आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 144
नरकासुर की अस्थियाँ और वराह द्वारा पृथ्वी का उद्धार
लोमश पाण्डवों को मन्दर पर्वत के मार्ग पर ले चलते हैं और बदरी से निकलने वाली उस पवित्र नदी को दिखाते हैं, जिसके जल को शिव ने गंगाद्वार पर अपने सिर पर धारण किया था; पाण्डव उसे आकाशगंगा मानकर प्रणाम करते हैं। फिर लोमश पर्वत जैसा एक श्वेत ढेर दिखाते हैं — दैत्य नरक की अस्थियाँ, जिसे विष्णु ने हाथ के प्रहार से मार डाला था, जब उसकी तपस्या से इन्द्र का पद संकट में पड़ गया था। युधिष्ठिर के पूछने पर वे बताते हैं कि सत्ययुग में जब विष्णु यम का कार्य कर रहे थे और कोई मरता न था, तब प्राणियों के भार से पृथ्वी सौ योजन नीचे धँस गयी; विष्णु ने एक दाँत वाले वराह का रूप लेकर उसे ऊपर उठाया, जिससे तीनों लोक काँप उठे, और ब्रह्मा ने भयभीत देवताओं को इसका कारण समझाया। यह पूरा अध्याय आलोचनात्मक संस्करण के मूल पाठ में नहीं है; वहाँ यह परिशिष्ट I.16 में छपा है।
लोमश उवाच
श्लोक 1 (3.144.1)
द्रष्टारः पर्वताः सर्वे नद्यः सपुरकाननाः । तीर्थानि चैव श्रीमन्ति स्पृष्टं च सलिलं करैः ॥
draṣṭāraḥ parvatāḥ sarve nadyaḥ sapurakānanāḥ | tīrthāni caiva śrīmanti spṛṣṭaṃ ca salilaṃ karaiḥ
लोमश बोले — तुमने सब पर्वत, नगरों और वनों सहित नदियाँ और शोभायमान तीर्थ देख लिये हैं, और उनके जल का अपने हाथों से स्पर्श कर लिया है।
श्लोक 2 (3.144.2)
पर्वतं मन्दरं दिव्यमेष पन्थाः प्रयास्यति । समाहिता निरुद्विग्नाः सर्वे भवत पाण्डवाः ॥
parvataṃ mandaraṃ divyameṣa panthāḥ prayāsyati | samāhitā nirudvignāḥ sarve bhavata pāṇḍavāḥ
यह मार्ग दिव्य मन्दर पर्वत की ओर जाएगा। पाण्डवो, तुम सब एकाग्र और निश्चिन्त रहो।
श्लोक 3 (3.144.3)
अयं देवनिवासो वै गन्तव्यो वो भविष्यति । ऋषीणां चैव दिव्यानां निवासः पुण्यकर्मणां ॥
ayaṃ devanivāso vai gantavyo vo bhaviṣyati | ṛṣīṇāṃ caiva divyānāṃ nivāsaḥ puṇyakarmaṇāṃ
देवताओं के इस निवास-स्थान तक तुम्हें जाना होगा; यह पुण्यकर्मा दिव्य ऋषियों का भी निवास है।
श्लोक 4 (3.144.4)
एषा शिवजला पुण्या याति सौम्य महानदी । बदरीप्रभवा राजन्देवर्षिगणसेविता ॥
eṣā śivajalā puṇyā yāti saumya mahānadī | badarīprabhavā rājandevarṣigaṇasevitā
हे सौम्य राजन्, कल्याणकारी जल वाली यह पवित्र महानदी बदरी से निकलकर बहती है; देवता और ऋषियों के समूह इसका सेवन करते हैं।
श्लोक 5 (3.144.5)
एषा वैहायसैर्नित्यं वालखिल्यैर्महात्मभिः । अर्चिता चोपयाता च गन्धर्वैश्च महात्मभिः ॥
eṣā vaihāyasairnityaṃ vālakhilyairmahātmabhiḥ | arcitā copayātā ca gandharvaiśca mahātmabhiḥ
आकाश में विचरने वाले महात्मा वालखिल्य सदा इसकी पूजा करते और इसके पास आते हैं, और महात्मा गन्धर्व भी।
श्लोक 6 (3.144.6)
अत्र साम स्म गायन्ति सामगाः पुण्यनिःस्वनाः । मरीचिः पुलहश्चैव भृगुश्चैवाङ्गिरास्तथा ॥
atra sāma sma gāyanti sāmagāḥ puṇyaniḥsvanāḥ | marīciḥ pulahaścaiva bhṛguścaivāṅgirāstathā
