आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 138
यवक्रीत की मृत्यु
लोमश यवक्रीत (यवक्री) की कथा आगे सुनाते हैं। निर्भय घूमता हुआ यवक्री वसन्त में रैभ्य के आश्रम पहुँचता है और रैभ्य के पुत्र परावसु की पत्नी का शील भंग करता है। क्रुद्ध रैभ्य अपनी दो जटाएँ अग्नि में होमकर उस स्त्री के रूप वाली एक कृत्या और एक राक्षस उत्पन्न करते हैं। कृत्या यवक्री का कमण्डलु चुरा लेती है जिससे वह अशुद्ध रह जाता है; राक्षस उसे सूखे सरोवरों और नदियों तक खदेड़ता है, और जब एक अन्धा शूद्र उसे पिता की अग्निशाला के द्वार पर रोक लेता है, तब राक्षस शूल से उसका वध कर देता है।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.138.1)
चङ्क्रम्यमाणः स तदा यवक्रीरकुतोभयः । जगाम माधवे मासि रैभ्याश्रमपदं प्रति ॥
caṅkramyamāṇaḥ sa tadā yavakrīrakutobhayaḥ | jagāma mādhave māsi raibhyāśramapadaṃ prati
लोमश बोले — निर्भय होकर इधर-उधर घूमता हुआ यवक्री तब माधव (वैशाख) मास में रैभ्य के आश्रम की ओर गया।
श्लोक 2 (3.138.2)
स ददर्शाश्रमे रम्ये पुष्पितद्रुमभूषिते । विचरन्तीं स्नुषां तस्य किन्नरीमिव भारत ॥
sa dadarśāśrame ramye puṣpitadrumabhūṣite | vicarantīṃ snuṣāṃ tasya kinnarīmiva bhārata
हे भारत, फूलों से लदे वृक्षों से सुशोभित उस रमणीय आश्रम में उसने रैभ्य की पुत्रवधू को किन्नरी के समान विचरते देखा।
श्लोक 3 (3.138.3)
यवक्रीस्तामुवाचेदमुपतिष्ठस्व मामिति । निर्लज्जो लज्जया युक्तां कामेन हृतचेतनः ॥
yavakrīstāmuvācedamupatiṣṭhasva māmiti | nirlajjo lajjayā yuktāṃ kāmena hṛtacetanaḥ
काम से विवेक खो बैठे उस निर्लज्ज यवक्री ने उस लज्जाशील स्त्री से कहा — 'मेरे पास आओ।'
श्लोक 4 (3.138.4)
सा तस्य शीलमाज्ञाय तस्माच्छापाच्च बिभ्यती । तेजस्वितां च रैभ्यस्य तथेत्युक्त्वा जगाम ह ॥
sā tasya śīlamājñāya tasmācchāpācca bibhyatī | tejasvitāṃ ca raibhyasya tathetyuktvā jagāma ha
उसका स्वभाव जानकर, उसके शाप से डरती हुई और रैभ्य के तेज का स्मरण करती हुई, वह 'ठीक है' कहकर चली गयी।
श्लोक 5 (3.138.5)
तत एकान्तमानीय लज्जयामास भारत । आजगाम तदा रैभ्यः स्वमाश्रममरिंदम ॥
tata ekāntamānīya lajjayāmāsa bhārata | ājagāma tadā raibhyaḥ svamāśramamariṃdama
तब हे भारत, वह उसे एकान्त में ले गया और उसका शील भंग किया। हे शत्रुदमन, उसी समय रैभ्य अपने आश्रम लौटे।
