आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 148
सौगन्धिक कमल: भीम की हनुमान् से भेंट
गन्धमादन पर अर्जुन की प्रतीक्षा करते समय वायु एक सहस्रदल सौगन्धिक कमल द्रौपदी के पास ले आती है, और वह भीम से वैसे ही और फूल लाने को कहती है। भीम पर्वत पर चढ़ते हैं — पशुओं को खदेड़ते, केले के वृक्ष उखाड़ते और एक सरोवर में क्रीड़ा करते हुए — और उनकी गर्जना से हनुमान् जाग उठते हैं, जो अपने भाई की रक्षा के लिए स्वर्ग के सँकरे मार्ग पर लेटे हैं। केला-वन में भीम उस तेजस्वी वानर को पाते हैं; हनुमान् उनकी हिंसा के लिए उन्हें डाँटते हैं, बताते हैं कि आगे कोई मनुष्य नहीं जा सकता, और फल खाकर लौट जाने को कहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.148.1)
तत्र ते पुरुषव्याघ्राः परमं शौचमास्थिताः । षड्रात्रमवसन्वीरा धनंजयदिदृक्षया ॥
tatra te puruṣavyāghrāḥ paramaṃ śaucamāsthitāḥ | ṣaḍrātramavasanvīrā dhanaṃjayadidṛkṣayā
वहाँ वे पुरुषसिंह वीर परम पवित्रता का पालन करते हुए धनंजय (अर्जुन) के दर्शन की लालसा से छह रातें ठहरे।
श्लोक 2 (3.148.2)
तस्मिन्विहरमाणाश्च रममाणाश्च पाण्डवाः । मनोज्ञे काननवरे सर्वभूतमनोरमे ॥
tasminviharamāṇāśca ramamāṇāśca pāṇḍavāḥ | manojñe kānanavare sarvabhūtamanorame
सब प्राणियों का मन मोहनेवाले उस सुन्दर, श्रेष्ठ वन में पाण्डव विहार और आमोद-प्रमोद करते रहे।
श्लोक 3 (3.148.3)
पादपैः पुष्पविकचैः फलभारावनामितैः । शोभितः पर्वतो रम्यः पुंस्कोकिलकुलाकुलैः । स्निग्धपत्रैरविरलैः शीतच्छायैर्मनोरमैः ॥
pādapaiḥ puṣpavikacaiḥ phalabhārāvanāmitaiḥ | śobhitaḥ parvato ramyaḥ puṃskokilakulākulaiḥ | snigdhapatrairaviralaiḥ śītacchāyairmanoramaiḥ
वह रमणीय पर्वत खिले फूलों वाले और फलों के भार से झुके वृक्षों से सुशोभित था, जिन पर नर कोकिलों के झुंड भरे रहते थे; उनके पत्ते चिकने और घने थे और छाया शीतल तथा मनोहर थी।
श्लोक 4 (3.148.4)
सरांसि च विचित्राणि प्रसन्नसलिलानि च । कमलैः सोत्पलैस्तत्रभ्राजमानानि सर्वशः । पश्यन्तश्चारुरूपाणि रेमिरे तत्र पाण्डवाः ॥
sarāṃsi ca vicitrāṇi prasannasalilāni ca | kamalaiḥ sotpalaistatrabhrājamānāni sarvaśaḥ | paśyantaścārurūpāṇi remire tatra pāṇḍavāḥ
वहाँ स्वच्छ जल वाले, कमलों और उत्पलों से चारों ओर शोभायमान, भाँति-भाँति के सुन्दर सरोवरों को देखते हुए पाण्डव आनन्द मनाते रहे।
श्लोक 5 (3.148.5)
पुण्यगन्धः सुखस्पर्शो ववौ तत्र समीरणः । ह्लादयन्पाण्डवान्सर्वान्सकृष्णान्सद्विजर्षभान् ॥
puṇyagandhaḥ sukhasparśo vavau tatra samīraṇaḥ | hlādayanpāṇḍavānsarvānsakṛṣṇānsadvijarṣabhān
वहाँ पवित्र सुगन्ध वाली, सुखद स्पर्श वाली वायु बहती थी, जो द्रौपदी और श्रेष्ठ ब्राह्मणों सहित सभी पाण्डवों को आनन्दित करती थी।
श्लोक 6 (3.148.6)
ततः पूर्वोत्तरे वायुः प्लवमानो यदृच्छया । सहस्रपत्रमर्काभं दिव्यं पद्ममुपाहरत् ॥
tataḥ pūrvottare vāyuḥ plavamāno yadṛcchayā | sahasrapatramarkābhaṃ divyaṃ padmamupāharat
तब संयोग से ईशान कोण से बहती वायु सूर्य के समान दीप्तिमान, सहस्र पंखुड़ियों वाला एक दिव्य कमल उड़ा लाई।
श्लोक 7 (3.148.7)
तदवैक्षत पाञ्चाली दिव्यगन्धं मनोरमम् । अनिलेनाहृतंभूमौ पतितं जलजं शुचि ॥
tadavaikṣata pāñcālī divyagandhaṃ manoramam | anilenāhṛtaṃbhūmau patitaṃ jalajaṃ śuci
पाञ्चाली ने उसे देखा — दिव्य सुगन्ध वाला, मनोहर, पवित्र जलज पुष्प, जिसे वायु उड़ाकर लाई थी और जो भूमि पर आ गिरा था।
श्लोक 8 (3.148.8)
तच्छुभा शुभमासाद्य सौगन्धिकमनुत्तमम् । अतीव मुदिता राजन्भीमसेनमथाब्रवीत् ॥
tacchubhā śubhamāsādya saugandhikamanuttamam | atīva muditā rājanbhīmasenamathābravīt
हे राजन्, उस अनुपम, सुन्दर सौगन्धिक कमल को पाकर वह कल्याणी अत्यन्त प्रसन्न हुई और भीमसेन से बोली —
द्रौपद्युवाच
श्लोक 9 (3.148.9)
पश्य दिव्यं सुरुचिरं भीम पुष्पमनुत्तमम् । गन्धसंस्थानसंपन्नं मनसो मम नन्दनम् ॥
paśya divyaṃ suruciraṃ bhīma puṣpamanuttamam | gandhasaṃsthānasaṃpannaṃ manaso mama nandanam
"भीम, देखो यह दिव्य, अत्यन्त सुन्दर, अनुपम पुष्प — सुगन्ध और आकार दोनों से सम्पन्न। यह मेरे मन को आनन्दित करता है।
श्लोक 10 (3.148.10)
इदं च धर्मराजाय प्रदास्यामि परंतप । गृह्यापराणि पुष्पाणि बहूनि पुरुषर्षभ । हरेरिदं मे कामाय काम्यके पुनराश्रमे ॥
idaṃ ca dharmarājāya pradāsyāmi paraṃtapa | gṛhyāparāṇi puṣpāṇi bahūni puruṣarṣabha | hareridaṃ me kāmāya kāmyake punarāśrame
हे परंतप, यह पुष्प मैं धर्मराज को दूँगी। हे पुरुषश्रेष्ठ, और भी बहुत-से फूल चुन लो; मेरी प्रसन्नता के लिए उन्हें ले आओ, ताकि मैं उन्हें फिर काम्यक के आश्रम में ले चलूँ।
श्लोक 11 (3.148.11)
