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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 156

उत्पात और सरोवर पर भीम से पाण्डवों का मिलन

जब भीम कमल एकत्र कर रहे होते हैं, तब पाण्डवों के निवास-स्थान पर भयानक उत्पात होते हैं — कठोर आँधी, उल्कापात, निस्तेज सूर्य और भूकम्प। भीम को न देखकर युधिष्ठिर द्रौपदी से जानते हैं कि वे उसके लिए और सौगन्धिक पुष्प लाने उत्तर-पूर्व की ओर गए हैं। घटोत्कच और उसके राक्षसों के कंधों पर पाण्डव, ब्राह्मण और लोमश सरोवर पर पहुँचते हैं, जहाँ भीम मारे गए रक्षकों के बीच गदा उठाए खड़े हैं; युधिष्ठिर उन्हें स्नेह से टोकते हैं। उद्यान के रक्षक शान्त किए जाते हैं, और कुबेर की जानकारी में पाण्डव अर्जुन की प्रतीक्षा करते हुए कुछ समय गन्धमादन की ढलानों पर रहते हैं।

अध्याय 155अध्याय-सूचीअध्याय 157

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.156.1)

ततस्तानि महार्हाणि दिव्यानि भरतर्षभ । बहूनि बहुरूपाणि विरजांसि समाददे ॥

tatastāni mahārhāṇi divyāni bharatarṣabha | bahūni bahurūpāṇi virajāṃsi samādade

हे भरतश्रेष्ठ, तब भीम ने वे बहुमूल्य, दिव्य, अनेक रूपों वाले निर्मल पुष्प बड़ी संख्या में एकत्र किए।

श्लोक 2 (3.156.2)

ततो वायुर्महाञ्शीघ्रो नीचैः शर्करकर्षणः । प्रादुरासीत्खरस्पर्शः संग्राममभिचोदयन् ॥

tato vāyurmahāñśīghro nīcaiḥ śarkarakarṣaṇaḥ | prādurāsītkharasparśaḥ saṃgrāmamabhicodayan

तब एक प्रचण्ड और वेगवान आँधी उठी, जो धरती से सटकर बहती हुई कंकड़ घसीट रही थी; उसका स्पर्श कठोर था, मानो वह युद्ध को उकसा रही हो।

श्लोक 3 (3.156.3)

पपात महती चोल्का सनिर्घाता महाभया । निष्प्रभश्चाभवत्सूर्यश्छन्नरश्मिस्तमोवृतः ॥

papāta mahatī colkā sanirghātā mahābhayā | niṣprabhaścābhavatsūryaśchannaraśmistamovṛtaḥ

गड़गड़ाहट के साथ एक विशाल और भयानक उल्का गिरी; सूर्य निस्तेज हो गया, उसकी किरणें छिप गईं और वह अन्धकार से घिर गया।

श्लोक 4 (3.156.4)

निर्घातश्चाभवद्भीमो भीमे विक्रममास्थिते । चचाल पृथिवी चापि पांसुवर्षं पपात च ॥

nirghātaścābhavadbhīmo bhīme vikramamāsthite | cacāla pṛthivī cāpi pāṃsuvarṣaṃ papāta ca

जब भीम पराक्रम दिखा रहे थे, तब भयंकर गर्जन हुआ, पृथ्वी काँप उठी और धूल की वर्षा होने लगी।

श्लोक 5 (3.156.5)

सलोहिता दिशश्चासन्खरवाचो मृगद्विजाः । तमोवृतमभूत्सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ॥

salohitā diśaścāsankharavāco mṛgadvijāḥ | tamovṛtamabhūtsarvaṃ na prājñāyata kiṃcana

दिशाएँ लाल हो गईं, पशु-पक्षी कर्कश स्वर में बोलने लगे; सब कुछ अन्धकार से ढक गया और कुछ भी दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 6 (3.156.6)

