आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 155
भीम द्वारा क्रोधवशों की पराजय और कमलों का ग्रहण
भीम रक्षकों को अपना परिचय देते हैं और बताते हैं कि वे द्रौपदी के लिए सौगन्धिक पुष्प लेने आए हैं। राक्षस चेतावनी देते हैं कि यह सरोवर कुबेर का है और उनकी अनुमति से ही इसका उपयोग हो सकता है, पर भीम उत्तर देते हैं कि क्षत्रिय याचना नहीं करता और पर्वत का सरोवर सब प्राणियों का समान रूप से है। जब वे जल में उतरते हैं तो राक्षस उन पर टूट पड़ते हैं; भीम गदा से उन्हें तितर-बितर कर सौ से अधिक को मार डालते हैं और कमल ले लेते हैं। पराजित क्रोधवश कुबेर को समाचार देते हैं, और कुबेर हँसकर भीम को फूल ले जाने देते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि यह सब द्रौपदी के लिए है।
भीम उवाच
श्लोक 1 (3.155.1)
पाण्डवो भीमसेनोऽहं धर्मराजादनन्तरः । विशालां बदरीं प्राप्तो भ्रातृभिः सह राक्षसाः ॥
pāṇḍavo bhīmaseno'haṃ dharmarājādanantaraḥ | viśālāṃ badarīṃ prāpto bhrātṛbhiḥ saha rākṣasāḥ
"राक्षसो, मैं पाण्डुपुत्र भीमसेन हूँ, धर्मराज से छोटा भाई। मैं अपने भाइयों के साथ विशाल बदरी में आया हूँ।"
श्लोक 2 (3.155.2)
अपश्यत्तत्रपाञ्चाली सौगन्धिकमनुत्तमम् । अनिलोढमितो नूनं सा बहूनि परीप्सति ॥
apaśyattatrapāñcālī saugandhikamanuttamam | aniloḍhamito nūnaṃ sā bahūni parīpsati
"वहाँ पाञ्चाली ने एक अनुपम सौगन्धिक पुष्प देखा, जिसे निश्चय ही वायु यहीं से उड़ा ले गई थी; अब वह ऐसे बहुत-से पुष्प चाहती है।"
श्लोक 3 (3.155.3)
तस्या मामनवद्याङ्ग्या धर्मपत्न्याः प्रिये स्थितम् । पुष्पाहारमिह प्राप्तं निबोधत निशाचराः ॥
tasyā māmanavadyāṅgyā dharmapatnyāḥ priye sthitam | puṣpāhāramiha prāptaṃ nibodhata niśācarāḥ
"हे निशाचरो, जान लो कि अपनी उस निर्दोष अंगों वाली धर्मपत्नी का प्रिय करने के लिए मैं यहाँ फूल लेने आया हूँ।"
राक्षसा ऊचुः
श्लोक 4 (3.155.4)
आक्रीडोऽयं कुबेरस्य दयितः पुरुषर्षभ । नेह शक्यं मनुष्येण विहर्तुं मर्त्यधर्मणा ॥
ākrīḍo'yaṃ kuberasya dayitaḥ puruṣarṣabha | neha śakyaṃ manuṣyeṇa vihartuṃ martyadharmaṇā
"हे पुरुषश्रेष्ठ, यह कुबेर का प्रिय क्रीडा-स्थल है। मरणधर्मा मनुष्य यहाँ विहार नहीं कर सकता।"
श्लोक 5 (3.155.5)
देवर्षयस्तथा यक्षा देवाश्चात्र वृकोदर । आमन्त्र्य यक्षप्रवरं पिबन्ति च हरन्ति च ॥
devarṣayastathā yakṣā devāścātra vṛkodara | āmantrya yakṣapravaraṃ pibanti ca haranti ca
"हे वृकोदर, देवर्षि, यक्ष और देवता भी यक्षराज से अनुमति लेकर ही यहाँ जल पीते और (पुष्प) ले जाते हैं।"
श्लोक 6 (3.155.6)
गन्धर्वाप्सरसश्चैव विहरन्त्यत्र पाण्डव । यक्षाधिपस्यानुमते कुबेरस्य महात्मनः ॥
gandharvāpsarasaścaiva viharantyatra pāṇḍava | yakṣādhipasyānumate kuberasya mahātmanaḥ
"हे पाण्डव, गन्धर्व और अप्सराएँ भी यक्षाधिपति महात्मा कुबेर की अनुमति से ही यहाँ विहार करते हैं।"
श्लोक 7 (3.155.7)
अन्यायेनेह यः कश्चिदवमन्य धनेश्वरम् । विहर्तुमिच्छेद्दुर्वृत्तः स विनश्येन्न संशयः ॥
anyāyeneha yaḥ kaścidavamanya dhaneśvaram | vihartumiccheddurvṛttaḥ sa vinaśyenna saṃśayaḥ
"जो कोई धनेश्वर की अवहेलना करके अनुचित रीति से यहाँ विहार करना चाहे, वह दुराचारी नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।"
श्लोक 8 (3.155.8)
तमनादृत्य पद्मानि जिहीर्षसि बलादिह । धर्मराजस्य चात्मानं ब्रवीषि भ्रातरं कथम् ॥
tamanādṛtya padmāni jihīrṣasi balādiha | dharmarājasya cātmānaṃ bravīṣi bhrātaraṃ katham
"उनकी उपेक्षा करके तुम बलपूर्वक यहाँ से कमल ले जाना चाहते हो, फिर अपने को धर्मराज का भाई कैसे कहते हो?"