यदि तेऽहं प्रिया पार्थ बहूनीमान्युपाहर । तान्यहं नेतुमिच्छामि काम्यकं पुनराश्रमम् ॥
yadi te'haṃ priyā pārtha bahūnīmānyupāhara | tānyahaṃ netumicchāmi kāmyakaṃ punarāśramam
हे पार्थ, यदि मैं तुम्हें प्रिय हूँ तो ऐसे बहुत-से फूल ले आओ। मैं इन्हें काम्यक के आश्रम में ले जाना चाहती हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (3.148.12)
एवमुक्त्वा तु पाञ्चाली भीमसेनमनिन्दिता । जगाम पुष्पमादाय धर्मराजाय तत्तदा ॥
evamuktvā tu pāñcālī bhīmasenamaninditā | jagāma puṣpamādāya dharmarājāya tattadā
भीमसेन से ऐसा कहकर निर्दोष पाञ्चाली वह पुष्प लेकर उसी समय धर्मराज के पास चली गई।
श्लोक 13 (3.148.13)
अभिप्रायं तु विज्ञाय महिष्याः पुरुषर्षभः । प्रियायाः प्रियकामः स प्रायाद्भीमो महाबलः ॥
abhiprāyaṃ tu vijñāya mahiṣyāḥ puruṣarṣabhaḥ | priyāyāḥ priyakāmaḥ sa prāyādbhīmo mahābalaḥ
अपनी प्रिय रानी की इच्छा समझकर, उसका प्रिय करने की कामना से वह पुरुषश्रेष्ठ महाबली भीम चल पड़ा।
श्लोक 14 (3.148.14)
वातं तमेवाभिमुखो यतस्तत्पुष्पमागतम् । आजिहीर्षुर्जगामाशु सपुष्पाण्यपराण्यपि ॥
vātaṃ tamevābhimukho yatastatpuṣpamāgatam | ājihīrṣurjagāmāśu sapuṣpāṇyaparāṇyapi
जिस ओर से वह पुष्प आया था, उसी वायु की ओर मुख करके वह और भी फूल लाने की इच्छा से तेज़ी से चल पड़ा।
श्लोक 15 (3.148.15)
रुक्मपृष्ठं धनुर्गृह्य शरांश्चाशीविषोपमान् । मृगराडिव संक्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः । ददृशुः सर्वभूतानि महाबाणधनुर्धरम् ॥
rukmapṛṣṭhaṃ dhanurgṛhya śarāṃścāśīviṣopamān | mṛgarāḍiva saṃkruddhaḥ prabhinna iva kuñjaraḥ | dadṛśuḥ sarvabhūtāni mahābāṇadhanurdharam
सोने से मढ़ी पीठ वाला धनुष और विषधर सर्पों जैसे बाण लेकर वह क्रुद्ध सिंह और मदमत्त हाथी की भाँति चला; सब प्राणियों ने उस महान् धनुष-बाणधारी को देखा।
श्लोक 16 (3.148.16)
न ग्लानिर्न च वैक्लव्यं न भयं न च संभ्रमः । कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः ॥
na glānirna ca vaiklavyaṃ na bhayaṃ na ca saṃbhramaḥ | kadācijjuṣate pārthamātmajaṃ mātariśvanaḥ
वायुपुत्र पार्थ (भीम) को कभी न थकान छूती थी, न व्याकुलता, न भय और न घबराहट।
श्लोक 17 (3.148.17)
द्रौपद्याः प्रियमन्विच्छन्स बाहुबलमाश्रितः । व्यपेतभयसंमोहः शैलमभ्यपतद्बली ॥
draupadyāḥ priyamanvicchansa bāhubalamāśritaḥ | vyapetabhayasaṃmohaḥ śailamabhyapatadbalī
द्रौपदी का प्रिय करने की इच्छा से, अपनी भुजाओं के बल का भरोसा करके, भय और मोह से मुक्त वह बलवान पर्वत पर चढ़ चला।
श्लोक 18 (3.148.18)
स तं द्रुमलतागुल्मच्छन्नं नीलशिलातलम् । गिरिं चचारारिहरः किन्नराचरितं शुभम् ॥
sa taṃ drumalatāgulmacchannaṃ nīlaśilātalam | giriṃ cacārāriharaḥ kinnarācaritaṃ śubham
शत्रुओं का संहार करनेवाला वह भीम वृक्षों, लताओं और झाड़ियों से ढके, नीली शिलाओं वाले, किन्नरों के विचरण-स्थल उस सुन्दर पर्वत पर घूमने लगा,
श्लोक 19 (3.148.19)
नानावर्णधरैश्चित्रं धातुद्रुममृगाण्डजैः । सर्वभूषणसंपूर्णं भूमेर्भुजमिवोच्छ्रितम् ॥
nānāvarṇadharaiścitraṃ dhātudrumamṛgāṇḍajaiḥ | sarvabhūṣaṇasaṃpūrṇaṃ bhūmerbhujamivocchritam
जो अनेक रंगों के धातुओं, वृक्षों, पशुओं और पक्षियों से चित्रित था, सब प्रकार के आभूषणों से भरा था और पृथ्वी की उठी हुई भुजा-सा ऊँचा खड़ा था।
श्लोक 20 (3.148.20)
सर्वर्तुरमणीयेषु गन्धमादनसानुषु । सक्तचक्षुरभिप्रायान्हृदयेनानुचिन्तयन् ॥
sarvarturamaṇīyeṣu gandhamādanasānuṣu | saktacakṣurabhiprāyānhṛdayenānucintayan
सभी ऋतुओं में रमणीय गन्धमादन की ढलानों पर दृष्टि जमाए वह मन ही मन अपने संकल्पों पर विचार करता चला।
श्लोक 21 (3.148.21)
पुंस्कोकिलनिनादेषु षट्पदाचरितेषु च । बद्धश्रोत्रमनश्चक्षुर्जगामामितविक्रमः ॥
puṃskokilaninādeṣu ṣaṭpadācariteṣu ca | baddhaśrotramanaścakṣurjagāmāmitavikramaḥ
नर कोकिलों की कूक से गूँजते और भौंरों से भरे स्थानों में कान, मन और आँखें लगाए वह अपार पराक्रमी आगे बढ़ता गया।
श्लोक 22 (3.148.22)
आजिघ्रन्स महातेजाः सर्वर्तुकुसुमोद्भवम् । गन्धमुद्धतमुद्दामो वने मत्त इव द्विपः ॥
ājighransa mahātejāḥ sarvartukusumodbhavam | gandhamuddhatamuddāmo vane matta iva dvipaḥ
सभी ऋतुओं के फूलों से उठती तीव्र सुगन्ध को सूँघता हुआ वह महातेजस्वी वन में मदमत्त हाथी की भाँति उन्मुक्त होकर चला,
श्लोक 23 (3.148.23)
वीज्यमानः सुपुण्येन नानाकुसुमगन्धिना । पितुः संस्पर्शशीतेन गन्धमादनवायुना ॥
vījyamānaḥ supuṇyena nānākusumagandhinā | pituḥ saṃsparśaśītena gandhamādanavāyunā
अनेक फूलों की सुगन्ध से भरी, पिता के स्पर्श-सी शीतल, पवित्र गन्धमादन-वायु से पंखा झलवाता हुआ,
श्लोक 24 (3.148.24)
ह्रियमाणश्रमः पित्रा संप्रहृष्टतनूरुहः ॥
