Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 157

आकाशवाणी द्वारा युधिष्ठिर का गन्धमादन से लौटाया जाना

युधिष्ठिर अपने भाइयों और ब्राह्मणों के साथ उन तीर्थों, नदियों, पर्वतों और आश्रमों का स्मरण करते हैं जो उन्होंने लोमश के मार्गदर्शन में देखे थे, और भीम से पूछते हैं कि कुबेर के दुर्गम निवास गन्धमादन तक वे कैसे पहुँचेंगे। एक अशरीरी वाणी कहती है कि यहाँ से उस पर्वत पर नहीं जाया जा सकता; उन्हें बदरी लौटकर वृषपर्वा के आश्रम और फिर आर्ष्टिषेण के आश्रम जाना होगा, तब वे कुबेर का निवास देखेंगे। सुगन्धित वायु फूल बरसाती है, धौम्य लौटने की सलाह देते हैं, और युधिष्ठिर भाइयों, द्रौपदी और ब्राह्मणों के साथ नर-नारायण आश्रम लौट आते हैं। यह पूरा अध्याय समीक्षित संस्करण के मूल पाठ में नहीं है; वह इसे परिशिष्ट I (संख्या 17) में देता है।

अध्याय 156अध्याय-सूचीअध्याय 158

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.157.1)

तस्मिन्निवसमानोऽथ धर्मराजो युधिष्ठिरः । आमन्त्र्य सहितान्भ्रातॄनित्युवाच सहद्विजान् ॥

tasminnivasamāno'tha dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | āmantrya sahitānbhrātṝnityuvāca sahadvijān

वहाँ रहते हुए धर्मराज युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों सहित अपने भाइयों को बुलाकर उनसे यह कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (3.157.2)

दृष्टानि तीर्थान्यस्माभिः पुण्यानि च शिवानि च । मनसो ह्लादनीयानि वनानि च पृथक्पृथक् ॥

dṛṣṭāni tīrthānyasmābhiḥ puṇyāni ca śivāni ca | manaso hlādanīyāni vanāni ca pṛthakpṛthak

"हमने पवित्र और मंगलमय तीर्थ देखे हैं, और मन को आनन्द देने वाले भिन्न-भिन्न वन भी,"

श्लोक 3 (3.157.3)

देवैः पूर्वं विचीर्णानि मुनिभिश्च महात्मभिः । यथाक्रममशेषेण द्विजैः संपूजितानि च ॥

devaiḥ pūrvaṃ vicīrṇāni munibhiśca mahātmabhiḥ | yathākramamaśeṣeṇa dvijaiḥ saṃpūjitāni ca

"जिनमें प्राचीन काल में देवता और महात्मा मुनि विचरते थे, और जिन सबकी ब्राह्मणों ने क्रम से पूजा की है।"

श्लोक 4 (3.157.4)

ऋषीणां पूर्वचरितं तपोधर्मविचेष्टितम् । राजर्षीणां च चरितं कथाश्च विविधाः शुभाः ॥

ṛṣīṇāṃ pūrvacaritaṃ tapodharmaviceṣṭitam | rājarṣīṇāṃ ca caritaṃ kathāśca vividhāḥ śubhāḥ

"ऋषियों के पूर्व चरित, उनके तप और धर्म के कार्य, राजर्षियों के चरित और अनेक प्रकार की शुभ कथाएँ —"

श्लोक 5 (3.157.5)

शृण्वानास्तत्रतत्र स्म आश्रमेषु शिवेषु च । अभिषेकं द्विजैः सार्धं कृतवन्तो विशेषतः ॥

śṛṇvānāstatratatra sma āśrameṣu śiveṣu ca | abhiṣekaṃ dvijaiḥ sārdhaṃ kṛtavanto viśeṣataḥ

"ये सब हमने जहाँ-तहाँ मंगलमय आश्रमों में सुनीं; और ब्राह्मणों के साथ विशेष विधि से तीर्थ-स्नान किया।"

श्लोक 6 (3.157.6)

अर्चिताः सततं देवाः पुष्पैरद्भिः सदा च वः । यथालब्धैर्मूलफलैः पितरश्चापि तर्पिताः ॥

arcitāḥ satataṃ devāḥ puṣpairadbhiḥ sadā ca vaḥ | yathālabdhairmūlaphalaiḥ pitaraścāpi tarpitāḥ

