आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 158
भीम द्वारा जटासुर का वध
जब भीम शिकार के लिए गए होते हैं, तब जटासुर नामक राक्षस, जो शस्त्रविद्या में कुशल ब्राह्मण के वेश में पाण्डवों के बीच रहता आया था, उनके शस्त्र उठाकर युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव और द्रौपदी को हर ले जाता है। युधिष्ठिर उसे धर्म का उपदेश देकर धिक्कारते हैं और भारी होकर उसकी चाल धीमी कर देते हैं, जबकि सहदेव छूटकर भीम को पुकारते हैं और राक्षस को ललकारते हैं। भीम आकर जटासुर के विश्वासघात की निन्दा करते हैं और वृक्षों, शिलाओं और घूँसों से भयंकर युद्ध के बाद उसे पीसकर उसका सिर धड़ से अलग कर देते हैं; फिर ब्राह्मणों से स्तुति पाते हुए युधिष्ठिर के पास लौटते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.158.1)
ततस्तान्परिविश्वस्तान्वसतस्तत्र पाण्डवान् । पर्वतेन्द्रे द्विजैः सार्धं पार्थागमनकाङ्क्षया ॥
tatastānpariviśvastānvasatastatra pāṇḍavān | parvatendre dvijaiḥ sārdhaṃ pārthāgamanakāṅkṣayā
तत्पश्चात् पाण्डव उस पर्वतराज पर ब्राह्मणों के साथ, अर्जुन के लौटने की प्रतीक्षा करते हुए, निश्चिन्त और विश्वस्त होकर रहने लगे।
श्लोक 2 (3.158.2)
गतेषु तेषु रक्षःसु भीमसेनात्मजेऽपि च । रहितान्भीमसेनेन कदाचित्तान्यदृच्छया । जहार धर्मराजं वै यमौ कृष्णां च राक्षसः ॥
gateṣu teṣu rakṣaḥsu bhīmasenātmaje'pi ca | rahitānbhīmasenena kadācittānyadṛcchayā | jahāra dharmarājaṃ vai yamau kṛṣṇāṃ ca rākṣasaḥ
जब वे राक्षस और भीमसेन का पुत्र भी चले गए, तब एक दिन संयोगवश उन्हें भीमसेन से रहित पाकर एक राक्षस धर्मराज, दोनों जुड़वाँ भाइयों और कृष्णा (द्रौपदी) को हर ले गया।
जनमेजय उवाच
श्लोक 3 (3.158.3)
ब्रह्मन्कथं धर्मराजं यमौ कृष्णां च राक्षसः । जहार चित्रं भीमश्च गतो राक्षसकण्टकः । वक्तुमर्हसि विप्राग्र्य व्यक्तमेतन्ममाऽनघ ॥
brahmankathaṃ dharmarājaṃ yamau kṛṣṇāṃ ca rākṣasaḥ | jahāra citraṃ bhīmaśca gato rākṣasakaṇṭakaḥ | vaktumarhasi viprāgrya vyaktametanmamā'nagha
हे ब्रह्मन्, राक्षस धर्मराज, दोनों जुड़वाँ भाइयों और कृष्णा को कैसे हर ले गया? यह तो आश्चर्य की बात है! और राक्षसों के लिए काँटे के समान भीम कहाँ चले गए थे? हे विप्रश्रेष्ठ, हे निष्पाप, आप यह मुझे स्पष्ट रूप से बताइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (3.158.4)
ब्राह्मणो मन्त्रकुशलः सर्वास्त्रेष्वस्त्रवित्तमः । इति ब्रुवन्पाण्डवेयान्पर्युपास्ते स्म नित्यदा । परीप्समानः पार्थानां कलापांश्च धनूंषि च ॥
brāhmaṇo mantrakuśalaḥ sarvāstreṣvastravittamaḥ | iti bruvanpāṇḍaveyānparyupāste sma nityadā | parīpsamānaḥ pārthānāṃ kalāpāṃśca dhanūṃṣi ca
'मैं मन्त्रों में कुशल, सब अस्त्रों का श्रेष्ठ ज्ञाता ब्राह्मण हूँ'—ऐसा कहता हुआ वह सदा पाण्डवों की सेवा में लगा रहता था और पार्थों के तरकश और धनुष हथियाने की ताक में रहता था।
श्लोक 5 (3.158.5)
अन्तरं संपरिप्रेप्सुर्द्रौपद्या हरणं प्रति । दुष्टात्मा पापबुद्धिः स नाम्ना ख्यातो जटासुरः ॥
antaraṃ saṃpariprepsurdraupadyā haraṇaṃ prati | duṣṭātmā pāpabuddhiḥ sa nāmnā khyāto jaṭāsuraḥ
वह द्रौपदी के हरण के लिए अवसर की ताक में था। वह दुष्टात्मा, पापबुद्धि राक्षस जटासुर नाम से प्रसिद्ध था।
श्लोक 6 (3.158.6)
पोषणं तस्य राजेन्द्र चक्रे पाण्डवनन्दनः । बुबुधे न च तं पापं भस्मच्छन्नमिवानलम् ॥
poṣaṇaṃ tasya rājendra cakre pāṇḍavanandanaḥ | bubudhe na ca taṃ pāpaṃ bhasmacchannamivānalam
हे राजेन्द्र, पाण्डवनन्दन युधिष्ठिर उसका भरण-पोषण करते रहे और राख में छिपी आग के समान उस पापी को पहचान न सके।
श्लोक 7 (3.158.7)
स भीमसेने निष्क्रान्ते मृगयार्थमरिंदमे । घटोत्कचं सानुचरं दृष्ट्वा विप्रद्रुतं दिशः ॥
sa bhīmasene niṣkrānte mṛgayārthamariṃdame | ghaṭotkacaṃ sānucaraṃ dṛṣṭvā vipradrutaṃ diśaḥ
जब शत्रुदमन भीमसेन शिकार के लिए निकल गए थे, और घटोत्कच को अपने अनुचरों सहित सब दिशाओं में गया देखकर,
श्लोक 8 (3.158.8)