hriyamāṇaśramaḥ pitrā saṃprahṛṣṭatanūruhaḥ
पिता (वायु) ने उसकी थकान हर ली थी और हर्ष से उसके रोंगटे खड़े हो गए थे।
श्लोक 25 (3.148.25)
स यक्षगन्धर्वसुरब्रह्मर्षिगणसेवितम् । विलोकयामास तदा पुष्पहेतोररिंदमः ॥
sa yakṣagandharvasurabrahmarṣigaṇasevitam | vilokayāmāsa tadā puṣpahetorariṃdamaḥ
पुष्प की खोज में उस शत्रुदमन ने तब यक्षों, गन्धर्वों, देवताओं और ब्रह्मर्षियों के समूहों से सेवित उस पर्वत को निहारा।
श्लोक 26 (3.148.26)
विषमच्छदैरचितैरनुलिप्त इवाङ्गुलैः । विमलैर्धातुविच्छेदैः काञ्चनाञ्जनराजतैः ॥
viṣamacchadairacitairanulipta ivāṅgulaiḥ | vimalairdhātuvicchedaiḥ kāñcanāñjanarājataiḥ
सप्तपर्ण आदि वृक्षों और सुनहरी, काली तथा रुपहली धातुओं की स्वच्छ धारियों से वह ऐसा लगता था मानो उँगलियों से उस पर रंग का लेप किया गया हो।
श्लोक 27 (3.148.27)
सपक्षमिव नृत्यन्तं पार्श्वलग्नैः पयोधरैः । मुक्ताहारैरिव चितं च्युतैः प्रस्रवणोदकैः ॥
sapakṣamiva nṛtyantaṃ pārśvalagnaiḥ payodharaiḥ | muktāhārairiva citaṃ cyutaiḥ prasravaṇodakaiḥ
उसकी बगलों से सटे बादलों के कारण वह मानो पंख फैलाकर नाचता प्रतीत होता था, और झरनों के गिरते जल से ऐसा लगता था मानो मोतियों के हार पहने हो।
श्लोक 28 (3.148.28)
अभिरामदरीकुञ्जनिर्झरोदककन्दरम् । अप्सरोनूपुररवैः प्रनृत्तवरबर्हिणम् ॥
abhirāmadarīkuñjanirjharodakakandaram | apsaronūpuraravaiḥ pranṛttavarabarhiṇam
उसमें मनोहर कन्दराएँ, कुञ्ज, झरने और गहरे खड्ड थे, और अप्सराओं के नूपुरों की झनकार पर सुन्दर मोर नाचते थे।
श्लोक 29 (3.148.29)
दिग्वारणविषाणाग्रैर्घृष्टोपलशिलातलम् । स्रस्तांशुकमिवाक्षोभ्यैर्निम्नगानिःसृतैर्जलैः ॥
digvāraṇaviṣāṇāgrairghṛṣṭopalaśilātalam | srastāṃśukamivākṣobhyairnimnagāniḥsṛtairjalaiḥ
दिग्गजों के दाँतों की नोकों से उसकी चट्टानें और शिलाएँ घिस गई थीं, और उससे निकलती नदियों की अविचल धाराओं से वह ऐसा लगता था मानो उसका वस्त्र खिसक गया हो।
श्लोक 30 (3.148.30)
सशष्पकबलैः स्वस्थैरदूरपरिवर्तिभिः । भयानभिज्ञैर्हरिणैः कौतूहलनिरीक्षितः ॥
saśaṣpakabalaiḥ svasthairadūraparivartibhiḥ | bhayānabhijñairhariṇaiḥ kautūhalanirīkṣitaḥ
भय से अनजान, निश्चिन्त हिरण मुँह में कोमल घास के कौर लिए पास ही घूमते हुए उसे कौतूहल से निहारते रहे।
श्लोक 31 (3.148.31)
चालयानः स्ववेगेन लताजालान्यनेकशः । आक्रीडमानः कौन्तेयः श्रीमान्वायुसुतो ययौ ॥
cālayānaḥ svavegena latājālānyanekaśaḥ | ākrīḍamānaḥ kaunteyaḥ śrīmānvāyusuto yayau
अपने वेग से लता-जालों को बार-बार हिलाता हुआ, खेलता-सा, वह श्रीमान् कुन्तीपुत्र वायुपुत्र आगे बढ़ा,
श्लोक 32 (3.148.32)
प्रियामनोरथं कर्तुमुद्यतश्चारुलोचनः । प्रांशुः कनकवर्णाभः सिंहसंहननो युवा ॥
priyāmanorathaṃ kartumudyataścārulocanaḥ | prāṃśuḥ kanakavarṇābhaḥ siṃhasaṃhanano yuvā
प्रिया का मनोरथ पूरा करने को उद्यत — सुन्दर नेत्रों वाला, ऊँचा, स्वर्ण-सी कान्ति वाला, सिंह-सी सुगठित देह वाला युवक,
श्लोक 33 (3.148.33)
मत्तवारणविक्रान्तो मत्तवारणवेगवान् । मत्तवारणताम्राक्षो मत्तवारणवारणः ॥
mattavāraṇavikrānto mattavāraṇavegavān | mattavāraṇatāmrākṣo mattavāraṇavāraṇaḥ
मतवाले हाथी जैसी चाल वाला, मतवाले हाथी जैसा वेगवान्, मतवाले हाथी जैसी लाल आँखों वाला और मतवाले हाथी को भी रोक देनेवाला।
श्लोक 34 (3.148.34)
प्रियपार्श्वोपविष्टाभिर्व्यावृत्ताभिर्विचेष्टितैः । यक्षगन्धर्वयोषाभिरदृश्याभिर्निरीक्षितः ॥
priyapārśvopaviṣṭābhirvyāvṛttābhirviceṣṭitaiḥ | yakṣagandharvayoṣābhiradṛśyābhirnirīkṣitaḥ
अपने प्रियतमों के पास बैठी यक्षों और गन्धर्वों की अदृश्य स्त्रियाँ मुड़कर, निश्चल होकर उसे निहारती रहीं।
श्लोक 35 (3.148.35)
नवावतारं रूपस्य विक्रीडन्निव पाण्डवः । चचार रमणीयेषु गन्धमादनसानुषु ॥
navāvatāraṃ rūpasya vikrīḍanniva pāṇḍavaḥ | cacāra ramaṇīyeṣu gandhamādanasānuṣu
सौन्दर्य के नए अवतार-सा वह पाण्डव मानो क्रीड़ा करता हुआ गन्धमादन की रमणीय ढलानों पर विचरता रहा,
श्लोक 36 (3.148.36)
संस्मरन्विविधान्क्लेशान्दुर्योधनकृतान्बहून् । द्रौपद्या वनवासिन्याः प्रियं कर्तुं समुद्यतः ॥
saṃsmaranvividhānkleśānduryodhanakṛtānbahūn | draupadyā vanavāsinyāḥ priyaṃ kartuṃ samudyataḥ
दुर्योधन के दिए अनेक कष्टों को याद करता हुआ और वनवासिनी द्रौपदी का प्रिय करने को तत्पर।
श्लोक 37 (3.148.37)
सोऽचिन्तयत्तथा पार्थे मयि त्वतिविलम्बिते । पुष्पहेतोः कथं त्वार्यः करिष्यति युधिष्ठिरः ॥
so'cintayattathā pārthe mayi tvativilambite | puṣpahetoḥ kathaṃ tvāryaḥ kariṣyati yudhiṣṭhiraḥ
उसने सोचा — "अर्जुन तो दूर हैं; यदि मैं भी बहुत देर कर दूँ, तो फूलों के लिए आर्य युधिष्ठिर क्या करेंगे?
