आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 140
अर्वावसु द्वारा मृतकों का पुनर्जीवन
राजा बृहद्द्युम्न अपने दीर्घ सत्र के लिए रैभ्य के पुत्रों अर्वावसु और परावसु को सहायक बनाते हैं। रात में चुपके से घर लौटे परावसु काले मृगचर्म ओढ़े अपने पिता रैभ्य को मृग समझकर मार डालते हैं; वे अर्वावसु से अपने लिए प्रायश्चित्त करवाते हैं और फिर उन्हें ही ब्रह्महत्यारा कहकर यज्ञ से निकलवा देते हैं। अर्वावसु वन में सूर्य की उपासना करते हैं; प्रसन्न देवता परावसु को निकाल देते हैं और अर्वावसु के वरदान से रैभ्य, भरद्वाज और यवक्रीत फिर जी उठते हैं। देवता यवक्रीत को समझाते हैं कि बिना गुरु के पाया ज्ञान रैभ्य के ज्ञान की बराबरी नहीं कर सकता, और लोमश युधिष्ठिर को यवक्रीत के आश्रम का माहात्म्य बताते हैं।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.140.1)
एतस्मिन्नेव काले तु बृहद्द्युम्नो महीपतिः । सत्रं तेने महाभागो रैभ्ययाज्यः प्रतापवान् ॥
etasminneva kāle tu bṛhaddyumno mahīpatiḥ | satraṃ tene mahābhāgo raibhyayājyaḥ pratāpavān
लोमश बोले — इसी समय महाभाग और प्रतापी राजा बृहद्द्युम्न ने, जिनके यज्ञ रैभ्य कराते थे, एक सत्र (दीर्घ यज्ञ) आरम्भ किया।
श्लोक 2 (3.140.2)
तेन रैभ्यस्य वै पुत्रावर्वावसुपरावसू । वृतौ सहायौ सत्रार्थं बृहद्द्युम्नेन धीमता ॥
tena raibhyasya vai putrāvarvāvasuparāvasū | vṛtau sahāyau satrārthaṃ bṛhaddyumnena dhīmatā
बुद्धिमान बृहद्द्युम्न ने रैभ्य के दोनों पुत्रों, अर्वावसु और परावसु, को सत्र में सहायक के रूप में वरण किया।
श्लोक 3 (3.140.3)
तत्र तौ समनुज्ञातौ पित्रा कौन्तेय जग्मतुः । आश्रमे त्वभवद्रैभ्यो भार्या चैव परावसोः ॥
tatra tau samanujñātau pitrā kaunteya jagmatuḥ | āśrame tvabhavadraibhyo bhāryā caiva parāvasoḥ
हे कुन्तीपुत्र, पिता की अनुमति लेकर वे दोनों वहाँ चले गये; आश्रम में रैभ्य और परावसु की पत्नी ही रह गये।
श्लोक 4 (3.140.4)
अथावलोककोऽगच्छद्गृहानेकः परावसुः । कृष्णाजिनेन संवीतं ददर्श पितरं वने ॥
athāvalokako'gacchadgṛhānekaḥ parāvasuḥ | kṛṣṇājinena saṃvītaṃ dadarśa pitaraṃ vane
तब परावसु अपने घर (पत्नी) को देखने के लिए अकेले लौटे, और वन में उन्होंने काले मृगचर्म से ढके अपने पिता को देखा।
श्लोक 5 (3.140.5)
जघन्यरात्रे निद्रान्धः सावशेषे तमस्यपि । चरन्तं गहनेऽरण्ये मेने स पितरं मृगम् ॥
jaghanyarātre nidrāndhaḥ sāvaśeṣe tamasyapi | carantaṃ gahane'raṇye mene sa pitaraṃ mṛgam
रात के अन्तिम पहर में, नींद से अन्धे होकर, जब अँधेरा अभी शेष था, उन्होंने घने वन में चलते हुए अपने पिता को मृग समझ लिया।
श्लोक 6 (3.140.6)
मृगं तु मन्यमानेन पिता वै तेन हिंसितः । अकामयानेन तदा शरीरत्राणमिच्छता ॥
mṛgaṃ tu manyamānena pitā vai tena hiṃsitaḥ | akāmayānena tadā śarīratrāṇamicchatā
उन्हें मृग समझकर, अपनी रक्षा करने की इच्छा से, परावसु ने अनजाने में अपने पिता का वध कर दिया।
