आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 150
हनुमान द्वारा रामकथा का वर्णन
हनुमान भीम को रामकथा सुनाते हैं — सीता का हरण, सुग्रीव से मित्रता, उनका स्वयं समुद्र लाँघकर लंका जाना, सेतु-बन्धन, रावण-वध और राम का लौटकर अयोध्या में राज्य करना। वे बताते हैं कि राम ने उन्हें वर दिया था कि जब तक संसार में रामकथा रहेगी, वे जीवित रहेंगे; और उन्होंने भीम का मार्ग इसलिए रोका कि यह देवमार्ग मनुष्यों के लिए अगम्य है, यद्यपि भीम जिस सरोवर को खोज रहे हैं, वह इसी ओर है।
हनूमानुवाच
श्लोक 1 (3.150.1)
हृतदारः सह भ्रात्रा पत्नीं मार्गन्स राघवः । दृष्टवाञ्शैलशिखरे सुग्रीवं वानरर्षभम् ॥
hṛtadāraḥ saha bhrātrā patnīṃ mārgansa rāghavaḥ | dṛṣṭavāñśailaśikhare sugrīvaṃ vānararṣabham
पत्नी के हर लिए जाने पर अपने भाई के साथ उसे खोजते हुए राघव ने पर्वत के शिखर पर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव को देखा।
श्लोक 2 (3.150.2)
तेन तस्याभवत्सख्यं राघवस्य महात्मनः । स हत्वा वालिनं राज्ये सुग्रीवं प्रत्यपादयत् ॥
tena tasyābhavatsakhyaṃ rāghavasya mahātmanaḥ | sa hatvā vālinaṃ rājye sugrīvaṃ pratyapādayat
उनके और महात्मा राघव के बीच मित्रता हो गई। राम ने वाली का वध करके सुग्रीव को राज्य पर प्रतिष्ठित किया।
श्लोक 3 (3.150.3)
स राज्यं प्राप्य सुग्रीवः सीतायाः परिमार्गणे । वानरान्प्रेषयामास शतशोऽथ सहस्रशः ॥
sa rājyaṃ prāpya sugrīvaḥ sītāyāḥ parimārgaṇe | vānarānpreṣayāmāsa śataśo'tha sahasraśaḥ
राज्य पाकर सुग्रीव ने सीता की खोज के लिए सैकड़ों और हज़ारों वानर भेजे।
श्लोक 4 (3.150.4)
ततो वानरकोटीभिः सहितोऽहं नरर्षभ । सीतां मार्गन्महाबाहो प्रस्थितो दक्षिणां दिशम् ॥
tato vānarakoṭībhiḥ sahito'haṃ nararṣabha | sītāṃ mārganmahābāho prasthito dakṣiṇāṃ diśam
तब, हे नरश्रेष्ठ, हे महाबाहु, मैं करोड़ों वानरों के साथ सीता को खोजता हुआ दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ा।
श्लोक 5 (3.150.5)
ततः प्रवृत्तिः सीताया गृध्रेण सुमहात्मना । संपातिना समाख्याता रावणस्य निवेशने ॥
tataḥ pravṛttiḥ sītāyā gṛdhreṇa sumahātmanā | saṃpātinā samākhyātā rāvaṇasya niveśane
तब महात्मा गृध्र सम्पाति ने हमें सीता का समाचार दिया कि वे रावण के भवन में हैं।
श्लोक 6 (3.150.6)
ततोऽहं कार्यसिद्ध्यर्थं रामस्याक्लिष्टकर्मणः । शतयोजनविस्तारमर्णवं सहसा प्लुतः ॥
tato'haṃ kāryasiddhyarthaṃ rāmasyākliṣṭakarmaṇaḥ | śatayojanavistāramarṇavaṃ sahasā plutaḥ
तब अक्लिष्टकर्मा राम का कार्य सिद्ध करने के लिए मैं एक ही छलाँग में सौ योजन चौड़े समुद्र के पार कूद गया।
श्लोक 7 (3.150.7)
अहं स्ववीर्यादुत्तीर्य सागरं मकरालयम् । सुतां जनकराजस्य सीतां सुरसुतोपमाम् ॥
ahaṃ svavīryāduttīrya sāgaraṃ makarālayam | sutāṃ janakarājasya sītāṃ surasutopamām