श्लोक 38 (3.148.38)
स्नेहान्नरवरो नूनमविश्वासाद्बलस्य च । नकुलं सहदेवं च न मोक्ष्यति युधिष्ठिरः ॥
snehānnaravaro nūnamaviśvāsādbalasya ca | nakulaṃ sahadevaṃ ca na mokṣyati yudhiṣṭhiraḥ
निश्चय ही नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर स्नेह के कारण और उनके बल पर भरोसा न होने से नकुल और सहदेव को नहीं भेजेंगे।"
श्लोक 39 (3.148.39)
कथं नु कुसुमावाप्तिः स्याच्छीघ्रमिति चिन्तयन् । प्रतस्थे नरशार्दूलः पक्षिराडिव वेगितः ॥
kathaṃ nu kusumāvāptiḥ syācchīghramiti cintayan | pratasthe naraśārdūlaḥ pakṣirāḍiva vegitaḥ
"फूल शीघ्र कैसे मिलें?" — यही सोचता हुआ वह नरशार्दूल पक्षिराज गरुड़ के समान वेग से चल पड़ा।
श्लोक 40 (3.148.40)
सज्जमानमनोदृष्टिः फुल्लेषु गिरिसानुषु । द्रौपदीवाक्यपाथेयो भीमः शीघ्रतरं ययौ ॥
sajjamānamanodṛṣṭiḥ phulleṣu girisānuṣu | draupadīvākyapātheyo bhīmaḥ śīghrataraṃ yayau
खिले हुए पर्वत-शिखरों में मन और दृष्टि उलझाए, द्रौपदी के वचनों को पाथेय बनाकर भीम और भी तेज़ी से चला।
श्लोक 41 (3.148.41)
कम्पयन्मेदिनीं पद्भ्यां निर्घात इव पर्वसु । त्रासयन्गजयूथानि वातरंहा वृकोदरः ॥
kampayanmedinīṃ padbhyāṃ nirghāta iva parvasu | trāsayangajayūthāni vātaraṃhā vṛkodaraḥ
पर्व के दिनों में होनेवाले उत्पात-सूचक वज्रपात की भाँति पैरों से धरती को कँपाता, हाथियों के झुंडों को डराता हुआ वायु-वेग से वृकोदर चला,
श्लोक 42 (3.148.42)
सिंहव्याघ्रमृगांश्चैव मर्दयानो महाबलः । उन्मूलयन्महावृक्षान्पोथयंश्चोरसा बली ॥
siṃhavyāghramṛgāṃścaiva mardayāno mahābalaḥ | unmūlayanmahāvṛkṣānpothayaṃścorasā balī
सिंहों, बाघों और मृगों को रौंदता, बड़े-बड़े वृक्षों को उखाड़ता और छाती से उन्हें तोड़ता हुआ वह महाबली,
श्लोक 43 (3.148.43)
लतावल्लीश्च वेगेन विकर्षन्पाण्डुनन्दनः । उपर्युपरि शैलाग्रमारुरुक्षुरिव द्विपः ॥
latāvallīśca vegena vikarṣanpāṇḍunandanaḥ | uparyupari śailāgramārurukṣuriva dvipaḥ
अपने वेग से लताओं और बेलों को खींचता हुआ पाण्डुनन्दन, पर्वत-शिखर पर चढ़ने को उत्सुक हाथी की भाँति, ऊपर और ऊपर बढ़ता गया।
श्लोक 44 (3.148.44)
जलावलम्बोऽतिभृशं सविद्युदिव तोयदः । व्यनदत्स महानादं भीमसेनो महाबलः ॥
jalāvalambo'tibhṛśaṃ savidyudiva toyadaḥ | vyanadatsa mahānādaṃ bhīmaseno mahābalaḥ
जल से भरे, बिजली से चमकते मेघ की भाँति महाबली भीमसेन ने ज़ोर से महान् गर्जना की।
श्लोक 45 (3.148.45)
तेन शब्देन महता भीमस्य प्रतिबोधिताः । गुहां संतत्यजुर्व्याघ्रा निलिल्युर्वनवासिनः ॥
tena śabdena mahatā bhīmasya pratibodhitāḥ | guhāṃ saṃtatyajurvyāghrā nililyurvanavāsinaḥ
भीम के उस महान् शब्द से जागकर बाघों ने अपनी गुफाएँ छोड़ दीं और वन के जीव छिप गए।
श्लोक 46 (3.148.46)
समुत्पेतुः खगास्त्रस्ता मृगयूथानि दुद्रुवुः । ऋक्षाश्चोत्ससृजर्वृक्षांस्तत्यजुर्हरयो गुहाम् । व्यजृम्भन्त महासिंहा महिषाश्च वनेचराः ॥
samutpetuḥ khagāstrastā mṛgayūthāni dudruvuḥ | ṛkṣāścotsasṛjarvṛkṣāṃstatyajurharayo guhām | vyajṛmbhanta mahāsiṃhā mahiṣāśca vanecarāḥ
डरे हुए पक्षी उड़ गए, मृगों के झुंड भाग खड़े हुए, रीछों ने पेड़ और वानरों ने गुफाएँ छोड़ दीं; बड़े-बड़े सिंह और वन के भैंसे अँगड़ाई लेकर उठ खड़े हुए।
श्लोक 47 (3.148.47)
तेन वित्रासिता नागाः करेणुपरिवारिताः । तद्वनं संपरित्यज्य जग्मुरन्यन्महावनम् ॥
tena vitrāsitā nāgāḥ kareṇuparivāritāḥ | tadvanaṃ saṃparityajya jagmuranyanmahāvanam
उससे भयभीत होकर हथिनियों से घिरे हाथी उस वन को छोड़कर दूसरे विशाल वन में चले गए।
श्लोक 48 (3.148.48)
वराहमृगसङ्घाश्च महिषाश्च वनेचराः । व्याघ्रगोमायुसङ्घाश्च प्रणेदुर्गवयैः सह ॥
varāhamṛgasaṅghāśca mahiṣāśca vanecarāḥ | vyāghragomāyusaṅghāśca praṇedurgavayaiḥ saha
सूअरों और मृगों के झुंड, वन के भैंसे और बाघों तथा सियारों के दल गवयों के साथ चिल्ला उठे।
श्लोक 49 (3.148.49)
रथाङ्गसाह्वदात्यूहा हंसकारण्डवप्लवाः । शुकाः पारावताः क्रौञ्चा विसंज्ञा भेजिरे दिशः ॥
rathāṅgasāhvadātyūhā haṃsakāraṇḍavaplavāḥ | śukāḥ pārāvatāḥ krauñcā visaṃjñā bhejire diśaḥ
चक्रवाक, दात्यूह, हंस, कारण्डव और प्लव जलपक्षी, तोते, कबूतर और क्रौञ्च सुध-बुध खोकर दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 50 (3.148.50)
तथाऽन्ये दर्पिता नागाः करेणुशरपीडिताः । सिंहव्याघ्राश्च संक्रुद्धा भीमसेनमथाद्रवन् ॥
tathā'nye darpitā nāgāḥ kareṇuśarapīḍitāḥ | siṃhavyāghrāśca saṃkruddhā bhīmasenamathādravan
तब दूसरे घमंडी हाथी, हथिनियों द्वारा उकसाए हुए, और क्रोध से भरे सिंह-बाघ भीमसेन पर टूट पड़े,