"तुमने सदा पुष्पों और जल से देवताओं की पूजा की है, और जो कन्द-मूल-फल मिले उनसे पितरों को भी तृप्त किया है।"

श्लोक 7 (3.157.7)

पर्वतेषु च रम्येषु सर्वेषु च सरस्सु च । उदधौ च महापुण्ये सूपस्पृष्टं महात्मभिः ॥

parvateṣu ca ramyeṣu sarveṣu ca sarassu ca | udadhau ca mahāpuṇye sūpaspṛṣṭaṃ mahātmabhiḥ

"सभी रमणीय पर्वतों पर, सरोवरों में और परम पवित्र समुद्र में हम महात्माओं ने विधिपूर्वक जल का स्पर्श और स्नान किया है।"

श्लोक 8 (3.157.8)

इला सरस्वती सिन्धुर्यमुना नर्मदा तथा । नानातीर्थेषु रम्येषु सूपस्पृष्टं सह द्विजैः ॥

ilā sarasvatī sindhuryamunā narmadā tathā | nānātīrtheṣu ramyeṣu sūpaspṛṣṭaṃ saha dvijaiḥ

"इला, सरस्वती, सिन्धु, यमुना और नर्मदा में तथा अनेक रमणीय तीर्थों में हमने ब्राह्मणों के साथ विधिवत् स्नान किया है।"

श्लोक 9 (3.157.9)

गङ्गाद्वारमतिक्रम्य बहवः पर्वताः शुभाः । हिमवान्पर्वतश्चैव नानाद्विजगणायुतः ॥

gaṅgādvāramatikramya bahavaḥ parvatāḥ śubhāḥ | himavānparvataścaiva nānādvijagaṇāyutaḥ

"गंगाद्वार को पार करके हमने अनेक सुन्दर पर्वत देखे हैं, और नाना प्रकार के पक्षि-समूहों से भरा हिमालय पर्वत भी।"

श्लोक 10 (3.157.10)

विशाला बदरी दृष्टा नरनारायणाश्रमः । दिव्यपुष्करिणी दृष्टा सिद्धदेवर्षिपूजिता ॥

viśālā badarī dṛṣṭā naranārāyaṇāśramaḥ | divyapuṣkariṇī dṛṣṭā siddhadevarṣipūjitā

"हमने विशाल बदरी, नर-नारायण का आश्रम, देखा है; सिद्धों, देवताओं और ऋषियों से पूजित दिव्य सरोवर भी देखा है।"

श्लोक 11 (3.157.11)

यथाक्रमविशेषेण सर्वाण्यायतनानि च । दर्शितानि द्विजेन्द्रेण लोमशेन महात्मना ॥

yathākramaviśeṣeṇa sarvāṇyāyatanāni ca | darśitāni dvijendreṇa lomaśena mahātmanā

"विप्रश्रेष्ठ महात्मा लोमश ने क्रम से सभी पवित्र स्थान हमें दिखाए हैं।"

श्लोक 12 (3.157.12)

इमं वैश्रवणावासं दुर्गमं गन्धमादनम् । कथं भीम गमिष्यामो मतिरत्र विधीयताम् ॥

imaṃ vaiśravaṇāvāsaṃ durgamaṃ gandhamādanam | kathaṃ bhīma gamiṣyāmo matiratra vidhīyatām

"पर वैश्रवण का निवास यह गन्धमादन दुर्गम है। हे भीम, हम वहाँ कैसे जाएँगे? इस विषय में निश्चय कर लिया जाए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (3.157.13)

एवं ब्रुवति राजेन्द्रे वागुवाचाशरीरिणी । न शक्यो दुर्गमो गन्तुं पर्वतो गन्धमादनः ॥

evaṃ bruvati rājendre vāguvācāśarīriṇī | na śakyo durgamo gantuṃ parvato gandhamādanaḥ

राजाधिराज के ऐसा कहते ही एक अशरीरी वाणी बोली — "दुर्गम गन्धमादन पर्वत पर नहीं जाया जा सकता।"

वागुवाच

श्लोक 14 (3.157.14)

अनेनैव पथा राजन्प्रतिगच्छ यथागतम् । नरनारायणस्थानं बदरीत्यभिविश्रुतम् ॥

anenaiva pathā rājanpratigaccha yathāgatam | naranārāyaṇasthānaṃ badarītyabhiviśrutam

