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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 154

कुबेर के सरोवर पर भीम

भीम कैलास पर कुबेर के भवन के पास उस सरोवर पर पहुँचते हैं, जो सुनहरे और सुगन्धित सौगन्धिक कमलों से भरा दिव्य जलाशय और यक्षराज का क्रीडा-स्थल है। वे उसका अमृत-जैसा जल पीते हैं और उसे देखकर आनन्दित होते हैं। उस सरोवर की रक्षा क्रोधवश नाम के लाखों राक्षस करते हैं, जो उन्हें मुनिवेश में शस्त्र लिए आते देखकर पूछते हैं कि वे कौन हैं और यहाँ क्यों आए हैं।

अध्याय 153अध्याय-सूचीअध्याय 155

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.154.1)

स गत्वानलिनीं रम्यां राक्षसैरभिरक्षिताम् । कैलासशिखरे रम्ये ददर्श शुभकानने ॥

sa gatvānalinīṃ ramyāṃ rākṣasairabhirakṣitām | kailāsaśikhare ramye dadarśa śubhakānane

आगे बढ़कर भीम ने कैलास के एक रमणीय शिखर पर सुन्दर वन में राक्षसों द्वारा रक्षित वह मनोहर सरोवर देखा।

श्लोक 2 (3.154.2)

कुबेरभुवनाभ्याशे जातां पर्वतनिर्झरैः । सुरम्यां विपुलच्छायां नानाद्रुमलताकुलाम् ॥

kuberabhuvanābhyāśe jātāṃ parvatanirjharaiḥ | suramyāṃ vipulacchāyāṃ nānādrumalatākulām

वह कुबेर के भवन के निकट पर्वत के झरनों से बना था — अत्यन्त सुन्दर, विस्तृत छाया वाला, अनेक प्रकार के वृक्षों और लताओं से भरा हुआ।

श्लोक 3 (3.154.3)

हरिताम्बुजसंछन्नां दिव्यां कनकपुष्कराम् । नानापक्षिजनाकीर्णां सूपतीर्थामकर्दमाम् ॥

haritāmbujasaṃchannāṃ divyāṃ kanakapuṣkarām | nānāpakṣijanākīrṇāṃ sūpatīrthāmakardamām

वह हरे कमलों से ढका हुआ, दिव्य और सुनहरे कमलों से युक्त था; नाना प्रकार के पक्षियों के झुंड उस पर छाए रहते थे; उसके घाट सुन्दर थे और उसमें कीचड़ नहीं था।

श्लोक 4 (3.154.4)

अतीव रम्यां सुजलां जातां पर्वतसानुषु । विचित्रभूतां लोकस्य शुभामद्भुतदर्शनाम् ॥

atīva ramyāṃ sujalāṃ jātāṃ parvatasānuṣu | vicitrabhūtāṃ lokasya śubhāmadbhutadarśanām

पर्वत की ढलानों पर स्थित, निर्मल जल वाला वह अत्यन्त रमणीय सरोवर संसार में अनोखा, मंगलमय और देखने में अद्भुत था।

श्लोक 5 (3.154.5)

तत्रामृतरसं शीतं लघु कुन्तीसुतः शुभम् । ददर्शविमलं तोयं पिबंश्च बहु पाण्डवः ॥

tatrāmṛtarasaṃ śītaṃ laghu kuntīsutaḥ śubham | dadarśavimalaṃ toyaṃ pibaṃśca bahu pāṇḍavaḥ

वहाँ कुन्तीपुत्र ने अमृत के समान स्वाद वाला, शीतल, हल्का, हितकारी और निर्मल जल देखा, और उस पाण्डव ने उसे जी भरकर पिया।

श्लोक 6 (3.154.6)

तां तु पुष्करिणीं रम्यां दिव्यसौगन्धिकावृताम् । जातरूपमयैः पद्मैश्छन्नां परमगन्धिभिः ॥

tāṃ tu puṣkariṇīṃ ramyāṃ divyasaugandhikāvṛtām | jātarūpamayaiḥ padmaiśchannāṃ paramagandhibhiḥ

वह रमणीय पुष्करिणी दिव्य सौगन्धिक पुष्पों से भरी थी और परम सुगन्धित स्वर्ण-कमलों से ढकी हुई थी,

श्लोक 7 (3.154.7)

वैडूर्यवरनालैश्च बहुचित्रैर्मनोरमैः । हंसकारण्डवोद्धूतैः सृजद्भिरमलं रजः ॥

vaiḍūryavaranālaiśca bahucitrairmanoramaiḥ | haṃsakāraṇḍavoddhūtaiḥ sṛjadbhiramalaṃ rajaḥ

जिनकी डंडियाँ उत्तम वैदूर्य मणि की थीं; वे रंग-बिरंगे मनोहर कमल हंसों और कारण्डवों के हिलाने से निर्मल पराग बिखेर रहे थे।

श्लोक 8 (3.154.8)

आक्रीडं राजराजस्य कुबेरस्य महात्मनः । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च देवैश्च परमार्चिताम् ॥

