Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 146

पर्वतीय मार्ग में द्रौपदी की मूर्च्छा

फिर से चलने के थोड़ी ही देर बाद, पैदल चलने की अभ्यस्त न होने और आँधी-वर्षा से थकी हुई द्रौपदी मूर्च्छित होकर गिर पड़ती है; नकुल उसे सँभालते हैं और युधिष्ठिर को पुकारते हैं। उसे गोद में लेकर युधिष्ठिर विलाप करते हैं कि उनकी द्यूत की आसक्ति के कारण पिता द्वारा सुख का वचन देकर ब्याही गयी पाञ्चाल राजकुमारी आज नंगी धरती पर पड़ी है। धौम्य और ब्राह्मण रक्षा-मन्त्रों का पाठ करते हैं, पाण्डव शीतल हाथों और जलकणों से भरी हवा से उसे होश में लाते हैं, और नकुल-सहदेव उसके पैर दबाते हैं। जब युधिष्ठिर पूछते हैं कि वह हिम से ढके पर्वतों को कैसे पार करेगी, तब भीम कहते हैं कि वे स्वयं सबको उठाकर ले चलेंगे, या आकाशगामी पुत्र घटोत्कच सबको ले जाएगा।

अध्याय 145अध्याय-सूचीअध्याय 147

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.146.1)

ततः प्रयातमात्रेषु पाण्डवेषु महात्मसु । पद्भ्यामनुचिता गन्तुं द्रौपदी समुपाविशत् ॥

tataḥ prayātamātreṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu | padbhyāmanucitā gantuṃ draupadī samupāviśat

वैशम्पायन बोले — महात्मा पाण्डव अभी चले ही थे कि पैदल चलने की अभ्यस्त न होने के कारण द्रौपदी बैठ गयी।

श्लोक 2 (3.146.2)

श्रान्ता दुःखपरीता च वातवर्षेण तेन च । सौकुमार्याच्च पाञ्चाली संमुमोह तपस्विनी ॥

śrāntā duḥkhaparītā ca vātavarṣeṇa tena ca | saukumāryācca pāñcālī saṃmumoha tapasvinī

थकी हुई, दुःख से घिरी, उस आँधी-वर्षा से पीड़ित और स्वभाव से कोमल होने के कारण वह दुखियारी पाञ्चाली मूर्च्छित हो गयी।

श्लोक 3 (3.146.3)

सा कम्पमाना मोहेन बाहुभ्यामसितेक्षणा । वृत्ताभ्यामनुरूपाभ्यामूरू समवलम्बत ॥

sā kampamānā mohena bāhubhyāmasitekṣaṇā | vṛttābhyāmanurūpābhyāmūrū samavalambata

मूर्च्छा से काँपती हुई उस कजरारी आँखों वाली ने अपनी गोल, सुडौल भुजाओं से अपनी जाँघों का सहारा लिया।

श्लोक 4 (3.146.4)

आलम्बमाना सहितावूरू गजकरोपमौ । पपात सहसा भूमौ वेपन्ती कदली यथा ॥

ālambamānā sahitāvūrū gajakaropamau | papāta sahasā bhūmau vepantī kadalī yathā

हाथी की सूँड़ जैसी अपनी सटी हुई जाँघों को पकड़े-पकड़े वह केले के पेड़ की तरह काँपती हुई अचानक धरती पर गिर पड़ी।

श्लोक 5 (3.146.5)

तां पतन्तीं वरारोहां भज्यमानां लतामिव । नकुलः समभिद्रुत्य परिजग्राह वीर्यवान् ॥

tāṃ patantīṃ varārohāṃ bhajyamānāṃ latāmiva | nakulaḥ samabhidrutya parijagrāha vīryavān

टूटती हुई लता की तरह उस सुन्दरी को गिरते देखकर पराक्रमी नकुल दौड़कर आये और उन्होंने उसे थाम लिया।

नकुल उवाच

श्लोक 6 (3.146.6)

राजन्पाञ्चालराजस्य सुतेयमसितेक्षणा । श्रान्ता निपतिता भूमौ तामवेक्षस्व भारत ॥

rājanpāñcālarājasya suteyamasitekṣaṇā | śrāntā nipatitā bhūmau tāmavekṣasva bhārata

नकुल बोले — राजन्, पाञ्चालराज की यह कजरारी आँखों वाली पुत्री थककर धरती पर गिर पड़ी है। हे भारत, इसकी ओर देखिए।

श्लोक 7 (3.146.7)

अदुःखार्हा परं दुःखं प्राप्तेयं मृदुगामिनी । आश्वासय महाराज तामिमां श्रमकर्शिताम् ॥

aduḥkhārhā paraṃ duḥkhaṃ prāpteyaṃ mṛdugāminī | āśvāsaya mahārāja tāmimāṃ śramakarśitām

