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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 149

भीम हनुमान् की पूँछ न उठा सके

भीम अपना परिचय देकर मार्ग माँगते हैं। हनुमान् बुढ़ापे का बहाना करके उन्हें अपने ऊपर से लाँघ जाने को कहते हैं, पर भीम हर देह में बसे परमात्मा के प्रति आदर के कारण ऐसा करने से मना करते हैं और समुद्र लाँघनेवाले अपने भाई हनुमान् की बड़ाई करते हैं। पूँछ हटाने का प्रयास करने पर भीम उसे हिला तक नहीं पाते, और नम्र होकर उस वानर से उसका सच्चा परिचय पूछते हैं। हनुमान् स्वयं को वायुपुत्र बताते हैं और सुग्रीव तथा राम की कथा आरम्भ करते हैं, जिनकी पत्नी को रावण ने तब हर लिया जब स्वर्णमृग बने मारीच ने राम को छलकर दूर कर दिया था।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.149.1)

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य वानरेन्द्रस्य धीमतः । भीमसेनस्तदा वीरः प्रोवाचामितविक्रमः ॥

etacchrutvā vacastasya vānarendrasya dhīmataḥ | bhīmasenastadā vīraḥ provācāmitavikramaḥ

बुद्धिमान वानरराज के ये वचन सुनकर अपार पराक्रमी वीर भीमसेन ने तब कहा —

भीम उवाच

श्लोक 2 (3.149.2)

को भवान्किंनिमित्तं वा वानरं वपुराश्रितः । ब्राह्मणानन्तरो वर्णः क्षत्रियस्त्वाऽनुपृच्छति ॥

ko bhavānkiṃnimittaṃ vā vānaraṃ vapurāśritaḥ | brāhmaṇānantaro varṇaḥ kṣatriyastvā'nupṛcchati

"आप कौन हैं और किस कारण वानर का रूप धारण किया है? आपसे एक क्षत्रिय पूछ रहा है, जो ब्राह्मणों के बाद का वर्ण है।

श्लोक 3 (3.149.3)

कौरवः सोमवंशीयः कुन्त्या गर्भेण धारितः । पाण्डवो वायुतनयो भीमसेन इति श्रुतः ॥

kauravaḥ somavaṃśīyaḥ kuntyā garbheṇa dhāritaḥ | pāṇḍavo vāyutanayo bhīmasena iti śrutaḥ

मैं चन्द्रवंशी कौरव हूँ, कुन्ती के गर्भ में धारण किया गया, पाण्डव, वायु का पुत्र, भीमसेन नाम से प्रसिद्ध।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (3.149.4)

स वाक्यं भीमसेनस्य स्मितेन प्रतिगृह्य तत् । हनुमान्वायुतनयो वायुपुत्रमभाषत ॥

sa vākyaṃ bhīmasenasya smitena pratigṛhya tat | hanumānvāyutanayo vāyuputramabhāṣata

भीमसेन की उस बात को मुस्कान के साथ ग्रहण करके वायुपुत्र हनुमान् ने वायुपुत्र (भीम) से कहा —

हनूमानुवाच

श्लोक 5 (3.149.5)

वानरोऽहं न ते मार्गं प्रदास्यामि यथेप्सितम् । साधु गच्छ निवर्तस्व मा त्वं प्राप्स्यसि वैशसम् ॥

vānaro'haṃ na te mārgaṃ pradāsyāmi yathepsitam | sādhu gaccha nivartasva mā tvaṃ prāpsyasi vaiśasam

"मैं वानर हूँ, तुम्हें मनचाहा मार्ग नहीं दूँगा। भला इसी में है कि लौट जाओ, विनाश को प्राप्त न हो।"

भीमसेन उवाच

श्लोक 6 (3.149.6)

वैशसं वाऽस्तु यद्वान्यन्न त्वां पृच्छामि वानर । प्रयच्छ मार्गमुत्तिष्ठ मा मत्तः प्राप्स्यसे व्यथाम् ॥

vaiśasaṃ vā'stu yadvānyanna tvāṃ pṛcchāmi vānara | prayaccha mārgamuttiṣṭha mā mattaḥ prāpsyase vyathām

