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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 147

घटोत्कच का पाण्डवों को बदरी तक ले जाना

द्रौपदी के आगे चलने में असमर्थ हो जाने पर युधिष्ठिर भीम से कहते हैं कि उनका राक्षस पुत्र उसे उठा ले चले। भीम घटोत्कच का स्मरण करते हैं; वह तुरंत उपस्थित होता है और अन्य राक्षसों के साथ द्रौपदी, पाण्डवों और ब्राह्मणों को आकाश-मार्ग से ले चलता है, जबकि लोमश अपने ही प्रभाव से चलते हैं। अनेक देशों और उत्तरकुरु को पार करके वे कैलास को देखते हैं और नर-नारायण के आश्रम के पास विशाल बदरी वृक्ष के निकट उतरते हैं। ऋषि युधिष्ठिर का स्वागत करते हैं, और पाण्डव वहीं रहकर भागीरथी में तर्पण करते हुए उस स्थान का आनन्द लेते हैं।

अध्याय 146अध्याय-सूचीअध्याय 148

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (3.147.1)

धर्मज्ञो बलवाञ्शूरः सद्यो राक्षसपुङ्गवः । भक्तोऽस्मानौरसः पुत्रो नेतुमर्हति मातरम् ॥

dharmajño balavāñśūraḥ sadyo rākṣasapuṅgavaḥ | bhakto'smānaurasaḥ putro netumarhati mātaram

"हे भीम, यह धर्मज्ञ, बलवान और शूर राक्षस-श्रेष्ठ तुम्हारा औरस पुत्र है और हमारा भक्त है; वही तुरंत अपनी माता को ले चलने में समर्थ है।"

श्लोक 2 (3.147.2)

तव भीम सुतेनाहं नीतो भीमपराक्रम । अक्षतः सह पाञ्चाल्या गच्छेयं गन्धमादनम् ॥

tava bhīma sutenāhaṃ nīto bhīmaparākrama | akṣataḥ saha pāñcālyā gaccheyaṃ gandhamādanam

"हे भयंकर पराक्रम वाले भीम, तुम्हारे पुत्र के द्वारा ले जाया जाकर मैं पांचाली के साथ सकुशल गन्धमादन तक पहुँच सकूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (3.147.3)

भ्रातुर्वचनमाज्ञाय भीमसेनो घटोत्कचम् । चिन्तयामास बलवान्महाबलपराक्रमम् ॥

bhrāturvacanamājñāya bhīmaseno ghaṭotkacam | cintayāmāsa balavānmahābalaparākramam

वैशम्पायन बोले — भाई की बात समझकर बलवान भीमसेन ने महान बल और पराक्रम वाले घटोत्कच का स्मरण किया।

श्लोक 4 (3.147.4)

घटोत्कचश्च धर्मात्मा स्मृतमात्रः पितुस्तदा । कृताञ्जलिरुपातिष्ठदभिवाद्याथ पाण्डवान् । ब्राह्मणांश्च महाबाहुः स च तैरभिनन्दितः ॥

ghaṭotkacaśca dharmātmā smṛtamātraḥ pitustadā | kṛtāñjalirupātiṣṭhadabhivādyātha pāṇḍavān | brāhmaṇāṃśca mahābāhuḥ sa ca tairabhinanditaḥ

पिता के स्मरण करते ही धर्मात्मा घटोत्कच उसी क्षण हाथ जोड़कर उपस्थित हो गया। उस महाबाहु ने पाण्डवों और ब्राह्मणों को प्रणाम किया, और उन्होंने भी उसका स्वागत किया।

श्लोक 5 (3.147.5)

उवाच भीमसेनं स पितरं सत्यविक्रमः ॥

uvāca bhīmasenaṃ sa pitaraṃ satyavikramaḥ

तब उस सत्यपराक्रमी ने अपने पिता भीमसेन से कहा।

घटोत्कच उवाच

श्लोक 6 (3.147.6)

