आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 153
हनुमान का वरदान और भीम को सौगन्धिक वन का दर्शन
हनुमान अपना विशाल रूप समेटकर भीम को गले लगाते हैं, जिससे उनकी थकान मिट जाती है, और आँसू भरकर उन्हें वर माँगने को कहते हैं — धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारना, हस्तिनापुर को कुचलना या दुर्योधन को बाँधकर ले आना। भीम केवल उनकी कृपा चाहते हैं; तब हनुमान वचन देते हैं कि वे युद्ध में भीम की गर्जना को बढ़ाएँगे और अर्जुन के रथ की ध्वजा से गर्जन करेंगे, और फिर अन्तर्धान हो जाते हैं। भीम गन्धमादन के वनों, सरोवरों और ढलानों को पार करते हुए सन्ध्या के समय एक नदी और उसमें विशाल सौगन्धिक वन देखते हैं, और उनका मन द्रौपदी की ओर चला जाता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.153.1)
ततः संहृत्य विपुलं तद्वपुः कामवर्धितम् । भीमसेनं पुनर्दोर्भ्यां पर्यष्वजत वानरः ॥
tataḥ saṃhṛtya vipulaṃ tadvapuḥ kāmavardhitam | bhīmasenaṃ punardorbhyāṃ paryaṣvajata vānaraḥ
तब वानर ने इच्छा से बढ़ाए हुए अपने उस विशाल शरीर को समेट लिया और फिर भीमसेन को दोनों भुजाओं में भरकर गले लगा लिया।
श्लोक 2 (3.153.2)
परिष्वक्तस्य तस्याशु भ्रात्रा भीमस्य भारत । श्रमो नाशमुपागच्छत्सर्वं चासीत्प्रदक्षिणम् ॥
pariṣvaktasya tasyāśu bhrātrā bhīmasya bhārata | śramo nāśamupāgacchatsarvaṃ cāsītpradakṣiṇam
हे भारत, भाई के आलिंगन करते ही भीम की थकान मिट गई और सब कुछ उनके अनुकूल हो गया।
श्लोक 3 (3.153.3)
बलं चातिबलो मेने न मेऽस्ति सदृशो महान् । ततः पुनरथोवाच पर्यश्रुनयनो हरिः ॥
balaṃ cātibalo mene na me'sti sadṛśo mahān | tataḥ punarathovāca paryaśrunayano hariḥ
अत्यन्त बलवान हुए भीम ने अपने बल का अनुभव करके सोचा, “कोई भी महान् मेरे समान नहीं है।” तब आँखों में आँसू भरकर वानर फिर बोला।
श्लोक 4 (3.153.4)
भीममाभाष्य सौहार्दाद्बाष्पगद्गदया गिरा । गच्छ वीर स्वमावासं स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे ॥
bhīmamābhāṣya sauhārdādbāṣpagadgadayā girā | gaccha vīra svamāvāsaṃ smartavyo'smi kathāntare
स्नेहपूर्वक भीम को सम्बोधित करके, आँसुओं से रुँधी वाणी में उसने कहा — “हे वीर, अपने निवास को जाओ, और बातचीत के बीच मुझे स्मरण करते रहना।
हनूमानुवाच
श्लोक 5 (3.153.5)
इहस्थश्च कुरुश्रेष्ठ न निवेद्योऽस्मि कस्यचित् । धनदस्यालयाच्चापि विसृष्टानां महाबल ॥
ihasthaśca kuruśreṣṭha na nivedyo'smi kasyacit | dhanadasyālayāccāpi visṛṣṭānāṃ mahābala
हे कुरुश्रेष्ठ, मैं यहाँ रहता हूँ, यह किसी को मत बताना। हे महाबली, धनपति कुबेर के भवन से विदा हुई
श्लोक 6 (3.153.6)
एष काल इहायातुं देवगन्धर्वयोषिताम् । ममापि सफलं चक्षुः स्मारितश्चास्मि राघवम् ॥
eṣa kāla ihāyātuṃ devagandharvayoṣitām | mamāpi saphalaṃ cakṣuḥ smāritaścāsmi rāghavam
देव और गन्धर्व स्त्रियों के यहाँ आने का यही समय है। मेरी आँखें भी सफल हो गईं, और मुझे राघव का स्मरण हो आया —
श्लोक 7 (3.153.7)
रामाभिधानं विष्णुं हि जगद्धृदयनन्दनम् । सीतावक्त्रारविन्दार्कं दशास्यध्वान्तभास्करम् ॥
rāmābhidhānaṃ viṣṇuṃ hi jagaddhṛdayanandanam | sītāvaktrāravindārkaṃ daśāsyadhvāntabhāskaram