श्लोक 6 (3.138.6)
रुदतीं च स्नुषां दृष्ट्वा भार्यामार्तां परावसोः । सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया वाचा पर्यपृच्छद्युधिष्ठिर ॥
rudatīṃ ca snuṣāṃ dṛṣṭvā bhāryāmārtāṃ parāvasoḥ | sāntvayañślakṣṇayā vācā paryapṛcchadyudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, अपनी पुत्रवधू, परावसु की पत्नी, को रोती और दुखी देखकर उन्होंने मधुर वाणी से उसे सान्त्वना दी और कारण पूछा।
श्लोक 7 (3.138.7)
सा तस्मै सर्वमाचष्ट यवक्रीभाषितं शुभा । प्रत्युक्तं च यवक्रीतं प्रेक्षापूर्वं तथाऽऽत्मना ॥
sā tasmai sarvamācaṣṭa yavakrībhāṣitaṃ śubhā | pratyuktaṃ ca yavakrītaṃ prekṣāpūrvaṃ tathā''tmanā
उस साध्वी ने यवक्री की कही हुई सारी बातें उन्हें बता दीं, और यह भी कि उसने स्वयं सोच-समझकर यवक्रीत को क्या उत्तर दिया था।
श्लोक 8 (3.138.8)
शृण्वानस्यैव रैभ्यस्य यवक्रेस्तद्विचेष्टनम् । दहन्निव तदा चेतः क्रोधः समभवन्महान् ॥
śṛṇvānasyaiva raibhyasya yavakrestadviceṣṭanam | dahanniva tadā cetaḥ krodhaḥ samabhavanmahān
यवक्री की वह करतूत सुनते ही रैभ्य के भीतर ऐसा प्रचण्ड क्रोध उठा मानो उनका हृदय जल रहा हो।
श्लोक 9 (3.138.9)
स तदा मन्युनाऽऽविष्टस्तपस्वी कोपनो भृशम् । अवलुप्य जटामेकां जुहावाग्नौ सुसंस्कृते ॥
sa tadā manyunā''viṣṭastapasvī kopano bhṛśam | avalupya jaṭāmekāṃ juhāvāgnau susaṃskṛte
क्रोध से भरे उस अत्यन्त कोपशील तपस्वी ने अपनी एक जटा उखाड़कर विधिपूर्वक संस्कारित अग्नि में आहुति दे दी।
श्लोक 10 (3.138.10)
ततः समभवन्नारी तस्या रूपेण संमिता । अवलुप्यापरां चापि जुहावाग्नौ जटां पुनः ॥
tataḥ samabhavannārī tasyā rūpeṇa saṃmitā | avalupyāparāṃ cāpi juhāvāgnau jaṭāṃ punaḥ
उससे एक स्त्री प्रकट हुई जो रूप में उसकी पुत्रवधू के समान थी। फिर उन्होंने दूसरी जटा उखाड़ी और उसे भी अग्नि में होम दिया।
श्लोक 11 (3.138.11)
ततः समभवद्रक्षो दीप्तास्यं घोरदर्शनम् । अब्रूतां तौ तदा रैभ्यं किं कार्यं करवामहे ॥
tataḥ samabhavadrakṣo dīptāsyaṃ ghoradarśanam | abrūtāṃ tau tadā raibhyaṃ kiṃ kāryaṃ karavāmahe
उससे जलते मुख वाला, भयानक दिखने वाला एक राक्षस उत्पन्न हुआ। उन दोनों ने रैभ्य से कहा — 'हम क्या कार्य करें?'