श्लोक 9 (3.155.9)
आमन्त्र्य यक्षराजं वै ततः पिब हरस्व च । नातोऽन्यथा त्वया शक्यं किंचित्पुष्करमीक्षितुम् ॥
āmantrya yakṣarājaṃ vai tataḥ piba harasva ca | nāto'nyathā tvayā śakyaṃ kiṃcitpuṣkaramīkṣitum
"पहले यक्षराज से अनुमति लो, फिर जल पियो और (कमल) ले जाओ। इसके बिना तुम इस सरोवर की ओर देख भी नहीं सकते।"
भीमसेन उवाच
श्लोक 10 (3.155.10)
राक्षसास्तं न पश्यामि धनेश्वरमिहान्तिके । दृष्ट्वाऽपिच महाराजं नाहं याचितुमुत्सहे ॥
rākṣasāstaṃ na paśyāmi dhaneśvaramihāntike | dṛṣṭvā'pica mahārājaṃ nāhaṃ yācitumutsahe
"राक्षसो, वह धनेश्वर मुझे यहाँ आस-पास कहीं दिखाई नहीं देता। और महाराज को देखकर भी मैं याचना नहीं कर सकता।"
श्लोक 11 (3.155.11)
न हि याचन्ति राजान एष धर्मः सनातनः । न चाहं हातुमिच्छामि क्षात्रधर्मं कथंचन ॥
na hi yācanti rājāna eṣa dharmaḥ sanātanaḥ | na cāhaṃ hātumicchāmi kṣātradharmaṃ kathaṃcana
"राजा याचना नहीं करते — यही सनातन धर्म है। और मैं किसी भी प्रकार क्षत्रिय-धर्म को छोड़ना नहीं चाहता।"
श्लोक 12 (3.155.12)
इयं च नलिनी रम्या जाता पर्वतनिर्झरे । नेयं भवनमासाद्यकुबेरस्य महात्मनः ॥
iyaṃ ca nalinī ramyā jātā parvatanirjhare | neyaṃ bhavanamāsādyakuberasya mahātmanaḥ
"यह रमणीय सरोवर पर्वत के झरने से बना है; यह महात्मा कुबेर के भवन के भीतर नहीं है।"
श्लोक 13 (3.155.13)
तुल्या हि सर्वभूतानामियं वैश्रवणस्य च । एवं गतेषु द्रव्येषु कः कं याचितुमर्हति ॥
tulyā hi sarvabhūtānāmiyaṃ vaiśravaṇasya ca | evaṃ gateṣu dravyeṣu kaḥ kaṃ yācitumarhati
"यह सब प्राणियों का उतना ही है जितना वैश्रवण का। जब वस्तुएँ इस प्रकार सबकी हों, तब कौन किससे याचना करे?"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (3.155.14)
इत्युक्त्वा राक्षसान्सर्वान्भीमसेनो व्यगाहत । तां तु पुष्करिणीं वीरः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ॥
ityuktvā rākṣasānsarvānbhīmaseno vyagāhata | tāṃ tu puṣkariṇīṃ vīraḥ prabhinna iva kuñjaraḥ
सब राक्षसों से ऐसा कहकर वीर भीमसेन मदमत्त हाथी की भाँति उस सरोवर में उतर गए।
श्लोक 15 (3.155.15)
ततः स राक्षसैर्वाचा प्रतिषिद्धः प्रतापवान् । मा मैवमिति सक्रोधैर्भर्त्सयद्भिः समन्ततः ॥
tataḥ sa rākṣasairvācā pratiṣiddhaḥ pratāpavān | mā maivamiti sakrodhairbhartsayadbhiḥ samantataḥ
तब राक्षसों ने चारों ओर से क्रोधपूर्वक डाँटते हुए उस प्रतापी वीर को वाणी से रोका — "नहीं, ऐसा मत करो!"
