आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 145
गन्धमादन पर आँधी और वर्षा
शस्त्र धारण किये, ब्राह्मणों और द्रौपदी को साथ लेकर पाण्डव सरोवरों, नदियों, वनों और ऊबड़-खाबड़ प्रदेशों से होते हुए, कन्द-मूल-फल खाते हुए गन्धमादन की ओर चढ़ते हैं। पर्वत में प्रवेश करते ही प्रचण्ड आँधी उठती है — धूल से आकाश ढक जाता है, पेड़ गिरने लगते हैं, और सब जहाँ-तहाँ छिप जाते हैं: भीम कृष्णा को लेकर एक पेड़ के सहारे, युधिष्ठिर और धौम्य वन में, सहदेव अग्निहोत्र की अग्नियाँ लेकर पर्वत पर, और नकुल, लोमश तथा ब्राह्मण पेड़ों की ओट में। फिर वर्षा, ओले और बिजली आते हैं और मटमैली धाराएँ समुद्र की ओर दौड़ती हैं; आँधी थमने और सूर्य निकलने पर वे फिर इकट्ठे होकर गन्धमादन की ओर चल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.145.1)
ते शूराः सज्जधन्वानस्तूणवन्तः समार्गणाः । बद्धगोधाङ्गुलित्राणाः खड्गवन्तोऽमितौजसः ॥
te śūrāḥ sajjadhanvānastūṇavantaḥ samārgaṇāḥ | baddhagodhāṅgulitrāṇāḥ khaḍgavanto'mitaujasaḥ
वैशम्पायन बोले — वे शूरवीर, जिनके धनुष चढ़े हुए थे, जिनके पास तरकश और बाण थे, जिन्होंने गोह के चमड़े के अंगुलित्राण बाँध रखे थे और तलवारें ले रखी थीं, अपार तेजस्वी,
श्लोक 2 (3.145.2)
परिगृह्य द्विजश्रेष्ठाञ्ज्येष्ठाः सर्वधनुष्मताम् । पञ्चालीसहिता राजन्प्रययुर्गन्धमादनम् ॥
parigṛhya dvijaśreṣṭhāñjyeṣṭhāḥ sarvadhanuṣmatām | pañcālīsahitā rājanprayayurgandhamādanam
सब धनुर्धरों में अग्रणी वे पाण्डव, हे राजन्, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को साथ लेकर पाञ्चाली सहित गन्धमादन की ओर चल पड़े।
श्लोक 3 (3.145.3)
सरांसि सरितश्चैव पर्वतांश्च वनानि च । वृक्षांश्च बहुलच्छायान्ददृशुर्गिरिमूर्धनि ॥
sarāṃsi saritaścaiva parvatāṃśca vanāni ca | vṛkṣāṃśca bahulacchāyāndadṛśurgirimūrdhani
पर्वत के शिखरों पर उन्होंने सरोवर, नदियाँ, पहाड़ियाँ, वन और घनी छाया वाले वृक्ष देखे,
श्लोक 4 (3.145.4)
नित्यपुष्पफलान्देशान्देवर्षिगणसेवितान् । आत्मन्यात्मानमाधाय वीरा मूलफलाशिनः ॥
nityapuṣpaphalāndeśāndevarṣigaṇasevitān | ātmanyātmānamādhāya vīrā mūlaphalāśinaḥ
और ऐसे प्रदेश, जहाँ सदा फूल-फल रहते हैं और जहाँ देवता और ऋषियों के समूह निवास करते हैं। मन को अपने भीतर स्थिर करके वे वीर कन्द-मूल और फल खाते हुए
श्लोक 5 (3.145.5)
चेरुरुच्चावचाकारान्देशान्विषमसंकटान् । पश्यन्तो मृगजातानि बहूनि विविधानि च ॥
ceruruccāvacākārāndeśānviṣamasaṃkaṭān | paśyanto mṛgajātāni bahūni vividhāni ca
तरह-तरह के ऊँचे-नीचे, विषम और दुर्गम प्रदेशों में घूमते रहे, और अनेक प्रकार के बहुत-से पशुओं को देखते रहे।
श्लोक 6 (3.145.6)
ऋषिसिद्धामरयुतं गन्धर्वाप्सरसां प्रियम् । विविशुस्ते महात्मानः किन्नराचरितं गिरिम् ॥
ṛṣisiddhāmarayutaṃ gandharvāpsarasāṃ priyam | viviśuste mahātmānaḥ kinnarācaritaṃ girim
