आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 141
कैलास के मार्ग पर लोमश की चेतावनी और आशीर्वाद
लोमश युधिष्ठिर को बताते हैं कि वे उशीरबीज, मैनाक, श्वेत पर्वत और कालशैल पार कर उस स्थान पर आ पहुँचे हैं जहाँ गंगा सात धाराओं में बहती है। वे कैलास के मार्ग में कुबेर और माणिभद्र की सेवा करने वाले गन्धर्वों, किम्पुरुषों, यक्षों और राक्षसों का वर्णन करते हैं, पाण्डवों को संयमी और सावधान रहने को कहते हैं, और देवताओं, नदियों तथा देवी गंगा से राजा की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। ऋषि की असामान्य चिन्ता देखकर युधिष्ठिर भाइयों से द्रौपदी की रक्षा करने को कहते हैं, भीम को उसकी सुरक्षा सौंपते हैं और नकुल-सहदेव को गले लगाकर धीरज बँधाते हैं।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.141.1)
उशीरबीजं मैनाकं गिरिं श्वेतं च भारत । समतीतोऽसि कौन्तेय कालशैलं च पार्थिव ॥
uśīrabījaṃ mainākaṃ giriṃ śvetaṃ ca bhārata | samatīto'si kaunteya kālaśailaṃ ca pārthiva
लोमश बोले — हे भारत, हे कुन्तीपुत्र राजन्, तुम उशीरबीज, मैनाक, श्वेत पर्वत और कालशैल को भी पार कर आये हो।
श्लोक 2 (3.141.2)
एषा गङ्गा सप्तविधा राजते भरतर्षभ । स्थानं विरजसं पुण्यं यत्राग्निर्नित्यमिध्यते ॥
eṣā gaṅgā saptavidhā rājate bharatarṣabha | sthānaṃ virajasaṃ puṇyaṃ yatrāgnirnityamidhyate
हे भरतश्रेष्ठ, यहाँ गंगा सात धाराओं में शोभा पाती है। यह वह निर्मल, पवित्र स्थान है जहाँ अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है।
श्लोक 3 (3.141.3)
एतद्वै मानुषेणाद्य न शक्यं द्रष्टुमद्भुतम् । समाधिं कुरुताव्यग्रास्तीर्थान्येतानि द्रक्ष्यथ ॥
etadvai mānuṣeṇādya na śakyaṃ draṣṭumadbhutam | samādhiṃ kurutāvyagrāstīrthānyetāni drakṣyatha
आज कोई मनुष्य इस अद्भुत दृश्य को नहीं देख सकता। तुम सब एकाग्र होकर चित्त को समाहित करो, तब इन तीर्थों के दर्शन करोगे।
श्लोक 4 (3.141.4)
एतद्द्रक्ष्यसि देवानामाक्रीडं चरणाङ्कितम् । अतिक्रान्तोऽसि कौन्तेय कालशैलं च पर्वतम् ॥
etaddrakṣyasi devānāmākrīḍaṃ caraṇāṅkitam | atikrānto'si kaunteya kālaśailaṃ ca parvatam
यहाँ तुम देवताओं की क्रीडाभूमि देखोगे, जो उनके चरणचिह्नों से अंकित है। हे कुन्तीपुत्र, तुम कालशैल पर्वत को पार कर चुके हो।
श्लोक 5 (3.141.5)
श्वेतं गिरिं प्रवेक्ष्यामो मन्दरं चैव पर्वतम् । यत्र माणिवरो यक्षः कुबेरश्चैव यक्षराट् ॥
śvetaṃ giriṃ pravekṣyāmo mandaraṃ caiva parvatam | yatra māṇivaro yakṣaḥ kuberaścaiva yakṣarāṭ
अब हम श्वेत पर्वत और मन्दर पर्वत में प्रवेश करेंगे, जहाँ यक्ष माणिवर और यक्षराज कुबेर रहते हैं।
श्लोक 6 (3.141.6)
अष्टाशीतिसहस्राणि गन्धर्वाः शीघ्रगामिनः । तथा किंपुरुषा राजन्यक्षाश्चैव चतुर्गुणाः ॥
aṣṭāśītisahasrāṇi gandharvāḥ śīghragāminaḥ | tathā kiṃpuruṣā rājanyakṣāścaiva caturguṇāḥ