श्लोक 51 (3.148.51)
शकृन्मूत्रं च मुञ्चाना भयविभ्रान्तमानसाः । व्यादितास्या महारौद्रा व्यनदन्भीषणान्रवान् ॥
śakṛnmūtraṃ ca muñcānā bhayavibhrāntamānasāḥ | vyāditāsyā mahāraudrā vyanadanbhīṣaṇānravān
भय से विक्षिप्त मन वाले, मल-मूत्र छोड़ते, मुँह फाड़े वे भयंकर जीव भीषण गर्जना करने लगे।
श्लोक 52 (3.148.52)
ततो वायुसुतः क्रोधात्स्वबाहुबलमाश्रितः । गजेनान्यान्गजान्श्रीमान्सिंहं सिंहेन वा विभुः । तलप्रहारैरन्यांश्च व्यहनत्पाण्डवो बली ॥
tato vāyusutaḥ krodhātsvabāhubalamāśritaḥ | gajenānyāngajānśrīmānsiṃhaṃ siṃhena vā vibhuḥ | talaprahārairanyāṃśca vyahanatpāṇḍavo balī
तब क्रोध में भरकर अपनी भुजाओं के बल के सहारे उस श्रीमान्, बलवान् पाण्डव वायुपुत्र ने हाथियों को हाथी से और सिंह को सिंह से मारा, और दूसरों को थप्पड़ों के प्रहार से मार गिराया।
श्लोक 53 (3.148.53)
ते वध्यमाना भीमेन सिंहव्याघ्रतरक्षवः । भयाद्विससृजुर्भीमं शकृन्मूत्रं च सुस्रुवुः ॥
te vadhyamānā bhīmena siṃhavyāghratarakṣavaḥ | bhayādvisasṛjurbhīmaṃ śakṛnmūtraṃ ca susruvuḥ
भीम की मार खाकर सिंह, बाघ और लकड़बग्घे डर के मारे भीम को छोड़कर हट गए और मल-मूत्र त्यागने लगे।
श्लोक 54 (3.148.54)
प्रविवेश ततः क्षिप्रं तानपास्य महाबलः । वनं पाण्डुसुतः श्रीमाञ्शब्देनापूरयन्दिशः ॥
praviveśa tataḥ kṣipraṃ tānapāsya mahābalaḥ | vanaṃ pāṇḍusutaḥ śrīmāñśabdenāpūrayandiśaḥ
उन्हें हटाकर वह महाबली, श्रीमान् पाण्डुपुत्र शीघ्र ही वन में घुस गया और अपनी गर्जना से दिशाओं को भर दिया।
श्लोक 55 (3.148.55)
अथापश्यन्महाबाहुर्गन्धमादनसानुषु । सुरम्यं कदलीषण्डं बहुयोजनविस्तृतम् ॥
athāpaśyanmahābāhurgandhamādanasānuṣu | suramyaṃ kadalīṣaṇḍaṃ bahuyojanavistṛtam
तब उस महाबाहु ने गन्धमादन की ढलानों पर कई योजन में फैला केलों का एक सुन्दर वन देखा।
श्लोक 56 (3.148.56)
तमभ्यगच्छद्वेगेन क्षोभयिष्यन्महाबलः । महागज इवास्रावी प्रभञ्जन्विविधान्द्रुमान् ॥
tamabhyagacchadvegena kṣobhayiṣyanmahābalaḥ | mahāgaja ivāsrāvī prabhañjanvividhāndrumān
मदमत्त महागज की भाँति भाँति-भाँति के वृक्षों को तोड़ता हुआ वह महाबली उसे मथ डालने के लिए वेग से उसकी ओर बढ़ा।
श्लोक 57 (3.148.57)
उत्पाट्य कदलीस्तम्भान्बहुतालसमुच्छ्रयान् । चिक्षेप तरसा भीमः समन्ताद्बलिनां वरः । विमर्दन्सुमहातेजा नृसिंह इव दर्पितः ॥
utpāṭya kadalīstambhānbahutālasamucchrayān | cikṣepa tarasā bhīmaḥ samantādbalināṃ varaḥ | vimardansumahātejā nṛsiṃha iva darpitaḥ
कई ताड़ों जितने ऊँचे केले के तनों को उखाड़कर बलवानों में श्रेष्ठ भीम ने उन्हें बलपूर्वक चारों ओर फेंक दिया; वह महातेजस्वी गर्वीले नरसिंह की भाँति सब कुछ रौंदता गया।
श्लोक 58 (3.148.58)
ततः संन्यपतंस्तत्रसुबहूनि महान्ति च । रुरुवारणयूथानि महिषाश्च जलाश्रयाः ॥
tataḥ saṃnyapataṃstatrasubahūni mahānti ca | ruruvāraṇayūthāni mahiṣāśca jalāśrayāḥ
तब वहाँ बहुत-से विशाल जीव उस पर टूट पड़े — रुरु मृगों और हाथियों के झुंड तथा जल में रहनेवाले भैंसे।
श्लोक 59 (3.148.59)
प्रविवेश ततः क्षिप्रं तानपास्य महाबलः । वनं पाण्डुसुतः श्रीमान्नादेनापूरयन्दिशः ॥
praviveśa tataḥ kṣipraṃ tānapāsya mahābalaḥ | vanaṃ pāṇḍusutaḥ śrīmānnādenāpūrayandiśaḥ
उन्हें हटाकर वह महाबली, श्रीमान् पाण्डुपुत्र शीघ्र ही वन में घुस गया और अपने नाद से दिशाओं को भर दिया।
श्लोक 60 (3.148.60)
तेन शब्देन चैवाथ भीमसेनरवेण च । वनान्तरगताश्चापि वित्रेसुर्मृगपक्षिणः ॥
tena śabdena caivātha bhīmasenaraveṇa ca | vanāntaragatāścāpi vitresurmṛgapakṣiṇaḥ
उस शब्द से और भीमसेन की गर्जना से वन के भीतर रहनेवाले पशु-पक्षी भी भयभीत हो उठे।
श्लोक 61 (3.148.61)
तस्मिन्नथ प्रवृत्ते तु संक्षोभे मृगपक्षिणाम् । जलार्द्रपक्षा विहगाः समुत्पेतुः सहस्रशः ॥
tasminnatha pravṛtte tu saṃkṣobhe mṛgapakṣiṇām | jalārdrapakṣā vihagāḥ samutpetuḥ sahasraśaḥ
पशु-पक्षियों में यह हलचल मचने पर भीगे पंखों वाले हज़ारों पक्षी उड़ उठे।
श्लोक 62 (3.148.62)
तानौदकान्पक्षिगणान्निरीक्ष्य भरतर्षभः । तानेवानुसरन्रम्यं ददर्श सुमहत्सरः ॥
tānaudakānpakṣigaṇānnirīkṣya bharatarṣabhaḥ | tānevānusaranramyaṃ dadarśa sumahatsaraḥ
उन जलपक्षियों के झुंडों को देखकर भरतश्रेष्ठ उन्हीं के पीछे चला और उसने एक सुन्दर, बहुत बड़ा सरोवर देखा,
श्लोक 63 (3.148.63)
काञ्चनैः कदलीषण्डैर्मन्दमारुतकम्पितैः । वीज्यमानमिवाक्षोभ्यं तीरात्तीरविसर्पिभिः ॥
kāñcanaiḥ kadalīṣaṇḍairmandamārutakampitaiḥ | vījyamānamivākṣobhyaṃ tīrāttīravisarpibhiḥ