वे महात्मा उस पर्वत में प्रविष्ट हुए, जहाँ ऋषि, सिद्ध और देवता रहते हैं, जो गन्धर्वों और अप्सराओं को प्रिय है और जहाँ किन्नर विचरते हैं।
श्लोक 7 (3.145.7)
प्रविशत्स्वथ वीरेषु पर्वतं गन्धमादनम् । चण्डवातं महद्वर्षं प्रादुरासीद्विशांपते ॥
praviśatsvatha vīreṣu parvataṃ gandhamādanam | caṇḍavātaṃ mahadvarṣaṃ prādurāsīdviśāṃpate
हे प्रजानाथ, जब वे वीर गन्धमादन पर्वत में प्रवेश कर रहे थे, तभी प्रचण्ड आँधी और भारी वर्षा आ गयी।
श्लोक 8 (3.145.8)
ततो रेणुः समुद्भूतः सपत्रबहुलो महान् । पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव सहसाऽवृणोत् ॥
tato reṇuḥ samudbhūtaḥ sapatrabahulo mahān | pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca dyāṃ caiva sahasā'vṛṇot
तब पत्तों से भरी धूल का एक बड़ा बवण्डर उठा और उसने अचानक पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आकाश को ढक लिया।
श्लोक 9 (3.145.9)
न स्म प्रज्ञायते किंचिदावृते व्योम्नि रेणुना । न चापि शेकुस्तत्कर्तुमन्योन्यस्याभिभाषणम् ॥
na sma prajñāyate kiṃcidāvṛte vyomni reṇunā | na cāpi śekustatkartumanyonyasyābhibhāṣaṇam
धूल से आकाश ढक जाने पर कुछ भी पहचान में नहीं आता था, और वे आपस में बात भी नहीं कर पाते थे।
श्लोक 10 (3.145.10)
न चापश्यंस्ततोऽन्योन्यं तमसाऽऽवृतचक्षुषः । आकृष्यमाणा वातेन साश्मचूर्णेन भारत ॥
na cāpaśyaṃstato'nyonyaṃ tamasā''vṛtacakṣuṣaḥ | ākṛṣyamāṇā vātena sāśmacūrṇena bhārata
हे भारत, अँधेरे से आँखें ढक जाने के कारण वे एक-दूसरे को देख नहीं पाते थे, और पत्थरों के चूर्ण से भरी आँधी उन्हें खींचे लिये जा रही थी।
श्लोक 11 (3.145.11)
द्रुमाणां वातरुग्णानां पततां भूतलेऽनिशम् । अन्येषां च महीजानां शब्दः समभवन्महान् ॥
drumāṇāṃ vātarugṇānāṃ patatāṃ bhūtale'niśam | anyeṣāṃ ca mahījānāṃ śabdaḥ samabhavanmahān
आँधी से टूटकर लगातार धरती पर गिरते हुए वृक्षों और दूसरे पेड़ों का भारी शब्द होने लगा।
श्लोक 12 (3.145.12)
द्यौः स्वित्पतति किं भूमिर्दीर्यते पर्वतो नु किम् । इति ते मेनिरे सर्वे पवनेन विमोहिताः ॥
dyauḥ svitpatati kiṃ bhūmirdīryate parvato nu kim | iti te menire sarve pavanena vimohitāḥ
"क्या आकाश गिर रहा है? क्या पृथ्वी फट रही है? क्या पर्वत टूट रहा है?" — आँधी से भ्रमित होकर सब ऐसा ही सोचने लगे।
श्लोक 13 (3.145.13)
ते पथाऽनन्तरान्वृक्षान्वल्मीकान्विषमाणि च । पाणिभिः परिमार्गन्तो भीता वायोर्निलिल्यिरे ॥
te pathā'nantarānvṛkṣānvalmīkānviṣamāṇi ca | pāṇibhiḥ parimārganto bhītā vāyornililyire
वे मार्ग में पास के पेड़ों, बाँबियों और गड्ढों को हाथों से टटोलते हुए डरकर आँधी से छिपने लगे।
श्लोक 14 (3.145.14)
ततः कार्मुकमादाय भीमसेनो महाबलः । कृष्णामादाय संगम्य तस्थावाश्रित्य पादपम् ॥
tataḥ kārmukamādāya bhīmaseno mahābalaḥ | kṛṣṇāmādāya saṃgamya tasthāvāśritya pādapam
तब महाबली भीमसेन ने धनुष उठाया, कृष्णा के पास जाकर उसे साथ लिया और एक वृक्ष के सहारे खड़े हो गये।
श्लोक 15 (3.145.15)