स्मृतोऽस्मि भवता शीघ्रं शुश्रूषुरहमागतः । आज्ञापय महाबाहो सर्वं कर्ताऽस्म्यसंशयम् ॥

smṛto'smi bhavatā śīghraṃ śuśrūṣurahamāgataḥ | ājñāpaya mahābāho sarvaṃ kartā'smyasaṃśayam

"आपने मेरा स्मरण किया और मैं सेवा के लिए तुरंत आ गया हूँ। हे महाबाहु, आज्ञा दीजिए; मैं सब कुछ करूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (3.147.7)

तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्तु राक्षसं परिषस्वजे । चिन्तया समनुप्राप्तमित्युवाच वृकोदरः ॥

tacchrutvā bhīmasenastu rākṣasaṃ pariṣasvaje | cintayā samanuprāptamityuvāca vṛkodaraḥ

यह सुनकर भीमसेन ने उस राक्षस को गले लगा लिया, और स्मरण मात्र से आए हुए उस पुत्र से वृकोदर ने यों कहा —

भीमसेन उवाच

श्लोक 8 (3.147.8)

हैडिम्बेय परिश्रान्ता तव माताऽपराजिता । त्वं च कामगमस्तात बलवान्वह तां खग ॥

haiḍimbeya pariśrāntā tava mātā'parājitā | tvaṃ ca kāmagamastāta balavānvaha tāṃ khaga

"हे हिडिम्बा-पुत्र, तुम्हारी कभी न हारने वाली माता थक गई है। तात, तुम बलवान हो और इच्छानुसार कहीं भी जा सकते हो; हे आकाशचारी, उसे उठा ले चलो।"

श्लोक 9 (3.147.9)

स्कन्धमारोप्य भद्रं ते मध्येऽस्माकं विहायसा । गच्छ नीचिकया गत्या यथा चैनां न पीडयेः ॥

skandhamāropya bhadraṃ te madhye'smākaṃ vihāyasā | gaccha nīcikayā gatyā yathā caināṃ na pīḍayeḥ

"तुम्हारा कल्याण हो; उसे कंधे पर बिठाकर हमारे बीच आकाश-मार्ग से नीचे-नीचे उड़ते हुए चलो, ताकि उसे कोई कष्ट न हो।"

घटोत्कच उवाच

श्लोक 10 (3.147.10)

धर्मराजं च धौम्यं च कृष्णां च यमजौ तथा । एकोऽप्यहमलं वोढुं किमुताद्य सहायवान् ॥

dharmarājaṃ ca dhaumyaṃ ca kṛṣṇāṃ ca yamajau tathā | eko'pyahamalaṃ voḍhuṃ kimutādya sahāyavān

घटोत्कच बोला — "धर्मराज, धौम्य, कृष्णा और दोनों जुड़वाँ भाइयों को मैं अकेला भी ढो सकता हूँ; फिर आज तो मेरे साथ सहायक भी हैं।"

श्लोक 11 (3.147.11)

अन्ये च शतशः शूरा विहङ्गाः कामरूपिणः । सर्वान्वो ब्राह्मणैः सार्धं वक्ष्यन्ति सहिताऽनघ । मन्दंमन्दं गमिष्यामि वहन्द्रुपदनन्दिनीम् ॥

anye ca śataśaḥ śūrā vihaṅgāḥ kāmarūpiṇaḥ | sarvānvo brāhmaṇaiḥ sārdhaṃ vakṣyanti sahitā'nagha | mandaṃmandaṃ gamiṣyāmi vahandrupadanandinīm

"हे निष्पाप, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले सैकड़ों अन्य शूर आकाशचारी मिलकर ब्राह्मणों सहित आप सबको ले चलेंगे। मैं द्रुपद-नन्दिनी को उठाकर धीरे-धीरे चलूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (3.147.12)