जो दुःख के योग्य नहीं थी, वह कोमल चाल वाली आज घोर दुःख में पड़ी है। महाराज, थकान से क्षीण हुई इसे ढाढ़स बँधाइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (3.146.8)

राजा तु वचनात्तस्य भृशं दुःखसमन्वितः । भीमश्च सहदेवश्च सहसा समुपाद्रवन् ॥

rājā tu vacanāttasya bhṛśaṃ duḥkhasamanvitaḥ | bhīmaśca sahadevaśca sahasā samupādravan

वैशम्पायन बोले — नकुल की बात सुनकर अत्यन्त दुःखी राजा और भीम तथा सहदेव तुरन्त दौड़कर उसके पास आये।

श्लोक 9 (3.146.9)

तामवेक्ष्य तु कौन्तेयो विवर्णवदनां कृशाम् । अङ्कमानीय धर्मात्मा पर्यदेवयदातुरः ॥

tāmavekṣya tu kaunteyo vivarṇavadanāṃ kṛśām | aṅkamānīya dharmātmā paryadevayadāturaḥ

उसे पीले मुख वाली और दुर्बल देखकर धर्मात्मा कुन्तीपुत्र ने उसे गोद में ले लिया और व्याकुल होकर विलाप करने लगे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 10 (3.146.10)

कथं वेश्मसु गुप्तेषु स्वास्तीर्णशयनोचिता । भूमौ निपतिता शेते सुखार्हा वरवर्णिनी ॥

kathaṃ veśmasu gupteṣu svāstīrṇaśayanocitā | bhūmau nipatitā śete sukhārhā varavarṇinī

युधिष्ठिर बोले — सुरक्षित महलों में सुन्दर बिछौनों पर सोने की अभ्यस्त, सुख की अधिकारिणी यह सुन्दरी आज धरती पर गिरी पड़ी है — यह कैसे हुआ?

श्लोक 11 (3.146.11)

सुकुमारौ कथं पादौ मुखं च कमलप्रभम् । मत्कृतेऽद्य वरार्हायाः श्यामतां समुपागतम् ॥

sukumārau kathaṃ pādau mukhaṃ ca kamalaprabham | matkṛte'dya varārhāyāḥ śyāmatāṃ samupāgatam

सर्वश्रेष्ठ वस्तुओं की अधिकारिणी इसके कोमल चरण और कमल-सा दमकता मुख आज मेरे कारण कैसे साँवले पड़ गये?

श्लोक 12 (3.146.12)

किमिदं द्यूतकामेन मया कृतमबुद्धिना । आदाय कृष्णां चरता वने मृगगणाकुले ॥

kimidaṃ dyūtakāmena mayā kṛtamabuddhinā | ādāya kṛṣṇāṃ caratā vane mṛgagaṇākule

द्यूत के लोभी मुझ मूर्ख ने यह क्या कर डाला, जो कृष्णा को लेकर पशुओं के झुंडों से भरे वन में भटक रहा हूँ?

श्लोक 13 (3.146.13)

सुखं प्राप्स्यसि कल्याणि पाण्डवान्प्राप्य वै पतीन् । इति द्रुपदराजेन पित्रा दत्ताऽयतेक्षणा ॥

sukhaṃ prāpsyasi kalyāṇi pāṇḍavānprāpya vai patīn | iti drupadarājena pitrā dattā'yatekṣaṇā

"कल्याणी, पाण्डवों को पति रूप में पाकर तुम सुख पाओगी" — यह कहकर पिता राजा द्रुपद ने इस विशाल नेत्रों वाली का विवाह किया था।

श्लोक 14 (3.146.14)

तत्सर्वमनवाप्येयं श्रमशोकाद्विकर्शिता । शेते निपतिता भूमौ पापस्य मम कर्मभिः ॥

tatsarvamanavāpyeyaṃ śramaśokādvikarśitā | śete nipatitā bhūmau pāpasya mama karmabhiḥ

उसमें से कुछ भी न पाकर, थकान और शोक से क्षीण हुई यह मुझ पापी के कर्मों के कारण धरती पर गिरी पड़ी है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (3.146.15)

तथा लालप्यमाने तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । धौम्यप्रभृतयः सर्वे तत्राजग्मुर्द्विजोत्तमाः ॥

tathā lālapyamāne tu dharmarāje yudhiṣṭhire | dhaumyaprabhṛtayaḥ sarve tatrājagmurdvijottamāḥ

वैशम्पायन बोले — जब धर्मराज युधिष्ठिर इस प्रकार विलाप कर रहे थे, तब धौम्य आदि सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 16 (3.146.16)

ते समाश्वासयामासुराशीर्भिश्चाप्यपूजयन् । रक्षोघ्नांश्च तथा मन्त्राञ्जेपुश्चक्रुश्च ते क्रियाः ॥

te samāśvāsayāmāsurāśīrbhiścāpyapūjayan | rakṣoghnāṃśca tathā mantrāñjepuścakruśca te kriyāḥ