"विनाश हो या कुछ और, मैं तुमसे यह नहीं पूछ रहा, वानर। उठो और मुझे मार्ग दो, नहीं तो मेरे हाथों कष्ट पाओगे।"

हनूमानुवाच

श्लोक 7 (3.149.7)

नास्ति शक्तिर्ममोत्थातुं जरया क्लेशितो ह्यहम् । यद्यवश्यं प्रयातव्यं लङ्घयित्वा प्रयाहि माम् ॥

nāsti śaktirmamotthātuṃ jarayā kleśito hyaham | yadyavaśyaṃ prayātavyaṃ laṅghayitvā prayāhi mām

"मुझमें उठने की शक्ति नहीं है, मैं बुढ़ापे से थका हुआ हूँ। यदि जाना ही है तो मुझे लाँघकर चले जाओ।"

भीम उवाच

श्लोक 8 (3.149.8)

निर्गुणः परमात्मा तु देहं ते व्याप्य तिष्ठते । तमहं ज्ञानविज्ञेयं नावमन्ये न लङ्घये ॥

nirguṇaḥ paramātmā tu dehaṃ te vyāpya tiṣṭhate | tamahaṃ jñānavijñeyaṃ nāvamanye na laṅghaye

"निर्गुण परमात्मा तुम्हारे शरीर में व्याप्त होकर स्थित है। ज्ञान से जानने योग्य उस परमात्मा का मैं अनादर नहीं करूँगा, तुम्हें नहीं लाँघूँगा।

श्लोक 9 (3.149.9)

यद्यागमैर्न विद्यां च तमहं भूतभावनम् । क्रमेयं त्वां गिरिं चैव हनूमानिव सागरम् ॥

yadyāgamairna vidyāṃ ca tamahaṃ bhūtabhāvanam | krameyaṃ tvāṃ giriṃ caiva hanūmāniva sāgaram

यदि शास्त्रों के द्वारा मैं उन भूतभावन परमात्मा को न जानता, तो तुम्हें और इस पर्वत को भी वैसे ही लाँघ जाता जैसे हनुमान् ने समुद्र लाँघा था।"

हनूमानुवाच

श्लोक 10 (3.149.10)

क एष हनुमान्नाम सागरो येन लङ्घितः । पृच्छामि त्वां नरश्रेष्ठ कथ्यतां यदि शक्यते ॥

ka eṣa hanumānnāma sāgaro yena laṅghitaḥ | pṛcchāmi tvāṃ naraśreṣṭha kathyatāṃ yadi śakyate

"यह हनुमान् कौन है, जिसने समुद्र लाँघा था? हे नरश्रेष्ठ, मैं तुमसे पूछता हूँ; यदि बता सको तो बताओ।"

भीम उवाच

श्लोक 11 (3.149.11)

भ्राता मम गुणश्लाघ्यो बुद्धिसत्त्वबलान्वितः । रामायणेऽतिविख्यातः श्रीमान्वानरपुङ्गवः ॥

bhrātā mama guṇaślāghyo buddhisattvabalānvitaḥ | rāmāyaṇe'tivikhyātaḥ śrīmānvānarapuṅgavaḥ

"वह मेरा भाई है — गुणों के लिए प्रशंसित, बुद्धि, धैर्य और बल से युक्त, रामायण में अत्यन्त विख्यात, श्रीमान् वानरश्रेष्ठ,

श्लोक 12 (3.149.12)

रामपत्नीकृते येन शतयोजनविस्तृतः । सागरः प्लवगेन्द्रेण क्रमेणैकेन लङ्घितः ॥

rāmapatnīkṛte yena śatayojanavistṛtaḥ | sāgaraḥ plavagendreṇa krameṇaikena laṅghitaḥ

वह वानरराज जिसने राम की पत्नी के लिए सौ योजन चौड़े समुद्र को एक ही छलाँग में पार कर लिया था।

श्लोक 13 (3.149.13)

स मे भ्राता महावीर्यस्तुल्योऽहं तस्य तेजसा । बले पराक्रमे युद्धे शक्तोऽहं तव निग्रहे ॥

sa me bhrātā mahāvīryastulyo'haṃ tasya tejasā | bale parākrame yuddhe śakto'haṃ tava nigrahe

