Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 143

अर्जुन के दर्शन के लिए युधिष्ठिर की व्याकुलता

युधिष्ठिर भीम, नकुल-सहदेव और द्रौपदी से कहते हैं कि पाँच वर्षों से अर्जुन को न देख पाने के कारण वे शोक से जल रहे हैं। वे अर्जुन की विस्तार से प्रशंसा करते हैं — उसकी अस्त्र-कुशलता, शरणागत पर उसकी दया, परिवार के लिए जीते हुए रत्न और रत्नमयी सभा, तथा श्रीकृष्ण, बलराम और इन्द्र से उसकी समानता। फिर वे निश्चय करते हैं कि सब लोग शस्त्र लेकर, संयम और मिताहार के साथ, पैदल ही गन्धमादन पर्वत में प्रवेश करेंगे — बदरी, नर-नारायण के आश्रम और कुबेर के कमल-सरोवर तक — ताकि अर्जुन से मिल सकें।

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (3.143.1)

भीमसेनयमौ चोभौ पाञ्चालि च निबोधत । नास्ति भूतस्य नाशो वै पश्यतास्मान्वनेचरान् ॥

bhīmasenayamau cobhau pāñcāli ca nibodhata | nāsti bhūtasya nāśo vai paśyatāsmānvanecarān

युधिष्ठिर बोले — भीमसेन, तुम दोनों माद्रीपुत्र और पाञ्चाली, सुनो। पहले किए हुए कर्म का कभी नाश नहीं होता; हमें देखो, हम वन-वन भटक रहे हैं।

श्लोक 2 (3.143.2)

दुर्बलाः क्लेशिताः स्मेति यद्ब्रुवामेतरेतरम् । अशक्येऽपि व्रजामो यद्धनंजयदिदृक्षया ॥

durbalāḥ kleśitāḥ smeti yadbruvāmetaretaram | aśakye'pi vrajāmo yaddhanaṃjayadidṛkṣayā

हम एक-दूसरे से कहते हैं कि हम दुर्बल और क्लेश से थके हुए हैं, फिर भी धनंजय को देखने की लालसा में असम्भव-से मार्गों पर भी चलते जा रहे हैं।

श्लोक 3 (3.143.3)

तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानलः । यच्च वीरं न पश्यामि धनंजयमुपान्तिके ॥

tanme dahati gātrāṇi tūlarāśimivānalaḥ | yacca vīraṃ na paśyāmi dhanaṃjayamupāntike

जैसे आग रुई के ढेर को जला डालती है, वैसे ही यह बात मेरे अंगों को जला रही है कि वीर धनंजय मुझे अपने पास दिखायी नहीं देता।

श्लोक 4 (3.143.4)

तस्यादर्शनतप्तं मां सानुजं वनमास्थितम् । याज्ञसेन्याः परामर्शः स च वीर दहत्युत ॥

tasyādarśanataptaṃ māṃ sānujaṃ vanamāsthitam | yājñasenyāḥ parāmarśaḥ sa ca vīra dahatyuta

भाइयों के साथ वन में रहते हुए मैं उसे न देख पाने से संतप्त हूँ, और हे वीर, याज्ञसेनी के केश पकड़े जाने की वह घटना भी मुझे जलाती रहती है।

श्लोक 5 (3.143.5)

नकुलात्पूर्वजं पार्थं न पश्याम्यमितौजसम् । अजेयमुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ॥

nakulātpūrvajaṃ pārthaṃ na paśyāmyamitaujasam | ajeyamugradhanvānaṃ tena tapye vṛkodara

नकुल के बड़े भाई, अपार तेजस्वी, अजेय और प्रचण्ड धनुष वाले पार्थ को मैं नहीं देख पाता; इसी से, वृकोदर, मैं संतप्त हूँ।

श्लोक 6 (3.143.6)

तीर्थानि चैव रम्याणि वनानि च सरांसि च । चरामि सह युष्माभिस्तस्य दर्शनकाङ्क्षया ॥

tīrthāni caiva ramyāṇi vanāni ca sarāṃsi ca | carāmi saha yuṣmābhistasya darśanakāṅkṣayā

उसके दर्शन की इच्छा से ही मैं तुम लोगों के साथ रमणीय तीर्थों, वनों और सरोवरों में घूम रहा हूँ।

श्लोक 7 (3.143.7)