जो शान्त था और मानो मन्द वायु से हिलते, एक तट से दूसरे तट तक फैले सुनहरे केला-वनों से पंखा झलवा रहा था।
श्लोक 64 (3.148.64)
तत्सरोऽथावतीर्याशु प्रभूतनलिनोत्पलम् । महागज इवोद्दामश्चिक्रीड बलवद्बली ॥
tatsaro'thāvatīryāśu prabhūtanalinotpalam | mahāgaja ivoddāmaścikrīḍa balavadbalī
कमलों और उत्पलों से भरे उस सरोवर में शीघ्र उतरकर वह बलवान, उन्मुक्त महागज की भाँति पूरे बल से क्रीड़ा करने लगा।
श्लोक 65 (3.148.65)
विक्रीड्यतस्मिन्रुचिरमुत्ततारामितद्युतिः । क्षोभयन्सलिलं भीमः प्रभिन्न इववारणः ॥
vikrīḍyatasminruciramuttatārāmitadyutiḥ | kṣobhayansalilaṃ bhīmaḥ prabhinna ivavāraṇaḥ
वहाँ मनोहर क्रीड़ा करके वह अपार तेजस्वी भीम मदमत्त हाथी की भाँति जल को मथता हुआ बाहर निकला।
श्लोक 66 (3.148.66)
ततो जगाहे वेगेन तद्वनं बहुपादपम् । दध्मौ च शङ्खं स्वनवत्सर्वप्राणेन पाण्डवः । आस्फोटयच्च बलवान्भीमः संनादयन्दिशः ॥
tato jagāhe vegena tadvanaṃ bahupādapam | dadhmau ca śaṅkhaṃ svanavatsarvaprāṇena pāṇḍavaḥ | āsphoṭayacca balavānbhīmaḥ saṃnādayandiśaḥ
तब वह वेग से अनेक वृक्षों वाले उस वन में घुसा, और उस पाण्डव ने पूरी साँस से गूँजता हुआ शंख बजाया; बलवान भीम ने भुजाओं पर ताल ठोककर दिशाओं को गुँजा दिया।
श्लोक 67 (3.148.67)
तस्य शङ्खस्य शब्देन भीमसेनरवेण च । बाहुशब्देन चोग्रेण नदन्तीव गिरेर्गुहाः ॥
tasya śaṅkhasya śabdena bhīmasenaraveṇa ca | bāhuśabdena cogreṇa nadantīva girerguhāḥ
उस शंख की ध्वनि, भीमसेन की गर्जना और भुजाओं की प्रचण्ड थाप से पर्वत की गुफाएँ मानो गरज उठीं।
श्लोक 68 (3.148.68)
तं वज्रनिष्पेषसममास्फोटितमहारवम् । श्रुत्वा शैलगुहासुप्तैः सिंहैर्मुक्तो महास्वनः ॥
taṃ vajraniṣpeṣasamamāsphoṭitamahāravam | śrutvā śailaguhāsuptaiḥ siṃhairmukto mahāsvanaḥ
वज्र-प्रहार के समान भुजाओं की उस महान् थाप को सुनकर पर्वत की गुफाओं में सोए सिंहों ने भारी गर्जना की।
श्लोक 69 (3.148.69)
सिंहनादभयत्रस्तैः कुञ्जरैरपि भारत । मुक्तो विरावः सुमहान्पर्वतो येन पूरितः ॥
siṃhanādabhayatrastaiḥ kuñjarairapi bhārata | mukto virāvaḥ sumahānparvato yena pūritaḥ
हे भारत, सिंहों की गर्जना से भयभीत हाथियों ने भी ऐसी भारी चिंघाड़ लगाई कि पूरा पर्वत उससे भर गया।
श्लोक 70 (3.148.70)
तं तु नादं ततः श्रुत्वा सुप्तो वानरपुङ्गवः ॥
taṃ tu nādaṃ tataḥ śrutvā supto vānarapuṅgavaḥ
उस नाद को सुनकर सोए हुए वानरश्रेष्ठ
श्लोक 71 (3.148.71)
भ्रातरं भीमसेनं तु विज्ञाय हनुमान्कपिः ॥
bhrātaraṃ bhīmasenaṃ tu vijñāya hanumānkapiḥ
हनुमान् कपि ने यह जानकर कि यह मेरा भाई भीमसेन है,
श्लोक 72 (3.148.72)
दिवंगमं रुरोधाथ मार्गं भीमस्य कारणात् । अनेन हि पथा मा वै गच्छेदिति विचार्य सः ॥
divaṃgamaṃ rurodhātha mārgaṃ bhīmasya kāraṇāt | anena hi pathā mā vai gacchediti vicārya saḥ
भीम के कारण स्वर्ग जानेवाले मार्ग को रोक दिया, यह सोचकर कि "वह इस रास्ते से न जाए।"
श्लोक 73 (3.148.73)
आस्त एकायने मार्गे कदलीषण्डमण्डिते । भ्रातुर्भीमस्य रक्षार्थं तं मार्गमवरुध्य वै ॥
āsta ekāyane mārge kadalīṣaṇḍamaṇḍite | bhrāturbhīmasya rakṣārthaṃ taṃ mārgamavarudhya vai
वह केलों के कुंजों से सुशोभित उस सँकरे मार्ग पर, अपने भाई भीम की रक्षा के लिए उस रास्ते को रोककर ठहर गया।
श्लोक 74 (3.148.74)
माऽत्र प्राप्स्यति शापं वा धर्षणां वेति पाण्डवः । कदलीषण्डमध्यस्थो ह्येवं संचिन्त्य वानरः ॥
mā'tra prāpsyati śāpaṃ vā dharṣaṇāṃ veti pāṇḍavaḥ | kadalīṣaṇḍamadhyastho hyevaṃ saṃcintya vānaraḥ
"यहाँ पाण्डव को कोई शाप या तिरस्कार न मिले" — ऐसा सोचकर वह वानर केला-वन के बीच टिक गया।
श्लोक 75 (3.148.75)
प्राजृम्भत महाकायो हनूमान्नाम वानरः । कदलीषण्डमध्यस्थो निद्रावशगतस्तदा ॥
prājṛmbhata mahākāyo hanūmānnāma vānaraḥ | kadalīṣaṇḍamadhyastho nidrāvaśagatastadā
केला-वन के बीच निद्रा के वश में पड़े विशालकाय हनुमान् नामक वानर ने अँगड़ाई ली।
श्लोक 76 (3.148.76)
तेन शब्देन महता व्यबुध्यत महाकपिः । जृम्भमाणः सुविपुलं शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम् । आस्फोटयच्चलाङ्गूलमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥
tena śabdena mahatā vyabudhyata mahākapiḥ | jṛmbhamāṇaḥ suvipulaṃ śakradhvajamivocchritam | āsphoṭayaccalāṅgūlamindrāśanisamasvanam
उस महान् शब्द से जागकर उस महाकपि ने जँभाई लेते हुए इन्द्रध्वज-सी ऊँची उठी अपनी विशाल पूँछ को फटकारा, जिसकी ध्वनि इन्द्र के वज्र जैसी थी।
श्लोक 77 (3.148.77)