अपने ही बल से मगरों के निवास समुद्र को पार करके मैंने राजा जनक की पुत्री, देवकन्या के समान सीता को —
श्लोक 8 (3.150.8)
दृष्टवान्भरतश्रेष्ठ रावणस्य निवेशने । समेत्य तामहं देवीं वैदेहीं राघवप्रियाम् ॥
dṛṣṭavānbharataśreṣṭha rāvaṇasya niveśane | sametya tāmahaṃ devīṃ vaidehīṃ rāghavapriyām
हे भरतश्रेष्ठ, रावण के भवन में देखा। राघव की प्रिया उन देवी वैदेही से मिलकर,
श्लोक 9 (3.150.9)
दग्ध्वा लङ्कामशेषेण साट्टप्राकारतोरणाम् । प्रत्यागतश्चास्य पुनर्नाम तत्र प्रकाश्य वै ॥
dagdhvā laṅkāmaśeṣeṇa sāṭṭaprākāratoraṇām | pratyāgataścāsya punarnāma tatra prakāśya vai
मैंने अट्टालिकाओं, परकोटों और तोरणों सहित सारी लंका जला डाली और वहाँ राम का नाम घोषित करके फिर लौट आया।
श्लोक 10 (3.150.10)
मद्वाक्यं चावधार्याशु रामो राजीवलोचनः । अबद्धपूर्वमन्यैश्च बद्ध्वा सेतुं महोदधौ । वृतो वानरकोटीभिः समुत्तीर्णो महार्णवम् ॥
madvākyaṃ cāvadhāryāśu rāmo rājīvalocanaḥ | abaddhapūrvamanyaiśca baddhvā setuṃ mahodadhau | vṛto vānarakoṭībhiḥ samuttīrṇo mahārṇavam
मेरी बात पर शीघ्र निश्चय करके कमलनयन राम ने महासागर पर ऐसा सेतु बाँधा जैसा पहले किसी ने नहीं बाँधा था, और करोड़ों वानरों से घिरे हुए वे महासागर के पार उतर गए।
श्लोक 11 (3.150.11)
ततो रामेण वीर्येण हत्वा तान्सर्वराक्षसान् । रणे तु राक्षसगणं रावणं लोकरावणम् ॥
tato rāmeṇa vīryeṇa hatvā tānsarvarākṣasān | raṇe tu rākṣasagaṇaṃ rāvaṇaṃ lokarāvaṇam
तब राम ने अपने पराक्रम से उन सब राक्षसों को मार डाला; और युद्ध में राक्षसों के समूह को तथा लोकों को रुलाने वाले रावण को —
श्लोक 12 (3.150.12)
निशाचरेन्द्रं हत्वा तु सभ्रातृसुतबान्धवम् । राज्येऽभिषिच्य लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ॥
niśācarendraṃ hatvā tu sabhrātṛsutabāndhavam | rājye'bhiṣicya laṅkāyāṃ rākṣasendraṃ vibhīṣaṇam
उस निशाचरराज को भाइयों, पुत्रों और बन्धुओं सहित मारकर उन्होंने लंका में विभीषण का राक्षसराज के रूप में अभिषेक किया,
श्लोक 13 (3.150.13)
धार्मिकं भक्तिमन्तं च भक्तानुगतवत्सलः । प्रत्याहृत्य ततः सीतां नष्टां वेदश्रुतिं यथा ॥
dhārmikaṃ bhaktimantaṃ ca bhaktānugatavatsalaḥ | pratyāhṛtya tataḥ sītāṃ naṣṭāṃ vedaśrutiṃ yathā
क्योंकि वह धर्मात्मा और भक्त था, और राम अपने भक्तों पर स्नेह रखते हैं। फिर उन्होंने सीता को वैसे ही वापस पाया जैसे खोई हुई वेद-श्रुति फिर से प्राप्त हो।
श्लोक 14 (3.150.14)
तयैव सहितः साध्व्या पत्न्या रामो महायशाः । गत्वा ततोऽतित्वरितः स्वां पुरीं रघुनन्दनः । अध्यावसत्ततोऽयोध्यामयोध्यां द्विषतां प्रभुः ॥
tayaiva sahitaḥ sādhvyā patnyā rāmo mahāyaśāḥ | gatvā tato'titvaritaḥ svāṃ purīṃ raghunandanaḥ | adhyāvasattato'yodhyāmayodhyāṃ dviṣatāṃ prabhuḥ