एवमुक्त्वा ततः कृष्णामुवाह स घटोत्कचः । पाण्डूनां मध्यगो वीरः पाण्डवानपि चापरे ॥

evamuktvā tataḥ kṛṣṇāmuvāha sa ghaṭotkacaḥ | pāṇḍūnāṃ madhyago vīraḥ pāṇḍavānapi cāpare

वैशम्पायन बोले — ऐसा कहकर वीर घटोत्कच कृष्णा को उठाकर पाण्डवों के बीच चलने लगा, और दूसरे राक्षसों ने पाण्डवों को उठा लिया।

श्लोक 13 (3.147.13)

लोमशः सिद्धमार्गेण जगामानुपमद्युतिः । स्वेनैव स प्रभावेण द्वितीय इव भास्करः ॥

lomaśaḥ siddhamārgeṇa jagāmānupamadyutiḥ | svenaiva sa prabhāveṇa dvitīya iva bhāskaraḥ

अनुपम तेज वाले लोमश अपने ही प्रभाव से सिद्धों के मार्ग से चले, मानो दूसरे सूर्य हों।

श्लोक 14 (3.147.14)

ब्राह्मणांश्चापि तान्सर्वान्समुपादाय राक्षसाः । नियोगाद्राक्षसेन्द्रस्य जग्मुर्भीमपराक्रमाः ॥

brāhmaṇāṃścāpi tānsarvānsamupādāya rākṣasāḥ | niyogādrākṣasendrasya jagmurbhīmaparākramāḥ

राक्षसराज की आज्ञा से भयंकर पराक्रम वाले राक्षस उन सब ब्राह्मणों को भी उठाकर चल पड़े।

श्लोक 15 (3.147.15)

एवं सुरमणीयानि वनान्युपवनानि च । आलोकयन्तस्ते जग्मुर्विशालां बदरीमनु ॥

evaṃ suramaṇīyāni vanānyupavanāni ca | ālokayantaste jagmurviśālāṃ badarīmanu

इस प्रकार अत्यंत रमणीय वनों और उपवनों को देखते हुए वे विशाल बदरी की ओर चले।

श्लोक 16 (3.147.16)

ते त्वाशुगतिभिर्वीरा राक्षसैस्तैर्महाजवैः । उह्यमाना ययुः शीघ्रं महदध्वानमल्पवत् ॥

te tvāśugatibhirvīrā rākṣasaistairmahājavaiḥ | uhyamānā yayuḥ śīghraṃ mahadadhvānamalpavat

उन तीव्रगामी, महावेगशाली राक्षसों द्वारा ढोए जाते हुए वे वीर उस लंबे मार्ग को शीघ्र ही ऐसे पार कर गए मानो वह छोटा हो।

श्लोक 17 (3.147.17)

देशान्म्लेच्छजनाकीर्णान्नानारत्नाकरायुतान् । ददृशुर्गिरिपादांश्च नानाधातुसमाचितान् ॥

deśānmlecchajanākīrṇānnānāratnākarāyutān | dadṛśurgiripādāṃśca nānādhātusamācitān

उन्होंने म्लेच्छ जनों से भरे और अनेक प्रकार के रत्नों की खानों से युक्त देश देखे, और नाना धातुओं से भरी पर्वतों की तलहटियाँ देखीं,

श्लोक 18 (3.147.18)

विद्याधरसमाकीर्णान्युतान्वानरकिन्नरैः । तथा किंपुरुषैश्चैव गन्धर्वैश्च समन्ततः ॥

vidyādharasamākīrṇānyutānvānarakinnaraiḥ | tathā kiṃpuruṣaiścaiva gandharvaiśca samantataḥ

जो विद्याधरों से भरे थे, वानरों और किन्नरों से युक्त थे, और चारों ओर किम्पुरुषों तथा गन्धर्वों से घिरे थे,

श्लोक 19 (3.147.19)

मयूरैश्चमरैश्चैव हरिणै रुरुभिस्तथा । वराहैर्गवयैश्चैव महिषैश्च समावृतान् ॥

mayūraiścamaraiścaiva hariṇai rurubhistathā | varāhairgavayaiścaiva mahiṣaiśca samāvṛtān