राम नाम धारण करने वाले उन विष्णु का, जो जगत् के हृदय को आनन्द देते हैं, सीता के मुख-कमल के लिए सूर्य हैं और दशमुख रावण-रूपी अन्धकार के लिए भास्कर हैं;
श्लोक 8 (3.153.8)
मानुषं गात्रसंस्पर्शं गत्वा भीम त्वया सह । तदस्मद्दर्शनं वीर कौन्तेयामोघमस्तु ते ॥
mānuṣaṃ gātrasaṃsparśaṃ gatvā bhīma tvayā saha | tadasmaddarśanaṃ vīra kaunteyāmoghamastu te
क्योंकि भीम, तुम्हारे द्वारा मुझे फिर एक मनुष्य के शरीर का स्पर्श मिला। इसलिए हे वीर कुन्तीपुत्र, मेरा यह दर्शन तुम्हारे लिए व्यर्थ न जाए।
श्लोक 9 (3.153.9)
भ्रातृत्वं त्वं पुरस्कृत्य वरं वरय भारत । यदि तावन्मया क्षुद्रा गत्वा वारणसाह्वयम् ॥
bhrātṛtvaṃ tvaṃ puraskṛtya varaṃ varaya bhārata | yadi tāvanmayā kṣudrā gatvā vāraṇasāhvayam
मुझे भाई मानकर, हे भारत, कोई वर माँगो। यदि मुझे हस्तिनापुर जाकर उन तुच्छ
श्लोक 10 (3.153.10)
धार्तराष्ट्रा निहन्तव्या यावदेतत्करोम्यहम् । शिलया नगरं वा तन्मर्दितव्यं मया यदि ॥
dhārtarāṣṭrā nihantavyā yāvadetatkaromyaham | śilayā nagaraṃ vā tanmarditavyaṃ mayā yadi
धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारना हो, तो मैं यह अभी कर दूँ। या यदि मुझे उस नगर को शिला से कुचल देना हो,
श्लोक 11 (3.153.11)
बद्ध्वा दुर्योधनं चाद्य आनयामि तवान्तिकम् । यावदेतत्करोम्यद्य कामं तव महाबल ॥
baddhvā duryodhanaṃ cādya ānayāmi tavāntikam | yāvadetatkaromyadya kāmaṃ tava mahābala
या आज ही दुर्योधन को बाँधकर तुम्हारे पास ले आऊँ — हे महाबली, तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैं आज ही यह कर दूँ।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (3.153.12)
भीमसेनस्तु तद्वाक्यं श्रुत्वा तस्य महात्मनः । प्रत्युवाच हनूमन्तं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥
bhīmasenastu tadvākyaṃ śrutvā tasya mahātmanaḥ | pratyuvāca hanūmantaṃ prahṛṣṭenāntarātmanā
उस महात्मा के ये वचन सुनकर भीमसेन ने प्रसन्न मन से हनुमान को उत्तर दिया —
भीम उवाच
श्लोक 13 (3.153.13)
कृतमेव त्वया सर्वं मम वानरपुङ्गव । स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो कामये त्वां प्रसीद मे ॥
kṛtameva tvayā sarvaṃ mama vānarapuṅgava | svasti te'stu mahābāho kāmaye tvāṃ prasīda me
“हे वानरश्रेष्ठ, आपने मेरे लिए सब कुछ कर ही दिया। हे महाबाहु, आपका कल्याण हो; मैं आपका स्नेह चाहता हूँ। मुझ पर प्रसन्न रहिए।
श्लोक 14 (3.153.14)
सनाथाः पाण्डवाः सर्वे त्वया नाथेन वीर्यवन् । तवैव तेजसा सर्वान्विजेष्यामो वयं परान् ॥
sanāthāḥ pāṇḍavāḥ sarve tvayā nāthena vīryavan | tavaiva tejasā sarvānvijeṣyāmo vayaṃ parān
हे पराक्रमी, आपको रक्षक पाकर सारे पाण्डव सनाथ हो गए। आपके ही तेज से हम सब शत्रुओं को जीत लेंगे।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 15 (3.153.15)
एवमुक्तस्तु हनुमान्भीमसेनमभाषत । भ्रातृत्वात्सौहृदाच्चैव करिष्यामि प्रियं तव ॥
evamuktastu hanumānbhīmasenamabhāṣata | bhrātṛtvātsauhṛdāccaiva kariṣyāmi priyaṃ tava
ऐसा कहे जाने पर हनुमान ने भीमसेन से कहा — “भ्रातृभाव और स्नेह के कारण मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा।