उन्होंने उसे सान्त्वना दी और आशीर्वादों से उसका सम्मान किया; राक्षसों का नाश करने वाले मन्त्रों का जप किया और विधियाँ सम्पन्न कीं।

श्लोक 17 (3.146.17)

पठ्यमानेषु मन्त्रेषु शान्त्यर्थं परमर्षिभिः । स्पृश्यमाना करैः शीतैः पाण्डवैश्च मुहुर्मुहुः ॥

paṭhyamāneṣu mantreṣu śāntyarthaṃ paramarṣibhiḥ | spṛśyamānā karaiḥ śītaiḥ pāṇḍavaiśca muhurmuhuḥ

जब महर्षि शान्ति के लिए मन्त्र पढ़ रहे थे और पाण्डव बार-बार अपने शीतल हाथों से उसे छू रहे थे,

श्लोक 18 (3.146.18)

सेव्यमाना च शीतेन जलमिश्रेण वायुना । पाञ्चाली सुखमासाद्य लेभे चेतः शनैः शनैः ॥

sevyamānā ca śītena jalamiśreṇa vāyunā | pāñcālī sukhamāsādya lebhe cetaḥ śanaiḥ śanaiḥ

और जलकणों से मिली शीतल हवा उसे लग रही थी, तब पाञ्चाली को आराम मिला और धीरे-धीरे उसे होश आ गया।

श्लोक 19 (3.146.19)

परिगृह्य च तां दीनां कृष्णामजिनसंस्तरे । पार्था विश्रामयामासुर्लब्धसंज्ञां तपस्विनीम् ॥

parigṛhya ca tāṃ dīnāṃ kṛṣṇāmajinasaṃstare | pārthā viśrāmayāmāsurlabdhasaṃjñāṃ tapasvinīm

होश में आयी उस दीन, दुखियारी कृष्णा को पार्थों ने मृगचर्म के बिछौने पर लिटाकर विश्राम कराया।

श्लोक 20 (3.146.20)

तस्या यमौ रक्ततलौ पादौ पूजितलक्षणौ । कराभ्यां किणजाताभ्यां शनकैः संववाहतुः ॥

tasyā yamau raktatalau pādau pūjitalakṣaṇau | karābhyāṃ kiṇajātābhyāṃ śanakaiḥ saṃvavāhatuḥ

नकुल-सहदेव ने धनुष की डोरी से घट्टे पड़े अपने हाथों से उसके लाल तलवों वाले, शुभ लक्षणों से युक्त चरणों को धीरे-धीरे दबाया।

श्लोक 21 (3.146.21)

पर्याश्वासयदप्येनां धर्मराजो युधिष्ठिरः । उवाच च कुरुश्रेष्ठो भीमसेनमिदं वचः ॥

paryāśvāsayadapyenāṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | uvāca ca kuruśreṣṭho bhīmasenamidaṃ vacaḥ

धर्मराज युधिष्ठिर ने भी उसे ढाढ़स बँधाया, और फिर उन कुरुश्रेष्ठ ने भीमसेन से यह बात कही —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 22 (3.146.22)

बहवः पर्वता भीम विषमा हिमदुर्गमाः । तेषु कृष्णा महाबाहो कथं नु विचरिष्यति ॥

bahavaḥ parvatā bhīma viṣamā himadurgamāḥ | teṣu kṛṣṇā mahābāho kathaṃ nu vicariṣyati

युधिष्ठिर बोले — भीम, आगे बहुत-से ऊबड़-खाबड़ और हिम के कारण दुर्गम पर्वत हैं। महाबाहु, कृष्णा उन पर कैसे चल पाएगी?

भीमसेन उवाच

श्लोक 23 (3.146.23)

त्वां राजन्राजपुत्रीं च यमौ च पुरुषर्षभ । स्वयं नेष्यामि राजेन्द्र मा विषादे मनः कृथाः ॥

tvāṃ rājanrājaputrīṃ ca yamau ca puruṣarṣabha | svayaṃ neṣyāmi rājendra mā viṣāde manaḥ kṛthāḥ

भीमसेन बोले — राजन्, हे पुरुषश्रेष्ठ, आपको, राजकुमारी को और नकुल-सहदेव को मैं स्वयं उठाकर ले चलूँगा। हे राजेन्द्र, मन को विषाद में मत डुबाइए।

श्लोक 24 (3.146.24)

अथवा यो मया जातो विहगो मद्बलोपमः । वहेदनघ सर्वान्नो वचनात्ते घटोत्कचः ॥

athavā yo mayā jāto vihago madbalopamaḥ | vahedanagha sarvānno vacanātte ghaṭotkacaḥ

अथवा, हे निष्पाप, मेरा पुत्र घटोत्कच, जो आकाश में विचरता है और मेरे ही समान बलवान है, आपकी आज्ञा से हम सबको उठा ले जाएगा।

अध्याय 145अध्याय-सूचीअध्याय 147