लोमशप्रभृतींस्तांस्तु महर्षींश्च समाहितान् । स्नातुं विनिर्गतान्दृष्ट्वा पुष्पार्थं च तपोधनान् ॥
lomaśaprabhṛtīṃstāṃstu maharṣīṃśca samāhitān | snātuṃ vinirgatāndṛṣṭvā puṣpārthaṃ ca tapodhanān
तथा लोमश आदि एकाग्रचित्त तपस्वी महर्षियों को स्नान करने और फूल चुनने के लिए बाहर गया देखकर,
श्लोक 9 (3.158.9)
रूपमन्यत्समास्थाय विकृतं भैरवं महत् । गृहीत्वा सर्वशस्त्राणि द्रौपदीं परिगृह्य च । प्रातिष्ठत सुदुष्टात्मा त्रीन्गृहीत्वा च पाण्डवान् ॥
rūpamanyatsamāsthāya vikṛtaṃ bhairavaṃ mahat | gṛhītvā sarvaśastrāṇi draupadīṃ parigṛhya ca | prātiṣṭhata suduṣṭātmā trīngṛhītvā ca pāṇḍavān
उसने दूसरा विशाल, विकृत और भयानक रूप धारण कर लिया, सब शस्त्र उठा लिए, द्रौपदी को पकड़ लिया और तीनों पाण्डवों को भी लेकर वह अत्यन्त दुष्टात्मा चल पड़ा।
श्लोक 10 (3.158.10)
सहदेवस्तु यत्नेन ततोऽपक्रम्य पाण्डवः । विक्रम्य कौशिकं खड्गं मोक्षयित्वा ग्रहं रिपोः । आक्रन्दद्भीमसेनं वै येन यातो महाबलः ॥
sahadevastu yatnena tato'pakramya pāṇḍavaḥ | vikramya kauśikaṃ khaḍgaṃ mokṣayitvā grahaṃ ripoḥ | ākrandadbhīmasenaṃ vai yena yāto mahābalaḥ
किन्तु पाण्डुपुत्र सहदेव प्रयत्न करके उससे छूट निकले; पराक्रम दिखाकर उन्होंने शत्रु की पकड़ से स्वयं को छुड़ाया, म्यान से तलवार खींची और उस दिशा में भीमसेन को पुकारा जिधर वे महाबली गए थे।
श्लोक 11 (3.158.11)
तमब्रवीद्धर्मराजो ह्रियमाणो युधिष्ठिरः । धर्मस्ते हीयते मूढ न चैनं समवेक्षसे ॥
tamabravīddharmarājo hriyamāṇo yudhiṣṭhiraḥ | dharmaste hīyate mūḍha na cainaṃ samavekṣase
हरे जाते हुए धर्मराज युधिष्ठिर ने उससे कहा—"मूर्ख, तेरा धर्म नष्ट हो रहा है और तू उसकी ओर देखता भी नहीं।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 12 (3.158.12)
येऽन्ये क्वचिन्मनुष्येषु तिर्यग्योनिगताश्च ये । धर्मं ते समवेक्षन्ते रक्षांसि च विशेषतः ॥
ye'nye kvacinmanuṣyeṣu tiryagyonigatāśca ye | dharmaṃ te samavekṣante rakṣāṃsi ca viśeṣataḥ
मनुष्यों में जो कोई भी हैं और जो पशु-पक्षियों की योनि में जन्मे हैं, वे सब धर्म का ध्यान रखते हैं, और राक्षस तो विशेष रूप से।
श्लोक 13 (3.158.13)
धर्मस्यराक्षसा मूलं धर्मं ते विदुरुत्तमम् । एतत्परीक्ष्यसर्वं त्वं समीपे स्थातुमर्हसि ॥
dharmasyarākṣasā mūlaṃ dharmaṃ te viduruttamam | etatparīkṣyasarvaṃ tvaṃ samīpe sthātumarhasi
राक्षस धर्म के मूल हैं; वे धर्म को सर्वोत्तम मानते हैं। इन सब बातों को परखकर तुम्हें उसी के निकट बने रहना चाहिए।
श्लोक 14 (3.158.14)
देवाश्च ऋषयः सिद्धाः पितरश्चापि राक्षस । गन्धर्वोरगरक्षांसि वयांसि पशवस्तथा ॥
devāśca ṛṣayaḥ siddhāḥ pitaraścāpi rākṣasa | gandharvoragarakṣāṃsi vayāṃsi paśavastathā
हे राक्षस, देवता, ऋषि, सिद्ध और पितर भी, गन्धर्व, नाग और राक्षस, पक्षी और पशु भी,
श्लोक 15 (3.158.15)
तिर्यग्योनिगताश्चैव अपि कीटपिपीलिकाः । मनुष्यानुपजीवन्ति ततस्त्वमपि जीवसि ॥
tiryagyonigatāścaiva api kīṭapipīlikāḥ | manuṣyānupajīvanti tatastvamapi jīvasi
तथा पशु-योनि में जन्मे प्राणी, यहाँ तक कि कीड़े और चींटियाँ भी—ये सब मनुष्यों के सहारे जीते हैं; इसी से तुम भी जीते हो।
श्लोक 16 (3.158.16)
समृद्ध्या यस्य लोकस्य लोको युष्माकमृध्यति । इमं च लोकं शोचन्तमनुशोचन्ति देवताः । पूज्यमानाश्च वर्धन्ते हव्यकव्यैर्यथाविधि ॥
samṛddhyā yasya lokasya loko yuṣmākamṛdhyati | imaṃ ca lokaṃ śocantamanuśocanti devatāḥ | pūjyamānāśca vardhante havyakavyairyathāvidhi
इस लोक की समृद्धि से ही तुम्हारा लोक समृद्ध होता है। इस लोक को शोक में देखकर देवता भी शोक करते हैं, और विधिपूर्वक हव्य-कव्य से पूजे जाने पर वे बढ़ते हैं।
श्लोक 17 (3.158.17)
वयं राष्ट्रस्य गोप्तारो रक्षितारश्च राक्षस । राष्ट्रस्यारक्ष्यमाणस्य कुतो भूतिः कुतः सुखम् ॥
vayaṃ rāṣṭrasya goptāro rakṣitāraśca rākṣasa | rāṣṭrasyārakṣyamāṇasya kuto bhūtiḥ kutaḥ sukham
हे राक्षस, हम राष्ट्र के रक्षक और पालक हैं। जिस राष्ट्र की रक्षा न हो, उसमें कहाँ ऐश्वर्य और कहाँ सुख?
