हो जा!' पर ऐसा कहे जाने पर भी वह भस्म नहीं हुआ।"

श्लोक 52 (3.137.52)

धनुषाक्षस्तु तं दृष्ट्वा मेधाविनमनामयम् । मुनिस्तत्कारणं ज्ञात्वा स्वयं महिषरूपधृत् । शृङ्गेणाद्रीनचलयत्ततोऽयंभस्मसादभूत् ॥

dhanuṣākṣastu taṃ dṛṣṭvā medhāvinamanāmayam | munistatkāraṇaṃ jñātvā svayaṃ mahiṣarūpadhṛt | śṛṅgeṇādrīnacalayattato'yaṃbhasmasādabhūt

"मेधावी को सकुशल देखकर धनुषाक्ष मुनि ने इसका कारण जान लिया। स्वयं भैंसे का रूप धारण करके उन्होंने अपने सींगों से पर्वतों को हिला दिया, और तब वह भस्म हो गया।"

श्लोक 53 (3.137.53)

निमित्तमस्य महर्षिर्भेदयामास पर्वतान् । स निमित्ते विनष्टे तु ममार सहसा शिशुः ॥

nimittamasya maharṣirbhedayāmāsa parvatān | sa nimitte vinaṣṭe tu mamāra sahasā śiśuḥ

"महर्षि ने उसकी आयु के निमित्त उन पर्वतों को तोड़ डाला; और निमित्त के नष्ट होते ही वह बालक सहसा मर गया।"

श्लोक 54 (3.137.54)

तं मृतं पुत्रमादाय विललाप ततः पिता ॥

taṃ mṛtaṃ putramādāya vilalāpa tataḥ pitā

"तब पिता अपने मरे हुए पुत्र को उठाकर विलाप करने लगे।"

श्लोक 55 (3.137.55)

लालप्यमानं तं दृष्ट्वा मुनयः परमार्तवत् । ऊचुर्वेदविदः सर्वे गाथां यां तां निबोध मे ॥

lālapyamānaṃ taṃ dṛṣṭvā munayaḥ paramārtavat | ūcurvedavidaḥ sarve gāthāṃ yāṃ tāṃ nibodha me

"उन्हें अत्यन्त दुखी की भाँति विलाप करते देखकर वेदवेत्ता सब मुनियों ने एक गाथा कही; उसे मुझसे सुनो —"

श्लोक 56 (3.137.56)

न दिष्टमर्थमत्येतुमीशोऽमर्त्यः कथंचन । महर्षिर्भेदयामास धनुषाक्षो महीधरान् ॥

na diṣṭamarthamatyetumīśo'martyaḥ kathaṃcana | maharṣirbhedayāmāsa dhanuṣākṣo mahīdharān

"'विधाता द्वारा निश्चित बात का उल्लंघन अमर भी कभी नहीं कर सकता; महर्षि धनुषाक्ष ने पर्वतों को ही तोड़ डाला।'"

श्लोक 57 (3.137.57)

एवं लब्ध्वा वरान्बाला दर्पपूर्णास्तपस्विनः । क्षिप्रमेव विनश्यन्ति यथा न स्यात्तथा भवान् ॥

evaṃ labdhvā varānbālā darpapūrṇāstapasvinaḥ | kṣiprameva vinaśyanti yathā na syāttathā bhavān

"इस प्रकार वर पाकर बालक तपस्वी घमण्ड से भर जाते हैं और शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। तुम वैसे न बनो, ऐसा ही करना।"

श्लोक 58 (3.137.58)

एष रैभ्यो महावीर्यः पुत्रौ चास्य तथाविधौ । तं यथा पुत्र नाभ्येषि तथा कुर्यास्त्वतन्द्रितः ॥

eṣa raibhyo mahāvīryaḥ putrau cāsya tathāvidhau | taṃ yathā putra nābhyeṣi tathā kuryāstvatandritaḥ

"ये रैभ्य महापराक्रमी हैं और इनके दोनों पुत्र भी वैसे ही हैं। वत्स, सावधान रहकर ऐसा ही करना कि तुम कभी उनसे टकराओ नहीं।"

श्लोक 59 (3.137.59)

स हि क्रुद्धः समर्थस्त्वां पुत्र पीडयितुं रुषा । रैभ्यश्चापि तपस्वी च कोपनश्च महानृषिः ॥

sa hi kruddhaḥ samarthastvāṃ putra pīḍayituṃ ruṣā | raibhyaścāpi tapasvī ca kopanaśca mahānṛṣiḥ

"क्योंकि वत्स, क्रुद्ध होने पर वे रोष में तुम्हें पीड़ा देने में समर्थ हैं। रैभ्य तपस्वी भी हैं और क्रोधी स्वभाव के महान् ऋषि भी।"

यवक्रीत उवाच

श्लोक 60 (3.137.60)

एवं करिष्ये मा तापं तात कार्षीः कथंचन । यथा हि मे भवान्मान्यस्तथा रैभ्यः पिता मम ॥

evaṃ kariṣye mā tāpaṃ tāta kārṣīḥ kathaṃcana | yathā hi me bhavānmānyastathā raibhyaḥ pitā mama

"मैं ऐसा ही करूँगा, पिताजी; आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें। जैसे आप मेरे लिए माननीय हैं, वैसे ही रैभ्य भी मेरे पिता हैं।"

लोमश उवाच

श्लोक 61 (3.137.61)

उक्त्वा स पितरं श्लक्ष्णं यवक्रीरकुतोभयः । विप्रकुर्वन्नृषीनन्यानतुष्यत्परया मुदा ॥

uktvā sa pitaraṃ ślakṣṇaṃ yavakrīrakutobhayaḥ | viprakurvannṛṣīnanyānatuṣyatparayā mudā

पिता से मीठे वचन कहकर, किसी से भी न डरने वाला यवक्री दूसरे ऋषियों का अपकार करता हुआ बड़े आनन्द में रहने लगा।

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