आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 152
हनुमान का विराट रूप-दर्शन और वर्णधर्म का उपदेश
भीम के आग्रह पर हनुमान वह विशाल रूप धारण करते हैं जिससे उन्होंने समुद्र लाँघा था; चकाचौंध हुए भीम उनसे रूप समेटने की प्रार्थना करते हैं और आश्चर्य करते हैं कि राम को स्वयं रावण से क्यों लड़ना पड़ा। हनुमान उत्तर देते हैं कि यदि वे स्वयं रावण को मारते तो राम की कीर्ति नष्ट हो जाती; फिर वे भीम को कुबेर के सौगन्धिक वन का मार्ग बताते हैं, बलपूर्वक फूल न तोड़ने की चेतावनी देते हैं, और उन्हें चारों वर्णों के धर्म तथा राजा के आचरण — मन्त्रणा, गुप्तचर, नीति के उपाय और दण्ड के उचित प्रयोग — का उपदेश देते हैं।
भीमसेन उवाच
श्लोक 1 (3.152.1)
पूर्वरूपमदृष्ट्वा ते न यास्यामि कथंचन । यदि तेऽहमनुग्राह्यो दर्शयात्मानमात्मना ॥
pūrvarūpamadṛṣṭvā te na yāsyāmi kathaṃcana | yadi te'hamanugrāhyo darśayātmānamātmanā
आपका पूर्व रूप देखे बिना मैं किसी प्रकार नहीं जाऊँगा। यदि मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ, तो स्वयं अपना वह रूप मुझे दिखाइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (3.152.2)
एवमुक्तस्तु भीमेन स्मितं कृत्वा प्लवंगमः । तद्रूपं दर्शयामास यद्वै सागरलङ्घने ॥
evamuktastu bhīmena smitaṃ kṛtvā plavaṃgamaḥ | tadrūpaṃ darśayāmāsa yadvai sāgaralaṅghane
भीम के ऐसा कहने पर उस वानर ने मुस्कराकर अपना वह रूप दिखाया जो समुद्र लाँघते समय उनका था।
श्लोक 3 (3.152.3)
भ्रातुः प्रियमभीप्सन्वै चकार सुमहद्वपुः । तद्रूपं यत्पुरा तस्य बभूवोदधिलङ्घने ॥
bhrātuḥ priyamabhīpsanvai cakāra sumahadvapuḥ | tadrūpaṃ yatpurā tasya babhūvodadhilaṅghane
भाई को प्रसन्न करने की इच्छा से उन्होंने अपना शरीर अत्यन्त विशाल कर लिया — वही रूप जो पहले समुद्र लाँघते समय उनका था।
श्लोक 4 (3.152.4)
देहस्तस्य ततोऽतीव वर्धत्यायामविस्तरैः । सद्रुमं कदलीषण्डं छादयन्नमितद्युतिः ॥
dehastasya tato'tīva vardhatyāyāmavistaraiḥ | sadrumaṃ kadalīṣaṇḍaṃ chādayannamitadyutiḥ
तब उनका शरीर लम्बाई और चौड़ाई में बहुत बढ़ गया, और उस अपार तेजस्वी ने वृक्षों सहित कदली-वन को ढक लिया।
श्लोक 5 (3.152.5)
गिरिश्चोच्छ्रयमाक्रम्य तस्थौ तत्र च वानरः । समुच्छ्रितमहाकायो द्वितीय इव पर्वतः ॥
giriścocchrayamākramya tasthau tatra ca vānaraḥ | samucchritamahākāyo dvitīya iva parvataḥ
पर्वत जैसी ऊँचाई तक उठकर वह वानर वहाँ खड़ा हो गया; ऊँचे उठे विशाल शरीर से वह दूसरे पर्वत-सा लग रहा था।
श्लोक 6 (3.152.6)