यहाँ पवित्र स्वर वाले सामगायक — मरीचि, पुलह, भृगु और अंगिरा — सामगान करते हैं।
श्लोक 7 (3.144.7)
अत्राह्निकं सुरश्रेष्ठो जपते समरुद्गणः । साध्याश्चैवाश्विनौ चैव परिधावन्ति तं तदा ॥
atrāhnikaṃ suraśreṣṭho japate samarudgaṇaḥ | sādhyāścaivāśvinau caiva paridhāvanti taṃ tadā
यहाँ देवश्रेष्ठ इन्द्र मरुद्गणों के साथ अपना नित्य जप करते हैं, और साध्यगण तथा दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवा में रहते हैं।
श्लोक 8 (3.144.8)
चन्द्रमाः सह सूर्येण ज्योतींषि च ग्रहैः सह । अहोरात्रविभागेन नदीमेनामनुव्रजन् ॥
candramāḥ saha sūryeṇa jyotīṃṣi ca grahaiḥ saha | ahorātravibhāgena nadīmenāmanuvrajan
सूर्य के साथ चन्द्रमा और ग्रहों के साथ नक्षत्र दिन-रात के विभाग के अनुसार इस नदी का अनुसरण करते हैं।
श्लोक 9 (3.144.9)
एतस्याः सलिलं मूर्ध्नि वृषाङ्कः पर्यधारयत् । गङ्गाद्वारे महाभाग येन लोकस्थितिर्भवेत् ॥
etasyāḥ salilaṃ mūrdhni vṛṣāṅkaḥ paryadhārayat | gaṅgādvāre mahābhāga yena lokasthitirbhavet
हे महाभाग, गंगाद्वार पर वृषभध्वज शिव ने इसके जल को अपने सिर पर धारण किया था, जिससे संसार की रक्षा हो सके।
श्लोक 10 (3.144.10)
एतां भगवतीं देवीं भवन्तः सर्व एव हि । प्रयतेनात्मना तात प्रतिगम्याभिवादत ॥
etāṃ bhagavatīṃ devīṃ bhavantaḥ sarva eva hi | prayatenātmanā tāta pratigamyābhivādata
वत्सो, तुम सब शुद्ध मन से इस भगवती देवी के पास जाकर इसे प्रणाम करो।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (3.144.11)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा लोमशस्य महात्मनः । आकाशगङ्गां प्रयताः पाण्डवास्तेऽभ्यवादयन् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā lomaśasya mahātmanaḥ | ākāśagaṅgāṃ prayatāḥ pāṇḍavāste'bhyavādayan
वैशम्पायन बोले — महात्मा लोमश की यह बात सुनकर पाण्डवों ने शुद्ध मन से आकाशगंगा को प्रणाम किया।
श्लोक 12 (3.144.12)
अभिवाद्य च ते सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः । पुनः प्रयाताः संहृष्टाः सर्वैर्ऋषिगणैः सह ॥
abhivādya ca te sarve pāṇḍavā dharmacāriṇaḥ | punaḥ prayātāḥ saṃhṛṣṭāḥ sarvairṛṣigaṇaiḥ saha
प्रणाम करके सभी धर्मपरायण पाण्डव ऋषियों के सब समूहों के साथ प्रसन्न होकर फिर आगे चल पड़े।
श्लोक 13 (3.144.13)
ततो दूरात्प्रकाशन्तं पाण्डुरं मेरुसंनिभम् । ददृशुस्ते नरश्रेष्ठा विकीर्णं सर्वतोदिशम् ॥
tato dūrātprakāśantaṃ pāṇḍuraṃ merusaṃnibham | dadṛśuste naraśreṣṭhā vikīrṇaṃ sarvatodiśam
तब उन नरश्रेष्ठों ने दूर से मेरु के समान चमकता हुआ एक श्वेत ढेर देखा, जो चारों ओर बिखरा हुआ था।
श्लोक 14 (3.144.14)
तान्प्रष्टुकामान्विज्ञाय पाण्डवान्स तु लोमशः । उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः शृणुध्वं पाण्डुनन्दनाः ॥
tānpraṣṭukāmānvijñāya pāṇḍavānsa tu lomaśaḥ | uvāca vākyaṃ vākyajñaḥ śṛṇudhvaṃ pāṇḍunandanāḥ
पाण्डवों को उसके विषय में पूछने को उत्सुक जानकर वाक्पटु लोमश ने कहा — "पाण्डुपुत्रो, सुनो।"