हनूमानुवाच
श्लोक 16 (3.153.16)
चमूं विगाह्य शत्रूणां परशक्तिसमाकुलाम् । यदा सिंहरवं वीर करिष्यसि महाबल ॥
camūṃ vigāhya śatrūṇāṃ paraśaktisamākulām | yadā siṃharavaṃ vīra kariṣyasi mahābala
हे वीर, हे महाबली, जब तुम शत्रुओं की बरछियों से भरी सेना में घुसकर सिंहनाद करोगे,
श्लोक 17 (3.153.17)
तदाहं बृंहयिष्यामि स्वरवेण रवं तव । यं श्रुत्वैव भविष्यन्ति व्यसवस्तेऽरयो रणे ॥
tadāhaṃ bṛṃhayiṣyāmi svaraveṇa ravaṃ tava | yaṃ śrutvaiva bhaviṣyanti vyasavaste'rayo raṇe
तब मैं अपने स्वर से तुम्हारी गर्जना को और बढ़ा दूँगा, जिसे सुनते ही युद्ध में तुम्हारे शत्रु प्राणहीन हो जाएँगे।
श्लोक 18 (3.153.18)
विजयस्य ध्वजस्थश्च नादान्मोक्ष्यामि दारुणान् । शत्रूणां ये प्राणहराः सुखं येन हनिष्यथ ॥
vijayasya dhvajasthaśca nādānmokṣyāmi dāruṇān | śatrūṇāṃ ye prāṇaharāḥ sukhaṃ yena haniṣyatha
विजय (अर्जुन) के ध्वज पर स्थित होकर मैं ऐसे भयंकर नाद करूँगा जो शत्रुओं के प्राण हर लेंगे, जिससे तुम उन्हें सहज ही मार सकोगे।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (3.153.19)
एवमाभाष्य हनुमांस्तदा पाण्डवनन्दनम् । मार्गमाख्याय भीमाय तत्रैवान्तरधीयत ॥
evamābhāṣya hanumāṃstadā pāṇḍavanandanam | mārgamākhyāya bhīmāya tatraivāntaradhīyata
पाण्डवनन्दन भीम से ऐसा कहकर और उन्हें मार्ग बताकर हनुमान वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 20 (3.153.20)
गते तस्मिन्हरिवरे भीमोऽपि बलिनां वरः । तेन मार्गेण विपुलं व्यचरद्गन्धमादनम् ॥
gate tasminharivare bhīmo'pi balināṃ varaḥ | tena mārgeṇa vipulaṃ vyacaradgandhamādanam
उस वानरश्रेष्ठ के चले जाने पर बलवानों में श्रेष्ठ भीम उसी मार्ग से विशाल गन्धमादन पर्वत पर विचरने लगे,
श्लोक 21 (3.153.21)
अनुस्मरन्वपुस्तस्य श्रियं चाप्रतिमां भुवि । माहात्म्यमनुभावं च स्मरन्दाशरथेर्ययौ ॥
anusmaranvapustasya śriyaṃ cāpratimāṃ bhuvi | māhātmyamanubhāvaṃ ca smarandāśaratheryayau
हनुमान के शरीर और पृथ्वी पर अनुपम उनकी शोभा को याद करते हुए, तथा दशरथनन्दन राम की महिमा और प्रभाव का स्मरण करते हुए वे आगे बढ़े।
श्लोक 22 (3.153.22)
स तानि रमणीयानि वनान्युपवनानि च । विलोलयामास तदा सौगन्धिकवनेप्सया ॥
sa tāni ramaṇīyāni vanānyupavanāni ca | vilolayāmāsa tadā saugandhikavanepsayā
सौगन्धिक वन तक पहुँचने की इच्छा से वे उन रमणीय वनों और उपवनों में हलचल मचाते हुए आगे बढ़े,
श्लोक 23 (3.153.23)
फुल्लपद्मविचित्राणि सरांसि सरितस्तथा । नानाकुसुमचित्राणि पुष्पितानि वनानि च ॥
phullapadmavicitrāṇi sarāṃsi saritastathā | nānākusumacitrāṇi puṣpitāni vanāni ca
खिले कमलों से सुशोभित सरोवरों और नदियों में, तथा नाना प्रकार के फूलों से रंग-बिरंगे पुष्पित वनों में।
श्लोक 24 (3.153.24)
मत्तवारणयूथानि पङ्कक्लिन्नानि भारत । वर्षतामिव मेघानां वृन्दानि ददृशे तदा ॥
mattavāraṇayūthāni paṅkaklinnāni bhārata | varṣatāmiva meghānāṃ vṛndāni dadṛśe tadā
हे भारत, तब उन्होंने कीचड़ से सने मतवाले हाथियों के झुंड देखे, जो बरसते बादलों के समूहों जैसे लग रहे थे।