श्लोक 7 (3.140.7)
तस्य स प्रेतकार्याणि कृत्वा सर्वाणि भारत । पुनरागम्य तत्सत्रमब्रवीद्भ्रातरं वचः ॥
tasya sa pretakāryāṇi kṛtvā sarvāṇi bhārata | punarāgamya tatsatramabravīdbhrātaraṃ vacaḥ
हे भारत, उनकी सारी अन्त्येष्टि क्रियाएँ करके वे फिर उस सत्र में लौटे और अपने भाई से बोले —
परावसुरुवाच
श्लोक 8 (3.140.8)
इदं कर्म न शक्तस्त्वं वोढुमेकः कथंचन । मया च हिंसितस्तातो मन्यमानेन वै मृगम् ॥
idaṃ karma na śaktastvaṃ voḍhumekaḥ kathaṃcana | mayā ca hiṃsitastāto manyamānena vai mṛgam
'तुम अकेले यह कर्म किसी प्रकार नहीं निभा सकते। और मैंने मृग समझकर पिताजी को मार डाला है।
श्लोक 9 (3.140.9)
सोऽस्मदर्थे व्रतं तात चर त्वं ब्रह्मघातिनाम् । समर्थो ह्यहमेकाकी कर्म कर्तुमिदं मुने ॥
so'smadarthe vrataṃ tāta cara tvaṃ brahmaghātinām | samartho hyahamekākī karma kartumidaṃ mune
इसलिए हे तात, मेरे लिए तुम ब्रह्महत्या करने वालों का व्रत (प्रायश्चित्त) करो। हे मुनि, यह यज्ञकर्म मैं अकेला कर सकता हूँ।'
अर्वावसुरुवाच
श्लोक 10 (3.140.10)
करोतु वै भवान्सत्रं बृहद्द्युम्नस्य धीमतः । ब्रह्महत्यां चरिष्येऽहं त्वदर्थं नियतेन्द्रियः ॥
karotu vai bhavānsatraṃ bṛhaddyumnasya dhīmataḥ | brahmahatyāṃ cariṣye'haṃ tvadarthaṃ niyatendriyaḥ
अर्वावसु बोले — आप ही बुद्धिमान बृहद्द्युम्न का सत्र कराइए। मैं इन्द्रियों को वश में रखकर आपके लिए ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करूँगा।
लोमश उवाच
श्लोक 11 (3.140.11)
स तस्या ब्रह्महत्यायाः पारं गत्वा युधिष्ठिर । अर्वावसुस्तदा सत्रमाजगाम पुनर्मुनिः ॥
sa tasyā brahmahatyāyāḥ pāraṃ gatvā yudhiṣṭhira | arvāvasustadā satramājagāma punarmuniḥ
लोमश बोले — हे युधिष्ठिर, उस ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त पूरा करके मुनि अर्वावसु फिर सत्र में आये।
श्लोक 12 (3.140.12)
ततः परावसुर्दृष्ट्वा भ्रातरं समुपस्थितम् । बृहद्द्युम्नमुवाचेदं वचनं हर्षगद्गदम् ॥
tataḥ parāvasurdṛṣṭvā bhrātaraṃ samupasthitam | bṛhaddyumnamuvācedaṃ vacanaṃ harṣagadgadam
भाई को आया देखकर परावसु ने हर्ष से गद्गद वाणी में बृहद्द्युम्न से यह कहा —
परावसुरुवाच
श्लोक 13 (3.140.13)
एष ते ब्रह्महा यज्ञं मा द्रष्टुं प्रविशेदिति । ब्रह्महा प्रेक्षितेनापि पीडयेत्त्वामसंशयम् ॥
eṣa te brahmahā yajñaṃ mā draṣṭuṃ praviśediti | brahmahā prekṣitenāpi pīḍayettvāmasaṃśayam
'यह ब्रह्महत्यारा आपके यज्ञ को देखने के लिए भीतर न आने पाये। ब्रह्महत्यारा तो दृष्टि मात्र से भी आपको हानि पहुँचा सकता है, इसमें कोई संशय नहीं।'
लोमश उवाच
श्लोक 14 (3.140.14)
तच्छ्रुत्वैव तदा राजा प्रेष्यानाह स विट्पते । प्रेष्यैरुत्सार्यमाणस्तु राजन्नर्वावसुस्तदा । न मया ब्रह्महत्येयं कृतेत्याह पुनःपुनः ॥
tacchrutvaiva tadā rājā preṣyānāha sa viṭpate | preṣyairutsāryamāṇastu rājannarvāvasustadā | na mayā brahmahatyeyaṃ kṛtetyāha punaḥpunaḥ