तस्य लाङ्गूलनिनदं पर्वतः सुगुहामुखैः । उद्गारमिव गौर्नर्दन्नुत्ससर्ज समन्ततः ॥
tasya lāṅgūlaninadaṃ parvataḥ suguhāmukhaiḥ | udgāramiva gaurnardannutsasarja samantataḥ
पर्वत ने अपनी गुफाओं के मुखों से उस पूँछ की ध्वनि को चारों ओर ऐसे लौटाया, मानो कोई डकारता हुआ बैल गर्जन कर रहा हो।
श्लोक 78 (3.148.78)
लाङ्गूलास्फोटशब्दाच्च चलितः स महागिरिः । विघूर्णमानशिखरः समन्तात्पर्यशीर्यत ॥
lāṅgūlāsphoṭaśabdācca calitaḥ sa mahāgiriḥ | vighūrṇamānaśikharaḥ samantātparyaśīryata
पूँछ फटकारने के शब्द से वह महान् पर्वत हिल उठा; उसके शिखर डगमगाने लगे और वह चारों ओर से टूट-टूटकर बिखरने लगा।
श्लोक 79 (3.148.79)
स लाङ्गूलरवस्तस्य मत्तवारणनिस्वनम् । अन्तर्धायविचित्रेषु चचार गिरिसानुषु ॥
sa lāṅgūlaravastasya mattavāraṇanisvanam | antardhāyavicitreṣu cacāra girisānuṣu
उसकी पूँछ की ध्वनि मदमत्त हाथियों की चिंघाड़ को दबाकर पर्वत की रंग-बिरंगी ढलानों पर फैल गई।
श्लोक 80 (3.148.80)
स भीमसेनस्तच्छ्रुत्वा संप्रहृष्टतनूरुहः । शब्दप्रभवमन्विच्छंश्चचार कदलीवनम् ॥
sa bhīmasenastacchrutvā saṃprahṛṣṭatanūruhaḥ | śabdaprabhavamanvicchaṃścacāra kadalīvanam
उसे सुनकर हर्ष से रोमांचित भीमसेन उस शब्द का स्रोत खोजता हुआ केला-वन में घूमने लगा।
श्लोक 81 (3.148.81)
कदलीवनमध्यस्थमथ पीने शिलातले । ददर्श सुमहाबाहुर्वानराधिपतिं तदा ॥
kadalīvanamadhyasthamatha pīne śilātale | dadarśa sumahābāhurvānarādhipatiṃ tadā
तब उस महाबाहु ने केला-वन के बीच एक चौड़ी शिला पर वानरराज को देखा,
श्लोक 82 (3.148.82)
विद्युत्संपातदुष्प्रेक्षं विद्युत्संपातपिङ्गलम् । विद्युत्संपातनिनदं विद्युत्संपातचञ्चलम् ॥
vidyutsaṃpātaduṣprekṣaṃ vidyutsaṃpātapiṅgalam | vidyutsaṃpātaninadaṃ vidyutsaṃpātacañcalam
जो बिजली की कौंध के समान दुर्दर्श, बिजली की कौंध के समान पिंगल वर्ण, बिजली की कड़क के समान गर्जन वाला और बिजली की कौंध के समान चंचल था,
श्लोक 83 (3.148.83)
बाहुस्वस्तिकविन्यस्तपीनवृत्तशिरोधरम् । स्कन्धभूयिष्ठकायत्वात्तनुमध्यकटीतटम् ॥
bāhusvastikavinyastapīnavṛttaśirodharam | skandhabhūyiṣṭhakāyatvāttanumadhyakaṭītaṭam
जिसकी मोटी, गोल गर्दन भुजाओं के मूल (कंधों) पर टिकी थी, और शरीर का अधिकांश भार कंधों में होने से कमर पतली थी,
श्लोक 84 (3.148.84)
किंचिच्चाभुग्नशीर्षेण दीर्घरोमाञ्चितेन च । लाङ्गूलेनोर्ध्वगतिना ध्वजेनेव विराजितम् ॥
kiṃciccābhugnaśīrṣeṇa dīrgharomāñcitena ca | lāṅgūlenordhvagatinā dhvajeneva virājitam
और जो ऊपर उठी, सिरे पर कुछ मुड़ी, लंबे रोओं से भरी, ध्वजा-सी पूँछ से सुशोभित था।
श्लोक 85 (3.148.85)
ह्रस्वौष्ठं ताम्रजिह्वास्यं रक्तकर्णं चलद्भ्रुवम् । अपश्यद्वदनं तस्य रश्मिवन्तमिवोडुपम् ॥
hrasvauṣṭhaṃ tāmrajihvāsyaṃ raktakarṇaṃ caladbhruvam | apaśyadvadanaṃ tasya raśmivantamivoḍupam
उसने उसका मुख देखा — छोटे होंठ, ताँबे-सी लाल जीभ और मुँह, लाल कान और चंचल भौंहें — किरणों वाले चन्द्रमा के समान,
श्लोक 86 (3.148.86)
वदनाभ्यन्तरगतैः शुक्लैर्दन्तैरलंकृतम् । केसरोत्करसंमिश्रमशोकानामिवोत्करम् ॥
vadanābhyantaragataiḥ śuklairdantairalaṃkṛtam | kesarotkarasaṃmiśramaśokānāmivotkaram
जो मुँह के भीतर के श्वेत दाँतों से सुशोभित था, मानो केसरों के ढेर से मिला अशोक-पुष्पों का गुच्छ हो।
श्लोक 87 (3.148.87)
हिरण्मयीनां मध्यस्थं कदलीनां महाद्युतिम् । दीप्यमानेन वपुषा स्वर्चिष्मन्तमिवानलम् । निरीक्षन्तमपत्रस्तं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः ॥
hiraṇmayīnāṃ madhyasthaṃ kadalīnāṃ mahādyutim | dīpyamānena vapuṣā svarciṣmantamivānalam | nirīkṣantamapatrastaṃ locanairmadhupiṅgalaiḥ
सुनहरे केलों के बीच स्थित, महान् कान्ति वाला, अपने शरीर से प्रज्वलित अग्नि-सा दमकता हुआ वह मधु-जैसी पीली आँखों से निर्भय होकर देख रहा था।
श्लोक 88 (3.148.88)
तं वानरवरं धीमानतिकायं महाबलम् । स्वर्गपन्थानमावृत्य हिमवन्तमिव स्थितम् ॥
taṃ vānaravaraṃ dhīmānatikāyaṃ mahābalam | svargapanthānamāvṛtya himavantamiva sthitam
वह बुद्धिमान, विशालकाय, महाबली वानरश्रेष्ठ स्वर्ग के मार्ग को घेरकर हिमालय के समान स्थित था।
श्लोक 89 (3.148.89)
दृष्ट्वा चैनं महाबाहुरेकं तस्मिन्महावने । अथोपसृत्यतरसा भीमो भीमपराक्रमः ॥
dṛṣṭvā cainaṃ mahābāhurekaṃ tasminmahāvane | athopasṛtyatarasā bhīmo bhīmaparākramaḥ
उस महावन में उसे अकेला देखकर भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीम तेज़ी से उसके पास गया
श्लोक 90 (3.148.90)