अन्ये च बहवो भीमा उत्पातास्तत्र जज्ञिरे । तदद्भुतमभिप्रेक्ष्य धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । उवाच वदतां श्रेष्ठः कोऽस्मानभिभविष्यति ॥

anye ca bahavo bhīmā utpātāstatra jajñire | tadadbhutamabhiprekṣya dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | uvāca vadatāṃ śreṣṭhaḥ ko'smānabhibhaviṣyati

वहाँ और भी अनेक भयंकर उत्पात प्रकट हुए। यह अद्भुत दृश्य देखकर वक्ताओं में श्रेष्ठ धर्मपुत्र युधिष्ठिर बोले — "कौन हमें पराजित करने वाला है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 7 (3.156.7)

सज्जीभवत भद्रं वः पाण्डवा युद्धदुर्मदाः । यथा रूपाणि पश्यामि सुव्यक्तो नः पराक्रमः ॥

sajjībhavata bhadraṃ vaḥ pāṇḍavā yuddhadurmadāḥ | yathā rūpāṇi paśyāmi suvyakto naḥ parākramaḥ

"हे युद्ध में दुर्जय पाण्डवो, तैयार हो जाओ, तुम्हारा कल्याण हो! जैसे लक्षण मैं देख रहा हूँ, उनसे स्पष्ट है कि हमारे पराक्रम का समय आ गया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (3.156.8)

एवमुक्त्वा ततो राजा वीक्षांचक्रे समन्ततः । अपश्यमानो भीमं तु धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

evamuktvā tato rājā vīkṣāṃcakre samantataḥ | apaśyamāno bhīmaṃ tu dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

ऐसा कहकर राजा ने चारों ओर दृष्टि डाली, पर धर्मपुत्र युधिष्ठिर को भीम कहीं दिखाई नहीं दिए।

श्लोक 9 (3.156.9)

ततः कृष्णां यमौ चापि समीपस्थानरिंदमः । पप्रच्छ भ्रातरं भीमं भीमकर्माणमाहवे ॥

tataḥ kṛṣṇāṃ yamau cāpi samīpasthānariṃdamaḥ | papraccha bhrātaraṃ bhīmaṃ bhīmakarmāṇamāhave

तब उस शत्रुदमन ने पास खड़ी कृष्णा और दोनों जुड़वाँ भाइयों से, युद्ध में भयंकर कर्म करने वाले अपने भाई भीम के विषय में पूछा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 10 (3.156.10)

कच्चिन्न भीमः पाञ्चालि किंच कृत्यं चिकीर्षति । कृतवानपि वा वीरः साहसं साहसप्रियः ॥

kaccinna bhīmaḥ pāñcāli kiṃca kṛtyaṃ cikīrṣati | kṛtavānapi vā vīraḥ sāhasaṃ sāhasapriyaḥ

"पाञ्चाली, कहीं भीम कोई काम करने तो नहीं चला गया? या साहस-प्रिय उस वीर ने कोई दुस्साहस तो नहीं कर डाला?"

श्लोक 11 (3.156.11)

इमे ह्यकस्मादुत्पाता महासमरशंसिनः । दर्शयन्तो भयं तीव्रं प्रादुर्भूताः समन्ततः ॥

ime hyakasmādutpātā mahāsamaraśaṃsinaḥ | darśayanto bhayaṃ tīvraṃ prādurbhūtāḥ samantataḥ

"क्योंकि महान युद्ध की सूचना देने वाले ये उत्पात अचानक चारों ओर प्रकट हुए हैं और घोर भय दिखा रहे हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (3.156.12)

तं तथावादिनं कृष्णा प्रत्युवाच मनस्विनी । प्रिया प्रियं चिकीर्षन्ती महिषी चारुहासिनी ॥

taṃ tathāvādinaṃ kṛṣṇā pratyuvāca manasvinī | priyā priyaṃ cikīrṣantī mahiṣī cāruhāsinī

उनके ऐसा कहने पर उनकी प्रिय, मनस्विनी, मनोहर मुस्कान वाली रानी कृष्णा ने उनका प्रिय करने की इच्छा से उत्तर दिया —