लोमश बोले — हे प्रजापालक, यह सुनते ही राजा ने अपने सेवकों को आज्ञा दी। हे राजन्, जब सेवक अर्वावसु को बाहर निकालने लगे, तब वे बार-बार कहने लगे — 'यह ब्रह्महत्या मैंने नहीं की।'
श्लोक 15 (3.140.15)
उच्यमानोऽसकृत्प्रेष्यैर्ब्रह्महा इति भारत । नैव स्म प्रतिजानामि ब्रह्महत्यां स्वयंकृताम् । मम भ्रात्रा कृतमिदं मया स परिमोक्षितः ॥
ucyamāno'sakṛtpreṣyairbrahmahā iti bhārata | naiva sma pratijānāmi brahmahatyāṃ svayaṃkṛtām | mama bhrātrā kṛtamidaṃ mayā sa parimokṣitaḥ
हे भारत, सेवकों द्वारा बार-बार 'ब्रह्महत्यारा' कहे जाने पर उन्होंने कहा — 'मैं यह स्वीकार नहीं करता कि ब्रह्महत्या मैंने स्वयं की है। यह मेरे भाई ने किया है, और मैंने उसे इस पाप से मुक्त किया है।'
श्लोक 16 (3.140.16)
स तथा प्रवदन्क्रोधात्तैश्च प्रेष्यैः प्रभाषितः । तूष्णीं जगाम ब्रह्मर्षिर्वनमेव महातपाः ॥
sa tathā pravadankrodhāttaiśca preṣyaiḥ prabhāṣitaḥ | tūṣṇīṃ jagāma brahmarṣirvanameva mahātapāḥ
जब वे ऐसा कह रहे थे, तब सेवकों ने क्रोधपूर्वक उन्हें फटकारा; और वे महातपस्वी ब्रह्मर्षि चुपचाप वन को चले गये।
श्लोक 17 (3.140.17)
उग्रं तपः समास्थाय दिवाकरमथाश्रितः । रहस्यवेदं कृतवान्सूर्यस्य द्विजसत्तमः ॥
ugraṃ tapaḥ samāsthāya divākaramathāśritaḥ | rahasyavedaṃ kṛtavānsūryasya dvijasattamaḥ
वहाँ उग्र तप करते हुए उन द्विजश्रेष्ठ ने सूर्यदेव का आश्रय लिया और सूर्य के रहस्य-वेद (गुप्त मन्त्र-विधि) का अनुष्ठान किया।
श्लोक 18 (3.140.18)
मूर्तिमांस्तं ददर्शाथ स्वयमग्रभुगव्ययः ॥
mūrtimāṃstaṃ dadarśātha svayamagrabhugavyayaḥ
तब यज्ञ-भाग के प्रथम भोक्ता अविनाशी देव ने स्वयं साकार रूप में उन्हें दर्शन दिये।
श्लोक 19 (3.140.19)
प्रीतास्तस्याभवन्देवाः कर्मणाऽर्वावसोर्नृप । तं ते प्रवरयामासुर्निरासुश्च परावसुम् ॥
prītāstasyābhavandevāḥ karmaṇā'rvāvasornṛpa | taṃ te pravarayāmāsurnirāsuśca parāvasum
हे राजन्, अर्वावसु के इस कर्म से देवता प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें (यज्ञ में) प्रधान रूप से वरण किया और परावसु को बाहर कर दिया।
श्लोक 20 (3.140.20)
ततो देवा वरं तस्मै ददुरग्निपुरोगमाः ॥
tato devā varaṃ tasmai daduragnipurogamāḥ
तब अग्नि आदि देवताओं ने उन्हें वर दिया।
श्लोक 21 (3.140.21)
स चापि वरयामास पितुरुत्थानमात्मनः । अनागस्त्वं ततो भ्रातुः पितुश्चास्मरणं वधे ॥
sa cāpi varayāmāsa piturutthānamātmanaḥ | anāgastvaṃ tato bhrātuḥ pituścāsmaraṇaṃ vadhe
उन्होंने यह वर माँगा कि उनके पिता जी उठें, उनके भाई निष्पाप हो जाएँ और पिता को अपने वध का स्मरण न रहे;
श्लोक 22 (3.140.22)
भरद्वाजस्य चोत्थानं यवक्रीतस्य चोभयोः । प्रतिष्ठां चापि वेदस्य सौरस्य द्विजसत्तमः ॥
bharadvājasya cotthānaṃ yavakrītasya cobhayoḥ | pratiṣṭhāṃ cāpi vedasya saurasya dvijasattamaḥ
और यह भी कि भरद्वाज और यवक्रीत दोनों जीवित हो उठें, तथा सूर्य-सम्बन्धी वेद की प्रतिष्ठा हो — यह उन द्विजश्रेष्ठ ने माँगा।