सिंहनादं चकारोग्रं वज्राशनिसमं बली । तेन शब्देन भीमस्य वित्रेसुर्मृगपक्षिणः ॥
siṃhanādaṃ cakārograṃ vajrāśanisamaṃ balī | tena śabdena bhīmasya vitresurmṛgapakṣiṇaḥ
और उस बलवान ने वज्रपात के समान भयंकर सिंहनाद किया। भीम के उस शब्द से पशु-पक्षी भयभीत हो उठे।
श्लोक 91 (3.148.91)
हनूमांश्च महासत्त्व ईषदुन्मील्य लोचने । दृष्ट्वा तमथ सावज्ञं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः ॥
hanūmāṃśca mahāsattva īṣadunmīlya locane | dṛṣṭvā tamatha sāvajñaṃ locanairmadhupiṅgalaiḥ
महाबली हनुमान् ने आँखें थोड़ी-सी खोलीं और अपनी मधु-पीली आँखों से उसे तिरस्कार से देखा।
श्लोक 92 (3.148.92)
ततः पवनजः श्रीमानन्तिकस्थं महौजसम् । स्मितेन चैनमासाद्यहनूमानिदमब्रवीत् ॥
tataḥ pavanajaḥ śrīmānantikasthaṃ mahaujasam | smitena cainamāsādyahanūmānidamabravīt
तब श्रीमान् पवनपुत्र हनुमान् ने पास खड़े उस महातेजस्वी की ओर मुस्कुराते हुए उन्मुख होकर यह कहा —
हनूमानुवाच
श्लोक 93 (3.148.93)
किमर्थं सरुजस्तेऽहं सुखसुप्तः प्रबोधितः । ननु नाम त्वया कार्या दया भूतेषु जानता ॥
kimarthaṃ sarujaste'haṃ sukhasuptaḥ prabodhitaḥ | nanu nāma tvayā kāryā dayā bhūteṣu jānatā
"तुमने मुझे क्यों जगाया? मैं रोगी हूँ और सुख से सो रहा था। ज्ञानी को तो प्राणियों पर दया करनी चाहिए।
श्लोक 94 (3.148.94)
वयं धर्मं न जानीमस्तिर्यग्योनिमुपाश्रिताः । नरास्तु बुद्धिसंपन्ना दयां कुर्वन्ति जन्तुषु ॥
vayaṃ dharmaṃ na jānīmastiryagyonimupāśritāḥ | narāstu buddhisaṃpannā dayāṃ kurvanti jantuṣu
हम पशु-योनि में जन्मे हैं, धर्म को नहीं जानते; किन्तु बुद्धि से सम्पन्न मनुष्य प्राणियों पर दया करते हैं।
श्लोक 95 (3.148.95)
क्रूरेषु कर्मसु कथं देहवाक्चित्तदूषिषु । धर्मघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥
krūreṣu karmasu kathaṃ dehavākcittadūṣiṣu | dharmaghātiṣu sajjante buddhimanto bhavadvidhāḥ
तुम जैसे बुद्धिमान लोग शरीर, वाणी और मन को दूषित करनेवाले तथा धर्म का नाश करनेवाले क्रूर कर्मों में कैसे लग जाते हैं?
श्लोक 96 (3.148.96)
न त्वं धर्मं विजानासि वृद्धा नोपासितास्त्वया । अल्पबुद्धितया बाल्यादुत्सादयसि यन्मृगान् ॥
na tvaṃ dharmaṃ vijānāsi vṛddhā nopāsitāstvayā | alpabuddhitayā bālyādutsādayasi yanmṛgān
तुम धर्म नहीं जानते, तुमने वृद्धों की सेवा नहीं की, क्योंकि अल्पबुद्धि और बचपने के कारण तुम पशुओं का संहार कर रहे हो।
श्लोक 97 (3.148.97)
ब्रूहि कस्त्वं किमर्थं वा किमिदं वनमागतः । वर्जितं मानुषैर्भावैस्तथैव पुरुषैरपि ॥
brūhi kastvaṃ kimarthaṃ vā kimidaṃ vanamāgataḥ | varjitaṃ mānuṣairbhāvaistathaiva puruṣairapi
बताओ, तुम कौन हो और किसलिए इस वन में आए हो, जो मनुष्यों के आचार-व्यवहार से और मनुष्यों से भी रहित है?
श्लोक 98 (3.148.98)
क्व च त्वयाऽद्यगन्तव्यं प्रब्रूहि पुरुषर्षभ । अतः परमगम्योऽयं पर्वतः सुदुरारुहः ॥
kva ca tvayā'dyagantavyaṃ prabrūhi puruṣarṣabha | ataḥ paramagamyo'yaṃ parvataḥ sudurāruhaḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ, बताओ, आज तुम्हें कहाँ जाना है? इससे आगे यह पर्वत अगम्य है; इस पर चढ़ना अत्यन्त कठिन है।
श्लोक 99 (3.148.99)
विना सिद्धगतिं वीर गतिरत्र न विद्यते । देवलोकस्य मार्गोऽयमगम्यो मानुषैः सदा ॥
vinā siddhagatiṃ vīra gatiratra na vidyate | devalokasya mārgo'yamagamyo mānuṣaiḥ sadā
हे वीर, सिद्धों की गति के बिना यहाँ से आगे कोई मार्ग नहीं है। यह देवलोक का मार्ग है, जो मनुष्यों के लिए सदा अगम्य है।
श्लोक 100 (3.148.100)
कारुण्यात्त्वामहं वीर वारयामि निबोध मे । नातः परं त्वया शक्यं गन्तुमाश्वसिहि प्रभो ॥
kāruṇyāttvāmahaṃ vīra vārayāmi nibodha me | nātaḥ paraṃ tvayā śakyaṃ gantumāśvasihi prabho
हे वीर, करुणावश मैं तुम्हें रोक रहा हूँ, मेरी बात सुनो। इससे आगे तुम नहीं जा सकते; हे प्रभो, धीरज रखो।
श्लोक 101 (3.148.101)
स्वागतं सर्वथैवेह तवाद्य मनुजर्षभ । इमान्यमृतकल्पानि मूलानि च फलानि च ॥
svāgataṃ sarvathaiveha tavādya manujarṣabha | imānyamṛtakalpāni mūlāni ca phalāni ca
हे नरश्रेष्ठ, आज यहाँ तुम्हारा सब प्रकार से स्वागत है। ये रहे अमृत-तुल्य कन्द-मूल और फल।
श्लोक 102 (3.148.102)
भक्षयित्वा निवर्तस्व मा वृथा प्राप्स्यसे वधम् । ग्राह्यं यदि वचो मह्यं हितं मनुजपुङ्गव ॥
bhakṣayitvā nivartasva mā vṛthā prāpsyase vadham | grāhyaṃ yadi vaco mahyaṃ hitaṃ manujapuṅgava
इन्हें खाकर लौट जाओ, व्यर्थ ही मृत्यु को न बुलाओ — हे मनुजश्रेष्ठ, यदि तुम मेरी हितकारी बात मानो।"