जो मोरों और चमरी गायों से, हिरनों और रुरु मृगों से, तथा सूअरों, गवयों और भैंसों से भरे थे,

श्लोक 20 (3.147.20)

नदीजालसमाकीर्णान्नानापक्षियुतान्बहून् । नानाविधमृगैर्जुष्टांश्चारणैश्चोपशोभितान् । समदैश्चापि विहगैः पादपैरन्वितांस्तथा ॥

nadījālasamākīrṇānnānāpakṣiyutānbahūn | nānāvidhamṛgairjuṣṭāṃścāraṇaiścopaśobhitān | samadaiścāpi vihagaiḥ pādapairanvitāṃstathā

नदियों के जाल से भरे, अनेक प्रकार के पक्षियों से युक्त, नाना भाँति के मृगों से सेवित और चारणों से सुशोभित, तथा मतवाले पक्षियों और वृक्षों से सम्पन्न बहुत-से देश।

श्लोक 21 (3.147.21)

तेऽवतीर्य बहून्देशानुत्तरांश्च कुरूनपि । ददृशुर्विविधाश्चर्यं कैलासं पर्वतोत्तमम् ॥

te'vatīrya bahūndeśānuttarāṃśca kurūnapi | dadṛśurvividhāścaryaṃ kailāsaṃ parvatottamam

बहुत-से देशों और उत्तरकुरु को भी पार करके उन्होंने अनेक आश्चर्यों से भरे पर्वतश्रेष्ठ कैलास को देखा।

श्लोक 22 (3.147.22)

तस्याभ्याशे तु ददृशुर्नरनारायणाश्रमम् । उपेतं पादपैर्दिव्यैः सदापुष्पफलोपगैः ॥

tasyābhyāśe tu dadṛśurnaranārāyaṇāśramam | upetaṃ pādapairdivyaiḥ sadāpuṣpaphalopagaiḥ

उसके निकट उन्होंने नर-नारायण का आश्रम देखा, जो सदा फूलों और फलों से लदे दिव्य वृक्षों से घिरा था।

श्लोक 23 (3.147.23)

ददृशुस्तां च बदरीं वृत्तस्कन्धां मनोरमाम् । स्निग्धामविरलच्छायां श्रिया परमया युताम् ॥

dadṛśustāṃ ca badarīṃ vṛttaskandhāṃ manoramām | snigdhāmaviralacchāyāṃ śriyā paramayā yutām

और उन्होंने उस मनोहर बदरी वृक्ष को देखा, जिसका तना गोल था, जिसकी छाया घनी और स्निग्ध थी, और जो परम शोभा से युक्त था;

श्लोक 24 (3.147.24)

पत्रैः स्निग्धैरविरलैरुपेतां मृदुभिः शुभाम् । विशालशाखां विस्तीर्णामतिद्युतिसमन्विताम् ॥

patraiḥ snigdhairaviralairupetāṃ mṛdubhiḥ śubhām | viśālaśākhāṃ vistīrṇāmatidyutisamanvitām

जो कोमल, चिकने और घने पत्तों से युक्त, सुन्दर, फैली हुई चौड़ी शाखाओं वाला और अत्यंत कान्तिमान था;

श्लोक 25 (3.147.25)

फलैरुपचितैर्दिव्यैराचितां स्वादुभिर्भृशम् । मधुस्रवैः सदा दिव्यां महर्षिगणसेविताम् । मदप्रमुदितैर्नित्यं नानाद्विजगणैर्युताम् ॥

phalairupacitairdivyairācitāṃ svādubhirbhṛśam | madhusravaiḥ sadā divyāṃ maharṣigaṇasevitām | madapramuditairnityaṃ nānādvijagaṇairyutām