श्लोक 23 (3.140.23)
एवमस्त्विति तं देवाः प्रोचुश्चापि वरान्ददुः । ततः प्रादुर्बभूवुस्ते सर्व एव युधिष्ठिर ॥
evamastviti taṃ devāḥ procuścāpi varāndaduḥ | tataḥ prādurbabhūvuste sarva eva yudhiṣṭhira
देवताओं ने उनसे कहा — 'ऐसा ही हो', और वर दे दिये। तब हे युधिष्ठिर, वे सब फिर जीवित होकर प्रकट हो गये।
श्लोक 24 (3.140.24)
अथाब्रवीद्यवक्रीतो देवानग्निपुरोगमान् । समधीतं मया ब्रह्म व्रतानि चरितानि च ॥
athābravīdyavakrīto devānagnipurogamān | samadhītaṃ mayā brahma vratāni caritāni ca
तब यवक्रीत ने अग्नि आदि देवताओं से कहा — 'मैंने वेद का भली-भाँति अध्ययन किया है और व्रतों का पालन किया है।
यवक्रीत उवाच
श्लोक 25 (3.140.25)
कथं च रैभ्यः शक्तो मामधीयानं तपस्विनम् । तथायुक्तेन विधिना निहन्तुममरोत्तमाः ॥
kathaṃ ca raibhyaḥ śakto māmadhīyānaṃ tapasvinam | tathāyuktena vidhinā nihantumamarottamāḥ
तो फिर हे श्रेष्ठ देवताओ, रैभ्य मुझ जैसे वेदाध्यायी तपस्वी को इस विधि से मारने में कैसे समर्थ हुए?'
देवा ऊचुः
श्लोक 26 (3.140.26)
मैवं कृथा यवक्रीत यथा वदसि वै मुने । ऋते गुरुमधीता हि स्वयं वेदास्त्वया पुरा ॥
maivaṃ kṛthā yavakrīta yathā vadasi vai mune | ṛte gurumadhītā hi svayaṃ vedāstvayā purā
देवता बोले — हे मुनि यवक्रीत, जैसा तुम कह रहे हो वैसा मत सोचो। तुमने पहले बिना गुरु के, अपने आप ही वेदों को पढ़ लिया था।
श्लोक 27 (3.140.27)
अनेन तु गुरून्दुःखात्तोषयित्वाऽऽत्मकर्मणा । कालेन महता क्लेशाद्ब्रह्माधिगतमुत्तमम् ॥
anena tu gurūnduḥkhāttoṣayitvā''tmakarmaṇā | kālena mahatā kleśādbrahmādhigatamuttamam
किन्तु इन्होंने (रैभ्य ने) अपने परिश्रम से कष्ट सहकर गुरुओं को प्रसन्न किया और दीर्घकाल तक क्लेश उठाकर उत्तम वेदज्ञान प्राप्त किया।
लोमश उवाच
श्लोक 28 (3.140.28)
यवक्रीतमथोक्त्वैवं देवाः साग्निपुरोगमाः । संजीवयित्वा तान्सर्वान्पुनर्जग्मुस्त्रिविष्टपम् ॥
yavakrītamathoktvaivaṃ devāḥ sāgnipurogamāḥ | saṃjīvayitvā tānsarvānpunarjagmustriviṣṭapam
लोमश बोले — यवक्रीत से ऐसा कहकर और उन सबको जीवित करके अग्नि आदि देवता फिर स्वर्ग लौट गये।
श्लोक 29 (3.140.29)
ततो वै स यवक्रीतो ब्रह्मचर्यं चचार ह । अष्टादश च वर्षाणि त्रिंशतं च युधिष्ठिर ॥
tato vai sa yavakrīto brahmacaryaṃ cacāra ha | aṣṭādaśa ca varṣāṇi triṃśataṃ ca yudhiṣṭhira
तत्पश्चात् हे युधिष्ठिर, यवक्रीत ने अठारह और फिर तीस वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन किया।
श्लोक 30 (3.140.30)
आश्रमस्तस्य पुण्योऽयं सदापुष्पफलद्रुमः । अत्रोष्य राजशार्दूल सर्वपापैः प्रमोक्ष्यसे ॥
āśramastasya puṇyo'yaṃ sadāpuṣpaphaladrumaḥ | atroṣya rājaśārdūla sarvapāpaiḥ pramokṣyase
यह उन्हीं का पवित्र आश्रम है, जिसके वृक्ष सदा फूलों और फलों से लदे रहते हैं। हे राजसिंह, यहाँ निवास करके तुम सब पापों से मुक्त हो जाओगे।