श्लोक 25 (3.153.25)
हरिणैश्चपलापाङ्गैर्हरिणीसहितैर्वनम् । सशष्पकवलैः श्रीमान्पथि दृष्ट्वा द्रुतं ययौ ॥
hariṇaiścapalāpāṅgairhariṇīsahitairvanam | saśaṣpakavalaiḥ śrīmānpathi dṛṣṭvā drutaṃ yayau
मार्ग में चंचल चितवन वाले, मुँह में घास के कौर लिए हिरनों और हिरनियों से भरे वन को देखते हुए श्रीमान् भीम तेज़ी से आगे बढ़े।
श्लोक 26 (3.153.26)
महिषैश्च वराहैश्च शार्दूलैश्च निषेवितम् । व्यपेतभीर्गिरिं शौर्याद्भीमसेनो व्यगाहत ॥
mahiṣaiśca varāhaiśca śārdūlaiśca niṣevitam | vyapetabhīrgiriṃ śauryādbhīmaseno vyagāhata
भैंसों, सूअरों और बाघों से सेवित उस पर्वत में निर्भय भीमसेन अपने शौर्य के बल पर भीतर तक घुसते चले गए।
श्लोक 27 (3.153.27)
कुसुमानतशाखैश्च ताम्रपल्लवकोमलैः । याच्यमान इवारण्ये द्रुमैर्मारुतकम्पितैः ॥
kusumānataśākhaiśca tāmrapallavakomalaiḥ | yācyamāna ivāraṇye drumairmārutakampitaiḥ
वन में हवा से हिलते, फूलों से झुकी डालियों और ताँबे जैसे लाल कोमल पत्तों वाले वृक्ष मानो उनसे याचना कर रहे थे;
श्लोक 28 (3.153.28)
कृतपद्माञ्जलिपुटा मत्तषट्पदसेविताः । प्रियतीर्थवना मार्गे पद्मिनीः समतिक्रमन् ॥
kṛtapadmāñjalipuṭā mattaṣaṭpadasevitāḥ | priyatīrthavanā mārge padminīḥ samatikraman
मार्ग में वे उन कमल-सरोवरों को पार करते गए जो मानो कमलों की अंजलि बाँधे खड़े थे, जिन पर मतवाले भौंरे मँडरा रहे थे और जिनके घाट और वन मनोहर थे।
श्लोक 29 (3.153.29)
सज्जमानमनोदृष्टिः फुल्लेषु गिरिसानुषु । द्रौपदीवाक्यपाथेयो भीमो भीमपराक्रमः ॥
sajjamānamanodṛṣṭiḥ phulleṣu girisānuṣu | draupadīvākyapātheyo bhīmo bhīmaparākramaḥ
खिले हुए पर्वत-शिखरों में मन और दृष्टि उलझाए, द्रौपदी के वचनों को ही पाथेय बनाकर, भयंकर पराक्रमी भीम चलते रहे।
श्लोक 30 (3.153.30)
परिवृत्तेऽहनि ततः प्रकीर्णहरिणे वने । काञ्चनैर्विमलैः पद्मैर्ददर्श विपुलां नदीम् ॥
parivṛtte'hani tataḥ prakīrṇahariṇe vane | kāñcanairvimalaiḥ padmairdadarśa vipulāṃ nadīm
फिर दिन ढलने पर, हिरनों से भरे वन में उन्होंने निर्मल सुनहरे कमलों वाली एक चौड़ी नदी देखी,
श्लोक 31 (3.153.31)
हंसकारण्डवयुतां चक्रवाकोपशोभिताम् । रचितामिव तस्याद्रेर्मालां विमलपङ्कजाम् ॥
haṃsakāraṇḍavayutāṃ cakravākopaśobhitām | racitāmiva tasyādrermālāṃ vimalapaṅkajām
जो हंसों और कारण्डवों से भरी और चक्रवाकों से सुशोभित थी, मानो उस पर्वत के लिए निर्मल कमलों की गूँथी हुई माला हो।
श्लोक 32 (3.153.32)
तस्यां नद्यां महासत्वः सौगन्धिकवनं महत् । अपश्यत्प्रीतिजननं बालार्कसदृशद्युति ॥
tasyāṃ nadyāṃ mahāsatvaḥ saugandhikavanaṃ mahat | apaśyatprītijananaṃ bālārkasadṛśadyuti
उस नदी में महाबली भीम ने उगते सूर्य जैसी कान्ति वाला, मन को आनन्द देने वाला विशाल सौगन्धिक वन देखा।
श्लोक 33 (3.153.33)
तद्दृष्ट्वा लब्धकामः स मनसा पाण्डुनन्दनः । वनवासपरिक्लिष्टां जगाम मनसा प्रियाम् ॥
taddṛṣṭvā labdhakāmaḥ sa manasā pāṇḍunandanaḥ | vanavāsaparikliṣṭāṃ jagāma manasā priyām
उसे देखकर पाण्डुनन्दन ने मन ही मन अपनी कामना को पूरी हुई समझा, और उनका मन वनवास के कष्टों से क्लान्त अपनी प्रिया की ओर चला गया।