श्लोक 12 (3.138.12)
तावब्रवीदृषिः क्रुद्धो यवक्रीर्वध्यतामिति । जग्मतुस्तौ तथेत्युक्त्वा यवक्रीतजिघांसया ॥
tāvabravīdṛṣiḥ kruddho yavakrīrvadhyatāmiti | jagmatustau tathetyuktvā yavakrītajighāṃsayā
क्रुद्ध ऋषि ने उनसे कहा — 'यवक्री का वध करो।' 'ऐसा ही हो' कहकर वे दोनों यवक्रीत को मारने की इच्छा से चल पड़े।
श्लोक 13 (3.138.13)
ततस्तं समुपास्थाय कृत्या सृष्टा महात्मना । कमण्डलुं जहारास्य मोहयित्वा तु भारत ॥
tatastaṃ samupāsthāya kṛtyā sṛṣṭā mahātmanā | kamaṇḍaluṃ jahārāsya mohayitvā tu bhārata
हे भारत, तब उस महात्मा द्वारा रची गयी कृत्या उसके पास पहुँची और उसे मोहित करके उसका कमण्डलु हर ले गयी।
श्लोक 14 (3.138.14)
उच्छिष्टं तु यवक्रीतमपकृष्टकमण्डलुम् । तत उद्यतशूलः स राक्षसः समुपाद्रवत् ॥
ucchiṣṭaṃ tu yavakrītamapakṛṣṭakamaṇḍalum | tata udyataśūlaḥ sa rākṣasaḥ samupādravat
जब यवक्रीत अशुद्ध (उच्छिष्ट) अवस्था में था और उसका कमण्डलु छिन चुका था, तब वह राक्षस शूल उठाकर उस पर टूट पड़ा।
श्लोक 15 (3.138.15)
तमाद्रवन्तं संप्रेक्ष्य शूलहस्तं जिघांसया । यवक्रीः सहसोत्थाय प्राद्रवद्यत्र वै सरः ॥
tamādravantaṃ saṃprekṣya śūlahastaṃ jighāṃsayā | yavakrīḥ sahasotthāya prādravadyatra vai saraḥ
हाथ में शूल लिए उसे मारने के लिए दौड़े आते देखकर यवक्री सहसा उठकर वहाँ भागा जहाँ एक सरोवर था।
श्लोक 16 (3.138.16)
जलहीनं सरो दृष्ट्वा यवक्रीस्त्वरितः पुनः । जगाम सरितः सर्वास्ताश्चाप्यासन्विशोषिताः ॥
jalahīnaṃ saro dṛṣṭvā yavakrīstvaritaḥ punaḥ | jagāma saritaḥ sarvāstāścāpyāsanviśoṣitāḥ
सरोवर को जलहीन देखकर यवक्री फिर शीघ्रता से सब नदियों की ओर गया, पर वे सब भी सूख चुकी थीं।
श्लोक 17 (3.138.17)
स काल्यमानो घोरेण शूलहस्तेन रक्षसा । अग्निहोत्रे पितुर्भीतः सहसा प्रविवेश ह ॥
sa kālyamāno ghoreṇa śūlahastena rakṣasā | agnihotre piturbhītaḥ sahasā praviveśa ha
भयानक शूलधारी राक्षस द्वारा खदेड़ा जाता हुआ वह डरकर सहसा अपने पिता की अग्निशाला में घुसने को दौड़ा।
श्लोक 18 (3.138.18)
स वै प्रविशमानस्तु शूद्रेणान्धेन रक्षिणा । निगृहीतो बलाद्द्वारि सोऽवातिष्ठत पार्थिव ॥
sa vai praviśamānastu śūdreṇāndhena rakṣiṇā | nigṛhīto balāddvāri so'vātiṣṭhata pārthiva
हे राजन्, जब वह भीतर जा रहा था, तब वहाँ के रक्षक अन्धे शूद्र ने उसे द्वार पर बलपूर्वक पकड़ लिया और वह बाहर ही रुक गया।
श्लोक 19 (3.138.19)
निगृहीतं तु शूद्रेण यवक्रीतं स राक्षसः । ताडयामास शूलेन स भिन्नहृदयोऽपतत् ॥
nigṛhītaṃ tu śūdreṇa yavakrītaṃ sa rākṣasaḥ | tāḍayāmāsa śūlena sa bhinnahṛdayo'patat
शूद्र द्वारा पकड़े गये यवक्रीत पर उस राक्षस ने शूल से प्रहार किया, और हृदय बिंध जाने से वह गिर पड़ा।
श्लोक 20 (3.138.20)
यवक्रीतं स हत्वा तु राक्षसो रैभ्यमागमत् । अनुज्ञातस्तु रैभ्येण तया नार्या सहावसत् ॥
yavakrītaṃ sa hatvā tu rākṣaso raibhyamāgamat | anujñātastu raibhyeṇa tayā nāryā sahāvasat
यवक्रीत को मारकर वह राक्षस रैभ्य के पास लौट आया और रैभ्य की आज्ञा से उस स्त्री के साथ रहने लगा।