श्लोक 18 (3.158.18)
न च राजाऽवमन्तव्यो रक्षसा जात्वनागसि । अणुरप्यपचारश्च नास्त्यस्माकं नराशन ॥
na ca rājā'vamantavyo rakṣasā jātvanāgasi | aṇurapyapacāraśca nāstyasmākaṃ narāśana
किसी निरपराध राजा का राक्षस को कभी अपमान नहीं करना चाहिए; और हे नरभक्षी, हमारी ओर से तो तनिक भी अपराध नहीं हुआ है।
श्लोक 19 (3.158.19)
विघसाशान्यथाशक्त्या कुर्महे देवतादिषु । गुरूंश्च ब्राह्मणांश्चैव प्रमाणप्रवणाः सदा ॥
vighasāśānyathāśaktyā kurmahe devatādiṣu | gurūṃśca brāhmaṇāṃścaiva pramāṇapravaṇāḥ sadā
हम यथाशक्ति देवता आदि को, तथा गुरुओं और ब्राह्मणों को भी भोजन कराने के बाद बचा हुआ अन्न ही खाते हैं, और सदा शास्त्र के प्रमाण के अनुसार चलते हैं।
श्लोक 20 (3.158.20)
द्रोग्धव्यं न च मित्रेषु न विश्वस्तेषु कर्हिचित् । येषां चान्नानि भुञ्जीत यत्रच स्यात्प्रतिश्रयः ॥
drogdhavyaṃ na ca mitreṣu na viśvasteṣu karhicit | yeṣāṃ cānnāni bhuñjīta yatraca syātpratiśrayaḥ
मित्रों से कभी द्रोह नहीं करना चाहिए, न विश्वास करने वालों से, न उनसे जिनका अन्न खाया हो, और न उनसे जिनके यहाँ आश्रय मिला हो।
श्लोक 21 (3.158.21)
स त्वं प्रतिश्रयेऽस्माकं पूज्यमानः सुखोषितः । भुक्त्वा चान्नानि दुष्प्रज्ञ कथमस्माञ्जिहीर्षसि ॥
sa tvaṃ pratiśraye'smākaṃ pūjyamānaḥ sukhoṣitaḥ | bhuktvā cānnāni duṣprajña kathamasmāñjihīrṣasi
तुम हमारे आश्रय में सम्मानपूर्वक सुख से रहे हो और हमारा अन्न खाया है; तो हे दुर्बुद्धि, तुम हमें हरकर क्यों ले जाना चाहते हो?
श्लोक 22 (3.158.22)
एवमेव वृथाचारो वृथा वृद्धो वृथामतिः । वृथामरणमर्हस्त्वं वृथाऽद्य न भविष्यसि ॥
evameva vṛthācāro vṛthā vṛddho vṛthāmatiḥ | vṛthāmaraṇamarhastvaṃ vṛthā'dya na bhaviṣyasi
तुम्हारा आचरण व्यर्थ है, तुम्हारी आयु व्यर्थ है, तुम्हारी बुद्धि व्यर्थ है। तुम व्यर्थ मृत्यु के ही योग्य हो, और आज तुम व्यर्थ ही मारे जाओगे।
श्लोक 23 (3.158.23)
अथ चेद्दुष्टबुद्धिस्त्वं सर्वैर्धर्मैर्विवर्जितः । प्रदाय शस्त्राण्यस्माकं युद्धेन द्रौपदीं हर ॥
atha cedduṣṭabuddhistvaṃ sarvairdharmairvivarjitaḥ | pradāya śastrāṇyasmākaṃ yuddhena draupadīṃ hara
और यदि तुम दुष्टबुद्धि हो और सब धर्मों से रहित हो, तो हमें हमारे शस्त्र दे दो और युद्ध करके द्रौपदी को ले जाओ।
श्लोक 24 (3.158.24)
अथ चेत्त्वमविज्ञाय इदं कर्म करिष्यसि । अधर्मं चाप्यकीर्तिं च लोके प्राप्स्यसि केवलं ॥
atha cettvamavijñāya idaṃ karma kariṣyasi | adharmaṃ cāpyakīrtiṃ ca loke prāpsyasi kevalaṃ
पर यदि तुम बिना समझे-बूझे यह कर्म करोगे, तो संसार में तुम्हें केवल अधर्म और अपयश ही मिलेगा।
श्लोक 25 (3.158.25)
एतामद्य परामृश्य स्त्रियं राक्षस मानुषीम् । विषमेतत्समालोड्य कुम्भेन प्राशितं त्वया ॥
etāmadya parāmṛśya striyaṃ rākṣasa mānuṣīm | viṣametatsamāloḍya kumbhena prāśitaṃ tvayā
हे राक्षस, आज इस मानवी स्त्री को छूकर तुमने मानो विष घोलकर घड़ा भर पी लिया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (3.158.26)
ततो युधिष्ठिरस्तस्य भारिकः समपद्यत । स तु भाराभिभूतात्मा न तथा शीघ्रगोऽभवत् ॥
tato yudhiṣṭhirastasya bhārikaḥ samapadyata | sa tu bhārābhibhūtātmā na tathā śīghrago'bhavat
तब युधिष्ठिर उसके लिए भारी हो गए, और वह भार से दबकर पहले जैसी तेज़ी से नहीं चल सका।