ताम्रेक्षणस्तीक्ष्णदंष्ट्रो भृकुटीकृतलोचनः । दीर्घं लाङ्गूलमाविध्य दिशो व्याप्य स्थितः कपिः ॥
tāmrekṣaṇastīkṣṇadaṃṣṭro bhṛkuṭīkṛtalocanaḥ | dīrghaṃ lāṅgūlamāvidhya diśo vyāpya sthitaḥ kapiḥ
ताँबे जैसी लाल आँखों, पैने दाँतों और तनी हुई भौंहों वाला वह कपि अपनी लम्बी पूँछ फटकारता हुआ दिशाओं को व्याप्त करके खड़ा था।
श्लोक 7 (3.152.7)
तद्रूपं महदालक्ष्य भ्रातुः कौरवनन्दनः । विसिष्मिये तदा भीमो जहृषे च पुनः पुनः ॥
tadrūpaṃ mahadālakṣya bhrātuḥ kauravanandanaḥ | visiṣmiye tadā bhīmo jahṛṣe ca punaḥ punaḥ
भाई का वह विशाल रूप देखकर कौरवनन्दन भीम चकित हो गए और बार-बार पुलकित हुए।
श्लोक 8 (3.152.8)
तमर्कमिव तेजोभिः सौवर्णमिव पर्वतम् । प्रदीप्तमिव चाकाशं दृष्ट्वा भीमो न्यमीलयत् ॥
tamarkamiva tejobhiḥ sauvarṇamiva parvatam | pradīptamiva cākāśaṃ dṛṣṭvā bhīmo nyamīlayat
सूर्य जैसे तेजस्वी, सोने के पर्वत जैसे और जलते आकाश जैसे उन्हें देखकर भीम ने आँखें मूँद लीं।
श्लोक 9 (3.152.9)
आबभाषे च हनुमान्भीमसेनं स्मयन्निव । एतावदिह शक्तस्त्वं द्रष्टुं रूपं ममानघ ॥
ābabhāṣe ca hanumānbhīmasenaṃ smayanniva | etāvadiha śaktastvaṃ draṣṭuṃ rūpaṃ mamānagha
तब हनुमान ने मानो मुस्कराते हुए भीमसेन से कहा — “हे निष्पाप, यहाँ तुम मेरा इतना ही रूप देख सकते हो।
हनूमानुवाच
श्लोक 10 (3.152.10)
वर्धेऽहं चाप्यतो भूयो यावन्मे मनसेप्सितम् । भीम शत्रुषु चात्यर्थं वर्धते मूर्तिरोजसा ॥
vardhe'haṃ cāpyato bhūyo yāvanme manasepsitam | bhīma śatruṣu cātyarthaṃ vardhate mūrtirojasā
मैं इससे भी अधिक, जितना मेरा मन चाहे, बढ़ सकता हूँ। भीम, शत्रुओं के बीच मेरी देह अपने ओज से और भी अधिक बढ़ जाती है।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (3.152.11)
तदद्भुतं महारौद्रं विन्ध्यपर्वतसन्निभम् । दृष्ट्वा हनूमतो वर्ष्म संभ्रान्तः पवनात्मजः ॥
tadadbhutaṃ mahāraudraṃ vindhyaparvatasannibham | dṛṣṭvā hanūmato varṣma saṃbhrāntaḥ pavanātmajaḥ
हनुमान के उस अद्भुत, अत्यन्त भयंकर, विन्ध्य पर्वत जैसे शरीर को देखकर पवनपुत्र भीम घबरा गए।
श्लोक 12 (3.152.12)
प्रत्युवाच ततो भीमः संप्रहृष्टतनूरुहः । कृताञ्जलिरदीनात्मा हनूमन्तमवस्थितम् ॥
pratyuvāca tato bhīmaḥ saṃprahṛṣṭatanūruhaḥ | kṛtāñjaliradīnātmā hanūmantamavasthitam
तब हर्ष से रोमांचित भीम ने हाथ जोड़कर, निर्भीक मन से, वहाँ खड़े हनुमान को उत्तर दिया —
भीमसेन उवाच
श्लोक 13 (3.152.13)
दृष्टं प्रमाणं विपुलं शरीरस्यास्य ते विभो । संहरस्व महावीर्य स्वयमात्मानमात्मना ॥
dṛṣṭaṃ pramāṇaṃ vipulaṃ śarīrasyāsya te vibho | saṃharasva mahāvīrya svayamātmānamātmanā