पञ्चवर्षाण्यहं वीरं सत्यसन्धं धनंजयम् । यन्न पश्यामि बीभत्सुं तेन तप्ये वृकोदर ॥

pañcavarṣāṇyahaṃ vīraṃ satyasandhaṃ dhanaṃjayam | yanna paśyāmi bībhatsuṃ tena tapye vṛkodara

पाँच वर्षों से मैंने सत्यप्रतिज्ञ वीर धनंजय बीभत्सु को नहीं देखा; इसी से, वृकोदर, मैं संतप्त हूँ।

श्लोक 8 (3.143.8)

तं वै श्यामं गुडाकेशं सिंहविक्रान्तगामिनम् । न पश्यामि महाबाहुं तेन तप्ये वृकोदर ॥

taṃ vai śyāmaṃ guḍākeśaṃ siṃhavikrāntagāminam | na paśyāmi mahābāhuṃ tena tapye vṛkodara

सिंह के समान पराक्रम से चलने वाले उस श्यामवर्ण, महाबाहु गुडाकेश को मैं नहीं देख पाता; इसी से, वृकोदर, मैं संतप्त हूँ।

श्लोक 9 (3.143.9)

कृतास्त्रं निपुणं युद्धेऽप्रतिमानं धनुष्मताम् । न पश्यामि कुरुश्रेष्ठ तेन तप्ये वृकोदर ॥

kṛtāstraṃ nipuṇaṃ yuddhe'pratimānaṃ dhanuṣmatām | na paśyāmi kuruśreṣṭha tena tapye vṛkodara

अस्त्रविद्या में पारंगत, युद्ध में निपुण, धनुर्धरों में अनुपम उस अर्जुन को, हे कुरुश्रेष्ठ, मैं नहीं देख पाता; इसी से, वृकोदर, मैं संतप्त हूँ।

श्लोक 10 (3.143.10)

चरन्तमरिसङ्घेषु क्रुद्धं कालमिवानघ । प्रभिन्नमिव मातङ्गं सिंहस्कन्धं धनंजयम् ॥

carantamarisaṅgheṣu kruddhaṃ kālamivānagha | prabhinnamiva mātaṅgaṃ siṃhaskandhaṃ dhanaṃjayam

हे निष्पाप, जो धनंजय शत्रुओं के झुंडों में क्रुद्ध काल की तरह, मदमत्त हाथी की तरह विचरता है, जिसके कंधे सिंह जैसे हैं;

श्लोक 11 (3.143.11)

यः स शक्रादनवरो वीर्येण च बलेन च । यमयोः पूर्वजः पार्थः श्वेताश्वोऽमितविक्रमः ॥

yaḥ sa śakrādanavaro vīryeṇa ca balena ca | yamayoḥ pūrvajaḥ pārthaḥ śvetāśvo'mitavikramaḥ

जो वीरता और बल में इन्द्र से कम नहीं, जो नकुल-सहदेव का बड़ा भाई है, श्वेत घोड़ों वाला, अपार पराक्रमी पार्थ;

श्लोक 12 (3.143.12)

नारायणसमो युद्धे सत्यसन्धो दृढव्रतः । तं ममापश्यतो भीम न शान्तिर्हृदयस्य वै ॥

nārāyaṇasamo yuddhe satyasandho dṛḍhavrataḥ | taṃ mamāpaśyato bhīma na śāntirhṛdayasya vai

जो युद्ध में नारायण के समान, सत्यप्रतिज्ञ और दृढ़व्रती है — उसे न देखने से, भीम, मेरे हृदय को शान्ति नहीं मिलती।

श्लोक 13 (3.143.13)

दुःखेन महताऽऽविष्टश्चिन्तयामि दिवानिशम् । अजेयमुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ॥

duḥkhena mahatā''viṣṭaścintayāmi divāniśam | ajeyamugradhanvānaṃ tena tapye vṛkodara

महान दुःख से घिरा मैं दिन-रात उसी अजेय, प्रचण्ड धनुर्धारी का चिन्तन करता रहता हूँ; इसी से, वृकोदर, मैं संतप्त हूँ।

श्लोक 14 (3.143.14)

सततं यः क्षमाशीलः क्षिप्यमाणोऽप्यणीयसा । ऋजुमार्गप्रपन्नस्य शर्मदाताऽभयस्य च ॥

satataṃ yaḥ kṣamāśīlaḥ kṣipyamāṇo'pyaṇīyasā | ṛjumārgaprapannasya śarmadātā'bhayasya ca