उसी साध्वी पत्नी के साथ महायशस्वी रघुनन्दन राम अत्यन्त शीघ्रता से अपनी नगरी गए; और शत्रुओं का दमन करने वाले वे प्रभु उस अयोध्या में रहने लगे जिससे कोई युद्ध नहीं कर सकता।
श्लोक 15 (3.150.15)
ततः प्रतिष्ठितो राज्ये रामो नृपतिसत्तमः । वरं मया याचितोऽसौ रामो राजीवलोचनः ॥
tataḥ pratiṣṭhito rājye rāmo nṛpatisattamaḥ | varaṃ mayā yācito'sau rāmo rājīvalocanaḥ
जब नृपश्रेष्ठ राम राज्य पर प्रतिष्ठित हो गए, तब मैंने कमलनयन राम से एक वर माँगा —
श्लोक 16 (3.150.16)
यावद्रामकथेयं ते भवेल्लोकेषु शत्रुहन् । तावज्जीवेयमित्येवं तथाऽस्त्विति च सोऽब्रवीत् ॥
yāvadrāmakatheyaṃ te bhavellokeṣu śatruhan | tāvajjīveyamityevaṃ tathā'stviti ca so'bravīt
“हे शत्रुसूदन, जब तक आपकी यह रामकथा लोकों में रहे, तब तक मैं जीवित रहूँ।” और उन्होंने कहा, “ऐसा ही हो।”
श्लोक 17 (3.150.17)
सीताप्रसादाच्च सदा मामिहस्थमरिंदम । उपतिष्ठन्ति दिव्या हि भोगा भीम यथेप्सिताः ॥
sītāprasādācca sadā māmihasthamariṃdama | upatiṣṭhanti divyā hi bhogā bhīma yathepsitāḥ
और हे शत्रुदमन भीम, सीता की कृपा से यहाँ रहते हुए मुझे सदा मनचाहे दिव्य भोग प्राप्त होते रहते हैं।
श्लोक 18 (3.150.18)
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । राज्यं कारितवान्रामस्ततः स्वभवनं गतः ॥
daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca | rājyaṃ kāritavānrāmastataḥ svabhavanaṃ gataḥ
राम ने दस हज़ार वर्ष और दस सौ वर्ष तक राज्य किया, फिर वे अपने धाम को चले गए।
श्लोक 19 (3.150.19)
तदिहाप्सरसस्तात गन्धर्वाश्च सदाऽनघ । तस्य वीरस्य चरितं गायन्त्यो रमयन्ति माम् ॥
tadihāpsarasastāta gandharvāśca sadā'nagha | tasya vīrasya caritaṃ gāyantyo ramayanti mām
इसलिए, तात, हे निष्पाप, यहाँ अप्सराएँ और गन्धर्व उस वीर का चरित गाकर मुझे सदा आनन्दित करते रहते हैं।
श्लोक 20 (3.150.20)
अयं च मार्गो मर्त्यानामगम्यः कुरुनन्दन । ततोऽहं रुद्धवान्मार्गं तवेमं देवसेवितम् ॥
ayaṃ ca mārgo martyānāmagamyaḥ kurunandana | tato'haṃ ruddhavānmārgaṃ tavemaṃ devasevitam
हे कुरुनन्दन, यह मार्ग मनुष्यों के लिए अगम्य है। इसीलिए मैंने देवताओं द्वारा सेवित तुम्हारे इस मार्ग को रोक दिया,
श्लोक 21 (3.150.21)
त्वामनेन पथा यान्तं यक्षो वा राक्षसोऽपि वा । धर्षयेद्वा शपेद्वाऽपि मा कश्चिदिति भारत ॥
tvāmanena pathā yāntaṃ yakṣo vā rākṣaso'pi vā | dharṣayedvā śapedvā'pi mā kaściditi bhārata
कि इस मार्ग से जाते हुए, हे भारत, तुम पर कोई यक्ष या राक्षस आक्रमण न करे या तुम्हें शाप न दे।
श्लोक 22 (3.150.22)
दिव्यो देवपथो ह्येष नात्र गच्छन्ति मानुषाः । यदर्थमागतश्चासि अत एव सरश्च तत् ॥
divyo devapatho hyeṣa nātra gacchanti mānuṣāḥ | yadarthamāgataścāsi ata eva saraśca tat
यह दिव्य देवमार्ग है; इस पर मनुष्य नहीं चलते। और जिस सरोवर के लिए तुम आए हो, वह भी इसी ओर है।