श्लोक 27 (3.158.27)
अथाब्रवीद्द्रौपदीं च नकुलं च युधिष्ठिरः । मा भैष्टं राक्षसान्मूढाद्गतिरस्य मया हृता ॥
athābravīddraupadīṃ ca nakulaṃ ca yudhiṣṭhiraḥ | mā bhaiṣṭaṃ rākṣasānmūḍhādgatirasya mayā hṛtā
तब युधिष्ठिर ने द्रौपदी और नकुल से कहा—"इस मूर्ख राक्षस से मत डरो; मैंने उसकी गति रोक दी है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 28 (3.158.28)
नातिदूरे महाबाहुर्भविता पवनात्मजः । अस्मिन्मुहूर्ते संप्राप्ते न भविष्यति राक्षसः ॥
nātidūre mahābāhurbhavitā pavanātmajaḥ | asminmuhūrte saṃprāpte na bhaviṣyati rākṣasaḥ
महाबाहु पवनपुत्र दूर नहीं होंगे। वह घड़ी आते ही यह राक्षस नहीं रहेगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (3.158.29)
सहदेवस्तु तं दृष्ट्वा राक्षसं मूढचेतसम् । उवाच वचनं राजन्कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥
sahadevastu taṃ dṛṣṭvā rākṣasaṃ mūḍhacetasam | uvāca vacanaṃ rājankuntīputraṃ yudhiṣṭhiram
हे राजन्, तब सहदेव ने उस मूढ़चित्त राक्षस को देखकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से यह वचन कहा—
सहदेव उवाच
श्लोक 30 (3.158.30)
राजन्किं नाम सत्कृत्यं क्षत्रियस्यास्त्यतोऽधिकम् । यद्युद्धेऽभिमुखः प्राणांस्त्यजेच्छत्रुं जयेत वा ॥
rājankiṃ nāma satkṛtyaṃ kṣatriyasyāstyato'dhikam | yadyuddhe'bhimukhaḥ prāṇāṃstyajecchatruṃ jayeta vā
राजन्, क्षत्रिय के लिए इससे बढ़कर उत्तम कार्य और क्या है कि वह युद्ध में शत्रु के सामने डटकर या तो प्राण त्याग दे या शत्रु को जीत ले?
श्लोक 31 (3.158.31)
एष वास्मान्वयं वैनं युध्यमानाः परंतप । सूदयेम महाबाहो देशः कालो ह्ययं नृप ॥
eṣa vāsmānvayaṃ vainaṃ yudhyamānāḥ paraṃtapa | sūdayema mahābāho deśaḥ kālo hyayaṃ nṛpa
हे परन्तप, युद्ध करते हुए या तो यह हमें मार डाले या हम इसे मार डालें, हे महाबाहु; हे नरेश, यही उचित स्थान और समय है।
श्लोक 32 (3.158.32)
क्षत्रधर्मस्य संप्राप्तः कालः सत्यपराक्रम । जयन्तो हन्यमाना वा प्राप्तुमर्हाम सद्गतिम् ॥
kṣatradharmasya saṃprāptaḥ kālaḥ satyaparākrama | jayanto hanyamānā vā prāptumarhāma sadgatim
हे सत्यपराक्रमी, क्षत्रियधर्म का समय आ पहुँचा है। हम जीतें या मारे जाएँ, दोनों ही दशाओं में उत्तम गति पाने के अधिकारी हैं।
श्लोक 33 (3.158.33)
राक्षसे जीवमानेऽद्य रविरस्तमियाद्यदि । नाहं ब्रूयां पुनर्जातु क्षत्रियोस्मीति भारत ॥
rākṣase jīvamāne'dya ravirastamiyādyadi | nāhaṃ brūyāṃ punarjātu kṣatriyosmīti bhārata
हे भारत, यदि आज इस राक्षस के जीते जी सूर्य अस्त हो गया, तो मैं फिर कभी नहीं कहूँगा कि 'मैं क्षत्रिय हूँ'।
श्लोक 34 (3.158.34)
भोभो राक्षस तिष्ठस्व सहदेवोस्मि पाण्डवः । हत्वा वा मां नयस्वैनां हतो वा स्वप्स्यसीह वै ॥
bhobho rākṣasa tiṣṭhasva sahadevosmi pāṇḍavaḥ | hatvā vā māṃ nayasvaināṃ hato vā svapsyasīha vai
अरे ओ राक्षस, ठहर! मैं पाण्डुपुत्र सहदेव हूँ। या तो मुझे मारकर इसे ले जा, या फिर मारा जाकर यहीं सो जा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 35 (3.158.35)
तदा ब्रुवति माद्रेये भीमसेनो यदृच्छया । प्रादृश्यत महाबाहुः सवज्र इव वासवः ॥
tadā bruvati mādreye bhīmaseno yadṛcchayā | prādṛśyata mahābāhuḥ savajra iva vāsavaḥ