द्रौपद्युवाच

श्लोक 13 (3.156.13)

यत्तत्सौगन्धिकं राजन्नाहृतं मातरिश्वना । तन्मया भीमसेनस्य प्रीतयाऽद्योपपादितम् ॥

yattatsaugandhikaṃ rājannāhṛtaṃ mātariśvanā | tanmayā bhīmasenasya prītayā'dyopapāditam

"राजन्, वायु जो सौगन्धिक पुष्प उड़ाकर लाई थी, उसे आज मैंने प्रसन्न होकर भीमसेन को दिया था।"

श्लोक 14 (3.156.14)

अपि चोक्तो मया वीरो यदिपश्येर्बहून्यपि । तानि सर्वाण्युपादाय शीघ्रमागम्यतामिति ॥

api cokto mayā vīro yadipaśyerbahūnyapi | tāni sarvāṇyupādāya śīghramāgamyatāmiti

"और मैंने उस वीर से यह भी कहा था — 'यदि तुम्हें ऐसे बहुत-से पुष्प दिखें, तो उन सबको लेकर शीघ्र लौट आना।'"

श्लोक 15 (3.156.15)

स तु नूनं महाबाहुः प्रियार्थं मम पाण्डवः । प्रागुदीचीं दिशं राजंस्तान्याहर्तुमितो गतः ॥

sa tu nūnaṃ mahābāhuḥ priyārthaṃ mama pāṇḍavaḥ | prāgudīcīṃ diśaṃ rājaṃstānyāhartumito gataḥ

"राजन्, निश्चय ही वह महाबाहु पाण्डव मेरा प्रिय करने के लिए उन्हें लाने यहाँ से उत्तर-पूर्व दिशा में गया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (3.156.16)

उक्तस्त्वेवं तया राजा यमाविदमथाब्रवीत् । गच्छाम सहितास्तूर्णं येन यातो वृकोदरः ॥

uktastvevaṃ tayā rājā yamāvidamathābravīt | gacchāma sahitāstūrṇaṃ yena yāto vṛkodaraḥ

उसके ऐसा कहने पर राजा ने दोनों जुड़वाँ भाइयों से कहा — "हम सब मिलकर शीघ्र उसी मार्ग से चलें, जिससे वृकोदर गया है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 17 (3.156.17)

वहन्तु राक्षसा विप्रान्यथाश्रान्तान्यथाकृशान् । त्वमप्यमरसंकाश वह कृष्णां घटोत्कच ॥

vahantu rākṣasā viprānyathāśrāntānyathākṛśān | tvamapyamarasaṃkāśa vaha kṛṣṇāṃ ghaṭotkaca

"जो ब्राह्मण थके हों और जो दुर्बल हों, उन्हें राक्षस उठाकर ले चलें। और हे देवतुल्य घटोत्कच, तुम कृष्णा को उठाकर ले चलो।"

श्लोक 18 (3.156.18)

व्यक्तं दूरमितो भीमः प्रविष्ट इतिमे मतिः । चिरं चतस्य कालोऽयं स च वायुसमो जवे ॥

vyaktaṃ dūramito bhīmaḥ praviṣṭa itime matiḥ | ciraṃ catasya kālo'yaṃ sa ca vāyusamo jave

"मेरा विचार है कि भीम निश्चय ही यहाँ से बहुत दूर निकल गया है; उसे गए बहुत समय हो गया है, और वह वेग में वायु के समान है।"

श्लोक 19 (3.156.19)

तरस्वी वैनतेयस्य सदृशो भुवि लङ्घने । उत्पतेदपिचाकाशं निपतेच्चयथेच्छकम् ॥

tarasvī vainateyasya sadṛśo bhuvi laṅghane | utpatedapicākāśaṃ nipateccayathecchakam

"वह वेगवान है और धरती पर छलाँग लगाने में विनतानन्दन गरुड़ के समान है; वह आकाश में उछलकर जहाँ चाहे वहाँ उतर सकता है।"