हे प्रभु, मैंने आपके इस शरीर का विशाल परिमाण देख लिया। हे महापराक्रमी, अब आप स्वयं अपने आपको समेट लीजिए।
श्लोक 14 (3.152.14)
न हि शक्नोमि त्वां द्रष्टुं दिवाकरमिवोदितम् । अप्रमेयमनाधृष्यं मैनाकमिव पर्वतम् ॥
na hi śaknomi tvāṃ draṣṭuṃ divākaramivoditam | aprameyamanādhṛṣyaṃ mainākamiva parvatam
मैं आपको देख नहीं पा रहा हूँ; आप उगते सूर्य के समान हैं, मैनाक पर्वत की भाँति अपरिमेय और अजेय।
श्लोक 15 (3.152.15)
विस्मयश्चैव मे वीर सुमहान्मनसोऽद्य वै । यद्रामस्त्वयि पार्श्वस्थे स्वयं रावणमभ्यगात् ॥
vismayaścaiva me vīra sumahānmanaso'dya vai | yadrāmastvayi pārśvasthe svayaṃ rāvaṇamabhyagāt
और हे वीर, आज मेरे मन में बड़ा विस्मय है कि आपके साथ रहते हुए भी राम स्वयं रावण से लड़ने गए।
श्लोक 16 (3.152.16)
त्वमेव शक्तस्तां लङ्कां सयोधां सहरावणाम् । स्वबाहुबलमाश्रित्य विनाशयितुमञ्जसा ॥
tvameva śaktastāṃ laṅkāṃ sayodhāṃ saharāvaṇām | svabāhubalamāśritya vināśayitumañjasā
आप अकेले ही अपने बाहुबल के सहारे उस लंका को उसके योद्धाओं और रावण सहित सहज ही नष्ट कर सकते थे।
श्लोक 17 (3.152.17)
न हि ते किंचिदप्राप्यं मारुतात्मज विद्यते । न चैव तव पर्याप्तो रावणः सगणो युधि ॥
na hi te kiṃcidaprāpyaṃ mārutātmaja vidyate | na caiva tava paryāpto rāvaṇaḥ sagaṇo yudhi
हे पवनपुत्र, आपके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है; और न ही अपने दल-बल सहित रावण युद्ध में आपकी बराबरी कर सकता था।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (3.152.18)
एवमुक्तस्तु भीमेन हनूमान्प्लवगोत्तमः । प्रत्युवाच ततो वाक्यं स्निग्धगम्भीरया गिरा ॥
evamuktastu bhīmena hanūmānplavagottamaḥ | pratyuvāca tato vākyaṃ snigdhagambhīrayā girā
भीम के ऐसा कहने पर वानरश्रेष्ठ हनुमान ने स्नेहभरी, गम्भीर वाणी में उत्तर दिया —
हनूमानुवाच
श्लोक 19 (3.152.19)
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । भीमसेन न पर्याप्तो ममासौ राक्षसाधमः ॥
evametanmahābāho yathā vadasi bhārata | bhīmasena na paryāpto mamāsau rākṣasādhamaḥ
हे महाबाहु भारत, जैसा तुम कहते हो वैसा ही है। भीमसेन, वह अधम राक्षस मेरी बराबरी नहीं कर सकता था।
श्लोक 20 (3.152.20)
मया तु निहते तस्मिन्रावणे लोककण्टके । कीर्तिर्नश्येद्राघवस्य तत एतदुपेक्षितम् ॥
mayā tu nihate tasminrāvaṇe lokakaṇṭake | kīrtirnaśyedrāghavasya tata etadupekṣitam
परन्तु यदि मैं लोकों के कण्टक उस रावण को मार देता, तो राघव की कीर्ति नष्ट हो जाती; इसलिए मैंने उसे छोड़ दिया।