लोमश उवाच
श्लोक 15 (3.144.15)
एतद्विकीर्णं सुश्रीमत्कैलासशिखरोपमम् । यत्पश्यसि नरश्रेष्ठ पर्वतप्रतिमं स्थितम् ॥
etadvikīrṇaṃ suśrīmatkailāsaśikharopamam | yatpaśyasi naraśreṣṭha parvatapratimaṃ sthitam
लोमश बोले — हे नरश्रेष्ठ, कैलास के शिखर-सा जो यह शोभायमान, बिखरा हुआ ढेर तुम पर्वत की तरह खड़ा देख रहे हो,
श्लोक 16 (3.144.16)
एतान्यस्थीनि दैत्यस्य नरकस्य महात्मनः । पर्वतप्रतिमं भाति पर्वतप्रस्तराश्रितम् ॥
etānyasthīni daityasya narakasya mahātmanaḥ | parvatapratimaṃ bhāti parvataprastarāśritam
वे महाबली दैत्य नरक की अस्थियाँ हैं; पर्वत की शिलाओं पर पड़ी हुई वे स्वयं पर्वत जैसी दिखती हैं।
श्लोक 17 (3.144.17)
पुरातनेन देवेन विष्णुना परमात्मना । दैत्यो विनिहतस्तेन सुरराजहितैषिणा ॥
purātanena devena viṣṇunā paramātmanā | daityo vinihatastena surarājahitaiṣiṇā
देवराज इन्द्र का हित चाहने वाले पुरातन देव, परमात्मा विष्णु ने उस दैत्य का वध किया था।
श्लोक 18 (3.144.18)
दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्यन्महामनाः । ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तपःस्वाध्यायविक्रमात् ॥
daśavarṣasahasrāṇi tapastapyanmahāmanāḥ | aindraṃ prārthayate sthānaṃ tapaḥsvādhyāyavikramāt
उस महामनस्वी ने दस हज़ार वर्षों तक तप किया, और तप तथा स्वाध्याय के बल से वह इन्द्र का पद पाना चाहता था।
श्लोक 19 (3.144.19)
तपोबलेन महता बाहुवेगबलेन च । नित्यमेव दुराधर्षो धर्षयन्स दितेः सुतः ॥
tapobalena mahatā bāhuvegabalena ca | nityameva durādharṣo dharṣayansa diteḥ sutaḥ
महान तपोबल और भुजाओं के वेग तथा बल से दिति का वह पुत्र सदा अजेय था और दूसरों को दबाता रहता था।
श्लोक 20 (3.144.20)
स तु तस्य बलं ज्ञात्वा धर्मे च चरितव्रतम् । भयाभिभूतः संविग्नः शक्र आसीत्तदाऽनघ ॥
sa tu tasya balaṃ jñātvā dharme ca caritavratam | bhayābhibhūtaḥ saṃvignaḥ śakra āsīttadā'nagha
हे निष्पाप, उसका बल और धर्म में उसके व्रत-पालन को जानकर इन्द्र भय से घिरकर व्याकुल हो उठे।
श्लोक 21 (3.144.21)
तेन संचिन्तितो देवो मनसा विष्णुरव्ययः । सर्वत्रगः प्रभुः श्रीमानागतश्च स्थितो बभौ ॥
tena saṃcintito devo manasā viṣṇuravyayaḥ | sarvatragaḥ prabhuḥ śrīmānāgataśca sthito babhau
उन्होंने मन ही मन अविनाशी देव विष्णु का स्मरण किया; और सर्वव्यापी, श्रीमान् प्रभु आकर वहाँ प्रकाशित होते हुए खड़े हो गये।
श्लोक 22 (3.144.22)
ऋषयश्चापि तं सर्वे तुष्टुवुश्च दिवौकसः ॥
ṛṣayaścāpi taṃ sarve tuṣṭuvuśca divaukasaḥ
सभी ऋषियों और स्वर्गवासी देवताओं ने उनकी स्तुति की।
श्लोक 23 (3.144.23)
तं दृष्ट्वा ज्वलमानश्रीर्भगवान्हव्यवाहनः । नष्टतेजाः समभवत्तस्य तेजोभिभर्त्सितः ॥
taṃ dṛṣṭvā jvalamānaśrīrbhagavānhavyavāhanaḥ | naṣṭatejāḥ samabhavattasya tejobhibhartsitaḥ
उन्हें देखकर प्रज्वलित कान्ति वाले भगवान् हव्यवाहन अग्नि भी उनके तेज से दबकर निस्तेज हो गये।