हे राजन्, वहाँ अठासी हजार शीघ्रगामी गन्धर्व हैं, और उनसे चौगुने किम्पुरुष तथा यक्ष हैं,
श्लोक 7 (3.141.7)
अनेकरूपसंस्थाना नानाप्रहरणाश्च ते । यक्षेन्द्रं मनुजश्रेष्ठ माणिभद्रमुपासते ॥
anekarūpasaṃsthānā nānāpraharaṇāśca te | yakṣendraṃ manujaśreṣṭha māṇibhadramupāsate
जो अनेक रूप-आकार वाले और भाँति-भाँति के शस्त्र धारण करने वाले हैं; हे नरश्रेष्ठ, वे यक्षेन्द्र माणिभद्र की सेवा करते हैं।
श्लोक 8 (3.141.8)
तेषामृद्धिरतीवात्र गतौ वायुसमाश्च ते । स्थानात्प्रच्यावयेयुर्ये देवराजमपि ध्रुवम् ॥
teṣāmṛddhiratīvātra gatau vāyusamāśca te | sthānātpracyāvayeyurye devarājamapi dhruvam
यहाँ उनकी शक्ति अत्यन्त महान है और गति में वे वायु के समान हैं; वे निश्चय ही देवराज इन्द्र को भी उनके स्थान से हटा सकते हैं।
श्लोक 9 (3.141.9)
तैस्तात बलिभिर्गुप्ता यातुधानैश्च रक्षिताः । दुर्गमाः पर्वताः पार्थ समाधिं परमं कुरु ॥
taistāta balibhirguptā yātudhānaiśca rakṣitāḥ | durgamāḥ parvatāḥ pārtha samādhiṃ paramaṃ kuru
हे तात, उन बलवानों द्वारा सुरक्षित और यातुधानों द्वारा रक्षित ये पर्वत दुर्गम हैं; हे पार्थ, पूर्ण एकाग्रता रखो।
श्लोक 10 (3.141.10)
कुबेरसचिवाश्चान्ये रौद्रा मैत्राश्च राक्षसाः । तैः समेष्याम कौन्तेय यत्तो विक्रमणे भव ॥
kuberasacivāścānye raudrā maitrāśca rākṣasāḥ | taiḥ sameṣyāma kaunteya yatto vikramaṇe bhava
कुबेर के अन्य मन्त्री भी हैं — कुछ उग्र और कुछ मैत्रीपूर्ण राक्षस। हे कुन्तीपुत्र, उनसे हमारा सामना होगा; पराक्रम के लिए सावधान रहो।
श्लोक 11 (3.141.11)
कैलासः पर्वतो राजन्षड्योजनशतोच्छ्रितः । यत्र देवाः समायान्ति विशाला यत्र भारत ॥
kailāsaḥ parvato rājanṣaḍyojanaśatocchritaḥ | yatra devāḥ samāyānti viśālā yatra bhārata
हे राजन्, कैलास पर्वत छह सौ योजन ऊँचा है; वहाँ देवता आते हैं, और हे भारत, वहीं विशाला (बदरी) भी है।
श्लोक 12 (3.141.12)
असङ्ख्येयास्तु कौन्तेय यक्षराक्षसकिन्नराः । नागाः सुपर्णा गन्धर्वाः कुबेरसदनं प्रति ॥
asaṅkhyeyāstu kaunteya yakṣarākṣasakinnarāḥ | nāgāḥ suparṇā gandharvāḥ kuberasadanaṃ prati
हे कुन्तीपुत्र, असंख्य यक्ष, राक्षस, किन्नर, नाग, सुपर्ण और गन्धर्व कुबेर के भवन की ओर आते-जाते हैं।
श्लोक 13 (3.141.13)
तान्विगाहस्व पार्थाद्य तपसा च दमेन च । रक्ष्यमाणो मया राजन्भीमसेनबलेन च ॥
tānvigāhasva pārthādya tapasā ca damena ca | rakṣyamāṇo mayā rājanbhīmasenabalena ca
हे पार्थ, आज तुम तप और इन्द्रिय-संयम के बल पर, मेरे द्वारा और भीमसेन के बल द्वारा रक्षित होकर, उनके बीच से आगे बढ़ो।
श्लोक 14 (3.141.14)
स्वस्ति ते वरुणो राजा यमश्च समितिंजयः । गङ्गा च यमुना चैव पर्वताश्च दिशन्तु ते ॥
svasti te varuṇo rājā yamaśca samitiṃjayaḥ | gaṅgā ca yamunā caiva parvatāśca diśantu te
राजा वरुण, युद्धविजयी यम, गंगा, यमुना और पर्वत तुम्हारा कल्याण करें।
श्लोक 15 (3.141.15)