जो अत्यंत स्वादिष्ट, पुष्ट और सदा मधु टपकाने वाले दिव्य फलों से लदा था, महर्षियों के समूह जिसकी सेवा करते थे, और जो मद से प्रसन्न अनेक प्रकार के पक्षियों के झुंडों से सदा भरा रहता था।

श्लोक 26 (3.147.26)

अदंशमशके देशे बहुमूलफलोदके । नीलशाद्वलसंछन्ने देवगन्धर्वसेविते ॥

adaṃśamaśake deśe bahumūlaphalodake | nīlaśādvalasaṃchanne devagandharvasevite

वह ऐसे स्थान पर उगा था जहाँ डाँस और मच्छर नहीं थे, जहाँ कन्द-मूल, फल और जल प्रचुर थे, जो हरी-नीली घास से ढका था और देवता तथा गन्धर्व जहाँ विचरते थे;

श्लोक 27 (3.147.27)

सुभूमिभागविशदे स्वभावविहिते शुभे । जातां हिममृदुस्पर्शे देशेऽपहतकण्टके ॥

subhūmibhāgaviśade svabhāvavihite śubhe | jātāṃ himamṛdusparśe deśe'pahatakaṇṭake

ऐसे शुभ स्थान पर, जिसकी भूमि स्वच्छ और सुन्दर थी, जो स्वभाव से ही ऐसा बना था, जिसका स्पर्श हिम के समान शीतल और कोमल था, और जहाँ काँटे नहीं थे।

श्लोक 28 (3.147.28)

तामुपेत्य महात्मानः सह तैर्ब्राह्मणर्षभैः । अवतेरुस्ततः सर्वे राक्षसस्कन्धतः शनैः ॥

tāmupetya mahātmānaḥ saha tairbrāhmaṇarṣabhaiḥ | avaterustataḥ sarve rākṣasaskandhataḥ śanaiḥ

उस वृक्ष के पास पहुँचकर वे सब महात्मा उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ धीरे-धीरे राक्षसों के कंधों से नीचे उतरे।

श्लोक 29 (3.147.29)

ततस्तमाश्रमं पुण्यं नरनारायणाश्रितम् । ददृशुः पाण्डवा राजन्सहिता द्विजपुङ्गवैः ॥

tatastamāśramaṃ puṇyaṃ naranārāyaṇāśritam | dadṛśuḥ pāṇḍavā rājansahitā dvijapuṅgavaiḥ

हे राजन्, तब पाण्डवों ने श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ नर-नारायण के निवास वाले उस पवित्र आश्रम को देखा,

श्लोक 30 (3.147.30)

तमसा रहितं पुण्यमनामृष्टं रवेः करैः । क्षुत्तृट्शीतोष्णदोषैश्च वर्जितं शोकनाशनम् ॥

tamasā rahitaṃ puṇyamanāmṛṣṭaṃ raveḥ karaiḥ | kṣuttṛṭśītoṣṇadoṣaiśca varjitaṃ śokanāśanam

जो पवित्र था, अंधकार से रहित था, जिसे सूर्य की किरणें छूती तक नहीं थीं, जो भूख, प्यास, सर्दी और गर्मी के कष्टों से मुक्त था और शोक को मिटा देता था;

श्लोक 31 (3.147.31)

महर्षिगणसंबाधं ब्राह्म्या लक्ष्म्या समन्वितम् । दुष्प्रवेशं महाराज नरैर्धर्मबहिष्कृतैः ॥

maharṣigaṇasaṃbādhaṃ brāhmyā lakṣmyā samanvitam | duṣpraveśaṃ mahārāja narairdharmabahiṣkṛtaiḥ

जो महर्षियों के समूहों से भरा था, ब्राह्मी लक्ष्मी से सम्पन्न था, और हे महाराज, धर्म से विमुख मनुष्यों के लिए जिसमें प्रवेश करना कठिन था;

श्लोक 32 (3.147.32)