श्लोक 16 (3.155.16)
कदर्थीकृत्यतु स तान्राक्षसान्भीमविक्रमः । व्यगाहत महातेजास्ते तं सर्वे न्यवारयन् ॥
kadarthīkṛtyatu sa tānrākṣasānbhīmavikramaḥ | vyagāhata mahātejāste taṃ sarve nyavārayan
परन्तु भयंकर पराक्रमी, महातेजस्वी भीम उन राक्षसों की परवाह न करके जल में उतर गए; वे सब उन्हें रोकते रहे।
श्लोक 17 (3.155.17)
गृह्णीत बध्नीत विकर्ततेमं । पचाम खादाम च भीमसेनम् । क्रुद्धा ब्रुवन्तोऽभिययुर्द्रुतं ते । शस्त्राणि चोद्यम्य विवृत्तनेत्राः ॥
gṛhṇīta badhnīta vikartatemaṃ | pacāma khādāma ca bhīmasenam | kruddhā bruvanto'bhiyayurdrutaṃ te | śastrāṇi codyamya vivṛttanetrāḥ
"पकड़ो! बाँधो! इसे काट डालो! भीमसेन को पकाकर खा जाएँ!" — क्रोध से ऐसा कहते हुए, आँखें घुमाते और शस्त्र उठाए वे तेजी से उन पर टूट पड़े।
श्लोक 18 (3.155.18)
ततः स गुर्वीं यमदण्डकल्पां । महागदां काञ्चनपट्टनद्धाम् । प्रगृह्यतानभ्यपतत्तरस्वी । ततोऽब्रवीत्तिष्ठत तिष्ठतेति ॥
tataḥ sa gurvīṃ yamadaṇḍakalpāṃ | mahāgadāṃ kāñcanapaṭṭanaddhām | pragṛhyatānabhyapatattarasvī | tato'bravīttiṣṭhata tiṣṭhateti
तब वेगशाली भीम यमदण्ड के समान भारी, सोने के पट्टों से मढ़ी अपनी विशाल गदा उठाकर उन पर झपटे और बोले — "ठहरो! ठहरो!"
श्लोक 19 (3.155.19)
ते तं तदा तोमरपट्टसाद्यै- । र्व्याविद्धशस्त्रैः सहसा निपेतुः । जिघांसवः क्रोधवशाः सुभीमा । भीमं समन्तात्परिवव्रुरुग्राः ॥
te taṃ tadā tomarapaṭṭasādyai- | rvyāviddhaśastraiḥ sahasā nipetuḥ | jighāṃsavaḥ krodhavaśāḥ subhīmā | bhīmaṃ samantātparivavrurugrāḥ
तब वे तोमर, पट्टिश आदि शस्त्र घुमाते हुए एक साथ उन पर टूट पड़े; उन्हें मार डालने को आतुर, भयंकर और उग्र क्रोधवश राक्षसों ने भीम को चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 20 (3.155.20)
वातेन कुन्त्यां बलवान्सुजातः । शूरस्तरस्वी द्विषतां निहन्ता । सत्ये च धर्मे च रतः सदैव । पराक्रमे शत्रुभिरप्रधृष्यः ॥
vātena kuntyāṃ balavānsujātaḥ | śūrastarasvī dviṣatāṃ nihantā | satye ca dharme ca rataḥ sadaiva | parākrame śatrubhirapradhṛṣyaḥ
परन्तु वे वायुदेव से कुन्ती के गर्भ से उत्पन्न बलवान, शूर, वेगवान और शत्रुओं का संहार करने वाले थे; सदा सत्य और धर्म में रत, और पराक्रम में शत्रुओं से अजेय।
श्लोक 21 (3.155.21)
तेषां स मार्गान्विविधान्महात्मा । निहत्य शस्त्राणि च शात्रवाणाम् । यथा प्रवीरान्निजघान भीमः । परश्शतान्पुष्करिणीसमीपे ॥
teṣāṃ sa mārgānvividhānmahātmā | nihatya śastrāṇi ca śātravāṇām | yathā pravīrānnijaghāna bhīmaḥ | paraśśatānpuṣkariṇīsamīpe
महात्मा भीम ने उनकी अनेक प्रकार की चालों को विफल किया, शत्रुओं के शस्त्र काट गिराए और सरोवर के पास उनके सौ से अधिक प्रमुख वीरों को मार डाला।
श्लोक 22 (3.155.22)
ते तस्य वीर्यं च बलं च दृष्ट्वा । विद्याबलंबाहुबलं तथैव । अशक्नुवन्तः सहितं समन्ता- । द्द्रुतं प्रवीराः सहसा निवृत्ताः ॥
te tasya vīryaṃ ca balaṃ ca dṛṣṭvā | vidyābalaṃbāhubalaṃ tathaiva | aśaknuvantaḥ sahitaṃ samantā- | ddrutaṃ pravīrāḥ sahasā nivṛttāḥ