श्लोक 24 (3.144.24)
तं दृष्ट्वा वरदं देवं विष्णुं देवगणेश्वरम् । प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य च वज्रभृत् । प्राह वाक्यं ततस्तत्त्वं यतस्तस्य भयं भवेत् ॥
taṃ dṛṣṭvā varadaṃ devaṃ viṣṇuṃ devagaṇeśvaram | prāñjaliḥ praṇato bhūtvā namaskṛtya ca vajrabhṛt | prāha vākyaṃ tatastattvaṃ yatastasya bhayaṃ bhavet
वरदाता, देवगणों के स्वामी भगवान् विष्णु को देखकर वज्रधारी इन्द्र ने हाथ जोड़कर, झुककर प्रणाम किया और फिर ठीक-ठीक बताया कि उन्हें किससे भय है।
विष्णुरुवाच
श्लोक 25 (3.144.25)
जानामि ते भयं शक्र दैत्येन्द्रान्नरकात्ततः । ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तपःसिद्धेन कर्मणा ॥
jānāmi te bhayaṃ śakra daityendrānnarakāttataḥ | aindraṃ prārthayate sthānaṃ tapaḥsiddhena karmaṇā
विष्णु बोले — इन्द्र, मैं जानता हूँ कि तुम्हें दैत्यराज नरक से भय है; वह तप से सिद्ध हुए कर्मों के बल पर इन्द्र का पद चाहता है।
श्लोक 26 (3.144.26)
सोऽहमेनं तव प्रीत्या तपःसिद्धमपि ध्रुवम् । वियुनज्मि देहाद्देवेन्द्र मुहूर्तं प्रतिपालय ॥
so'hamenaṃ tava prītyā tapaḥsiddhamapi dhruvam | viyunajmi dehāddevendra muhūrtaṃ pratipālaya
तुम्हारे प्रेम के कारण, यद्यपि वह निश्चय ही तप से सिद्ध है, मैं उसे उसके शरीर से अलग कर दूँगा। देवेन्द्र, क्षण भर प्रतीक्षा करो।
लोमश उवाच
श्लोक 27 (3.144.27)
तस्य विष्णुर्महातेजाः पाणिना चेतनां हरत् । स पपात ततो भूमौ गिरिराज इवाहतः । तस्यैतदस्थिसंघातं मायाविनिहतस्य वै ॥
tasya viṣṇurmahātejāḥ pāṇinā cetanāṃ harat | sa papāta tato bhūmau girirāja ivāhataḥ | tasyaitadasthisaṃghātaṃ māyāvinihatasya vai
लोमश बोले — तब महातेजस्वी विष्णु ने हाथ के प्रहार से उसके प्राण हर लिये, और वह वज्र से आहत पर्वतराज की तरह धरती पर गिर पड़ा। माया-शक्ति से मारे गये उसी दैत्य का यह अस्थियों का ढेर है।
श्लोक 28 (3.144.28)
इदं द्वितीयमपरं विष्णोः कर्म प्रकाशते ॥
idaṃ dvitīyamaparaṃ viṣṇoḥ karma prakāśate
यहाँ विष्णु का एक और, दूसरा कर्म दिखायी देता है —
श्लोक 29 (3.144.29)
नष्टा वसुमती कृत्स्ना पाताले चैव मज्जिता । पुनरुद्धरिता तेन वाराहेणैकशृङ्गिणा ॥
naṣṭā vasumatī kṛtsnā pātāle caiva majjitā | punaruddharitā tena vārāheṇaikaśṛṅgiṇā
सारी पृथ्वी खोकर पाताल में डूब गयी थी, और उन्होंने एक दाँत वाले वराह के रूप में उसे फिर ऊपर उठाया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 30 (3.144.30)
भगवन्विस्तरेणेमां कथां कथय तत्त्वतः ॥
bhagavanvistareṇemāṃ kathāṃ kathaya tattvataḥ
युधिष्ठिर बोले — भगवन्, यह कथा मुझे विस्तार से और यथार्थ रूप में सुनाइए।
श्लोक 31 (3.144.31)
कथं तेन सुरेशेन नष्टा वसुमती तदा । योजनानां शतं ब्रह्मन्पुनरुद्धरिता तदा ॥
kathaṃ tena sureśena naṣṭā vasumatī tadā | yojanānāṃ śataṃ brahmanpunaruddharitā tadā
ब्रह्मन्, उस समय पृथ्वी कैसे खो गयी थी, और उन देवेश्वर ने उसे सौ योजन फिर ऊपर कैसे उठाया?