बलिहोमार्चितं दिव्यं सुसंमृष्टानुलेपनम् । दिव्यपुष्पोपहारैश्च सर्वतोऽभिविराजितम् ॥

balihomārcitaṃ divyaṃ susaṃmṛṣṭānulepanam | divyapuṣpopahāraiśca sarvato'bhivirājitam

जो दिव्य था, बलि और होम से पूजित था, भली-भाँति बुहारा और लीपा हुआ था, और दिव्य पुष्पों की भेंटों से चारों ओर सुशोभित था;

श्लोक 33 (3.147.33)

विशालैरग्निशरणैः स्रुग्भाण्डैराचितं शुभैः । महद्भिस्तोयकलशैः कठिनैश्चोपशोभितम् ॥

viśālairagniśaraṇaiḥ srugbhāṇḍairācitaṃ śubhaiḥ | mahadbhistoyakalaśaiḥ kaṭhinaiścopaśobhitam

जो विशाल अग्निशालाओं और सुन्दर स्रुवा तथा पात्रों से भरा था, और बड़े-बड़े जल-कलशों तथा छींकों से सुशोभित था;

श्लोक 34 (3.147.34)

शरण्यं सर्वभूतानां ब्रह्मघोषनिनादितम् । दिव्यमाश्रयणीयं तमाश्रमं श्रमनाशनम् । श्रिया युतमनिर्देश्यं देववर्योपशोभितम् ॥

śaraṇyaṃ sarvabhūtānāṃ brahmaghoṣanināditam | divyamāśrayaṇīyaṃ tamāśramaṃ śramanāśanam | śriyā yutamanirdeśyaṃ devavaryopaśobhitam

जो सब प्राणियों को शरण देने वाला था और वेदपाठ की ध्वनि से गूँजता रहता था — वह दिव्य आश्रम आश्रय लेने योग्य, थकान मिटाने वाला, अवर्णनीय शोभा से युक्त और श्रेष्ठ देवताओं से सुशोभित था।

श्लोक 35 (3.147.35)

फलमूलाशनैर्दान्तैश्चारुकृष्णाजिनाम्बरैः । सूर्यवैश्वानरसमैस्तपसा भावितात्मभिः ॥

phalamūlāśanairdāntaiścārukṛṣṇājināmbaraiḥ | sūryavaiśvānarasamaistapasā bhāvitātmabhiḥ

वहाँ फल-मूल खाने वाले, जितेन्द्रिय, सुन्दर काले मृगचर्म पहनने वाले, सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी और तप से शुद्ध हुए अन्तःकरण वाले लोग रहते थे;

श्लोक 36 (3.147.36)

महर्षिभिर्मोक्षपरैर्यतिभिर्नियतेन्द्रियैः । ब्रह्मभूतैर्महाभागैरुपेतं ब्रह्मवादिभिः ॥

maharṣibhirmokṣaparairyatibhirniyatendriyaiḥ | brahmabhūtairmahābhāgairupetaṃ brahmavādibhiḥ

मोक्ष में लगे महर्षि, इन्द्रियों को वश में रखने वाले यति, और ब्रह्मभाव को प्राप्त, ब्रह्म का उपदेश करने वाले महाभाग वहाँ निवास करते थे।

श्लोक 37 (3.147.37)

सोऽभ्यगच्छन्महातेजास्तानृषीन्नियतः शुचिः । भ्रातृभिः सहितो धीमान्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

so'bhyagacchanmahātejāstānṛṣīnniyataḥ śuciḥ | bhrātṛbhiḥ sahito dhīmāndharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

महातेजस्वी, संयमी और पवित्र बुद्धिमान धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ उन ऋषियों के पास गए।

श्लोक 38 (3.147.38)

दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते दृष्ट्वा प्राप्तं युधिष्ठिरम् । अभ्यगच्छन्त सुप्रीता दिव्या देवमहर्षयः ॥

divyajñānopapannāste dṛṣṭvā prāptaṃ yudhiṣṭhiram | abhyagacchanta suprītā divyā devamaharṣayaḥ