माद्रीपुत्र जब यह कह ही रहे थे, तभी संयोगवश महाबाहु भीमसेन वज्रधारी इन्द्र के समान वहाँ दिखाई दिए।
श्लोक 36 (3.158.36)
सोऽपश्यद्भ्रातरौ तत्र द्रौपदीं च यशस्विनीम् । क्षितिस्थं सहदेवं च क्षिपन्तं राक्षसं तदा ॥
so'paśyadbhrātarau tatra draupadīṃ ca yaśasvinīm | kṣitisthaṃ sahadevaṃ ca kṣipantaṃ rākṣasaṃ tadā
उन्होंने वहाँ अपने दोनों भाइयों और यशस्विनी द्रौपदी को देखा, और भूमि पर खड़े सहदेव को राक्षस को ललकारते हुए देखा;
श्लोक 37 (3.158.37)
मार्गाच्च राक्षसं मूढं कालोपहतचेतसम् । भ्रमन्तं तत्रतत्रैव दैवेन परिमोहितम् ॥
mārgācca rākṣasaṃ mūḍhaṃ kālopahatacetasam | bhramantaṃ tatratatraiva daivena parimohitam
और उस मूढ़ राक्षस को भी देखा, जिसकी बुद्धि काल ने हर ली थी और जो दैव से मोहित होकर मार्ग से भटककर इधर-उधर घूम रहा था।
श्लोक 38 (3.158.38)
हृतान्संदृश्य तान्भ्रातॄन्द्रौपदीं च महाबलः । क्रोधमाहारयद्भीमो राक्षसंचेदमब्रवीत् ॥
hṛtānsaṃdṛśya tānbhrātṝndraupadīṃ ca mahābalaḥ | krodhamāhārayadbhīmo rākṣasaṃcedamabravīt
अपने भाइयों और द्रौपदी को हरे जाते देखकर महाबली भीम क्रोध से भर उठे और राक्षस से यह बोले—
भीम उवाच
श्लोक 39 (3.158.39)
विज्ञातोऽसि मया पूर्वं चेष्टञ्शस्त्रपरीक्षणे । आस्था तु त्वयि मे नास्ति यतोसि न हतस्तदा ॥
vijñāto'si mayā pūrvaṃ ceṣṭañśastraparīkṣaṇe | āsthā tu tvayi me nāsti yatosi na hatastadā
जब तुम हमारे शस्त्रों की परख करते हुए चेष्टाएँ कर रहे थे, तभी मैंने तुम्हें पहचान लिया था। पर तुम्हें मारने में मेरी रुचि नहीं थी, इसलिए तब तुम मारे नहीं गए।
श्लोक 40 (3.158.40)
ब्रह्मरूपप्रतिच्छन्नो न नो वदसि चाप्रियम् । प्रियेषु रममाणं त्वां न चैवाप्रियकारिणम् । ब्रह्मरूपेण विहितं नैव हन्यामनागसम् ॥
brahmarūpapraticchanno na no vadasi cāpriyam | priyeṣu ramamāṇaṃ tvāṃ na caivāpriyakāriṇam | brahmarūpeṇa vihitaṃ naiva hanyāmanāgasam
ब्राह्मण के रूप में छिपे हुए तुमने हमसे कभी अप्रिय बात नहीं कही; तुम हमारे प्रिय कार्यों में रमे रहे और कोई अप्रिय कार्य नहीं किया। ब्राह्मण का रूप धारण किए हुए निरपराध को मैं कभी नहीं मारता।
श्लोक 41 (3.158.41)
राक्षसं जानमानोऽपि यो हन्यान्नरकं व्रजेत् । अपक्वस्य च कालेन वधस्तव न विद्यते ॥
rākṣasaṃ jānamāno'pi yo hanyānnarakaṃ vrajet | apakvasya ca kālena vadhastava na vidyate
उसे राक्षस जानते हुए भी जो उसे मारे, वह नरक में जाता है। और काल के पकाए बिना तुम्हारा वध होना नहीं था।
श्लोक 42 (3.158.42)
नूनमद्यासि संपक्वो यथा ते मतिरीदृशी । दत्ता कृष्णापहरणे कालेनाद्भुतकर्मणा । सोपि कालं समासाद्य तथाऽद्य न भविष्यसि ॥
nūnamadyāsi saṃpakvo yathā te matirīdṛśī | dattā kṛṣṇāpaharaṇe kālenādbhutakarmaṇā | sopi kālaṃ samāsādya tathā'dya na bhaviṣyasi
निश्चय ही आज तुम पक चुके हो, क्योंकि अद्भुत कर्म करने वाले काल ने तुम्हें कृष्णा के हरण की ऐसी बुद्धि दी है। अपना काल आ पहुँचने पर आज तुम भी नहीं बचोगे।
श्लोक 43 (3.158.43)
बडिशोऽयंत्वया ग्रस्तः कालसूत्रेण लम्बितः । मत्स्योऽम्भसीव स्यूतास्यः कथमद्य गमिष्यसि ॥
baḍiśo'yaṃtvayā grastaḥ kālasūtreṇa lambitaḥ | matsyo'mbhasīva syūtāsyaḥ kathamadya gamiṣyasi
तुमने काल की डोरी से लटकता यह काँटा निगल लिया है; पानी में जिसका मुँह बिंध गया हो, उस मछली की भाँति आज तुम कैसे बचकर जाओगे?