श्लोक 32 (3.144.32)
केन चैव प्रकारेण जगतो धरणी ध्रुवा । शिवा देवी महाभागा सर्वसस्यप्ररोहिणी । कस्य चैव प्रभावाद्धि योजनानां शतं गता ॥
kena caiva prakāreṇa jagato dharaṇī dhruvā | śivā devī mahābhāgā sarvasasyaprarohiṇī | kasya caiva prabhāvāddhi yojanānāṃ śataṃ gatā
संसार की स्थिर आधार, सब अन्नों को उपजाने वाली वह कल्याणी, महाभागा देवी पृथ्वी किस प्रकार और किसके प्रभाव से सौ योजन नीचे चली गयी?
श्लोक 33 (3.144.33)
केनैतद्वीर्यसर्वस्वं दर्शितं परमात्मनः । एतत्सर्वं यथातत्त्वमिच्छामि द्विजसत्तम । श्रोतुं विस्तरशः सर्वं त्वं हि तस्य प्रतिश्रयः ॥
kenaitadvīryasarvasvaṃ darśitaṃ paramātmanaḥ | etatsarvaṃ yathātattvamicchāmi dvijasattama | śrotuṃ vistaraśaḥ sarvaṃ tvaṃ hi tasya pratiśrayaḥ
परमात्मा का यह सम्पूर्ण पराक्रम किसने प्रकट किया? हे द्विजश्रेष्ठ, मैं यह सब ठीक-ठीक और विस्तार से सुनना चाहता हूँ, क्योंकि आप ही इसके आधार हैं।
लोमश उवाच
श्लोक 34 (3.144.34)
यत्तेऽहं परिपृष्टोऽस्मि कथामेतां युधिष्ठिर । तत्सर्वमखिलेनेह श्रूयतां मम भाषतः ॥
yatte'haṃ paripṛṣṭo'smi kathāmetāṃ yudhiṣṭhira | tatsarvamakhileneha śrūyatāṃ mama bhāṣataḥ
लोमश बोले — युधिष्ठिर, तुमने मुझसे जो यह कथा पूछी है, वह सब मैं यहाँ पूरी-पूरी कहता हूँ; सुनो।
श्लोक 35 (3.144.35)
पुरा कृतयुगे तात वर्तमानेऽभयंकरे । यमत्वं कारयामास आदिदेवः पुरातनः ॥
purā kṛtayuge tāta vartamāne'bhayaṃkare | yamatvaṃ kārayāmāsa ādidevaḥ purātanaḥ
वत्स, प्राचीन काल में जब निर्भय सत्ययुग चल रहा था, तब पुरातन आदिदेव ने यमराज का कार्य अपने हाथ में ले लिया।
श्लोक 36 (3.144.36)
यमत्वं कुर्वतस्तस्य देवदेवस्य धीमतः । न तत्र म्रियते कश्चिज्जायते वा तथाऽच्युत ॥
yamatvaṃ kurvatastasya devadevasya dhīmataḥ | na tatra mriyate kaścijjāyate vā tathā'cyuta
जब वे बुद्धिमान देवाधिदेव यम का कार्य कर रहे थे, तब, हे अच्युत, वहाँ कोई मरता नहीं था और जन्म पहले की तरह होते रहते थे।
श्लोक 37 (3.144.37)
वर्धन्ते पक्षिसङ्घाश्च तथा पशुगवेडकम् । गवाश्वं च मृगाश्चैव सर्वे ते पिशिताशनाः ॥
vardhante pakṣisaṅghāśca tathā paśugaveḍakam | gavāśvaṃ ca mṛgāścaiva sarve te piśitāśanāḥ
पक्षियों के झुंड बढ़ते गये, और उसी तरह पशु, गायें, भेड़ें, घोड़े, मृग और सभी मांसाहारी जीव भी।
श्लोक 38 (3.144.38)
तथा पुरुषशार्दूल मानुषाश्च परंतप । सहस्रशो ह्ययुतशो वर्धन्ते सलिलं यथा ॥
tathā puruṣaśārdūla mānuṣāśca paraṃtapa | sahasraśo hyayutaśo vardhante salilaṃ yathā
हे पुरुषसिंह, शत्रुतापन, इसी प्रकार मनुष्य भी हज़ारों और दसियों हज़ारों की संख्या में बढ़ती हुई बाढ़ की तरह बढ़ते गये।
श्लोक 39 (3.144.39)
एतस्मिन्संकुले तात वर्तमाने भयंकरे । अतिभाराद्वसुमती योजनानां शतं गता ॥
etasminsaṃkule tāta vartamāne bhayaṃkare | atibhārādvasumatī yojanānāṃ śataṃ gatā
वत्स, जब यह भीड़ भयंकर हो गयी, तब अत्यधिक भार के कारण पृथ्वी सौ योजन नीचे धँस गयी।
श्लोक 40 (3.144.40)