श्लोक 20 (3.156.20)

तमन्वियाम भवतां प्रभावाद्रजनीचराः । पुरा स नापराध्नोति सिद्धानां ब्रह्मवादिनाम् ॥

tamanviyāma bhavatāṃ prabhāvādrajanīcarāḥ | purā sa nāparādhnoti siddhānāṃ brahmavādinām

"हे निशाचरो, तुम्हारे प्रभाव से हम उसके पीछे चलें, इससे पहले कि वह ब्रह्मवादी सिद्धों का कोई अपराध कर बैठे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (3.156.21)

तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वेहैडिम्बप्रमुखास्तदा । उद्देशज्ञाः कुबेरस्य नलिन्या भरतर्षभ ॥

tathetyuktvā tu te sarvehaiḍimbapramukhāstadā | uddeśajñāḥ kuberasya nalinyā bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, "ऐसा ही हो" कहकर हिडिम्बा-पुत्र घटोत्कच आदि वे सब राक्षस, जो कुबेर के सरोवर का स्थान जानते थे,

श्लोक 22 (3.156.22)

आदाय पाण्डवांश्चैव तांश्च विप्राननेकशः । लोमशेनैव सहिताः प्रययुः प्रीतमानसाः ॥

ādāya pāṇḍavāṃścaiva tāṃśca viprānanekaśaḥ | lomaśenaiva sahitāḥ prayayuḥ prītamānasāḥ

पाण्डवों और उन अनेक ब्राह्मणों को उठाकर, लोमश मुनि के साथ प्रसन्न मन से चल पड़े।

श्लोक 23 (3.156.23)

ते सर्वे त्वरिता गत्वा ददृशुस्तत्र कानने । पद्मसौगन्धिकवतींनलिनीं सुमनोरमाम् ॥

te sarve tvaritā gatvā dadṛśustatra kānane | padmasaugandhikavatīṃnalinīṃ sumanoramām

शीघ्रता से जाकर उन सबने वहाँ वन में कमलों और सौगन्धिक पुष्पों से भरा वह अत्यन्त मनोरम सरोवर देखा,

श्लोक 24 (3.156.24)

तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे व्यवस्थितम् । ददृशुर्निहतांश्चैव यक्षांश्च विपुलेक्षणान् ॥

taṃ ca bhīmaṃ mahātmānaṃ tasyāstīre vyavasthitam | dadṛśurnihatāṃścaiva yakṣāṃśca vipulekṣaṇān

और उन्होंने उसके किनारे खड़े महात्मा भीम को तथा मारे गए बड़ी-बड़ी आँखों वाले यक्षों को देखा,

श्लोक 25 (3.156.25)

भिन्नकायाक्षिबाहूरून्संचूर्णितशिरोधरान् । तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे व्यवस्थितम् ॥

bhinnakāyākṣibāhūrūnsaṃcūrṇitaśirodharān | taṃ ca bhīmaṃ mahātmānaṃ tasyāstīre vyavasthitam

जिनके शरीर, आँखें, भुजाएँ और जाँघें टूट गई थीं और गर्दनें चूर-चूर हो गई थीं। उन्होंने सरोवर के तट पर खड़े महात्मा भीम को देखा —

श्लोक 26 (3.156.26)

सक्रोधं स्तब्धनयनं संदष्टदशनच्छदम् । उद्यम्य च गदां दोर्भ्यां नदीतीरे व्यवस्थितम् ॥

sakrodhaṃ stabdhanayanaṃ saṃdaṣṭadaśanacchadam | udyamya ca gadāṃ dorbhyāṃ nadītīre vyavasthitam

क्रोध से भरे, अपलक नेत्रों वाले, होंठ दबाए हुए, दोनों हाथों में गदा उठाए तट पर खड़े,

श्लोक 27 (3.156.27)

प्रजासंक्षेपसमये दण्डहस्तमिवान्तकम् । तं दृष्ट्वा धर्मराजस्तु परिष्वज्याथ भारत ॥

prajāsaṃkṣepasamaye daṇḍahastamivāntakam | taṃ dṛṣṭvā dharmarājastu pariṣvajyātha bhārata