धर्मराजश्च धौम्यश्च निलिल्याते महावने । अग्निहोत्राण्युपादाय सहदेवस्तु पर्वते ॥
dharmarājaśca dhaumyaśca nililyāte mahāvane | agnihotrāṇyupādāya sahadevastu parvate
धर्मराज और धौम्य उस महान वन में छिप गये; सहदेव अग्निहोत्र की अग्नियाँ लेकर पर्वत पर छिपे।
श्लोक 16 (3.145.16)
नकुलो ब्राह्मणाश्चान्ये लोमशश्च महातपाः । वृक्षानासाद्य संत्रस्तास्तत्रतत्र निलिल्यिरे ॥
nakulo brāhmaṇāścānye lomaśaśca mahātapāḥ | vṛkṣānāsādya saṃtrastāstatratatra nililyire
नकुल, अन्य ब्राह्मण और महातपस्वी लोमश भयभीत होकर पेड़ों के पास पहुँचे और जहाँ-तहाँ छिप गये।
श्लोक 17 (3.145.17)
मन्दीभूते तु पवने तस्मिन्रजसि शाम्यति । महद्भिर्जलधारौघैर्वर्षमभ्याजगाम ह ॥
mandībhūte tu pavane tasminrajasi śāmyati | mahadbhirjaladhāraughairvarṣamabhyājagāma ha
जब आँधी धीमी पड़ी और धूल बैठने लगी, तब जलधाराओं की भारी बौछारों के साथ वर्षा आ गयी।
श्लोक 18 (3.145.18)
भृशं चटचटाशब्दो वज्राणां क्षिप्यतामिव । ततस्ताश्चञ्चलाभासश्चेरुरभ्रेषु विद्युतः ॥
bhṛśaṃ caṭacaṭāśabdo vajrāṇāṃ kṣipyatāmiva | tatastāścañcalābhāsaścerurabhreṣu vidyutaḥ
वज्र फेंके जाने जैसा ज़ोर का कड़कड़ाहट का शब्द होने लगा, और बादलों में चंचल चमक वाली बिजलियाँ कौंधने लगीं।
श्लोक 19 (3.145.19)
ततोऽश्मसहिता धाराः संवृण्वन्त्यः समन्ततः । प्रपेतुरनिशं तत्र शीघ्रवातसमीरिताः ॥
tato'śmasahitā dhārāḥ saṃvṛṇvantyaḥ samantataḥ | prapeturaniśaṃ tatra śīghravātasamīritāḥ
फिर ओलों से भरी धाराएँ तेज़ हवा से उड़ायी जाती हुई, चारों ओर सब कुछ ढकती हुई वहाँ लगातार बरसने लगीं।
श्लोक 20 (3.145.20)
तत्र सागरगा ह्यापः कीर्यमाणाः समन्ततः । प्रादुरासन्सकलुषाः फेनवत्यो विशांपते ॥
tatra sāgaragā hyāpaḥ kīryamāṇāḥ samantataḥ | prādurāsansakaluṣāḥ phenavatyo viśāṃpate
हे प्रजानाथ, वहाँ चारों ओर बिखरती हुई, समुद्र की ओर बहने वाली मटमैली, झागदार जलधाराएँ प्रकट हो गयीं,
श्लोक 21 (3.145.21)
वहन्त्यो वारि बहुलं फेनोडुपपरिप्लुतम् । परिसस्रुर्महाशब्दाः प्रकर्षन्त्यो महीरुहान् ॥
vahantyo vāri bahulaṃ phenoḍupapariplutam | parisasrurmahāśabdāḥ prakarṣantyo mahīruhān
जो झाग के बेड़ों से भरा बहुत-सा जल बहाती हुई, भारी गर्जना के साथ वृक्षों को उखाड़कर खींचती हुई चारों ओर बह चलीं।
श्लोक 22 (3.145.22)
तस्मिन्नुपरते शब्दे वाते च समतां गते । गते ह्यम्भसि निम्नानि प्रादुर्भूते दिवाकरे ॥
tasminnuparate śabde vāte ca samatāṃ gate | gate hyambhasi nimnāni prādurbhūte divākare
जब वह शब्द थम गया, हवा शान्त हो गयी, जल निचले स्थानों में बह गया और सूर्य निकल आया,
श्लोक 23 (3.145.23)
निर्जग्मुस्ते शनैः सर्वे समाजग्मुश्च भारत । प्रतस्थिरे पुनर्वीराः पर्वतं गन्धमादनम् ॥
nirjagmuste śanaiḥ sarve samājagmuśca bhārata | pratasthire punarvīrāḥ parvataṃ gandhamādanam
तब हे भारत, वे सब धीरे-धीरे बाहर निकले और फिर एकत्र हुए, और वे वीर फिर गन्धमादन पर्वत की ओर चल पड़े।