श्लोक 44 (3.158.44)
यं चासि प्रस्थितो देशं मनः पूर्वं गतं च ते । न तं गन्तासि गन्तासि मार्गं बकहिडिम्बयोः ॥
yaṃ cāsi prasthito deśaṃ manaḥ pūrvaṃ gataṃ ca te | na taṃ gantāsi gantāsi mārgaṃ bakahiḍimbayoḥ
जिस स्थान के लिए तुम चले थे और जहाँ तुम्हारा मन पहले ही पहुँच चुका था, वहाँ तुम नहीं पहुँचोगे; तुम बक और हिडिम्ब के मार्ग पर जाओगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (3.158.45)
एवमुक्तस्तु भीमेन राक्षसः कालचोदितः । भीत उत्सृज्य तान्सर्वान्युद्धाय समुपस्थितः ॥
evamuktastu bhīmena rākṣasaḥ kālacoditaḥ | bhīta utsṛjya tānsarvānyuddhāya samupasthitaḥ
भीम के ऐसा कहने पर काल से प्रेरित वह राक्षस भयभीत हो गया, उसने उन सबको छोड़ दिया और युद्ध के लिए आ डटा।
श्लोक 46 (3.158.46)
अब्रवीच्च पुनर्भीमं रोषात्प्रस्फुरिताधरः । न मे मूढा दिशः पाप त्वदर्थं मे विलम्बनम् ॥
abravīcca punarbhīmaṃ roṣātprasphuritādharaḥ | na me mūḍhā diśaḥ pāpa tvadarthaṃ me vilambanam
क्रोध से फड़कते होंठों के साथ उसने फिर भीम से कहा—"पापी, मैं दिशा नहीं भूला था; तेरे ही लिए मैं रुका हुआ था।
जटासुर उवाच
श्लोक 47 (3.158.47)
श्रुता मे राक्षसा ये ये त्वया विनिहता रणे । तेषामद्यकरिष्यामि तवास्रेणोदकक्रियाम् ॥
śrutā me rākṣasā ye ye tvayā vinihatā raṇe | teṣāmadyakariṣyāmi tavāsreṇodakakriyām
युद्ध में तूने जिन-जिन राक्षसों को मारा है, उन सबके बारे में मैंने सुना है। आज मैं तेरे रक्त से उनका तर्पण करूँगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 48 (3.158.48)
एवमुक्त्वातदा भीमं राक्षसो योद्धुमाययौ । करालवदनः क्रोधात्कालसर्प इव श्वसन् ॥
evamuktvātadā bhīmaṃ rākṣaso yoddhumāyayau | karālavadanaḥ krodhātkālasarpa iva śvasan
भीम से ऐसा कहकर वह राक्षस युद्ध करने आया; उसका मुख विकराल था और वह क्रोध से काल-सर्प के समान फुफकार रहा था।
श्लोक 49 (3.158.49)
एवमुक्तस्ततो भीमः सृक्विणी परिलेलिहन् । स्मयमान इव क्रोधात्साक्षात्कालान्तकोपमः ॥
evamuktastato bhīmaḥ sṛkviṇī parilelihan | smayamāna iva krodhātsākṣātkālāntakopamaḥ
यह सुनकर भीम होंठों के कोने चाटते हुए क्रोध में मानो मुस्कराने लगे; वे साक्षात् कालान्तक के समान थे।
श्लोक 50 (3.158.50)
ब्रुवन्वै तिष्ठतिष्ठेति क्रोधसंरक्तलोचनः । बाहुसंरम्भमेवेच्छन्नभिदुद्राव राक्षसम् ॥
bruvanvai tiṣṭhatiṣṭheti krodhasaṃraktalocanaḥ | bāhusaṃrambhamevecchannabhidudrāva rākṣasam
'ठहर, ठहर' कहते हुए, क्रोध से लाल आँखें किए और केवल भुजाओं से भिड़ने की इच्छा लिए वे राक्षस पर टूट पड़े।
श्लोक 51 (3.158.51)
राक्षसोऽपि तदा भीमं युद्धार्थिनमवस्थितम् । मुहुर्मुहुर्व्याददानः सृक्विणी परिसंलिहन् । अभिदुद्राव संरब्धो बलो वज्रधरं यथा ॥
rākṣaso'pi tadā bhīmaṃ yuddhārthinamavasthitam | muhurmuhurvyādadānaḥ sṛkviṇī parisaṃlihan | abhidudrāva saṃrabdho balo vajradharaṃ yathā
राक्षस भी बार-बार मुँह फाड़ता और होंठों के कोने चाटता हुआ, युद्ध के लिए डटे भीम पर क्रोध से वैसे ही झपटा जैसे बल दैत्य वज्रधारी इन्द्र पर झपटा था।
श्लोक 52 (3.158.52)
भीमसेनोऽप्यवष्टब्धो नियुद्धायाभवत्स्थितः । राक्षसोऽपि च विस्रब्धो बाहुयुद्धमकाङ्क्षत ॥
bhīmaseno'pyavaṣṭabdho niyuddhāyābhavatsthitaḥ | rākṣaso'pi ca visrabdho bāhuyuddhamakāṅkṣata
भीमसेन भी दृढ़ होकर मल्लयुद्ध के लिए डट गए, और राक्षस भी निःशंक होकर बाहुयुद्ध की इच्छा करने लगा।
श्लोक 53 (3.158.53)
वर्तमाने तयो राजन्बाहुयुद्धे सुदारुणे । माद्रीपुत्रावतिक्रुद्धावुभावप्यभ्यधावताम् ॥
vartamāne tayo rājanbāhuyuddhe sudāruṇe | mādrīputrāvatikruddhāvubhāvapyabhyadhāvatām