ākrīḍaṃ rājarājasya kuberasya mahātmanaḥ | gandharvairapsarobhiśca devaiśca paramārcitām

वह राजाधिराज महात्मा कुबेर का क्रीडा-स्थल था, जिसका गन्धर्व, अप्सराएँ और देवता अत्यन्त आदर करते थे।

श्लोक 9 (3.154.9)

सेवितामृषिभिर्दिव्यैर्यक्षैः किंपुरुषैस्तथा । राक्षसैः किंनरैश्चापि गुप्तां वैश्रवणेन च ॥

sevitāmṛṣibhirdivyairyakṣaiḥ kiṃpuruṣaistathā | rākṣasaiḥ kiṃnaraiścāpi guptāṃ vaiśravaṇena ca

दिव्य ऋषि, यक्ष, किम्पुरुष, राक्षस और किन्नर वहाँ आते-जाते थे, और स्वयं वैश्रवण (कुबेर) उसकी रक्षा करते थे।

श्लोक 10 (3.154.10)

तां च दृष्ट्वैव कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः । बभूव परमप्रीतो दिव्यंप्रेक्ष्य सरो महत् ॥

tāṃ ca dṛṣṭvaiva kaunteyo bhīmaseno mahābalaḥ | babhūva paramaprīto divyaṃprekṣya saro mahat

उसे देखते ही कुन्तीपुत्र महाबली भीमसेन उस विशाल दिव्य सरोवर को निहारकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।

श्लोक 11 (3.154.11)

तच्च क्रोधवशा नाम राक्षसा राजशासनात् । रक्षन्ति शतसाहस्राश्चित्रायुधपरिच्छदाः ॥

tacca krodhavaśā nāma rākṣasā rājaśāsanāt | rakṣanti śatasāhasrāścitrāyudhaparicchadāḥ

अपने राजा की आज्ञा से क्रोधवश नाम के लाखों राक्षस, नाना प्रकार के शस्त्रों और साज-सज्जा से युक्त होकर, उसकी रक्षा करते थे।

श्लोक 12 (3.154.12)

ते तु दृष्ट्वैव कौन्तेयमजिनैः परिवारितम् । रुक्माङ्गदधरं वीरं भीमं भीमपराक्रमम् ॥

te tu dṛṣṭvaiva kaunteyamajinaiḥ parivāritam | rukmāṅgadadharaṃ vīraṃ bhīmaṃ bhīmaparākramam

जब उन्होंने मृगचर्म धारण किए, सोने के बाजूबंद पहने, भयंकर पराक्रम वाले वीर कुन्तीपुत्र भीम को देखा —

श्लोक 13 (3.154.13)

सायुधं बद्धनिस्त्रिंशमशङ्कितमरिंदमम् । पुष्करेप्सुमुपायान्तमन्योन्यमभिचुक्रुशुः ॥

sāyudhaṃ baddhanistriṃśamaśaṅkitamariṃdamam | puṣkarepsumupāyāntamanyonyamabhicukruśuḥ

शस्त्रधारी, कमर में तलवार बाँधे, निर्भय, शत्रुओं का दमन करने वाले भीम को कमलों की इच्छा से आते देखकर वे आपस में पुकारकर कहने लगे —

राक्षसा ऊचुः

श्लोक 14 (3.154.14)

अयं पुरुषशार्दूलः सायुधोऽजिनसंवृतः । यच्चिकीर्षुरिह प्राप्तस्तत्संप्रष्टुमिहार्हथ ॥

ayaṃ puruṣaśārdūlaḥ sāyudho'jinasaṃvṛtaḥ | yaccikīrṣuriha prāptastatsaṃpraṣṭumihārhatha

"यह पुरुषसिंह शस्त्र लिए और मृगचर्म ओढ़े हुए है। यह यहाँ क्या करने आया है, यह इससे पूछ लेना चाहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (3.154.15)

ततः सर्वे महाबाहुं समासाद्यवृकोदरम् । तेजोयुक्तमपृच्छन्त कस्त्वमाख्यातुमर्हसि ॥

tataḥ sarve mahābāhuṃ samāsādyavṛkodaram | tejoyuktamapṛcchanta kastvamākhyātumarhasi

तब वे सब तेजस्वी महाबाहु वृकोदर के पास पहुँचे और पूछने लगे — "तुम कौन हो? हमें बताओ।"

राक्षसा ऊचुः

श्लोक 16 (3.154.16)

मुनिवेषधरश्चैव सायुधश्चैव लक्ष्यसे । यदर्थमभिसंप्राप्तस्तदाचक्ष्वमहामते ॥

muniveṣadharaścaiva sāyudhaścaiva lakṣyase | yadarthamabhisaṃprāptastadācakṣvamahāmate

"तुम मुनि का वेश धारण किए हो, फिर भी शस्त्रधारी दिखाई देते हो। हे महामति, बताओ कि तुम किस प्रयोजन से यहाँ आए हो।"

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