उनका पराक्रम, बल, युद्ध-कौशल और भुजबल देखकर, सब मिलकर भी उनका सामना न कर सकने के कारण वे वीर चारों ओर से तुरन्त भाग खड़े हुए।
श्लोक 23 (3.155.23)
विदीर्यमाणास्तत एव तूर्ण- । माकाशमास्थाय विमूढसंज्ञाः । कैलासशृङ्गाण्यभिदुद्रुवुस्ते । भीमार्दिताः क्रोधवशाः प्रभग्नाः ॥
vidīryamāṇāstata eva tūrṇa- | mākāśamāsthāya vimūḍhasaṃjñāḥ | kailāsaśṛṅgāṇyabhidudruvuste | bhīmārditāḥ krodhavaśāḥ prabhagnāḥ
भीम की मार से क्षत-विक्षत और सुध-बुध खोए हुए वे क्रोधवश राक्षस तुरन्त आकाश में उड़कर कैलास के शिखरों की ओर भाग गए।
श्लोक 24 (3.155.24)
स शक्रवद्दानवदैत्यसङ्घान् । विक्रम्य जित्वा च रणेऽरिसङ्घान् । विगाह्यतां पुष्करिणीं जितारिः । कामं स जग्राह ततोऽम्बुजानि ॥
sa śakravaddānavadaityasaṅghān | vikramya jitvā ca raṇe'risaṅghān | vigāhyatāṃ puṣkariṇīṃ jitāriḥ | kāmaṃ sa jagrāha tato'mbujāni
जैसे इन्द्र दानवों और दैत्यों के दलों को जीतते हैं, वैसे ही रण में शत्रु-समूहों को पराक्रम से जीतकर, शत्रुविजयी भीम सरोवर में उतरे और इच्छानुसार कमल लेने लगे।
श्लोक 25 (3.155.25)
ततः स पीत्वाऽमृतकल्पमम्भो । भूयो बभूवोत्तमवीर्यतेजाः । उत्पाट्य जग्राह ततोऽम्बुजानि । सौगन्धिकान्युत्तमगन्धवन्ति ॥
tataḥ sa pītvā'mṛtakalpamambho | bhūyo babhūvottamavīryatejāḥ | utpāṭya jagrāha tato'mbujāni | saugandhikānyuttamagandhavanti
फिर अमृत के समान उस जल को पीकर वे पुनः उत्तम बल और तेज से भर गए, और उन्होंने उत्तम सुगन्ध वाले सौगन्धिक कमल उखाड़कर ले लिए।
श्लोक 26 (3.155.26)
ततस्तु ते क्रोधवशाः समेत्य । धनेश्वरं भीमबलप्रणुन्नाः । भीमस्य वीर्यं च बलं च संख्ये । यथावदाचख्युरतीव दीनाः ॥
tatastu te krodhavaśāḥ sametya | dhaneśvaraṃ bhīmabalapraṇunnāḥ | bhīmasya vīryaṃ ca balaṃ ca saṃkhye | yathāvadācakhyuratīva dīnāḥ
तब भीम के बल से खदेड़े गए वे क्रोधवश एकत्र होकर धनेश्वर के पास गए और अत्यन्त दीन भाव से युद्ध में भीम के पराक्रम और बल का यथावत् वर्णन किया।
श्लोक 27 (3.155.27)
तेषां वचस्तत्तु निशाम्य देवः । प्रहस्य रक्षांसि ततोऽभ्युवाच । गृह्णातु भीमो जलजानि कामं । कृष्णानिमित्तं विदितं ममैतत् ॥
teṣāṃ vacastattu niśāmya devaḥ | prahasya rakṣāṃsi tato'bhyuvāca | gṛhṇātu bhīmo jalajāni kāmaṃ | kṛṣṇānimittaṃ viditaṃ mamaitat
उनकी बात सुनकर देव कुबेर हँसे और राक्षसों से बोले — "भीम अपनी इच्छा के अनुसार कमल ले जाए। मुझे ज्ञात है कि यह सब कृष्णा (द्रौपदी) के लिए है।"
श्लोक 28 (3.155.28)
ततोऽभ्यनुज्ञाय धनेश्वरं ते । जग्मुः कुरूणां प्रवरं विरोषाः । भीमं च तस्यां ददृशुर्नलिन्यां । यथोपजोषं विहरन्तमेकम् ॥
tato'bhyanujñāya dhaneśvaraṃ te | jagmuḥ kurūṇāṃ pravaraṃ viroṣāḥ | bhīmaṃ ca tasyāṃ dadṛśurnalinyāṃ | yathopajoṣaṃ viharantamekam
तब धनेश्वर से विदा लेकर वे क्रोध त्यागकर कुरुश्रेष्ठ भीम के पास गए और उन्होंने देखा कि भीम उस सरोवर में अकेले, मनमाने ढंग से विहार कर रहे हैं।