श्लोक 21 (3.152.21)
तेन वीरेण तं हत्वा सगणं राक्षसाधमम् । आनीता स्वपुरं सीता कीर्तिश्च स्थापिता नृषु ॥
tena vīreṇa taṃ hatvā sagaṇaṃ rākṣasādhamam | ānītā svapuraṃ sītā kīrtiśca sthāpitā nṛṣu
उस वीर ने उस अधम राक्षस को उसके दल सहित मारकर सीता को अपनी नगरी में लौटा लाया और मनुष्यों में अपनी कीर्ति स्थापित की।
श्लोक 22 (3.152.22)
तद्गच्छ विपुलप्रज्ञ भ्रातुः प्रियहिते रतः । अरिष्टं क्षेममध्वानं वायुना परिरक्षितः ॥
tadgaccha vipulaprajña bhrātuḥ priyahite rataḥ | ariṣṭaṃ kṣemamadhvānaṃ vāyunā parirakṣitaḥ
इसलिए हे विशालबुद्धि, अपने भाई के प्रिय और हित में लगे हुए तुम वायु से रक्षित होकर निर्विघ्न और कुशलपूर्वक अपने मार्ग पर जाओ।
श्लोक 23 (3.152.23)
एष पन्थाः कुरुश्रेष्ठ सौगन्धिकवनाय ते । द्रक्ष्यसे धनदोद्यानं रक्षितं यक्षराक्षसैः ॥
eṣa panthāḥ kuruśreṣṭha saugandhikavanāya te | drakṣyase dhanadodyānaṃ rakṣitaṃ yakṣarākṣasaiḥ
हे कुरुश्रेष्ठ, यह सौगन्धिक वन की ओर जाने का तुम्हारा मार्ग है। वहाँ तुम यक्षों और राक्षसों द्वारा रक्षित धनपति कुबेर का उद्यान देखोगे।
श्लोक 24 (3.152.24)
न च ते तरसा कार्यः कुसुमापचयः स्वयम् । दैवतानि हि मान्यानि पुरुषेण विशेषतः ॥
na ca te tarasā kāryaḥ kusumāpacayaḥ svayam | daivatāni hi mānyāni puruṣeṇa viśeṣataḥ
पर तुम स्वयं बलपूर्वक फूल मत तोड़ना; क्योंकि देवता माननीय होते हैं, विशेषकर मनुष्यों के लिए।
श्लोक 25 (3.152.25)
बलिहोमनमस्कारैर्मन्त्रैश्च भरतर्षभ । दैवतानि प्रसादं हि भक्त्या कुर्वन्ति भारत ॥
balihomanamaskārairmantraiśca bharatarṣabha | daivatāni prasādaṃ hi bhaktyā kurvanti bhārata
हे भरतश्रेष्ठ, बलि, होम, नमस्कार और मन्त्रों से, भक्ति होने पर, देवता प्रसन्न होकर कृपा करते हैं।
श्लोक 26 (3.152.26)
मा तात साहसं कार्षीः स्वधर्मं परिपालय । स्वधर्मस्थापनं धर्मं बुध्यस्वागमयस्व च ॥
mā tāta sāhasaṃ kārṣīḥ svadharmaṃ paripālaya | svadharmasthāpanaṃ dharmaṃ budhyasvāgamayasva ca
तात, दुस्साहस मत करना; अपने धर्म का पालन करो। अपने कर्तव्य में स्थिर रखने वाले धर्म को समझो, और धैर्य रखो।
श्लोक 27 (3.152.27)
न हि धर्ममविज्ञाय वृद्धाननुपसेव्य च । धर्मो वै वेदितुं शक्यो बृहस्पतिसमैरपि ॥
na hi dharmamavijñāya vṛddhānanupasevya ca | dharmo vai vedituṃ śakyo bṛhaspatisamairapi
क्योंकि धर्म का विवेक किए बिना और वृद्धों की सेवा किए बिना, बृहस्पति के समान ज्ञानी भी धर्म को नहीं जान सकते।
श्लोक 28 (3.152.28)