वह महापराक्रमी मेरा भाई है और तेज में मैं उसके समान हूँ; बल, पराक्रम और युद्ध में मैं तुम्हें दण्ड देने में समर्थ हूँ।

श्लोक 14 (3.149.14)

इमं देशमनुप्राप्तः कारणेनास्मि केनचित् । उत्तिष्ठ देहि मे मार्गं पश्य मे चाद्य पौरुषम् । मच्छासनमकुर्वाणं त्वां वा नेष्ये यमक्षयम् ॥

imaṃ deśamanuprāptaḥ kāraṇenāsmi kenacit | uttiṣṭha dehi me mārgaṃ paśya me cādya pauruṣam | macchāsanamakurvāṇaṃ tvāṃ vā neṣye yamakṣayam

मैं किसी प्रयोजन से इस प्रदेश में आया हूँ। उठो, मुझे मार्ग दो और आज मेरा पौरुष देखो; यदि मेरी आज्ञा नहीं मानोगे तो तुम्हें यमलोक भेज दूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (3.149.15)

विज्ञाय तं बलोन्मत्तं बाहुवीर्येण दर्पितम् । हृदयेनावहस्यैनं हनूमान्वाक्यमब्रवीत् ॥

vijñāya taṃ balonmattaṃ bāhuvīryeṇa darpitam | hṛdayenāvahasyainaṃ hanūmānvākyamabravīt

उसे बल से उन्मत्त और भुजाओं के पराक्रम से घमंडी जानकर हनुमान् ने मन ही मन उसकी हँसी उड़ाते हुए कहा —

हनूमानुवाच

श्लोक 16 (3.149.16)

प्रसीद नास्ति मे शक्तिरुत्थातुं जरयाऽनघ । ममानुकम्पया त्वेतत्पुच्छमुत्सार्य गम्यताम् ॥

prasīda nāsti me śaktirutthātuṃ jarayā'nagha | mamānukampayā tvetatpucchamutsārya gamyatām

"प्रसन्न होओ, हे निष्पाप! बुढ़ापे के कारण मुझमें उठने की शक्ति नहीं है। मुझ पर दया करके इस पूँछ को हटाकर चले जाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (3.149.17)

एवमुक्ते हनुमता हीनवीर्यपराक्रमम् । मनसाऽचिन्तयद्भीमः स्वबाहुबलदर्पितः ॥

evamukte hanumatā hīnavīryaparākramam | manasā'cintayadbhīmaḥ svabāhubaladarpitaḥ

हनुमान् के ऐसा कहने पर अपनी भुजाओं के बल पर घमंड करनेवाले भीम ने मन में उसे बल और पराक्रम से हीन समझा,

श्लोक 18 (3.149.18)

पुच्छे प्रगृह्य तरसा हीनवीर्यपराक्रमम् । सालोक्यमन्तकस्यैनं नयाम्यद्येह वानरम् ॥

pucche pragṛhya tarasā hīnavīryaparākramam | sālokyamantakasyainaṃ nayāmyadyeha vānaram

और सोचा — "इस बल-पराक्रम से हीन वानर की पूँछ पकड़कर मैं इसे आज यहीं यमलोक पहुँचा दूँगा।"

श्लोक 19 (3.149.19)

सावज्ञमथ वामेन स्मयञ्जग्राह पाणिना । न चाशकच्चालयितुं भीमः पुच्छं महाकपेः ॥

sāvajñamatha vāmena smayañjagrāha pāṇinā | na cāśakaccālayituṃ bhīmaḥ pucchaṃ mahākapeḥ

तब मुस्कुराते हुए उसने तिरस्कारपूर्वक बाएँ हाथ से पूँछ पकड़ी, पर भीम उस महाकपि की पूँछ को हिला तक न सका।

श्लोक 20 (3.149.20)

उच्चिक्षेप पुनर्दोर्भ्यामिन्द्रायुधमिवोच्छ्रितम् । नोद्धर्तुमशकद्भीमो दोर्भ्यामपि महाबलः ॥

uccikṣepa punardorbhyāmindrāyudhamivocchritam | noddhartumaśakadbhīmo dorbhyāmapi mahābalaḥ