मरुतश्च सहाश्विभ्यां सरितश्च सरांसि च । स्वस्ति देवासुरेभ्यश्च वसुभ्यश्च महाद्युते ॥
marutaśca sahāśvibhyāṃ saritaśca sarāṃsi ca | svasti devāsurebhyaśca vasubhyaśca mahādyute
मरुद्गण दोनों अश्विनीकुमारों के साथ, नदियाँ और सरोवर तुम्हारा मंगल करें; हे महातेजस्वी, देवताओं, असुरों और वसुओं से भी तुम्हें कल्याण प्राप्त हो।
श्लोक 16 (3.141.16)
इन्द्रस्य जाम्बूनदपर्वताद्वै । शृणोमि घोषं तव देवि गङ्गे । गोपाययेमं सुभगे गिरिभ्यः । सर्वाजमीढापचितं नरेन्द्रम् ॥
indrasya jāmbūnadaparvatādvai | śṛṇomi ghoṣaṃ tava devi gaṅge | gopāyayemaṃ subhage giribhyaḥ | sarvājamīḍhāpacitaṃ narendram
हे देवि गंगे, इन्द्र के सुवर्णमय पर्वत से मैं तुम्हारा घोष सुन रहा हूँ। हे सुभगे, समस्त अजमीढवंशियों द्वारा सम्मानित इस नरेश की इन पर्वतों से रक्षा करो।
श्लोक 17 (3.141.17)
ददस्व शर्म प्रविविक्षतोऽस्य । शैलानिमाञ्छैलसुते नृपस्य । शिवप्रदा सर्वसरित्प्रधाने । सभ्रातृकस्येह युधिष्ठिरस्य ॥
dadasva śarma pravivikṣato'sya | śailānimāñchailasute nṛpasya | śivapradā sarvasaritpradhāne | sabhrātṛkasyeha yudhiṣṭhirasya
हे शैलसुते, इन पर्वतों में प्रवेश करने जा रहे इस राजा को आश्रय दो; हे सब नदियों में श्रेष्ठ, भाइयों सहित यहाँ आये इस युधिष्ठिर के लिए मंगलदायिनी बनो।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 18 (3.141.18)
अपूर्वोऽयं संभ्रमो लोमशस्य । कृष्णां च सर्वे रक्षत मा प्रमादः । देशो ह्ययं दुर्गतमो मतोऽस्य । तस्मात्परं शौचमिहाचरध्वम् ॥
apūrvo'yaṃ saṃbhramo lomaśasya | kṛṣṇāṃ ca sarve rakṣata mā pramādaḥ | deśo hyayaṃ durgatamo mato'sya | tasmātparaṃ śaucamihācaradhvam
युधिष्ठिर बोले — लोमश जी की यह घबराहट अभूतपूर्व है। तुम सब कृष्णा की रक्षा करो, कोई असावधानी न हो। वे इस प्रदेश को अत्यन्त दुर्गम मानते हैं; इसलिए यहाँ परम पवित्रता का आचरण करो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (3.141.19)
ततोऽब्रवीद्भीममुदारवीर्यं । कृष्णां यत्तः पालय भीमसेन । शून्येऽर्जुनेऽसन्निहिते च तात । त्वामेव कृष्णा भजते भयेषु ॥
tato'bravīdbhīmamudāravīryaṃ | kṛṣṇāṃ yattaḥ pālaya bhīmasena | śūnye'rjune'sannihite ca tāta | tvāmeva kṛṣṇā bhajate bhayeṣu
वैशम्पायन बोले — तब उन्होंने महापराक्रमी भीम से कहा — 'भीमसेन, सावधान रहकर कृष्णा की रक्षा करो। तात, अर्जुन के यहाँ न होने पर भय के समय कृष्णा तुम्हारा ही आश्रय लेती है।'
श्लोक 20 (3.141.20)
ततो महात्मा स यमौ समेत्य । मूर्धन्युपाघ्राय विमृज्य गात्रे । उवाच तौ बाष्पकलं स राजा । मा भैष्टमागच्छतमप्रमत्तौ ॥
tato mahātmā sa yamau sametya | mūrdhanyupāghrāya vimṛjya gātre | uvāca tau bāṣpakalaṃ sa rājā | mā bhaiṣṭamāgacchatamapramattau
फिर उस महात्मा राजा ने दोनों जुड़वाँ भाइयों के पास जाकर उनका सिर सूँघा, उनके अंगों को सहलाया और आँसुओं से रुँधे कण्ठ से उनसे कहा — 'डरो मत; सावधान होकर आगे बढ़ो।'