अधर्मो यत्र धर्माख्यो धर्मश्चाधर्मसंज्ञितः । स विज्ञेयो विभागेन यत्र मुह्यन्त्यबुद्धयः ॥
adharmo yatra dharmākhyo dharmaścādharmasaṃjñitaḥ | sa vijñeyo vibhāgena yatra muhyantyabuddhayaḥ
जहाँ अधर्म को धर्म कहा जाता है और धर्म को अधर्म, जहाँ अबुद्ध लोग मोह में पड़ जाते हैं, उसे विवेकपूर्वक भेद करके समझना चाहिए।
श्लोक 29 (3.152.29)
आचारसंभवो धर्मो धर्माद्वेदाः समुत्थिताः । वेदैर्यज्ञाः समुत्पन्ना यज्ञैर्देवाः प्रतिष्ठिताः ॥
ācārasaṃbhavo dharmo dharmādvedāḥ samutthitāḥ | vedairyajñāḥ samutpannā yajñairdevāḥ pratiṣṭhitāḥ
धर्म आचार से उत्पन्न होता है; धर्म से वेद प्रकट हुए; वेदों से यज्ञ उत्पन्न हुए और यज्ञों पर देवता प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 30 (3.152.30)
वेदाचारविधानोक्तैर्यज्ञैर्धार्यन्ति देवताः । बृहस्पत्युशनःप्रोक्तैर्नयैर्धार्यन्ति मानवाः ॥
vedācāravidhānoktairyajñairdhāryanti devatāḥ | bṛhaspatyuśanaḥproktairnayairdhāryanti mānavāḥ
वेदाचार की विधियों में बताए गए यज्ञों से देवताओं का पोषण होता है; बृहस्पति और उशना (शुक्राचार्य) की बताई नीतियों से मनुष्यों का।
श्लोक 31 (3.152.31)
बल्याकरवणिज्याभिः कृष्यर्थैर्योनिपोषणैः । वार्तया धार्यते सर्वं धर्मैरेतैर्द्विजातिभिः ॥
balyākaravaṇijyābhiḥ kṛṣyarthairyonipoṣaṇaiḥ | vārtayā dhāryate sarvaṃ dharmairetairdvijātibhiḥ
कर, खानों और व्यापार से, खेती और पशुपालन से — इस वार्ता (जीविका) से ही सब कुछ टिका रहता है; द्विज इन्हीं धर्मों से इसे धारण करते हैं।
श्लोक 32 (3.152.32)
त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तिस्रो विद्या विजानताम् । ताभिः सम्यक्प्रवृत्ताभिर्लोकयात्रा विधीयते ॥
trayī vārtā daṇḍanītistisro vidyā vijānatām | tābhiḥ samyakpravṛttābhirlokayātrā vidhīyate
त्रयी (तीनों वेद), वार्ता और दण्डनीति — ज्ञानियों की ये तीन विद्याएँ हैं; इनके ठीक से चलने पर ही लोकयात्रा चलती है।
श्लोक 33 (3.152.33)
सा चेद्धर्मकृता न स्यात्त्रयीधर्ममृते भुवि । दण्डनीतिमृते चापि निर्मर्यादमिदं भवेत् ॥
sā ceddharmakṛtā na syāttrayīdharmamṛte bhuvi | daṇḍanītimṛte cāpi nirmaryādamidaṃ bhavet
यदि वह लोकयात्रा धर्म से न चले — पृथ्वी पर त्रयी-धर्म के बिना और दण्डनीति के बिना — तो यह संसार मर्यादाहीन हो जाए।
श्लोक 34 (3.152.34)
वार्ताधर्मे ह्यवर्तिन्यो विनश्येयुरिमाः प्रजाः । सुप्रवृत्तैस्त्रिभिर्ह्येतैर्धर्मैः सूयन्ति वै प्रजाः ॥
vārtādharme hyavartinyo vinaśyeyurimāḥ prajāḥ | supravṛttaistribhirhyetairdharmaiḥ sūyanti vai prajāḥ