हे राजन्, जब उन दोनों में अत्यन्त भयंकर बाहुयुद्ध चल रहा था, तब माद्री के दोनों पुत्र अत्यन्त क्रोधित होकर आगे दौड़े।
श्लोक 54 (3.158.54)
न्यवारयत्तौ प्रहसन्कुन्तीपुत्रो वृकोदरः । शक्तोऽहं राक्षसस्येति प्रेक्षध्वमिति चाब्रवीत् ॥
nyavārayattau prahasankuntīputro vṛkodaraḥ | śakto'haṃ rākṣasasyeti prekṣadhvamiti cābravīt
कुन्तीपुत्र वृकोदर ने हँसते हुए उन्हें रोका और कहा—"मैं इस राक्षस के लिए पर्याप्त हूँ; तुम बस देखो।"
भीम उवाच
श्लोक 55 (3.158.55)
आत्मना भ्रातृभिश्चैव धर्मेण सुकृतेन च । इष्टेन च शपे राजन्सूदयिष्यामि राक्षसम् ॥
ātmanā bhrātṛbhiścaiva dharmeṇa sukṛtena ca | iṣṭena ca śape rājansūdayiṣyāmi rākṣasam
हे राजन्, मैं अपनी, अपने भाइयों की, धर्म की, पुण्य कर्मों की और यज्ञ की शपथ लेकर कहता हूँ—मैं इस राक्षस को मार डालूँगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 56 (3.158.56)
इत्येवमुक्त्वा तौ वीरौ स्पर्धमानौ परस्परम् । बाहुभिः समसज्जेतामुभौ रक्षोवृकोदरौ ॥
ityevamuktvā tau vīrau spardhamānau parasparam | bāhubhiḥ samasajjetāmubhau rakṣovṛkodarau
ऐसा कहकर वे दोनों वीर, राक्षस और वृकोदर, एक-दूसरे को ललकारते हुए भुजाओं से भिड़ गए।
श्लोक 57 (3.158.57)
तयोरासीत्संप्रहारः क्रुद्धयोर्भीमरक्षसोः । अमृष्यमाणयोः सङ्ख्ये शक्रशम्बरयोरिव ॥
tayorāsītsaṃprahāraḥ kruddhayorbhīmarakṣasoḥ | amṛṣyamāṇayoḥ saṅkhye śakraśambarayoriva
तब क्रोध में भरे भीम और राक्षस में, जो युद्ध में एक-दूसरे को सह नहीं पा रहे थे, इन्द्र और शम्बर के समान भिड़न्त होने लगी।
श्लोक 58 (3.158.58)
तौ वीरौ समभिक्रुद्धावन्योन्यं पर्यधावताम् । आरुज्यारुज्यतौ वृक्षानन्योन्यमभिजघ्नतुः । जीमूताविव घर्मान्ते विनदन्तौ महाबलौ ॥
tau vīrau samabhikruddhāvanyonyaṃ paryadhāvatām | ārujyārujyatau vṛkṣānanyonyamabhijaghnatuḥ | jīmūtāviva gharmānte vinadantau mahābalau
वे दोनों वीर अत्यन्त क्रोधित होकर एक-दूसरे पर झपटे; बार-बार वृक्ष उखाड़कर वे एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे और ग्रीष्म के अन्त में गरजते बादलों के समान दहाड़ने लगे।
श्लोक 59 (3.158.59)
बभञ्जतुर्महावृक्षानूरुभिर्बलिनां वरौ । अन्योन्येनाभिसंरब्धौ परस्परवधैषिणौ ॥
babhañjaturmahāvṛkṣānūrubhirbalināṃ varau | anyonyenābhisaṃrabdhau parasparavadhaiṣiṇau
बलवानों में श्रेष्ठ वे दोनों अपनी जाँघों से बड़े-बड़े वृक्ष तोड़ने लगे; वे एक-दूसरे पर क्रुद्ध थे और एक-दूसरे का वध चाहते थे।
श्लोक 60 (3.158.60)
तद्वृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् । वालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोः पुरेव कपिसिंहयोः ॥
tadvṛkṣayuddhamabhavanmahīruhavināśanam | vālisugrīvayorbhrātroḥ pureva kapisiṃhayoḥ
वृक्षों का नाश करने वाला वह वृक्ष-युद्ध वैसा ही था जैसा प्राचीन काल में वानरश्रेष्ठ भाइयों वाली और सुग्रीव के बीच हुआ था।
श्लोक 61 (3.158.61)
आविध्याविध्य तौ वृक्षान्मुहूर्तमितरेतरम् । ताडयामासतुरुभौ विनदन्तौ मुहुर्मुहुः ॥
āvidhyāvidhya tau vṛkṣānmuhūrtamitaretaram | tāḍayāmāsaturubhau vinadantau muhurmuhuḥ
वृक्षों को घुमा-घुमाकर वे दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे और बार-बार गर्जना करते रहे।
श्लोक 62 (3.158.62)
तस्मिन्देशे यदा वृक्षाः सर्व एव निपातिताः । पूगीकृताश्च शतशः परस्परवधेप्सया ॥
tasmindeśe yadā vṛkṣāḥ sarva eva nipātitāḥ | pūgīkṛtāśca śataśaḥ parasparavadhepsayā
जब एक-दूसरे को मारने की इच्छा से उस स्थान के सारे वृक्ष गिरा दिए गए और सैकड़ों की संख्या में ढेर हो गए,
श्लोक 63 (3.158.63)
ततः शिलाः समादाय मुहूर्तमिव भारत । महाभ्रैरिव शैलेन्द्रौ युयुधाते महाबलौ ॥