वह सदा क्षमाशील है, तुच्छ से तुच्छ व्यक्ति के अपमान करने पर भी; और सरल मार्ग पर चलने वाले को वह शरण और अभय देता है;

श्लोक 15 (3.143.15)

स तु जिह्मप्रवृत्तस्य माययाऽभिजिघांसतः । अपि वज्रधरस्यापि भवेत्कालविषोपमः ॥

sa tu jihmapravṛttasya māyayā'bhijighāṃsataḥ | api vajradharasyāpi bhavetkālaviṣopamaḥ

परन्तु जो कुटिल आचरण करे और छल से उसे मारना चाहे, उसके लिए — चाहे वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो — वह कालकूट विष के समान है।

श्लोक 16 (3.143.16)

शत्रोरपि प्रपन्नस्य सोऽनृशंसः प्रतापवान् । दाताऽभयस्य बीभत्सुरमितात्मा महाबलः ॥

śatrorapi prapannasya so'nṛśaṃsaḥ pratāpavān | dātā'bhayasya bībhatsuramitātmā mahābalaḥ

शरण में आए शत्रु पर भी वह प्रतापी दया करता है; उदारचित्त, महाबली बीभत्सु उसे अभय देता है।

श्लोक 17 (3.143.17)

सर्वेषामाश्रयोऽस्माकं रणेऽरीणां प्रमर्दिता । आहर्ता सर्वरत्नानां सर्वेषां नः सुखावहः ॥

sarveṣāmāśrayo'smākaṃ raṇe'rīṇāṃ pramarditā | āhartā sarvaratnānāṃ sarveṣāṃ naḥ sukhāvahaḥ

वह हम सबका आश्रय है, युद्ध में शत्रुओं को कुचलने वाला, सब प्रकार के रत्न लाने वाला और हम सबको सुख देने वाला।

श्लोक 18 (3.143.18)

रत्नानि यस्य वीर्येण दिव्यान्यासत्पुरा मम । बहूनि बहुजातीनि यानि प्राप्तः सुयोधनः ॥

ratnāni yasya vīryeṇa divyānyāsatpurā mama | bahūni bahujātīni yāni prāptaḥ suyodhanaḥ

उसी के पराक्रम से कभी मेरे पास अनेक प्रकार के बहुत-से दिव्य रत्न थे, जिन्हें अब सुयोधन ने पा लिया है।

श्लोक 19 (3.143.19)

यस्य बाहुबलाद्वीर सभा चासीत्पुरा मम । सर्वरत्नमयी ख्याता त्रिषु लोकेषु पाण्डव ॥

yasya bāhubalādvīra sabhā cāsītpurā mama | sarvaratnamayī khyātā triṣu lokeṣu pāṇḍava

हे वीर पाण्डुनन्दन, उसी के बाहुबल से कभी मेरे पास सब रत्नों से बनी वह सभा थी, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी।

श्लोक 20 (3.143.20)

वासुदेवसमं वीर्ये कार्तवीर्यसमं युधि । अजेयममितं युद्धे तं न पश्यामि फल्गुनम् ॥

vāsudevasamaṃ vīrye kārtavīryasamaṃ yudhi | ajeyamamitaṃ yuddhe taṃ na paśyāmi phalgunam

वीरता में वासुदेव के समान, युद्ध में कार्तवीर्य के समान, संग्राम में अजेय और अतुलनीय — उस फाल्गुन को मैं नहीं देख पाता।

श्लोक 21 (3.143.21)

संकर्षणं महावीर्यं त्वां च भीमापराजितम् । अनुयातः स्ववीर्येण वासुदेवं च शत्रुहा ॥

saṃkarṣaṇaṃ mahāvīryaṃ tvāṃ ca bhīmāparājitam | anuyātaḥ svavīryeṇa vāsudevaṃ ca śatruhā

वह शत्रुनाशक अपने पराक्रम से महाबली संकर्षण की, हे अपराजित भीम, तुम्हारी और वासुदेव की बराबरी करता है।

श्लोक 22 (3.143.22)

यस्य बाहुबले तुल्यः प्रभावे च पुरंदरः । जवे वायुर्मुखे सोमः क्रोधे मृत्युः सनातनः ॥

yasya bāhubale tulyaḥ prabhāve ca puraṃdaraḥ | jave vāyurmukhe somaḥ krodhe mṛtyuḥ sanātanaḥ