वार्ता-धर्म का पालन न करने पर ये प्रजाएँ नष्ट हो जाएँ; इन्हीं तीन धर्मों के भली-भाँति चलने से प्रजा फलती-फूलती है।
श्लोक 35 (3.152.35)
द्विजानाममृतं धर्मो ह्येकश्चैवैकवर्णकः । यज्ञाध्ययनदानानि त्रयः साधारणाः स्मृताः ॥
dvijānāmamṛtaṃ dharmo hyekaścaivaikavarṇakaḥ | yajñādhyayanadānāni trayaḥ sādhāraṇāḥ smṛtāḥ
द्विजों के लिए धर्म अमृत है, और प्रत्येक वर्ण का एक-एक विशेष धर्म है; यज्ञ, अध्ययन और दान — ये तीन सबके लिए समान माने गए हैं।
श्लोक 36 (3.152.36)
याजनाध्यापने चोभे ब्राह्मणानां परिग्रहः । पालनं क्षत्रियाणां वै वैश्यधर्मश्च पोषणम् ॥
yājanādhyāpane cobhe brāhmaṇānāṃ parigrahaḥ | pālanaṃ kṣatriyāṇāṃ vai vaiśyadharmaśca poṣaṇam
यज्ञ कराना, पढ़ाना और दान ग्रहण करना ब्राह्मणों का धर्म है; रक्षा करना क्षत्रियों का, और पालन-पोषण वैश्यों का धर्म है।
श्लोक 37 (3.152.37)
शुश्रूषा च द्विजातीनां शूद्राणां धर्म उच्यते । भैक्षहोमव्रतैर्हीनास्तथैव गुरुवासिताः ॥
śuśrūṣā ca dvijātīnāṃ śūdrāṇāṃ dharma ucyate | bhaikṣahomavratairhīnāstathaiva guruvāsitāḥ
द्विजों की सेवा शूद्रों का धर्म कहा जाता है; वे भिक्षा, होम और व्रतों से रहित होते हैं, और इसी प्रकार ऊपर के तीनों वर्णों के आश्रय में रहते हैं।
श्लोक 38 (3.152.38)
क्षत्रधर्मोऽत्र कौन्तेय तव धर्मोऽत्र रक्षणम् । स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व विनीतो नियतेन्द्रियः ॥
kṣatradharmo'tra kaunteya tava dharmo'tra rakṣaṇam | svadharmaṃ pratipadyasva vinīto niyatendriyaḥ
हे कुन्तीपुत्र, यहाँ तुम्हारा धर्म क्षत्रिय-धर्म है; रक्षा करना ही तुम्हारा धर्म है। विनयी और जितेन्द्रिय होकर अपने धर्म का पालन करो।
श्लोक 39 (3.152.39)
वृद्धैः संमन्त्र्य सद्भिश्च बुद्धिमद्भिः श्रुतान्वितैः । आस्थितः शास्ति दण्डेन व्यसनी परिभूयते ॥
vṛddhaiḥ saṃmantrya sadbhiśca buddhimadbhiḥ śrutānvitaiḥ | āsthitaḥ śāsti daṇḍena vyasanī paribhūyate
वृद्धों, सज्जनों, बुद्धिमानों और शास्त्रज्ञों से परामर्श करके और उनके सहारे स्थित होकर राजा दण्ड से शासन करता है; व्यसनी राजा तिरस्कृत होता है।
श्लोक 40 (3.152.40)
निग्रहानुग्रहैः सम्यग्यदा नेता प्रवर्तते । तदा भवन्ति लोकस्य मर्यादाः सुव्यवस्थिताः ॥
nigrahānugrahaiḥ samyagyadā netā pravartate | tadā bhavanti lokasya maryādāḥ suvyavasthitāḥ
जब नेता दण्ड और अनुग्रह का ठीक प्रयोग करता है, तब संसार की मर्यादाएँ भली-भाँति स्थिर रहती हैं।
श्लोक 41 (3.152.41)
तस्माद्देशे च दुर्गे च शत्रुमित्रबलेषु च । नित्यं चारेण बोद्धव्यं स्थानं वृद्धिः क्षयस्तथा ॥