मानो प्रलय के समय दण्ड हाथ में लिए यमराज हों। हे भारत, उन्हें देखकर धर्मराज ने उन्हें गले से लगा लिया

श्लोक 28 (3.156.28)

उवाच श्लक्ष्णया वाचा कौन्तेय किमिदं कृतम् । साहसं वत भद्रं ते देवानामपि चाप्रियम् । पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥

uvāca ślakṣṇayā vācā kaunteya kimidaṃ kṛtam | sāhasaṃ vata bhadraṃ te devānāmapi cāpriyam | punarevaṃ na kartavyaṃ mama cedicchasi priyam

और मधुर वाणी में कहा — "कुन्तीनन्दन, यह तुमने क्या किया? तुम्हारा कल्याण हो, पर यह दुस्साहस था, जो देवताओं को भी अप्रिय है। यदि मेरा प्रिय चाहते हो, तो फिर ऐसा मत करना।"

श्लोक 29 (3.156.29)

अनुशिष्य तु कौन्तेयं पद्मानि परिगृह्य च । तस्यामेव नलिन्यां तु विजह्रुरमरोपमाः ॥

anuśiṣya tu kaunteyaṃ padmāni parigṛhya ca | tasyāmeva nalinyāṃ tu vijahruramaropamāḥ

कुन्तीपुत्र को समझाकर और कमल लेकर वे देवतुल्य वीर उसी सरोवर में विहार करने लगे।

श्लोक 30 (3.156.30)

एतस्मिन्नेव काले तु प्रगृहीतशिलायुधाः । प्रादुरासन्महाकायास्तस्योद्यानस्य रक्षिणः ॥

etasminneva kāle tu pragṛhītaśilāyudhāḥ | prādurāsanmahākāyāstasyodyānasya rakṣiṇaḥ

उसी समय उस उद्यान के रक्षक, विशालकाय राक्षस, शिलाओं को शस्त्र बनाकर हाथ में लिए प्रकट हुए।

श्लोक 31 (3.156.31)

ते दृष्ट्वाधर्मराजानं महर्षिं चापि लोमशम् । नकुलं सहदेवं च तथाऽन्यान्ब्राह्मणर्षभान् ॥

te dṛṣṭvādharmarājānaṃ maharṣiṃ cāpi lomaśam | nakulaṃ sahadevaṃ ca tathā'nyānbrāhmaṇarṣabhān

धर्मराज, महर्षि लोमश, नकुल, सहदेव तथा अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देखकर

श्लोक 32 (3.156.32)

विनयेन नताः सर्वेप्रणिपत्य च भारत । सान्त्विता धर्मराजेन प्रसेदुः क्षणदाचराः ॥

vinayena natāḥ sarvepraṇipatya ca bhārata | sāntvitā dharmarājena praseduḥ kṣaṇadācarāḥ

हे भारत, वे सब विनयपूर्वक झुके और उन्होंने प्रणाम किया; फिर धर्मराज के सान्त्वना देने पर वे निशाचर प्रसन्न हो गए।

श्लोक 33 (3.156.33)

विदिताश्चकुबेरस्य तत्रते कुरुपुङ्गवाः । ऊषुर्नातिचिरं कालं रममाणाः कुरूद्वहाः । प्रतीक्षमाणा बीभत्सुं गन्धमादनसानुषु ॥

viditāścakuberasya tatrate kurupuṅgavāḥ | ūṣurnāticiraṃ kālaṃ ramamāṇāḥ kurūdvahāḥ | pratīkṣamāṇā bībhatsuṃ gandhamādanasānuṣu

कुबेर की जानकारी में वे कुरुश्रेष्ठ थोड़े समय तक वहाँ गन्धमादन की ढलानों पर आनन्दपूर्वक रहे और बीभत्सु (अर्जुन) की प्रतीक्षा करते रहे।

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