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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 139

भरद्वाज का शोक और शाप

भरद्वाज अपना नित्य स्वाध्याय करके घर लौटते हैं तो देखते हैं कि उनकी अग्नियाँ उनके स्वागत में नहीं उठतीं। घर का रक्षक अन्धा शूद्र उन्हें बताता है कि रैभ्य के राक्षस से खदेड़ा गया यवक्रीत अग्निशाला के द्वार पर रोका गया और वहीं मारा गया। शोक से व्याकुल भरद्वाज पुत्र के लिए विलाप करते हैं और रैभ्य को शाप देते हैं कि उनका ज्येष्ठ पुत्र ही उन्हें मारे; फिर मित्र को शाप देने के लिए स्वयं को धिक्कारते हुए वे यवक्रीत का दाह-संस्कार करके स्वयं अग्नि में प्रवेश कर जाते हैं।

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लोमश उवाच

श्लोक 1 (3.139.1)

भरद्वाजस्तु कौन्तेय कृत्वा स्वाध्यायमाह्निकम् । समित्कलापमादाय प्रविवेश स्वमाश्रमम् ॥

bharadvājastu kaunteya kṛtvā svādhyāyamāhnikam | samitkalāpamādāya praviveśa svamāśramam

लोमश बोले — हे कुन्तीपुत्र, भरद्वाज अपना नित्य स्वाध्याय पूरा करके समिधाओं का गट्ठर लेकर अपने आश्रम में आये।

श्लोक 2 (3.139.2)

तं स्म दृष्ट्वा पुरा सर्वे प्रत्युत्तिष्ठन्ति पावकाः । न त्वेनमुपतिष्ठन्ति हतपुत्रं तदाऽग्नयः ॥

taṃ sma dṛṣṭvā purā sarve pratyuttiṣṭhanti pāvakāḥ | na tvenamupatiṣṭhanti hataputraṃ tadā'gnayaḥ

पहले उन्हें देखते ही सब अग्नियाँ उनके स्वागत में उठ खड़ी होती थीं, पर उस समय पुत्र के मारे जाने के कारण अग्नियाँ उनकी अगवानी के लिए नहीं उठीं।

श्लोक 3 (3.139.3)

वैकृतं त्वग्निहोत्रे स लक्षयित्वा महातपाः । तमन्धं शूद्रमासीनं गृहपालमथाब्रवीत् ॥

vaikṛtaṃ tvagnihotre sa lakṣayitvā mahātapāḥ | tamandhaṃ śūdramāsīnaṃ gṛhapālamathābravīt

अग्निहोत्र में यह विकार देखकर उस महातपस्वी ने वहाँ बैठे अन्धे शूद्र गृहरक्षक से कहा —

भरद्वाज उवाच

श्लोक 4 (3.139.4)

किंनु मे नाग्नयः शूद्र प्रतिनन्दन्ति दर्शनम् । त्वं चापि न यथापूर्वं कच्चित्क्षेममिहाश्रमे ॥

kiṃnu me nāgnayaḥ śūdra pratinandanti darśanam | tvaṃ cāpi na yathāpūrvaṃ kaccitkṣemamihāśrame

'शूद्र, मेरी अग्नियाँ मुझे देखकर प्रसन्न क्यों नहीं हो रहीं? तुम भी पहले जैसे नहीं लग रहे। क्या आश्रम में सब कुशल है?

श्लोक 5 (3.139.5)

कच्चिन्न रैभ्यं पुत्रो मे गतवानल्पचेतनः । एतदाचक्ष्व मे शीघ्रं न हि शुद्ध्यति मे मनः ॥

kaccinna raibhyaṃ putro me gatavānalpacetanaḥ | etadācakṣva me śīghraṃ na hi śuddhyati me manaḥ

कहीं मेरा वह अल्पबुद्धि पुत्र रैभ्य के पास तो नहीं चला गया? यह मुझे शीघ्र बताओ, क्योंकि मेरा मन आश्वस्त नहीं हो रहा।'

शूद्र उवाच

श्लोक 6 (3.139.6)