सा वै व्यथितसर्वाङ्गी भारेणाक्रान्तचेतना । नारायणं वरं देवं प्रपन्ना शरणं गता ॥
sā vai vyathitasarvāṅgī bhāreṇākrāntacetanā | nārāyaṇaṃ varaṃ devaṃ prapannā śaraṇaṃ gatā
उसके सारे अंग पीड़ा से भर गये और भार से उसकी चेतना दब गयी; तब वह परमदेव नारायण की शरण में गयी।
पृथिव्युवाच
श्लोक 41 (3.144.41)
भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तिष्ठेयं सुचिरं त्विह । भारेणास्मि समाक्रान्ता न शक्नोमि स्म वर्तितुम् ॥
bhagavaṃstvatprasādāddhi tiṣṭheyaṃ suciraṃ tviha | bhāreṇāsmi samākrāntā na śaknomi sma vartitum
पृथ्वी बोली — भगवन्, आपकी कृपा से ही मैं यहाँ बहुत समय तक टिकी रह सकती हूँ। मैं भार से दबी हुई हूँ और अब टिक नहीं पा रही।
श्लोक 42 (3.144.42)
ममेमं भगवन्भारं व्यपनेतुं त्वमर्हसि । शरणागताऽस्मि ते देव प्रसादं कुरु मे विभो ॥
mamemaṃ bhagavanbhāraṃ vyapanetuṃ tvamarhasi | śaraṇāgatā'smi te deva prasādaṃ kuru me vibho
भगवन्, आप ही मेरा यह भार दूर कर सकते हैं। देव, मैं आपकी शरण में आयी हूँ; हे विभो, मुझ पर कृपा कीजिए।
लोमश उवाच
श्लोक 43 (3.144.43)
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भगवानक्षरः प्रभुः । प्रोवाच वचनं हृष्टः श्रव्याक्षरसमीरितम् ॥
tasyāstadvacanaṃ śrutvā bhagavānakṣaraḥ prabhuḥ | provāca vacanaṃ hṛṣṭaḥ śravyākṣarasamīritam
लोमश बोले — उसकी बात सुनकर अविनाशी भगवान् प्रभु प्रसन्न हुए और सुनने में मधुर अक्षरों में बोले —
विष्णुरुवाच
श्लोक 44 (3.144.44)
न ते महि भयं कार्यं भारार्ते वसुधारिणि । अयमेवं तथा कुर्मि यथा लघ्वी भविष्यसि ॥
na te mahi bhayaṃ kāryaṃ bhārārte vasudhāriṇi | ayamevaṃ tathā kurmi yathā laghvī bhaviṣyasi
विष्णु बोले — हे वसुधा, भार से पीड़ित पृथ्वी, तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं। मैं ऐसा करूँगा जिससे तुम हल्की हो जाओगी।
लोमश उवाच
श्लोक 45 (3.144.45)
स तां विसर्जयित्वा तु वसुधां शैलकुण्डलाम् । ततो वराहः संवृत्त एकशृङ्गो महाद्युतिः ॥
sa tāṃ visarjayitvā tu vasudhāṃ śailakuṇḍalām | tato varāhaḥ saṃvṛtta ekaśṛṅgo mahādyutiḥ
लोमश बोले — पर्वतों को कुण्डलों की तरह धारण करने वाली पृथ्वी को विदा करके वे महातेजस्वी, एक दाँत वाले वराह बन गये।
श्लोक 46 (3.144.46)
रक्ताभ्यां नयनाभ्यां तु भयमुत्पादयन्निव । धूमं च ज्वलयँल्लक्ष्म्या तत्र देशे व्यवर्धत ॥
raktābhyāṃ nayanābhyāṃ tu bhayamutpādayanniva | dhūmaṃ ca jvalayam̐llakṣmyā tatra deśe vyavardhata
अपनी दोनों लाल आँखों से मानो भय उत्पन्न करते हुए और अपनी कान्ति से धुआँ-सा प्रज्वलित करते हुए वे उस स्थान पर बढ़ते गये।
श्लोक 47 (3.144.47)
स गृहीत्वा वसुमतीं शृङ्गेणैकेन भास्वता । योजनानां शतं वीर समुद्धरति सोऽक्षरः ॥
sa gṛhītvā vasumatīṃ śṛṅgeṇaikena bhāsvatā | yojanānāṃ śataṃ vīra samuddharati so'kṣaraḥ
हे वीर, उन अविनाशी ने अपने एक चमकते दाँत पर पृथ्वी को उठाकर सौ योजन ऊपर कर दिया।
श्लोक 48 (3.144.48)