tasmāddeśe ca durge ca śatrumitrabaleṣu ca | nityaṃ cāreṇa boddhavyaṃ sthānaṃ vṛddhiḥ kṣayastathā
इसलिए गुप्तचरों द्वारा अपने देश, दुर्ग और शत्रु तथा मित्र की सेनाओं की स्थिति, वृद्धि और क्षय को सदा जानते रहना चाहिए।
श्लोक 42 (3.152.42)
राज्ञामुपायश्चारश्च बुद्धिमन्त्रपराक्रमाः । निग्रहप्रग्रहौ चैव दाक्ष्यं वै कार्यसाधकम् ॥
rājñāmupāyaścāraśca buddhimantraparākramāḥ | nigrahapragrahau caiva dākṣyaṃ vai kāryasādhakam
राजाओं के साधन हैं — गुप्तचर, बुद्धि, मन्त्रणा और पराक्रम, निग्रह और अनुग्रह, तथा दक्षता; ये ही कार्य सिद्ध करते हैं।
श्लोक 43 (3.152.43)
साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनोपेक्षणेन च । साधनीयानि कार्याणि समासव्यासयोगतः ॥
sāmnā dānena bhedena daṇḍenopekṣaṇena ca | sādhanīyāni kāryāṇi samāsavyāsayogataḥ
साम, दान, भेद, दण्ड और उपेक्षा — इन्हें अलग-अलग या मिलाकर कार्य सिद्ध करने चाहिए।
श्लोक 44 (3.152.44)
मन्त्रमूला नयाः सर्वे चाराश्च भरतर्षभ । सुमन्त्रितनयैः सद्भिस्तद्विधैः सह मन्त्रयेत् ॥
mantramūlā nayāḥ sarve cārāśca bharatarṣabha | sumantritanayaiḥ sadbhistadvidhaiḥ saha mantrayet
हे भरतश्रेष्ठ, सारी नीतियों और गुप्तचरों का मूल मन्त्रणा है। भली-भाँति विचारी गई नीतियों के साथ, उनके जानकार सज्जनों से परामर्श करना चाहिए।
श्लोक 45 (3.152.45)
स्त्रिया मूढेन बालेन लुब्धेन लघुनाऽपि वा । न मन्त्रयीत गुह्यानि येषु चोन्मादलक्षणम् ॥
striyā mūḍhena bālena lubdhena laghunā'pi vā | na mantrayīta guhyāni yeṣu conmādalakṣaṇam
स्त्री, मूर्ख, बालक, लोभी या ओछे व्यक्ति से, और जिनमें उन्माद के लक्षण हों उनसे, गुप्त बातों पर मन्त्रणा नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 46 (3.152.46)
मन्त्रयेत्सह विद्वद्भिः शक्तैः कर्माणि कारयेत् । स्निग्धैश्च नीतिविन्यासैर्मूर्खान्सर्वत्र वर्जयेत् ॥
mantrayetsaha vidvadbhiḥ śaktaiḥ karmāṇi kārayet | snigdhaiśca nītivinyāsairmūrkhānsarvatra varjayet
विद्वानों से मन्त्रणा करे, समर्थ लोगों से काम कराए, स्नेही जनों से नीति की व्यवस्था कराए, और मूर्खों को सर्वत्र दूर रखे।
श्लोक 47 (3.152.47)
धार्मिकान्धर्मकार्येषु अर्थकार्येषु पण्डितान् । स्त्रीषु क्लीबान्नियुञ्जीत क्रूरान्क्रूरेषु कर्मसु ॥
dhārmikāndharmakāryeṣu arthakāryeṣu paṇḍitān | strīṣu klībānniyuñjīta krūrānkrūreṣu karmasu
धर्म-कार्यों में धर्मात्माओं को, अर्थ-कार्यों में पण्डितों को, स्त्रियों के बीच नपुंसकों को और कठोर कर्मों में कठोर लोगों को नियुक्त करे।