बाहुबल और प्रभाव में इन्द्र ही उसके समान है; वेग में वह वायु है, मुख में चन्द्रमा, और क्रोध में सनातन मृत्यु।

श्लोक 23 (3.143.23)

ते वयं तं नरव्याघ्रं सर्वे वीर दिदृक्षवः । प्रवेक्ष्यामो महाबाहो पर्वतं गन्धमादनम् ॥

te vayaṃ taṃ naravyāghraṃ sarve vīra didṛkṣavaḥ | pravekṣyāmo mahābāho parvataṃ gandhamādanam

हे वीर महाबाहु, उस नरश्रेष्ठ को देखने की इच्छा से हम सब गन्धमादन पर्वत में प्रवेश करेंगे,

श्लोक 24 (3.143.24)

विशाला बदरी यत्र नरनारायणाश्रमः । तं सदाऽध्युषितं यक्षैर्द्रक्ष्यामो गिरिमुत्तमम् ॥

viśālā badarī yatra naranārāyaṇāśramaḥ | taṃ sadā'dhyuṣitaṃ yakṣairdrakṣyāmo girimuttamam

जहाँ विशाला बदरी और नर-नारायण का आश्रम है। यक्षों से सदा बसे उस श्रेष्ठ पर्वत को हम देखेंगे।

श्लोक 25 (3.143.25)

कुबेरनलिनीं रम्यां राक्षसैरभिसेविताम् । पद्भिरेव गमिष्यामस्तप्यमाना महत्तपः ॥

kuberanalinīṃ ramyāṃ rākṣasairabhisevitām | padbhireva gamiṣyāmastapyamānā mahattapaḥ

महान तप करते हुए हम पैदल ही कुबेर के उस रमणीय कमल-सरोवर तक जाएँगे, जहाँ राक्षस आते-जाते रहते हैं।

श्लोक 26 (3.143.26)

नातप्ततपसा शक्यो गन्तुं देशो वृकोदर । न नृशंसेन लुब्धेन नाप्रशान्तेन भारत ॥

nātaptatapasā śakyo gantuṃ deśo vṛkodara | na nṛśaṃsena lubdhena nāpraśāntena bhārata

वृकोदर, जिसने तप नहीं किया, वह उस प्रदेश तक नहीं पहुँच सकता; और हे भारत, न कोई क्रूर, लोभी या अशान्त व्यक्ति ही वहाँ जा सकता है।

श्लोक 27 (3.143.27)

तत्र सर्वे गमिष्यामो भीमार्जुनपदैषिणः । सायुधा बद्धनिस्त्रिंशाः सार्धं विप्रैर्महाव्रतैः ॥

tatra sarve gamiṣyāmo bhīmārjunapadaiṣiṇaḥ | sāyudhā baddhanistriṃśāḥ sārdhaṃ viprairmahāvrataiḥ

भीम, अर्जुन के पदचिह्नों को खोजते हुए हम सब वहाँ जाएँगे — शस्त्र लिये, तलवारें बाँधे, महान व्रतधारी ब्राह्मणों के साथ।

श्लोक 28 (3.143.28)

मक्षिकादंशमशकान्सिंहान्व्याघ्रान्सरीसृपान् । प्राप्नोत्यनियतः पार्थ नियतस्तान्न पश्यति ॥

makṣikādaṃśamaśakānsiṃhānvyāghrānsarīsṛpān | prāpnotyaniyataḥ pārtha niyatastānna paśyati

पार्थ, जो संयमी नहीं है उसे मक्खियाँ, डाँस, मच्छर, सिंह, बाघ और सर्प मिलते हैं; संयमी व्यक्ति उन्हें देखता तक नहीं।

श्लोक 29 (3.143.29)

ते वयं नियतात्मानः पर्वतं गन्धमादनम् । प्रवेक्ष्यामो मिताहारा धनंजयदिदृक्षवः ॥

te vayaṃ niyatātmānaḥ parvataṃ gandhamādanam | pravekṣyāmo mitāhārā dhanaṃjayadidṛkṣavaḥ

इसलिए हम संयतचित्त होकर, थोड़ा-सा आहार लेते हुए, धनंजय के दर्शन की इच्छा से गन्धमादन पर्वत में प्रवेश करेंगे।

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144