फिर उसने इन्द्रधनुष के समान ऊँची उठी उस पूँछ को दोनों भुजाओं से उठाने का यत्न किया, पर महाबली भीम दोनों भुजाओं से भी उसे न उठा सका।

श्लोक 21 (3.149.21)

उत्क्षिप्तभ्रूर्विवृत्ताक्षः संहतभ्रकुटीमुखः । स्विन्नगात्रोऽभवद्भीमो न चोद्धर्तुंशशाक तम् ॥

utkṣiptabhrūrvivṛttākṣaḥ saṃhatabhrakuṭīmukhaḥ | svinnagātro'bhavadbhīmo na coddhartuṃśaśāka tam

उसकी भौंहें तन गईं, आँखें घूमने लगीं, चेहरे पर त्योरियाँ चढ़ गईं, शरीर पसीने से भीग गया, फिर भी भीम उसे न उठा सका।

श्लोक 22 (3.149.22)

यत्नवानपि तु श्रीमाँल्लाङ्गूलोद्धरणे ततः । कपेः पार्श्वगतो भीमस्तस्थौ व्रीडानताननः ॥

yatnavānapi tu śrīmām̐llāṅgūloddharaṇe tataḥ | kapeḥ pārśvagato bhīmastasthau vrīḍānatānanaḥ

पूँछ उठाने का पूरा प्रयत्न करके भी जब श्रीमान् भीम सफल न हुआ, तब वह लज्जा से मुँह झुकाए कपि के पास खड़ा हो गया।

श्लोक 23 (3.149.23)

प्रणिपत्य च कौन्तेयः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् । प्रसीद कपिशार्दूल दुरुक्तं क्षम्यतां मम ॥

praṇipatya ca kaunteyaḥ prāñjalirvākyamabravīt | prasīda kapiśārdūla duruktaṃ kṣamyatāṃ mama

और कुन्तीपुत्र ने प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा — "हे कपिश्रेष्ठ, प्रसन्न होइए, मेरे कटु वचनों को क्षमा कीजिए।

भीम उवाच

श्लोक 24 (3.149.24)

सिद्धो वा यदि वा देवो गन्धर्वो वाऽथ गुह्यकः । पृष्टः सन्को मया ब्रूहि कस्त्वं वानररूपधृत् ॥

siddho vā yadi vā devo gandharvo vā'tha guhyakaḥ | pṛṣṭaḥ sanko mayā brūhi kastvaṃ vānararūpadhṛt

क्या आप सिद्ध हैं, या देवता, गन्धर्व अथवा गुह्यक? मैं पूछता हूँ, बताइए — वानर का रूप धारण करनेवाले आप कौन हैं?

श्लोक 25 (3.149.25)

न चेद्गुह्यं महाबाहो श्रोतव्यं चेद्भवेन्मम । शिष्यवत्त्वां तु पृच्छामि उपपन्नोऽस्मि तेऽनघ ॥

na cedguhyaṃ mahābāho śrotavyaṃ cedbhavenmama | śiṣyavattvāṃ tu pṛcchāmi upapanno'smi te'nagha

हे महाबाहु, यदि यह गोपनीय न हो और मेरे सुनने योग्य हो, तो मैं शिष्य की भाँति आपसे पूछता हूँ; हे निष्पाप, मैं आपकी शरण में आया हूँ।"

हनूमानुवाच

श्लोक 26 (3.149.26)

यत्ते मम परिज्ञाने कौतूहलमरिंदम । तत्सर्वमखिलेन त्वं शृणु पाण्डवनन्दन ॥

yatte mama parijñāne kautūhalamariṃdama | tatsarvamakhilena tvaṃ śṛṇu pāṇḍavanandana

"हे शत्रुदमन, मेरे विषय में जानने का जो कौतूहल तुम्हें है, तो हे पाण्डवनन्दन, वह सब पूरा-पूरा सुनो।

श्लोक 27 (3.149.27)