रैभ्यं यातो नूनमयं पुत्रस्ते मन्दचेतनः । तथाहि निहतः शेते राक्षसेन महात्मना ॥

raibhyaṃ yāto nūnamayaṃ putraste mandacetanaḥ | tathāhi nihataḥ śete rākṣasena mahātmanā

शूद्र बोला — निश्चय ही आपका यह मन्दबुद्धि पुत्र रैभ्य के पास गया था, क्योंकि यह एक महाबली राक्षस के हाथों मारा गया पड़ा है।

श्लोक 7 (3.139.7)

प्रकाल्यमानस्तेनायं शूलहस्तेन रक्षसा । अग्न्यगारं प्रतिद्वारि मया दोर्भ्यां निवारितः ॥

prakālyamānastenāyaṃ śūlahastena rakṣasā | agnyagāraṃ pratidvāri mayā dorbhyāṃ nivāritaḥ

शूलधारी राक्षस से खदेड़ा जाता हुआ यह अग्निशाला की ओर आया, और मैंने द्वार पर ही इसे अपनी दोनों भुजाओं से रोक लिया।

श्लोक 8 (3.139.8)

ततः स विहताशोऽत्र जलकामोऽशुचिर्ध्रुवम् । निहतः सोऽतिवेगेन शूलहस्तेन रक्षसा ॥

tataḥ sa vihatāśo'tra jalakāmo'śucirdhruvam | nihataḥ so'tivegena śūlahastena rakṣasā

तब यहीं उसकी आशा टूट गयी; वह जल चाहता था और निश्चय ही अशुद्ध था, और उस शूलधारी राक्षस ने बड़े वेग से उसे मार डाला।

लोमश उवाच

श्लोक 9 (3.139.9)

भरद्वाजस्तु तच्छ्रुत्वा शूद्रस्य विप्रियं महत् । गतासुं पुत्रमादाय विललाप सुदुःखितः ॥

bharadvājastu tacchrutvā śūdrasya vipriyaṃ mahat | gatāsuṃ putramādāya vilalāpa suduḥkhitaḥ

लोमश बोले — शूद्र से यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर भरद्वाज ने अपने निष्प्राण पुत्र को उठा लिया और अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगे।

भरद्वाज उवाच

श्लोक 10 (3.139.10)

ब्राह्मणानां किलार्थाय ननु त्वं तप्तवांस्तपः । द्विजानामनधीता वै वेदाः संप्रतिभान्त्विति ॥

brāhmaṇānāṃ kilārthāya nanu tvaṃ taptavāṃstapaḥ | dvijānāmanadhītā vai vedāḥ saṃpratibhāntviti

भरद्वाज बोले — कहते हैं, तुमने ब्राह्मणों के हित के लिए तप किया था, ताकि द्विजों को बिना अध्ययन किये ही वेद प्रकट हो जाएँ।

श्लोक 11 (3.139.11)

तथा कल्याणशीलस्त्वं ब्राह्मणेषु महात्मसु । अनागाः सर्वभूतेषु कर्कशत्वमुपेयिवान् ॥

tathā kalyāṇaśīlastvaṃ brāhmaṇeṣu mahātmasu | anāgāḥ sarvabhūteṣu karkaśatvamupeyivān

तुम महात्मा ब्राह्मणों के प्रति कल्याणकारी स्वभाव वाले और सब प्राणियों के प्रति निर्दोष थे, फिर भी तुममें कठोरता आ गयी।

श्लोक 12 (3.139.12)

प्रतिषिद्धो मया तात रैभ्यावसथदर्शनात् । गतवानेव तं क्षुद्रं कालान्तकयमोपमम् ॥

pratiṣiddho mayā tāta raibhyāvasathadarśanāt | gatavāneva taṃ kṣudraṃ kālāntakayamopamam

पुत्र, मैंने तुम्हें रैभ्य के निवास की ओर जाने से रोका था, फिर भी तुम उस क्षुद्र के पास चले ही गये, जो प्रलयकारी काल और यम के समान है।

श्लोक 13 (3.139.13)