"हे राजन्, जिस मार्ग से आए हो उसी से लौट जाओ, नर-नारायण के उस स्थान को जो बदरी नाम से प्रसिद्ध है।"

श्लोक 15 (3.157.15)

तस्माद्यास्यसि कौन्तेय सिद्धचारणसेवितम् । बहुपुष्पफलं रम्यमाश्रमं वृषपर्वणः ॥

tasmādyāsyasi kaunteya siddhacāraṇasevitam | bahupuṣpaphalaṃ ramyamāśramaṃ vṛṣaparvaṇaḥ

"हे कुन्तीनन्दन, वहाँ से तुम सिद्धों और चारणों से सेवित, बहुत-से फूलों और फलों से भरे वृषपर्वा के रमणीय आश्रम में जाओगे।"

श्लोक 16 (3.157.16)

अतिक्रम्य च तं पार्थ त्वार्ष्टिषेणाश्रमे वसेः । ततो द्रक्ष्यसि कौन्तेय निवेशं धनदस्य च ॥

atikramya ca taṃ pārtha tvārṣṭiṣeṇāśrame vaseḥ | tato drakṣyasi kaunteya niveśaṃ dhanadasya ca

"हे पार्थ, उसे पार करके तुम आर्ष्टिषेण के आश्रम में निवास करना; तब, हे कौन्तेय, तुम धनद (कुबेर) का निवास देखोगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (3.157.17)

एतस्मिन्नन्तरे वायुर्दिव्यगन्धवहः शुभः । मनःप्रह्लादनः शीतः पुष्पवर्षं ववर्ष वै ॥

etasminnantare vāyurdivyagandhavahaḥ śubhaḥ | manaḥprahlādanaḥ śītaḥ puṣpavarṣaṃ vavarṣa vai

उसी समय दिव्य सुगन्ध से भरी, पवित्र, मन को आनन्द देने वाली शीतल वायु बहने लगी और उसने फूलों की वर्षा की।

श्लोक 18 (3.157.18)

तच्छ्रुत्वा दिव्यमाकाशाद्विस्मयः समपद्यत । ऋषीणां ब्राह्मणानां च पार्थिवानां विशेषतः ॥

tacchrutvā divyamākāśādvismayaḥ samapadyata | ṛṣīṇāṃ brāhmaṇānāṃ ca pārthivānāṃ viśeṣataḥ

आकाश से वह दिव्य वाणी सुनकर ऋषि, ब्राह्मण और विशेषकर राजकुमार विस्मय से भर गए।

श्लोक 19 (3.157.19)

श्रुत्वा तन्महदाश्चर्यं द्विजो धौम्यस्त्वभाषत । न शक्यमुत्तरं गन्तुं प्रतिगच्छाम पाण्डव ॥

śrutvā tanmahadāścaryaṃ dvijo dhaumyastvabhāṣata | na śakyamuttaraṃ gantuṃ pratigacchāma pāṇḍava

उस महान आश्चर्य को सुनकर ब्राह्मण धौम्य ने कहा — "उत्तर की ओर जाना सम्भव नहीं है। हे पाण्डव, हम लौट चलें।"

श्लोक 20 (3.157.20)

ततो युधिष्ठिरो राजा विस्मयोत्फुल्ललोचनः । प्रत्यागम्य पुनस्तं तु नरनारायणाश्रमम् ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā vismayotphullalocanaḥ | pratyāgamya punastaṃ tu naranārāyaṇāśramam

तब विस्मय से खिली आँखों वाले राजा युधिष्ठिर फिर से नर-नारायण के आश्रम को लौट आए,

श्लोक 21 (3.157.21)

भीमसेनादिभिः सर्वैर्भ्रातृभिः परिवारितः । पाञ्चाल्या ब्राह्मणैश्चैव न्यवसत्सुसुखं तदा ॥

bhīmasenādibhiḥ sarvairbhrātṛbhiḥ parivāritaḥ | pāñcālyā brāhmaṇaiścaiva nyavasatsusukhaṃ tadā

और भीमसेन आदि सब भाइयों, पाञ्चाली तथा ब्राह्मणों से घिरे हुए वहाँ बड़े सुख से रहने लगे।

अध्याय 156अध्याय-सूचीअध्याय 158