तस्यां चोद्धार्यमाणायां संक्षोभः समजायत । देवाः संक्षुभिताः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ॥
tasyāṃ coddhāryamāṇāyāṃ saṃkṣobhaḥ samajāyata | devāḥ saṃkṣubhitāḥ sarve ṛṣayaśca tapodhanāḥ
जब वह ऊपर उठायी जा रही थी, तब बड़ी उथल-पुथल मच गयी; सब देवता और तपोधन ऋषि विचलित हो उठे।
श्लोक 49 (3.144.49)
हाहाभूतमभूत्सर्वं त्रिदिवं व्योम भूस्तथा । न पर्यवस्थितः कश्चिद्देवो वा मानुषोऽपि वा ॥
hāhābhūtamabhūtsarvaṃ tridivaṃ vyoma bhūstathā | na paryavasthitaḥ kaściddevo vā mānuṣo'pi vā
स्वर्ग, आकाश और पृथ्वी — सब में हाहाकार मच गया; कोई भी, देवता हो या मनुष्य, स्थिर न रह सका।
श्लोक 50 (3.144.50)
ततो ब्रह्माणमासीनं ज्वलमानमिव श्रिया । देवाः सर्षिगणाश्चैव उपतस्थुरनेकशः ॥
tato brahmāṇamāsīnaṃ jvalamānamiva śriyā | devāḥ sarṣigaṇāścaiva upatasthuranekaśaḥ
तब ऋषिगणों सहित देवता बड़ी संख्या में ब्रह्मा के पास पहुँचे, जो अपनी शोभा से मानो प्रज्वलित होकर बैठे थे।
श्लोक 51 (3.144.51)
उपसर्प्य च देवेशं ब्रह्माणं लोकसाक्षिकम् । भूत्वा प्राञ्जलयः सर्वे वाक्यमुच्चारयंस्तदा ॥
upasarpya ca deveśaṃ brahmāṇaṃ lokasākṣikam | bhūtvā prāñjalayaḥ sarve vākyamuccārayaṃstadā
देवेश्वर, लोकसाक्षी ब्रह्मा के निकट जाकर सबने हाथ जोड़े और यह वचन कहा —
देवा ऊचुः
श्लोक 52 (3.144.52)
लोकाः संक्षुभिताः सर्वे व्याकुलं च चराचरम् । समुद्राणां च संक्षोभस्त्रिदशेश प्रकाशते ॥
lokāḥ saṃkṣubhitāḥ sarve vyākulaṃ ca carācaram | samudrāṇāṃ ca saṃkṣobhastridaśeśa prakāśate
देवता बोले — हे देवेश्वर, सारे लोक काँप उठे हैं, सारा चराचर व्याकुल है, और समुद्रों में भी हलचल दिखायी दे रही है।
श्लोक 53 (3.144.53)
सैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता । किमेतत्किंप्रभावेण येनेदं व्याकुलं जगत् । आख्यातु नो भवाञ्शीघ्रं विसंज्ञाः स्मेह सर्वशः ॥
saiṣā vasumatī kṛtsnā yojanānāṃ śataṃ gatā | kimetatkiṃprabhāveṇa yenedaṃ vyākulaṃ jagat | ākhyātu no bhavāñśīghraṃ visaṃjñāḥ smeha sarvaśaḥ
यह सारी पृथ्वी सौ योजन नीचे चली गयी है। यह क्या है? किसके प्रभाव से यह जगत् इतना व्याकुल है? आप हमें शीघ्र बताइए, हम सब यहाँ घबराये हुए हैं।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 54 (3.144.54)
असुरेभ्यो भयं नास्ति युष्माकं कुत्रचित्क्वचित् । श्रूयतां यत्कृते त्वेष संक्षोभो जायतेऽमराः ॥
asurebhyo bhayaṃ nāsti yuṣmākaṃ kutracitkvacit | śrūyatāṃ yatkṛte tveṣa saṃkṣobho jāyate'marāḥ
ब्रह्मा बोले — देवताओ, तुम्हें असुरों से कहीं भी कोई भय नहीं है। सुनो, यह उथल-पुथल किस कारण हो रही है।
श्लोक 55 (3.144.55)
योऽसौ सर्वत्रगः श्रीमानक्षरात्मा व्यवस्थितः । तस्य प्रभावात्संक्षोभस्त्रिदिवस्य प्रकाशते ॥
yo'sau sarvatragaḥ śrīmānakṣarātmā vyavasthitaḥ | tasya prabhāvātsaṃkṣobhastridivasya prakāśate
जो सर्वव्यापी, श्रीमान् और अविनाशी आत्मा के रूप में स्थित हैं, उन्हीं के प्रभाव से स्वर्ग में यह हलचल दिखायी दे रही है।
श्लोक 56 (3.144.56)
यैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता । समुद्धृता पुनस्तेन विष्णुना परमात्मना ॥
yaiṣā vasumatī kṛtsnā yojanānāṃ śataṃ gatā | samuddhṛtā punastena viṣṇunā paramātmanā
यह सारी पृथ्वी जो सौ योजन नीचे चली गयी थी, उसे परमात्मा विष्णु ने फिर ऊपर उठा लिया है।
श्लोक 57 (3.144.57)
तस्यामुद्धार्यमाणायां संक्षोभः समजायत । एवं भवन्तो जानन्तु च्छिद्यतां संशयश्च वः ॥
tasyāmuddhāryamāṇāyāṃ saṃkṣobhaḥ samajāyata | evaṃ bhavanto jānantu cchidyatāṃ saṃśayaśca vaḥ
उसके उठाये जाते समय ही यह उथल-पुथल हुई। ऐसा जानो, और तुम्हारा संशय दूर हो जाए।
देवा ऊचुः
श्लोक 58 (3.144.58)
क्व तद्भूतं वसुमतीं समुद्धरति हृष्टवत् । तं देशं भगवन्ब्रूहि तत्र यास्यामहे वयम् ॥
kva tadbhūtaṃ vasumatīṃ samuddharati hṛṣṭavat | taṃ deśaṃ bhagavanbrūhi tatra yāsyāmahe vayam
देवता बोले — वह कौन-सा प्राणी है जो प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वी को उठा रहा है, और कहाँ है? भगवन्, वह स्थान बताइए; हम वहाँ जाएँगे।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 59 (3.144.59)
हन्त गच्छत भद्रं वो नन्दने पश्यत स्थितम् । एषोऽत्र भगवाञ्श्रीमान्सुपर्णः संप्रकाशते ॥
hanta gacchata bhadraṃ vo nandane paśyata sthitam | eṣo'tra bhagavāñśrīmānsuparṇaḥ saṃprakāśate
ब्रह्मा बोले — अच्छा, जाओ, तुम्हारा कल्याण हो; तुम उन्हें नन्दन वन में खड़ा देखोगे। उसी के पास भगवान् श्रीमान् सुपर्ण प्रकाशित हो रहे हैं।
श्लोक 60 (3.144.60)
वाराहेणैव रूपेण भगवाँल्लोकभावनः । कालानल इवाभाति पृथिवीतलमुद्धरन् ॥
vārāheṇaiva rūpeṇa bhagavām̐llokabhāvanaḥ | kālānala ivābhāti pṛthivītalamuddharan
वराह के रूप में लोकों के रचयिता भगवान् पृथ्वीतल को उठाते हुए प्रलय की अग्नि के समान चमक रहे हैं।
श्लोक 61 (3.144.61)
एतस्योरसि सुव्यक्तं श्रीवत्समभिराजते । पश्यध्वं विबुधाः सर्वे भूतमेतदनामयम् ॥
etasyorasi suvyaktaṃ śrīvatsamabhirājate | paśyadhvaṃ vibudhāḥ sarve bhūtametadanāmayam
उनके वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न स्पष्ट शोभा पा रहा है। देवताओ, तुम सब इस निर्विकार दिव्य सत्ता का दर्शन करो।
लोमश उवाच
श्लोक 62 (3.144.62)
ततो दृष्ट्वा महात्मानं श्रुत्वा चामन्त्र्य चामराः । पितामहं पुरस्कृत्य जग्मुर्देवा यथागतम् ॥
tato dṛṣṭvā mahātmānaṃ śrutvā cāmantrya cāmarāḥ | pitāmahaṃ puraskṛtya jagmurdevā yathāgatam
लोमश बोले — तब देवताओं ने उन महात्मा के दर्शन किये; ब्रह्मा की बात सुनकर और उनसे विदा लेकर वे पितामह को आगे करके जैसे आये थे वैसे ही लौट गये।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 63 (3.144.63)
श्रुत्वा तु तां कथां सर्वे पाण्डवा जनमेजय । लोमशादेशितेनाशु पथा जग्मुः प्रहृष्टवत् ॥
śrutvā tu tāṃ kathāṃ sarve pāṇḍavā janamejaya | lomaśādeśitenāśu pathā jagmuḥ prahṛṣṭavat
वैशम्पायन बोले — जनमेजय, वह कथा सुनकर सभी पाण्डव लोमश के बताये हुए मार्ग से शीघ्र और प्रसन्न होकर आगे बढ़े।