युधिष्ठिर को आया देखकर दिव्य ज्ञान से सम्पन्न वे दिव्य देवर्षि अत्यंत प्रसन्न होकर उनसे मिलने आगे आए।

श्लोक 39 (3.147.39)

प्रीतास्ते तस्य सत्कारं विधिना पावकोपमाः । उपाजह्रुश्च सलिलं पुष्पमूलफलं शुचि ॥

prītāste tasya satkāraṃ vidhinā pāvakopamāḥ | upājahruśca salilaṃ puṣpamūlaphalaṃ śuci

अग्नि के समान तेजस्वी उन ऋषियों ने प्रसन्न होकर विधिपूर्वक उनका सत्कार किया और उनके लिए जल तथा पवित्र फूल, कन्द-मूल और फल ले आए।

श्लोक 40 (3.147.40)

स तैः प्रीत्याऽथ सत्कारमुपनीतं महर्षिभिः । प्रयतः प्रतिगृह्याथ धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

sa taiḥ prītyā'tha satkāramupanītaṃ maharṣibhiḥ | prayataḥ pratigṛhyātha dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

धर्मराज युधिष्ठिर ने संयत भाव से महर्षियों द्वारा प्रेमपूर्वक किया गया वह सत्कार स्वीकार किया।

श्लोक 41 (3.147.41)

तं शक्रसदनप्रख्यं दिव्यगन्धं मनोरमम् । प्रीतः स्वर्गोपमं पुण्यं पाण्डवः सह कृष्णया ॥

taṃ śakrasadanaprakhyaṃ divyagandhaṃ manoramam | prītaḥ svargopamaṃ puṇyaṃ pāṇḍavaḥ saha kṛṣṇayā

फिर इन्द्र के भवन के समान, दिव्य सुगन्ध से भरे, मनोरम और स्वर्ग-तुल्य उस पवित्र आश्रम में प्रसन्न पाण्डुपुत्र कृष्णा के साथ

श्लोक 42 (3.147.42)

विवेश शोभया युक्तं भ्रातृभिश्च सहानघ । ब्राह्मणैर्वेदवेदाङ्गपारगैश्च सहार्चितः ॥

viveśa śobhayā yuktaṃ bhrātṛbhiśca sahānagha | brāhmaṇairvedavedāṅgapāragaiśca sahārcitaḥ

— जो शोभा से भरा था — हे निष्पाप, अपने भाइयों और वेद-वेदांगों के पारंगत ब्राह्मणों के साथ सम्मानित होकर प्रविष्ट हुए।

श्लोक 43 (3.147.43)

तत्रापश्यत्स धर्मात्मा देवदेवर्षिपूजितम् । नरनारायणस्थानं भागीरथ्योपशोभितम् ॥

tatrāpaśyatsa dharmātmā devadevarṣipūjitam | naranārāyaṇasthānaṃ bhāgīrathyopaśobhitam

वहाँ उन धर्मात्मा ने देवताओं और देवर्षियों द्वारा पूजित, भागीरथी से सुशोभित नर-नारायण का स्थान देखा।

श्लोक 44 (3.147.44)

तस्मिन्मधुस्रवफलां ब्रह्मर्षिगणभाविनीम् । वदरीं तामुपाश्रित्य पाण्डवो भ्रातृभिः सह ॥

tasminmadhusravaphalāṃ brahmarṣigaṇabhāvinīm | vadarīṃ tāmupāśritya pāṇḍavo bhrātṛbhiḥ saha

वहाँ मधु टपकाने वाले फलों से युक्त और ब्रह्मर्षियों के समूहों द्वारा आदृत उस बदरी वृक्ष का आश्रय लेकर पाण्डुपुत्र अपने भाइयों के साथ रहने लगे।

श्लोक 45 (3.147.45)