श्लोक 48 (3.152.48)
स्वेभ्यश्चैव परेभ्यश्च कार्याकार्यसमुद्भवा । बुद्धिः कर्मसु विज्ञेया रिपूणां च बलाबलम् ॥
svebhyaścaiva parebhyaśca kāryākāryasamudbhavā | buddhiḥ karmasu vijñeyā ripūṇāṃ ca balābalam
अपने लोगों से और दूसरों से भी, हर काम में क्या करना है और क्या नहीं, यह जानना चाहिए, और शत्रुओं का बलाबल भी।
श्लोक 49 (3.152.49)
बुद्ध्या स्वप्रतिपन्नेषु कुर्यात्साधुष्वनुग्रहम् । निग्रहं चाप्यशिष्टेषु निर्मर्यादेषु कारयेत् ॥
buddhyā svapratipanneṣu kuryātsādhuṣvanugraham | nigrahaṃ cāpyaśiṣṭeṣu nirmaryādeṣu kārayet
विवेक से शरण में आए सज्जनों पर अनुग्रह करे, और दुष्ट तथा मर्यादाहीन लोगों का निग्रह कराए।
श्लोक 50 (3.152.50)
निग्रहे प्रग्रहे सम्यग्यदा राजा प्रवर्तते । तदा भवति लोकस्य मर्यादा सुव्यवस्थिता ॥
nigrahe pragrahe samyagyadā rājā pravartate | tadā bhavati lokasya maryādā suvyavasthitā
जब राजा निग्रह और संरक्षण का ठीक प्रयोग करता है, तब संसार की मर्यादा भली-भाँति स्थिर रहती है।
श्लोक 51 (3.152.51)
एष तेऽभिहितः पार्थ घोरो धर्मो दुरन्वयः । तं स्वधर्मविभागेन विनयस्थोऽनुपालय ॥
eṣa te'bhihitaḥ pārtha ghoro dharmo duranvayaḥ | taṃ svadharmavibhāgena vinayastho'nupālaya
हे पार्थ, मैंने तुम्हें यह कठोर और कठिनाई से निभने वाला धर्म बताया। विनय में स्थित रहकर अपने धर्म के विभाग के अनुसार इसका पालन करो।
श्लोक 52 (3.152.52)
तपोधर्मदमेज्याभिर्विप्रा यान्ति यथा दिवम् । दानातिथ्यक्रियाधर्मैर्यान्ति वैश्याश्च सद्गतिम् ॥
tapodharmadamejyābhirviprā yānti yathā divam | dānātithyakriyādharmairyānti vaiśyāśca sadgatim
जैसे ब्राह्मण तप, धर्म, इन्द्रिय-संयम और यज्ञ से स्वर्ग जाते हैं, वैसे ही वैश्य दान, अतिथि-सत्कार और कर्तव्य-कर्मों से सद्गति पाते हैं।
श्लोक 53 (3.152.53)
द्विजशुश्रूषया शूद्रा लभन्ते गतिमुत्तमाम् । क्षत्रं याति तथा स्वर्गं भुवि निग्रहपालनैः ॥
dvijaśuśrūṣayā śūdrā labhante gatimuttamām | kṣatraṃ yāti tathā svargaṃ bhuvi nigrahapālanaiḥ
शूद्र द्विजों की सेवा से उत्तम गति पाते हैं; और क्षत्रिय इसी प्रकार पृथ्वी पर निग्रह और पालन करके स्वर्ग जाता है।
श्लोक 54 (3.152.54)
सम्यक्प्रणीतदण्डा हि कामद्वेषविवर्जिताः । अलुब्धा विगतक्रोधाः सतां यान्ति सलोकतां ॥
samyakpraṇītadaṇḍā hi kāmadveṣavivarjitāḥ | alubdhā vigatakrodhāḥ satāṃ yānti salokatāṃ
क्योंकि जो दण्ड का ठीक प्रयोग करते हैं, काम और द्वेष से रहित, निर्लोभ और क्रोधहीन होते हैं, वे सज्जनों के लोकों को जाते हैं।