tataḥ śilāḥ samādāya muhūrtamiva bhārata | mahābhrairiva śailendrau yuyudhāte mahābalau
तब, हे भारत, वे दोनों महाबली शिलाएँ उठाकर कुछ देर तक ऐसे लड़े मानो दो पर्वतराज बड़े-बड़े मेघों से लड़ रहे हों।
श्लोक 64 (3.158.64)
शिलाभिरुग्ररूपाभिर्बृहतीभिः परस्परम् । वज्रैरिव महावेगैराजघ्नतुरमर्षणौ ॥
śilābhirugrarūpābhirbṛhatībhiḥ parasparam | vajrairiva mahāvegairājaghnaturamarṣaṇau
भयानक आकार वाली बड़ी-बड़ी शिलाओं से, जो वज्र के समान प्रचण्ड वेग से जाती थीं, वे दोनों असहिष्णु योद्धा एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 65 (3.158.65)
अभिद्रुत्य च भूयस्तावन्योन्यबलदर्पितौ । भुजाभ्यां परिगृह्याथ चकर्षाते गजाविव ॥
abhidrutya ca bhūyastāvanyonyabaladarpitau | bhujābhyāṃ parigṛhyātha cakarṣāte gajāviva
फिर अपने बल पर गर्व करते हुए वे दोनों एक-दूसरे पर झपटे, भुजाओं से एक-दूसरे को जकड़ लिया और दो हाथियों की भाँति एक-दूसरे को खींचने लगे।
श्लोक 66 (3.158.66)
मुष्टिभिश्च महाघोरैरन्योन्यमभिपेततुः । ततः कटकटाशब्दो बभूव सुमहात्मनोः ॥
muṣṭibhiśca mahāghorairanyonyamabhipetatuḥ | tataḥ kaṭakaṭāśabdo babhūva sumahātmanoḥ
वे अत्यन्त भयंकर घूँसों से एक-दूसरे पर टूट पड़े, और उन दोनों महाबलियों के बीच कड़-कड़ का शब्द होने लगा।
श्लोक 67 (3.158.67)
ततः संहृत्यमुष्टिं तु पञ्चशीर्षमिवोरगम् । वेगेनाभ्यहनद्भीमो राक्षसस्य शिरोधराम् ॥
tataḥ saṃhṛtyamuṣṭiṃ tu pañcaśīrṣamivoragam | vegenābhyahanadbhīmo rākṣasasya śirodharām
तब भीम ने पाँच फनों वाले सर्प के समान मुट्ठी बाँधकर पूरे वेग से राक्षस की गर्दन पर प्रहार किया।
श्लोक 68 (3.158.68)
ततः श्रान्तं तु तद्रक्षो भीमसेनभुजाहतम् । सुपरिभ्रान्तमालक्ष्य भीमसेनोऽभ्यवर्तत ॥
tataḥ śrāntaṃ tu tadrakṣo bhīmasenabhujāhatam | suparibhrāntamālakṣya bhīmaseno'bhyavartata
भीमसेन की भुजा की चोट से उस राक्षस को थका और बुरी तरह लड़खड़ाता देखकर भीमसेन और उत्साह से आगे बढ़े।
श्लोक 69 (3.158.69)
तत एनं महाबाहुर्बाहुभ्याममरोपमः । समुत्क्षिप्य बलाद्भीमो निष्पिपेष महीतले ॥
tata enaṃ mahābāhurbāhubhyāmamaropamaḥ | samutkṣipya balādbhīmo niṣpipeṣa mahītale
तब देवताओं के समान महाबाहु भीम ने उसे दोनों भुजाओं से बलपूर्वक ऊपर उठाया और पृथ्वी पर पटककर पीस डाला।
श्लोक 70 (3.158.70)
ततः संपीड्य बलवद्भुजाभ्यां क्रोधमूर्च्छितः । तस्य गात्राणि सर्वाणि चूर्णयामास पाण्डवः । अरत्निना चाभिहत्य शिरः कायादपाहरत् ॥
tataḥ saṃpīḍya balavadbhujābhyāṃ krodhamūrcchitaḥ | tasya gātrāṇi sarvāṇi cūrṇayāmāsa pāṇḍavaḥ | aratninā cābhihatya śiraḥ kāyādapāharat
फिर क्रोध से उन्मत्त पाण्डुपुत्र ने उसे भुजाओं में बलपूर्वक भींचकर उसके सारे अंग चूर-चूर कर दिए, और कोहनी से प्रहार करके उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
श्लोक 71 (3.158.71)
संदष्टौष्ठं विवृत्ताक्षं फलं वृक्षादिव च्युतम् । जटासुरस्य तु शिरो भीमसेनबलाद्धृतम् । पपात रुधिरादिग्धं संदष्टदशनच्छदम् ॥
saṃdaṣṭauṣṭhaṃ vivṛttākṣaṃ phalaṃ vṛkṣādiva cyutam | jaṭāsurasya tu śiro bhīmasenabalāddhṛtam | papāta rudhirādigdhaṃ saṃdaṣṭadaśanacchadam
भीमसेन के बल से उखड़ा जटासुर का सिर, होंठ दाँतों में दबाए और आँखें फिराए, पेड़ से टपके फल की भाँति रक्त से लथपथ होकर गिर पड़ा; उसके दाँत होंठों में गड़े हुए थे।
श्लोक 72 (3.158.72)
तं निहत्यमहेष्वासो युधिष्ठिरमुपागमत् । स्तूयमानो द्विजाग्र्यैस्तु मरुद्भिरिव वासवः ॥
taṃ nihatyamaheṣvāso yudhiṣṭhiramupāgamat | stūyamāno dvijāgryaistu marudbhiriva vāsavaḥ
उसे मारकर वे महाधनुर्धर युधिष्ठिर के पास आए, और श्रेष्ठ ब्राह्मण उनकी वैसे ही स्तुति करने लगे जैसे मरुद्गण इन्द्र की करते हैं।