मुदा युक्ता महात्मानो रेमिरे तत्र ते तदा । आलोकयन्तो मैनाकं नानाद्विजगणायुतम् । हिरण्यशिखरं चैव मध्ये विन्दुसरः शिवम् ॥

mudā yuktā mahātmāno remire tatra te tadā | ālokayanto mainākaṃ nānādvijagaṇāyutam | hiraṇyaśikharaṃ caiva madhye vindusaraḥ śivam

वे महात्मा वहाँ आनन्द से भरकर सुखपूर्वक रहने लगे। वे अनेक पक्षि-समूहों से भरे मैनाक पर्वत को, हिरण्यशिखर को और उनके बीच स्थित कल्याणकारी बिन्दुसरोवर को देखते रहते थे,

श्लोक 46 (3.147.46)

भागीरथीं सुतीर्थां च शीतामलजलां शिवाम् । मणिप्रवालप्रस्तारां पादपैरुपशोभिताम् ॥

bhāgīrathīṃ sutīrthāṃ ca śītāmalajalāṃ śivām | maṇipravālaprastārāṃ pādapairupaśobhitām

और सुन्दर घाटों वाली, शीतल, निर्मल और कल्याणकारी जल वाली भागीरथी को भी, जिसकी सीढ़ियाँ मणियों और मूँगों से बनी थीं और जो वृक्षों से सुशोभित थी;

श्लोक 47 (3.147.47)

दिव्यपुष्पसमाकीर्णां मनःप्रीतिविवर्धनीम् । वीक्षमाणा महात्मानो विजह्रुस्तत्र पाण्डवाः ॥

divyapuṣpasamākīrṇāṃ manaḥprītivivardhanīm | vīkṣamāṇā mahātmāno vijahrustatra pāṇḍavāḥ

जो दिव्य पुष्पों से ढकी थी और मन के आनन्द को बढ़ाती थी। उसे निहारते हुए महात्मा पाण्डव वहाँ विहार करने लगे।

श्लोक 48 (3.147.48)

तस्मिन्देवर्षिचरिते देशे परमदुर्गमे । भागीरथीपुण्यजले तर्पयांचक्रिरे पितॄन् । देवानृषींश्च कौन्तेयाः परमं शौचमास्थिताः ॥

tasmindevarṣicarite deśe paramadurgame | bhāgīrathīpuṇyajale tarpayāṃcakrire pitṝn | devānṛṣīṃśca kaunteyāḥ paramaṃ śaucamāsthitāḥ

देवर्षियों द्वारा सेवित उस अत्यंत दुर्गम स्थान में परम पवित्रता का पालन करते हुए कुन्तीपुत्रों ने भागीरथी के पवित्र जल में पितरों, देवताओं और ऋषियों का तर्पण किया।

श्लोक 49 (3.147.49)

तत्र ते तर्पयन्तश्च जपन्तश्च कुरूद्वहाः । ब्राह्मणैः सहिता वीरा ह्यवसन्पुरुषर्षभाः ॥

tatra te tarpayantaśca japantaśca kurūdvahāḥ | brāhmaṇaiḥ sahitā vīrā hyavasanpuruṣarṣabhāḥ

वहाँ वे कुरुश्रेष्ठ, पुरुषों में श्रेष्ठ वीर, तर्पण और जप करते हुए ब्राह्मणों के साथ रहने लगे।

श्लोक 50 (3.147.50)

कृष्णायास्तत्र पश्यन्तः क्रीडितान्यमरप्रभाः । विचित्राणि नरव्याघ्रा रेमिरे तत्र पाण्डवाः ॥

kṛṣṇāyāstatra paśyantaḥ krīḍitānyamaraprabhāḥ | vicitrāṇi naravyāghrā remire tatra pāṇḍavāḥ

वहाँ कृष्णा की भाँति-भाँति की मनोहर क्रीड़ाएँ देखते हुए देवताओं के समान कान्तिमान, नरश्रेष्ठ पाण्डव आनन्दपूर्वक रहने लगे।

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