अहं केसरिणः क्षेत्रे वायुना जगदायुषा । जातः कमलपत्राक्ष हनूमान्नाम वानरः ॥

ahaṃ kesariṇaḥ kṣetre vāyunā jagadāyuṣā | jātaḥ kamalapatrākṣa hanūmānnāma vānaraḥ

हे कमलनयन, मैं हनुमान् नामक वानर हूँ, जो केसरी के क्षेत्र में जगत् के प्राणरूप वायु से उत्पन्न हुआ।

श्लोक 28 (3.149.28)

सूर्यपुत्रं च सुग्रीवं शक्रपुत्रं च वालिनम् । सर्ववानरराजानौ सर्ववानरयूथपाः ॥

sūryaputraṃ ca sugrīvaṃ śakraputraṃ ca vālinam | sarvavānararājānau sarvavānarayūthapāḥ

सूर्यपुत्र सुग्रीव और इन्द्रपुत्र वाली — समस्त वानरों के दोनों राजा — और सभी वानर-यूथपति,

श्लोक 29 (3.149.29)

उपतस्थुर्महावीर्या मम चामित्रकर्शन । सुग्रीवेणाभवत्प्रीतिरनिलस्याग्निना यथा ॥

upatasthurmahāvīryā mama cāmitrakarśana | sugrīveṇābhavatprītiranilasyāgninā yathā

हे शत्रुसंतापी, वे महापराक्रमी मेरे पास आते थे। सुग्रीव से मेरी वैसी ही मित्रता थी जैसी वायु की अग्नि से।

श्लोक 30 (3.149.30)

निकृतः स ततो भ्रात्रा कस्मिंश्चित्कारणान्तरे । ऋश्यमूके मया सार्धं सुग्रीवो न्यवसच्चिरम् ॥

nikṛtaḥ sa tato bhrātrā kasmiṃścitkāraṇāntare | ṛśyamūke mayā sārdhaṃ sugrīvo nyavasacciram

फिर किसी कारणवश सुग्रीव को उसके भाई ने निकाल दिया, और वह बहुत समय तक मेरे साथ ऋश्यमूक पर्वत पर रहा।

श्लोक 31 (3.149.31)

अथ दाशरथिर्वीरो रामो नाम महाबलः । विष्णुर्मानुषरूपेण चचार वसुधातलम् ॥

atha dāśarathirvīro rāmo nāma mahābalaḥ | viṣṇurmānuṣarūpeṇa cacāra vasudhātalam

तब दशरथ के पुत्र, राम नाम के महाबली वीर, जो मनुष्य रूप में विष्णु ही थे, पृथ्वी पर विचरते थे।

श्लोक 32 (3.149.32)

स पितुः प्रियमन्विच्छन्सहभार्यः सहानुजः । सधनुर्धन्विनांश्रेष्ठो दण्डकारण्यमाश्रितः ॥

sa pituḥ priyamanvicchansahabhāryaḥ sahānujaḥ | sadhanurdhanvināṃśreṣṭho daṇḍakāraṇyamāśritaḥ

पिता का प्रिय करने की इच्छा से धनुर्धारियों में श्रेष्ठ वे धनुष लेकर पत्नी और छोटे भाई के साथ दण्डकारण्य में रहने लगे।

श्लोक 33 (3.149.33)

तस्य भार्या जनस्थानाच्छलेनापहृता बलात् । राक्षसेन्द्रेण बलिना रावणेन दुरात्मना ॥

tasya bhāryā janasthānācchalenāpahṛtā balāt | rākṣasendreṇa balinā rāvaṇena durātmanā

उनकी पत्नी को जनस्थान से राक्षसों के बलवान राजा, दुष्टात्मा रावण ने छल और बल से हर लिया,

श्लोक 34 (3.149.34)

सुवर्णरत्नचित्रेण मृगरूपेण रक्षसा । वञ्चयित्वा नरव्याघ्रं मारीचेन तदाऽनघ ॥

suvarṇaratnacitreṇa mṛgarūpeṇa rakṣasā | vañcayitvā naravyāghraṃ mārīcena tadā'nagha

हे निष्पाप, जब सोने और रत्नों से चित्रित मृग का रूप धरे राक्षस मारीच ने उस नरश्रेष्ठ को छलकर दूर कर दिया था।

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