यः स जानन्महातेजा वृद्धस्यैकं ममात्मजम् । गतवानेव कोपस्य वशं परमदुर्मतिः ॥

yaḥ sa jānanmahātejā vṛddhasyaikaṃ mamātmajam | gatavāneva kopasya vaśaṃ paramadurmatiḥ

वह महातेजस्वी पर अत्यन्त दुर्बुद्धि, यह जानते हुए भी कि तुम मुझ वृद्ध के एकमात्र पुत्र हो, क्रोध के वश में हो ही गया।

श्लोक 14 (3.139.14)

पुत्रशोकमनुप्राप्त एष रैभ्यस्य कर्मणा । त्यक्ष्यामि त्वामृते पुत्र प्राणानिष्टतमान्भुवि ॥

putraśokamanuprāpta eṣa raibhyasya karmaṇā | tyakṣyāmi tvāmṛte putra prāṇāniṣṭatamānbhuvi

रैभ्य के इस कर्म से पुत्रशोक को प्राप्त हुआ मैं, हे पुत्र, तुम्हारे बिना संसार में अपने परमप्रिय प्राणों को त्याग दूँगा।

श्लोक 15 (3.139.15)

यथाऽहं पुत्रशोकेन देहं त्यक्ष्यामि किल्विषी । तथा ज्येष्ठः सुतो रैभ्यं हिंस्याच्छीघ्रमनागसम् ॥

yathā'haṃ putraśokena dehaṃ tyakṣyāmi kilviṣī | tathā jyeṣṭhaḥ suto raibhyaṃ hiṃsyācchīghramanāgasam

जैसे मैं पुत्रशोक से पीड़ित होकर देह त्यागूँगा, वैसे ही रैभ्य का ज्येष्ठ पुत्र शीघ्र ही उसे, निरपराध होते हुए भी, मार डाले।

श्लोक 16 (3.139.16)

सुखिनो वै नरा येषां जाया पुत्रो न विद्यते । ये पुत्रशोकमप्राप्य विचरन्ति यथासुखम् ॥

sukhino vai narā yeṣāṃ jāyā putro na vidyate | ye putraśokamaprāpya vicaranti yathāsukham

सुखी तो वे लोग हैं जिनके पत्नी और पुत्र नहीं होते; पुत्रशोक को प्राप्त न होकर वे इच्छानुसार विचरते हैं।

श्लोक 17 (3.139.17)

ये तु पुत्रकृताच्छोकाद्भृशं व्याकुलचेतसः । शपन्तीष्टान्सखीनार्तास्तेभ्यः पापतरो नु कः ॥

ye tu putrakṛtācchokādbhṛśaṃ vyākulacetasaḥ | śapantīṣṭānsakhīnārtāstebhyaḥ pāpataro nu kaḥ

परन्तु जो पुत्र के शोक से अत्यन्त व्याकुलचित्त होकर दुःख में अपने प्रिय मित्रों को भी शाप दे देते हैं, उनसे बढ़कर पापी कौन है?

श्लोक 18 (3.139.18)

परासुश्च सुतो दृष्टः शप्तश्चेष्टः सखा मया । ईदृशीमापदं कोऽत्र द्वितीयोऽनुभविष्यति ॥

parāsuśca suto dṛṣṭaḥ śaptaśceṣṭaḥ sakhā mayā | īdṛśīmāpadaṃ ko'tra dvitīyo'nubhaviṣyati

मैंने अपने पुत्र को मृत देखा है और अपने प्रिय मित्र को शाप दे दिया है। ऐसी विपत्ति यहाँ दूसरा कौन भोगेगा?

लोमश उवाच

श्लोक 19 (3.139.19)

विलप्यैवं बहुविधं भरद्वाजोऽदहत्सुतम् । सुसमिद्धं ततः पश्चात्प्रविवेश हुताशनम् ॥

vilapyaivaṃ bahuvidhaṃ bharadvājo'dahatsutam | susamiddhaṃ tataḥ paścātpraviveśa hutāśanam

लोमश बोले — इस प्रकार अनेक प्रकार से विलाप करके भरद्वाज ने अपने पुत्र का दाह-संस्कार किया और उसके बाद स्वयं प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर गये।

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